शनिवार, 14 मई 2011

जिंदगी



लहर में बहती
बिना पतवार
एक नांव

हिचकोले खाती
उछलती
ठांव ठांव

एक माझी
एक चप्पू
जोरों की हवा

हवा से लडती
और उखडती
एक नाव

जिंदगी क्या इसीका नाम है ?
कभी उलटती
फिर सम्हलती
एक नाव ।

जिंदगी-२

पानी में बहते
पत्ते सी
मेरी जिंदगी
कभी तेज
तो कभी धीमें चलती
जिंदगी ।

हवा के झोंके , पत्थर
पेडों के तने
इनके असर पर
डगमगाती जिंदगी ।

एक लहर साथी को
कर देती अलग
अफसोस में फिर
आह भरती जिंदगी

अपना नही चलता
जब कोई जोर है
तो घुटन में
कसमसाती जिंदगी

कोई दिशा
मिलेगी क्या
इसको कभी
या फिर यूं ही
कटेगी जिंदगी ?

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

सूरज से बडे




रात की महफिल में छलके जाम कितने
किसने गिने हैं किसने देखे ख्वाब कितने ।

किसने सुनाई नज्म यार-ए बेरुखी की
और मुहब्बत को नवाज़ा किसने किसने ।

अपनी बारी का किये हम इन्तजार,
पर शम्मा को आगे बढाया, हाय, किसने ।

कितनी आहें, कितने उफ, तौबायें कितनी
कह न पाये कुछ, हुए गुमनाम इतने ।

वो रकीब, वो बन गया महफिल का सूरज
वो ही रहा कहता गज़ल, वाह, वाह, कितने ।

हम उठे मेहफिल से जब मायूस हो कर
पूछा किया वह आसमाँ में चांद कितने ।

दूर हैं बस, टिम टिमा कर आह भरते
वरना सूरज से बडे, हैं सितारे कितने ।

रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्यार की कुछ क्षणिकाएँ

मन में मचती है खलबली सी
आ जाती हैं जब वो, अच्छे नसीब सी
जाते जाते हो जाती हैं कुछ और करीब सी

मेरे मन की तरह ही समंदर में उठती लहरें
मेरे मन जैसे ही इसके भाव कुछ छिछले, गहरे
पर ये उन्मुक्त, और मुझ पर कितने पहरे

कुछ दिन कैसे बन जाते हैं खास
मन में जगाते हैं कोमल कोमल अहसास
वो आयें या ना आयें लगे कि बस हैं आस ही पास

प्यार किसे कहेंगे, कैसे समझायेंगे
कोशिश करते हैं, शायद कामयाब हो जायेंगे
जैसे आ जाता है न बुखार, वैसे ही हो ही जाता है प्यार ।

कितनी उदासी छा जाती है ,
जैसे सूरज पे बदली मंडराती है
जब कई कई दिन फोन नही आता, न कोई मेल आती है ।

पॉवर कट के बाद बिजली की तरह, जब तुम आते हो
यूं लगता है कि गरमी में ए सी की ठंडक लहराती है
तबियत बाग बाग मन में हरियाली छा जाती है ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

दुनिया झुकती है


ये कौनसा सूरज निकला है
ये किरण कहां से फूटी है
जो सालों में नही हुई
हो रही वो बात अनूठी है ।

“झुकाने वाला चाहिये”
आज फिर सच होते देखा
सैलाब ये जनता का हमने
फिर आज उमडते देखा ।

आंदोलन किसको कहते हैं
जनता की ताकत क्या होती
ये आज पता लग जायेगा
मगरूर सी इस सरकार को भी ।

जड से है हिला दिया इसको
ये डर के मारे ही चुप है
चलते चुनाव में क्या होगा
यही तो इसकी धुक धुक है ।

इसकी ही क्यूं उन सारों की
है अब खडी हुई खटिया
राजनीति के नाम पे ही
जनता को जिनने सदा दुहा ।

