राष्ट्रवादी ताकतों की हार पर दुख और हताशा जताने वाला एक लेख पढा । पर लेख के अंत में उत्साह बढाने वाली हरिवंश राय बच्चन की यह कविता पढकर बहुत अच्छा लगा । काँग्रेस ने शायद इसी तर्ज पर काम किया होगा । अब भाजपा हो या हम में से कोई सबके लिये यह कविता संबल बनकर उभरती है । कितनी बार जीवन में ऐसे प्रसंग आते है जब हम चारों तरफ से निराश और हताश हो जाते हैं । उस वक्त के लिये यह कविता ।
नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर
यह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया
फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात भय से
भीत जन जन भीत कण कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर
क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों में
उषा है मुसकराती
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए
जो जा रही है
वह सहज में ही पवन
उनचास को नीचा दिखा रही है
नाश के दुःख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में
सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर
नेह का आव्हान फिर फिर ।
सोमवार, 18 मई 2009
रविवार, 10 मई 2009
माँ, तुमने
माँ, तुमने
सही मेरी कितनी ही शैतानियाँ
और अनदेखी सी कर दीं कितनी ही नादानियाँ
डाले परदे मेरी कितनी ही बदमाशियों पर
और फिर बांटीं हमेशा दु:खभरी तनहाइयां
पऱ अकेले में सदा ही दी समझ पहचान की
क्या सही है क्या गलत है, मान की अपमान की
तभी तो बन सका हूँ मैं जो कुछ भी आज हूँ
धन्यवाद कह नही सकता, मै तेरा ही साज़ हूँ ।
आज का विचार
जब आप कुछ पाना चाहते हैं तो सारा ध्यान उसीपर केंद्रित करें, आप अवश्य सफल होंगे ।
स्वास्थ्य सुझाव
चुकंदर को उबाल कर सलाद में खाइये ये हीमोग्लोबीन की मात्रा बढाता है ।
सही मेरी कितनी ही शैतानियाँ
और अनदेखी सी कर दीं कितनी ही नादानियाँ
डाले परदे मेरी कितनी ही बदमाशियों पर
और फिर बांटीं हमेशा दु:खभरी तनहाइयां
पऱ अकेले में सदा ही दी समझ पहचान की
क्या सही है क्या गलत है, मान की अपमान की
तभी तो बन सका हूँ मैं जो कुछ भी आज हूँ
धन्यवाद कह नही सकता, मै तेरा ही साज़ हूँ ।
आज का विचार
जब आप कुछ पाना चाहते हैं तो सारा ध्यान उसीपर केंद्रित करें, आप अवश्य सफल होंगे ।
स्वास्थ्य सुझाव
चुकंदर को उबाल कर सलाद में खाइये ये हीमोग्लोबीन की मात्रा बढाता है ।
शनिवार, 2 मई 2009
हो गये चुनाव

लो हो गये चुनाव
वोट डालने का पांच सालाना याग खत्म हो गया
हमें न कुछ मिलना है न मिला था
बस बंदर बांट का सिलसिला नये से शुरू हो गया ।
तो फिर क्यू डालें हम वोट, क्यूं उठायें जहमत
कतार में खडे होने की एक बार और
हो गये हैं खासे बोर
कोई जीते कोई हारे हमें क्या,
हम वोट दें ना दें तुम्हें क्या,
जो भी आयेगा
खूब खायेगा
औघा जायेगा तब भी
ना रुकेगा
क्यूं कि लालच का अंत नही
सात पीढियों तक की ही सोचें ऐसे वो संत नहीं
हमें तो करनी है वही मजदूरी
जमींदारों की बेगारी
मालिकों की तलबगारी
वही सोचना है दो वक्त की रोटी का
बडी होती बेटी का
खाली पेट और खाली झोटी का ।
और गरमी भी क्या गजब़ की पडी है इस बार
न कहीं छाँव न पानी की फुहार
सब तरफ से हमारी ही हार
ऊपर वाला भी ना सुने गरीब की पुकार
तो ये नेता क्या सुनेंगे
इनके कान में तो ये इसके बाद रुई ठूँस लेंगे
कहाँ है रोजगार, कहाँ हैं सडकें, कहाँ है पीने का साफ पानी
और कहाँ है सुरक्षा ?