अण्णा तुम बापू बन आये
और बन आये तुम जयप्रकाश
मिटाने भ्रष्टाचार का तम
और फैलाने सच का प्रकाश ।

अब देश का बदलेगा स्वभाव
इसका चरित्र भी बदलेगा
जब हम सब साथ खडे होंगे
और युवा देश उठ गरजेगा ।

सोमवार, 28 मार्च 2011

हासिल



आसमान के चांद तारे तोड लाने की बात करते थे तुम
फूल तक तो ला नही पाये कभी आज तक

ऐसा क्यूं होता है कि पत्नि बनते ही
प्रेमिका की अर्थी उठ जाती है
रोमांस और रोमांच खुदकुशी कर लेते हैं
या फिर जर्जर हुए, दम टूटने का इन्तजार

क्यूं मै हमेशा रही हासिल की तरह, तुम्हारे लिये
कभी उत्तर नही बन पाई हमारे गणित का

मेरे साथ चलते हुए भी इधर उधर भटकती तुम्हारी आँखें
फूल फूल पर मंडराने वाले भौरें की ही याद दिलाती रहीं
मै तो नन्दादीप बनी जलती रही तुम्हारे मंदिर में
पर तुमने कब आंख खोली मेरे लिये

छोडो अब, इस बहस की कोई जगह नही
मैनें सीख लिया है अपने लिये जीना ।

सोमवार, 21 मार्च 2011

चलते ही जाना ४-हेदवी, वेळणेश्वर, हरिहरेश्वर


हेदवी, ये जोगळेकर लोगों का यानि हम लोगों का गांव है यहां ज्यादा तर लोगों का आखरी नाम जोगळेकर है । यहां पर दशभुजा गणपती का एक सुंदर मंदिर भी है । हमारी बस खूब ऊँचे नीचे रास्तों से जा रही थी शायद विजय ने कोई शॉर्ट कट ढूँढा था । वनस्पती की यहां भी भरमार थी । सच में कोकण प्रदेश की यह हरियाली बहुत सुख और आनंद दे रही थी । तो कोई दो घंटे बाद हम हेदवी के मंदिर पहुँचे । सीढियां चढ कर ऊपर गये मंदिर में प्रवेश कर गणपति की सुंदर मूर्ती के दर्शन किये । यह दशभुज लक्ष्मी-गणेश कहलाते हैं । गणपति के दसों भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं । बाहर काफी बडा प्रांगण है, दीप स्तंभ भी हैं । प्रदक्षिणा की और बाहर थोडी देर बैठे । (विडियो देखें)

भूख लगी थी तो पता किया नाश्ता कहां मिलेगा । वहां दो किशोर वय के ल़डके बैठे थे उनसे पूछा तो वे बोले आप को हरि-हरेश्वर जाना है ना तो आप वेळणेश्वर होते हुए जाइये और वहां दर्शन कर के नाश्ता कीजिये, नंबर वन पोहे मिलेंगे । उनकी बातों में इतना रस था कि हम फौरन ही चल पडे वेळणेश्वर के लिये । हेदवी में नाश्ता नही किया पर खोये के मोदक और आमरस का गोला खरीदा । नीचे उतर कर बस में बैठे और चल पडे वेळणेश्वर के लिये । (विडियो देखें)

लगभग एक घंटे में हम वेळणेश्वर पहुंच गये यह स्थान गुहागर से कोई २६ कि.मी. है पर हम तो हेदवी से आये थे । वेळणेश्वर एक बहुत पुरातन महादेवजी का मंदिर है । मंदिर बहुत बडा और सुंदर है । यहां हर वर्ष शिवरात्री पर बडा उत्सव होता है । वैसे भी भक्तों की भीड तो हमेशा ही होती है । हम मंदिर में गये तो पूजा हो रही थी सुंदर सुंदर भजन गाये जा रहे थे । एक भक्तिमय वातावरण की सृष्टी हो रही थी । वेळणेश्वर का समुद्र किनारा भी बहुत सुंदर है । दर्शन तो हो गये अब हमें तो पहले पेट पूजा करनी थी साड़ेग्यारह बज चुके थे और नाश्ते का भी अता पता नही था । तो हम मंदिर के पास ही एक रेस्तरॉं में गये वहां तो खाना भी तैयार था सबने खाना खाया, पर मुझे और विजुताई को एक नंबर के पोहे खाने थे तो हमने तो वही ऑर्डर किये । पोहे वाकई बहुत अच्छे थे । सोलकढी पी और श्रीखंड भी खाया । फिर गये बीच पर । नारियल और सुपारी के पेडों से सुशोभित ये किनारा शांति से आराम करने के लिये एकदम उपयुक्त है । तो वहीं थोडी देर बैठे । आज ही हमें हरिहरेश्वर पहुंचना था । हरिहरेश्वर में हमारा पडाव था दो दिन । हमारा एम टी डी सी में बुकिंग था । हरिहरेश्वर को जाते हुए बहुत ही सुंदर एक घाटी लगी एकदम बादलों से भरी हुई । प्याली में सफेद रंग के ‘बुढ्ढी के बाल’ भरे हों जैसे । वहां हमने बहुत से फोटो भी खींचे ।
हरिहरेश्वर पहुंचते पहुंचते शाम हो गई थी । हम गये एम टी डी सी । हमारी कॉटेजेज बहुत ही सुंदर थीं, साफ सुथरी । तो सामान रख कर हम परिसर देख आये । हम यहां दो रात रहने वाले थे और २८ को चल कर दिवे-आगर होते हुए ठाणे वापिस जाना था । हमने प्लान बनाया कि हम कल सुबह उठ कर हरिहरेश्वर मंदिर जाकर दर्शन करेंगे फिर समुद्र किनारे जायेंगे । प्लान के अनुसार ही हम लोग तैयार होकर निकल पडे । हम जब एक दूसरे के लिये वेट कर रहे थे तो एक छोटू अपने पापा के साथ ऊपर से देख रहा था, पापा की गोदी में से ही खूब बातें चल रही थीं । नीचे भी आना था । उसे बाय कर के बस में बैठे ।
हम सब पहले मंदिर गये यहां दो मंदिर हैं एक हरिहरेश्वर जी का और एक काल-भैरव का । कालभैरव मंदिर में दर्शन कर के ही हरिहरेश्वर के मंदिर में जाना होता है । यह मंदिर काफी प्राचीन है शायद शिवाजी के काल का इसका जीर्णोध्दार प्रथम बाजीराव पेशवा ने किया । समंदर के साथ जो पहाड है उसका नाम है हरिहर एक और नाम भी है पुष्पाद्री । इसे दक्षिण की काशी कहा जाता है । इस मंदिर में ब्रम्हा विष्णु महेश के साथ साथ देवी पार्वती की भी प्रतिमा है । काल भैरव के अलावा यहां योगेश्वरी मंदिर भी है । मंदिर के प्रांगण से ही समुद्र दर्शन किये जा सकते हैं । मंदिर के रास्ते में ही एक अच्छा सा रेस्तरॉं देख कर हमने हेवी नाश्ता कर लिया । फिर हम गये बीच पर, मंदिर से दूर था यह बीच इसीलिये शायद हमारे अतिरिक्त यहां कोई भी नही था । हम लोग थोडी देर तक तो बीच पर घूमते रहे फिर सुहास ने सबको पानी मे भिगो दिया और अंततः हम सब महिलाओ ने तो स्नान ही कर लिया । बहुत मज़ा आया । हमारे प्रकाश भाउजी को बडी शरम आ रही थी शायद, वे वहां से काफी दूर टहलने लगे । सुरेश ने तो हमारे मौजमस्ती की शूटिंग कर ली । समंदर से बाहर निकले तो दूर एक बगुलों का झुंड था उनकी तस्वीरें खींचने के लालच से मै दूर तक चली गई उससे दो फायदे हुए तस्वीरें तो खींची ही साथ ही साथ कपडे भी सूख गये । समंदर के आसपास केवडे के जंगल थे । वहां से बाहर आये तो सीधे अपने ठिकाने पर । कपडों में बदन पर रेत ही रेत चिपकी थी तो नहाना तो जरूरी था । कोई आधा किलो रेत निकली होगी ।(विडियो देखें)bath