सिक्कों की खन खन में, ना नोटों के फुसफुस में
ये बातें लगतीं हैं बेमानी
पर अगर अभी हम ना जागे
जो हैं थोडे से लोग अच्छे
उन्हें ना लाये आगे
तो ये ऐसा ही चलेगा
बद से बदतर होता जायेगा
इसलिये शायद करना चाहिये हमें
इस इकलौती ताकत का इस्तेमाल
तो शायद कभी सुधरे हमरे बेटों का हाल ।
आज का विचार
ईश्वर मुझे अपने बारे में ऊँचे विचार रखने में मदद करे ।
स्वास्थ्य सुझाव
जौ का पानी लगातार ३ महीने पीने से आपके शरीर से विषैले पदार्थों का निकास होने में मदद मिलती है ।
रविवार, 19 अप्रैल 2009
दंतकथा

इसकी शुरुवात कोई चार पांच साल पहले दिल्ली में हुई । मेरे पतिदेव के दांत में दर्द था और हम कोई अच्छा सा दाँत का डॉक्टर खोज रहे थे । राजू (मेरा बडा बेटा) से बात हुई तो बोला,” अरे, अपना अनुपम है ना, वसंत कुंज में ही तो है उसका क्लिनिक कर देगा आपका इलाज या फिर डॉ. जैना के पास चले जाइये“ । डॉ. जैना यानि बडी बहू के रिश्तेदार, हमसे पैसे नही लेंगे वगैरा वगैरा । तो हमने डॉ. अनुपम को फोन किया । तीसरी कक्षा से राजू का सहपाठी था .और मै जब एनसीईआरटी में काम करती थी तो ये सब बच्चे नीचे केंद्रीय विद्यालय में तीसरी कक्षा में पढते थे । बेक्टीरिया देखने मेरे पास लैब में आया करते थे । इतना विनम्र और प्यारा बेटा कि दूसरे ही दिन गाडी लेकर हमें लेने आ गया । इनका इलाज भी २-३ दिन में अच्छे से हो गया । बातों बातों में मैने उसे बताया कि .मेरी दो डाढों मे पिन जाये इतने बडे सूराख हैं अभी तो मुझे कोई परेशानी है नही लेकिन क्या आगे होगी ? तो उसने कहा इन्हें भरवा देते हैं सिरेमिक से मैने कहा मुझे डेन्टिस्ट की सुई से बडा डर लगता है, ५८ साल की हो गई पर अब तक डेन्टिस्ट से बच के रही हूँ । तो वह हँस के बोले, “ अरे आंटी आपको पता भी नही चलेगा । तीन दिन बाद अंकल को आना है तभी आप भी आ जाइये “ । और तीन दिन बाद मैने ओखली में सिर दे ही दिया ।
मेरे सारे दाँतों (३२) की बडे ही नफासत से उन्होंने सफाई की । पार्श्व में धीमा धीमा संगीत (हिमालयन चान्ट्स्) और बहुत ही मृदु आवाज में इधर उधर की बातें करके मेरा ध्यान बटाता हुआ डॉक्टर । मेरे डाढों के छोटे छोटे सूराखों को मशीन द्वारा बडा बडा कर के फिर उन्हें सीमेन्ट से भर दिया गया । इसके पहले बहुत ही महीन सुई से सुन्न करने का इंजेक्श न लगाया गया । कुल मिला के किसी विजयी वीर की तरह मै क्लिनिक से बाहर निकली और मेरा डेन्टिस्ट का भय भी जाता रहा ।
इसके तुरंत ही बाद हमें अमरीका जाना था । वहां जाकर हम दोनो ने अनुपम की खूब तारीफ की और मेरे दमकते दातों को देख कर राजू ने कहा, "वाह आय एम इंम्प्रेस्ड ”। तीन चार महीने तो सब ठीक चला पर एक दिन एक डाढ का सीमेंट उखड कर निकल आया । फिर बचे दो ढाई महीने वही डाढ बचा बचा कर खाना खाना चला । अमेरिका से वापसी पर फिर अनुपम जी की शरण ली । डॉक्टर के तो हम कायल थे, हमारे जाते ही झुक कर पांव छूना हमारा हाल चाल पूछना आदि बराबर करते । डाढ़ देखने पर बोले कि इसका रूट कनालिंग करना पडेगा वो करके पक्का फिलिंग करेंगे और फिर कैप कर देंगे फिर आपको कोई तकलीफ नही होगी । दोनों डाढों का करेंगे । ३-४ सिटिंग दे कर रूट कनालिंग और फिलिंग हुआ फिर बताया कि अब कैपिंग १५ दिन बाद करेंगे।