फिर थोडी देर आराम करने के बाद सब को चाय की तलब लग गई, तो हम गये एम टी डी सी रेस्तराँ । वहां के मेनेजर से खूब बातें की । वे बताते रहे कि कैसे उन्होने ये रेस्तराँ के आस पास के बगीचे को लगाया और उसका रखरखाव अब भी कर रहे हैं । बहुत अच्छा लग रहा था वहां बैठ कर । तभी वहां पर एक मुर्गी अपने खूब सारे चूजों सहित आ गई तो सबका ध्यान उधर ही चला गया, काफी देर तक हम उन्हीं की एक्टिविटी देखते रहे । मुर्गी आगे आगे चूजे पीछे पीछे ।(विडियो देखें)

फिर डिनर किया और थोडी देर टीवी देखा गप्पें लगाई और सो गये । हमें कल निकलना था दिवे-आगर के लिये । वहां पर सोने के गणपति जी का मंदिर है वही सबको देखना था । वहीं बापट जी के खानावळ में यहां खाना खाने का तय किया । सुबह हमें सात बजे तैयार रहना था तो रात को ही सामान बांध के तैयार थे हम ।
यहां से दिवे-आगर कोई ४ घंटे का रास्ता था । दिवे आगर जाते हुए हमने अंताक्षरी खेली । पहले गणपति मंदिर पहुँचे । इन गणपति जी की भी एक कथा है। ये गणपति का १.२५ फीट लंबा सोने का मुखौटा श्रीमति द्रौपदी धर्मा पाटील को उनकी वाडी (बगीचे) में काम करवाते हुए मिला । गणपतिजी एक तांबे के एक बडे से बक्से में पाये गये इसके साथ ही मिला गणपति जी के आभूषणों का डिब्बा । महिला ने इसे स्वयं रखने की जगह समाज को दान करने का ही निश्चय किया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग दर्शन का लाभ उठा सकें । वही यह मंदिर है । मंदिर में पूजा हो रही थी वह देखी दर्शन किये थोडी देर बैठे और चल पडे । बापट जी का भोजनालय ढूँढना था ।
रास्ते में बहुत सुंदर एक वाडी थी वहां जमीन पर सुपारीयां गिरी हुई थी सुंदर नारंगी रंग की कच्ची सुपारी । एक लडकी को मांगा तो उसने दो फल दे दिये । बापट जी का भोजनालय तो मिला नही पर एक अन्य मिल गया वहां पर पोहे खाये क्यूं कि खाना डेढ़ बजे से पहले नही । और खायी आंबोळी । आंबोली चावल के आटे को फरमेन्ट करके बनाये चीले होते हैं जो काफी स्वादिष्ट थे । (विडियो देखें)

यहां का बगीचा बहुत सुन्दर था तरह तरह के फूलों वाले पौधे थे । हमारा पेट भर गया तो गये समुद्र देखने । रास्ते में फिर केवडे के वन मिले एक दो भुट्टे (फूल) पीले हो गये थे और भीनी भीनी खुशबु फैल रही थी । । समुद्र देख कर फिर वापिस अपने बस पर । बस को अब वापसी का रास्ता पकडना था मै और सुरेश पनवेल में मेरे भांजे के यहां रुकने वाले थे बाकी लोगों को ठाणे जाना था । पनवेल में रवि और बहू ने बडी खातिरदारी की, नई बंबई के मॉल में भी घुमाया । हम दो दिन बाद ठाणे पहुँच तो लतिका अपने घर चली गई थी विजूताई भी एक दिन बाद चली गईं । हम चारों सुहास विजय मै और सुरेश ३१ को इंदौर होते हुए दिल्ली पहुँचे । इंदौर में विजय के भतीजे अनिल और शैला से मिले । महाकालेश्वर के दर्शन करने उज्जैन गये । ट्रिप में खूब मज़ा आया जो सब के साथ होने से दुगना हो गया । सबसे बिछुडते हुए बुरा तो लगा, पर साथ कुछ ही दिनों का हो तो उसकी मिठास कुछ और ही होती है ।

रविवार, 13 मार्च 2011

चलते ही जाना- ३ - गणपतीपुळे


सुबह ५ बजे उठकर चाय पीकर नहा धो कर तैयार हुए । सात बजे ठीक निकलना जो था हमारे टीम लीडर प्रकाश समय के एकदम पाबंद सात मतलब पौने सात बजे वे दोनो तैयार होकर बाहर खडे मिलते विजय गाडी के साथ सामान लोड करने को तैयार, तो जो भी आता उसे यही लगता कि देर हो गई शायद । तो निकल पडे चाय भरवा ली थी २५ कपी थर्मास में । ब्रेकफास्ट रास्ते में करना था पोहे या वडा पाव । हम सेटल हुए और बस चल पडी तो मैने कहा चलो अंताक्षरी खेलते हैं पर सब ने मेरी बात काटने की ठान रखी थी ।
तो जवाब आया, नही।
मैने कहा हाँ ।
हाँ क्या हाँ, अभी नही खेलना ।
नही तो मत खेलो मेरी बला से ।
समझा करो अभी तो नाश्ता भी नही किया, कणकवली में नाश्ता करेंगे फिर खेलेंगे ।
गणपति बाप्पा देखना इनको ।
हमारे संवाद सुन कर लगा कि ये तो गद्य़ अंताक्षरी हो गई और हम खूब हंसें ।
फिर कणकवली में वडा पाव का नाश्ता किया और लतिका ने जोक सुनाया कि वट पौर्णिमा के दिन औरतें व्रत रखती हैं और दिन भार वडा पाव, वडा पाव करती रहती हैं । (वडा पाव माने “हे वट वृक्ष मुझे प्रसन्न हो ।“ ) तो हम हंसते हंसाते चलते जा रहे थे ।
पहले हमें जाना था गणपतिपुळे, यहां के गणपतिजी समुद्र के किनारे विराजे हैं । हमारा रास्ता रत्नागिरि होकर ही जाता था । रत्नागिरि ४ घंटे और फिर करीब एक घंटा गणपतिपुळे । हमारे एक रिश्तेदार मालगुंड में रहते थे उनसे हमने अच्छी खानावळ के बारे में पूछा था उन्होने बताया । उन्हें हमारी पसंद बता दी थी । उन्होने कहा कि आप एमटी डी सी कॉटेजेज में रुके हो तो वहां से पास ही भाऊ जोशी का रेस्टॉरेन्ट है वहां आपको अच्छा खाना मिलेगा । जो चाहिये उन्हें पहले ही बता दें तो वे तैयार रखेंगे तो हमने जोशी जी से सम्पर्क कर के उन्हे हमारा प्लान तथा पसंद बता दी थी । (विडियो देखें )

कोकण के सुंदर रास्ते पार करते हुए हम करीब दो बजे पहुंचे एम टी डी सी । वहां ऑफिस में बात कर के हमारे कॉटेजेज की चाबियाँ ले लीं, सामान रखा और चल पडे खाना खाने । भूख जो लगी थी बहुत । रेस्टराँ अच्छा था और वरायटी भी बहुत थी मराठी, पंजाबी गुजराती सब तरह का खाना था । मोदक भी थे और सोल कढी भी । खा पी कर बाहर आये तो वहीं रेस्तरॉं के बाहर मेंगो-शेक पाउडर मिल रहा था वह खरीदा । बाहर छोटा मोटा हाट था वहां घूमें चीजें देखीं फिर अपने ठिय्ये पर आराम करने चले गये । शाम को मंदिर गये । यह थोडे ही दूर थी पर रास्ता ऊबड खाबड था तो हम बस से ही गये ।
हरे भरे नारियल और ताड के पेडों के झुरमुट में यह करीब हजार साल पुराना मंदिर स्वयंभू है । स्वयंभू का अर्थ है कि यह मूर्ती गढी नही गये वरन ऐसी ही पाई गई है जिसे भक्तों नें स्थापित कर यहां मंदिर बनाया । (विडियो देखें )