इस बीच हमें देहेरादून जाना पड गया । वहाँ इत्तेफाकन सोनपापडी खाते हुए कुछ कठोर चीज डाढ़ के नीचे आ गई और खोखलेपन की वजह से वह दो टुकडे हो गई । एक टुकडा एकदम हिल गया था और वह हिस्सा खूब दर्द भी कर रहा था । फिर देहरादून में डेन्टिस्ट को ढूँढा । तो डॉक्टर साहब ने कहा कि आधी डाढ टूट गई है और अपने जगह से हिल गई है इसे तो निकालना ही पडेगा पर बाकी आधी ठीक है इसे आप दिल्ली जा कर कैपिंग करवा लेना ये आधी मै निकाल देता हूँ । एक मोटासा इंजेक्शन देकर बाईं और का जबडा सुन्न किया गया और फिर आधी डाढ़ निकाली गई । इंजेक्शन लेने में काफी दर्द हुआ और बादमें मसूढा भी काफी सूज गया । ऐसे मे अनुपम की बडी याद आई । खैर ३-४ दिन में देहेरादून मसूरी से वापिस आये तब तक सब ठीक हो गया । डॉ. अनुपम ने देख कर कहा कि कैपिंग अब भी हो सकती है । तो कैपिंग करवाई और हम वापिस अमेरिका । वहाँ तो सब बढिया रहा भारत आकर भी सब ठीक ही था ।
एक दो महीने गुजरने के बाद लगा कि डाढ हिल रही है । लेकिन डॉ को दिखाने का मौका ही नही लग रहा था । इसी बीच रांची बोकारो का ट्रिप लगा । वहाँ से आकर डॉ अनुपम को दिखाया तो उन्होने कैप को कुरेद के हिला के देखा पर वह तो अंगद के पैर की तरह जमी हुई थी, पर अंदर की डाढ पिजडे के पंछी की तरह छटपटा रही थी । अभी चलने देते हैं आप अगली बार आयेंगी तब देखेंगे । सिर्फ ब्रश और फ्लॉस का खयाल रखना । इन्हें कुछ रूट केनालिंग करवाना था सो करवाया और वापिस अमेरिका । दातों का खूब ख्याल रखती दोनो वक्त ब्रश और फ्लॉस करती कि यहाँ डेन्टिस्ट का खर्चा न पडे । पर नही हुआ कुछ भी सब ठीक से निबट गया ।
इस बार जब वापिस आये तो तुरंत ही अनुपम को दिखाना चाह रही थी पर कुछ वाकयात ऐसे बने कि नही हो पाया, तो २-३ महिने बाद गये फिर अनुपम जी के शरण में । देख कर बोले डाढ़ काफी हिल रही है ज्यादा देर तक ऐसे छोडा तो इनफेक्शन हो सकता है इसे तो निकालना ही पडेगा । अगले हफ्ते आ जाइये । इसी बीच २-३ दिन बाद मुझे लगा कि मेरे सारे दातों मे ही दर्द है । इस दर्द के उद्गम को खोजना मुश्किल हो रहा था पर अपॉइन्टमेन्ट तो पांच दिन बाद था तो लौंग मुह में रख कर काम चलाते रहे ।
जैसे ही नियत दिन आया मै उतावली में आधा घंटा पहले ही पहुँच गई । पर मुझसे आगे कतार में ४-५ पेशंट पहले से थे । करीब एक घंटे बाद मेरा नंबर आया । डॉ. साहब को सब बताया तो निरीक्षण परीक्षण के बाद बोले दूसरे बाजू के डाढ़ में कीडा लगा है । इसकी सफाई करते है फिर फिलिंग कर देंगे । सो उस दिन तो सिर्फ उस डाढ़ की सफाई हुई .। तीन दिन बाद उसी की मरम्मत और अगले तीन दिन बाद का अपॉइन्टमेन्ट मिला आधी हिलने वाली डाढ़ के लिये । फिर गये साहब, आखिर मरता क्या न करता । बाहर की कैप इतनी बुलंद कि उसे उखाडने के लिये डॉक्टर साहब को काफी मशक्कत करनी पडी । मैं अपनी साँस अंदर खींचे लेटी रही कि अब खून का फव्वारा छूटा तब छूटा पर नही ऐसा कुछ नही हुआ क्यूंकि मेरी एस्पिरिन ८ दिन पहले ही बंद करवा दी गई थी और इंजेक्शन भी दे दिया था । तो साहब पहले कवच उतरा और फिर कुंडल की तरह हिलती मेरी आधी डाढ । उसको भी तीन टुकडों मे निकालना पडा क्यूं कि इसका एक रूट बहुत ही मजबूत था । “आज इधर से कुछ नही खाना और एक घंटे तक कुछ खाना ही नही “, एक मोटासा कपास का गोला उस खाई मे ठूंस कर डॉ.