यहां प्रति वर्ष लाखों की संख्या में यात्री यहां आते हैं और दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं । पुळे मतलब रेत के टीले (सैंड ड्यून्स ) रेतीले किनारे का गणपती इसी से गणपती पुळे । इन ड्यून्स के साथ खेलता समुद्र का नीला पानी, लहराती हवा और इसके साथ बलखाते नारियल और ताड के वृक्ष एक बहुत ही सुंदर दृष्य की सृष्टी करते हैं । यहां के समुद्र में तैरना मना है । यह काफी खतरनाक माना जाता है । मंदिर के अंदर गणपति के दर्शन कर के मन प्रसन्न हो गया ।
ओम नमस्ते गणपतये,
त्वमेव प्रत्यक्षम् तत्वमसी,
त्वमेव केवलं कर्ता सी
त्वमेव केवलं धर्ता सी
त्वमेव केवलें हर्ता सी
त्वमेव सर्वम् खल्विदम् ब्रम्हा सी
मन में गूंज उठा ।
मंदिर में घूम कर प्रदक्षिणा नही कर सकते प्रांगण के बाहर से करनी पडती है जिसमें एक से डेढ घंटा लग जाता है । हमने तो वह नही किया । थोडी देर समंदर को देखते रहे पर वहां भीड बहुत थी । फिर हम थोडा घूम घाम कर वापिस आये। हमें तो बापट जी के यहां, जो मेरे छोटे भाई मिलिंद के साडू साहब हैं, खाना खाने जाना था वे हमें एम टी डी सी के गेट पर लेने आ गये थे । बाकी लोग वापिस कमरों में गये ।
बापट जी मालगुंड में रहते हैं मिलिंद भी यहीं शिफ्ट हो रहा है एप्रिल में । यहां मराठी के प्रसिध्द कवि केशव सुत का स्मारक है । मिलिंद ने कहा था कि हम बापट जी के साथ जा कर उसका बना हुआ घर देख कर आयें, तो बापट जी ने पहले हमें मिलिंद का घर दिखाया फिर अपना दिखाने से पहले हमें समंदर पर ले गये एकदम अनछुआ किनारा । केकडों की ऐसी अद्भुत चित्रकारी देखी कैमरा हाथ में ना होना बहुत खला । वहां उस क्वांरे समुद्रतट को देख कर मन बहुत ही प्रसन्न हो गया फिर घर गये । बापट जी ने तो अच्छा खासा बगीचा बना लिया है उसमें नारियल, काजू, और कोकम के पेड दिखाये । एक बिल्ली घूम रही थी पता चला एक नही दो हैं । कोकण में सांप बहुत निकलते हैं और जहरीले भी होते हैं इसलिये बिल्लियां । बिल्ली सांपों को खाती है यह हमें यहीं पता चला । बापट जी ने बढिया खाना खिलाया । हमने उनसे कहा कि हमें कल सुबह ही निकलना है तो वे हमें रात में ही हमारे ठिकाने पर छोड दें । जाते हुए अलका ने मुझे दो बडी बडी कौडियां दीं जो उसने खुद समंदर के किनारे से पाईं थीं । रात को घर (आज के लिये घरj ) आये बापटजी के साथ , प्रकाश के कमरे में टी वी चल रहा था थोडी देर वहां बैठ कर फिर अपने कमरे में, और आनंद मंगल ।
कल ही हम यहां से निकलने वाले थे हेदवी होते हुए हरि-हरेश्वर के लिये । (क्रमशः)