अनुपम बोले और हाँ रास्ते में यह दवाइयां खरीद लेना दिन में दो बार खानी हैं । हामी भरकर मैं चली आई तो साहब घाव तो ठीक हो गया पर वह जो खाली पन आगया वह कैसे कटे ? वहां आलू का टुकडा, मटर, कॉर्नफ्लेक्स मजे से फँसते हैं और मेरी जीभ के साथ लुकाछिपी खेलते हैं ।
अनुपम को बताया तो बोले कि ब्रिज कर सकते हैं पर आपको तो जाना है और इतनी जल्दी टिशू की नरमी जायेगी नही आप वापस आइये तब देखेंगे । बहर हाल अपने बिछडे डाढ के वियोग में समय काट रहे
है । एक बात बताऊं जब तक संभव है दांत के डॉक्टर के पास जाना नही, नही तो ये नित्य की बात बन जायेगी ।
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
लोरी

विपुल ओर रचना हाल ही में एक नन्ही सी बेटी से लाभान्वित हुए हैं ।
उनकी इस प्यारी सी बिटिया के लिये ये लोरी
मेरी नन्ही सी परी
बाबा माँ की दुलारी
प्यारी प्यारी सुकुमारी
सोजा चुप होजा ।
तेरे लिये आँखों के दिये जलाये हैं
तेरे लिये हाथों के पलने झुलाये हैं
कितना कितना करें जतन
फिर भी ना रुके रुदन
ना रो रे फुलवारी
प्यारी प्यारी सुकुमारी
सोजा चुप हो जा ।
हवा ने तेरे लिये गीत गुनगुनाये हैं
चांद तारों ने नये सपने साथ लाये है
रात रानी ने कैसी खुशबु बिखेरी है
दादी ने भी फूलों से नजर उतारी है
जाऊँ तो पे वारी वारी
प्यारी प्यारी सुकुमारी
सोजा चुप होजा ।
शनिवार, 21 मार्च 2009
अजन्मी संतान हूँ

माँ मुझे तू जान ले पहचान ले
मैं तुम्हारी अजन्मी संतान हूँ ।
हूँ तुम्हारी तरह मैं भी एक नारी
एक अनुपम ईश्वरी वरदान हूँ । माँ मुझे तू जान ले
किसने बनाया ये नियम तुम कुछ तो बोलो
सोच क्या अब भी यहीं तक है तुम्हारी
कि मैं हूँ कमतर एक पुरुष संतान से
इसलिये अभिशाप हूँ अपमान हूँ । माँ मुझे तू जान ले
खोल आँखे देख ले चहूँ और अपने
नारियों नें भी हैं देखे कितने सपने
सिर्फ देखे ही नही सच किया उनको
उनकी तरह मैं भी तो प्रतिभावान हूँ । माँ मुझे तू जान ले
हिम्मत दिखा माँ जन्म लेने दे तू मुझको
मैं ही बँधाऊँगी हमेशा धैर्य तुझको
तेरे लिये भिड़ जाऊँगी संसार से भी
मै कोई लानत नही सम्मान हूँ । माँ मुझे तू जान ले
आज का विचार
नारी पल की पत्नी तथा अनंत काल की माता है ।
स्वास्थ्य सुझाव
कच्चे केले और कच्चे पपीते की सब्जी खायें इससे आपके फेफडों को मजबूती मिलती है ।
शनिवार, 7 मार्च 2009
होली

उड रहे रंग अबीर गुलाल
होली खेल रहे नंद लाल ।
गोपी ग्वाले दंग हो गये
श्रीरंग के रंग में खो गये
हवा वसंती लगी डोलने
हिलोरें उठीं प्रेम-रस-ताल । उड रहे....
मगन हो रहीं वृक्ष लताएँ
लिख कर फूलों की कविताएँ
भौंरे गुनगुन गीत सुनाते
बसंत की बाज रही खडताल । उड रहे....
मना रही गोकुल में होली
बरसाने की राधा भोली
कनखी से देखे वनमाली
मगन सब गोपी ग्वाल बाल । उड रहे....
आज का विचार
दुनिया में अच्छे लोग ज्यादा हैं और बुरे कम इसीसे दुनिया चलती रहती है ।
स्वास्थ्य सुझाव
मेथी का साग फेफडों के स्वास्थ्य के लिये गुणकारी है ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)