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गुरुवार, 29 मई 2014

मालगुंड (कोकण) की सैर




इस बार वापिस आने के बाद महीने के अंदर ही हमने घूमने का कार्यक्रम बना लिया। मालगुंड, पुणे,  पनवेल, ठाणे और वापिस।
मालगुंड- गणपतिपुळे के साथ ही लगा हुआ कोकण का एक गाँव जो अभी भी अपने गांव-रूप को जतन किये हुए है। मिलिंद और अचला ( मेरा छोटा भाई और भावज) ने वहीं अब अपना घर बसा लिया है। रांची में बहुत साल किर्लोस्कर इंजिनों की मरम्मत और बिक्री का काम करने के बाद अवकाश का शांत सा बसेरा।
इन दोनों के वहां जाकर बसने का एक कारण अचला की बहन अलका और बहनोई श्री वैद्यजी की मालगुंड में जा कर बसना था।  वे चाहते थे संग साथ तो बस उन्होने ही जमीन खरीदवाई और मकान भी बनवा दिया। मिलिंद अचला को सिर्फ २-४ बार वहां चक्कर लगाने और चेक काटने की जरूरत पडी और चाभी उनके हाथ में। सुंदरसा  दो तल्ला मकान २ शयनागार ऊपर दो नीचे, नीचे ही बडा सा हॉलनुमा ड्रॉइंगरूम कम लिविंग रूम कम किचन और डायनिंग। ऊपर बडी सी छत और नीचे बाहर अहाता पेड पौधे लगाने के लिये। सडक पार करते ही एक बडी सी केवडे की झाडी और झाडी के तुरंत  बाद सुंदर सा रत्नाकर यानि समंदर। यह मै इस लिये बता रही हूँ क्यूं कि हम रहते हैं दिल्ली जैसे महानगर के एक फ्लैट में और ये सब कुछ कल्पना ही है। बहर हाल हमारे सफर पर आते हैं।
रत्नागिरि स्टेशन पर जब हमारी त्रिवेंद्रम राजधानी कोई २२ घंटे के सफर के बाद पहुँची तो मिलिंद अचला को स्टेशन पर पाया वे गाडी लेकर हमें लेने आये थे क्यूं कि रत्नागिरि से मालगुंड के लिये वही सही था। बस सेवा नही के बराबर तो गाडी या टेम्पो ही हैं जाने आने के साधन।
हमारा सामान जिसे उठाने के दिल्ली में कुली ने ६०० रुं लिये थे मालगुंड में महज १२० रूं लिये। इस के बाद हम मिलिंद की ईको में बैठ कर चल पडे मालगुंड की और। कोई एक घंटे की सुखद यात्रा जिसमें बराबर आपको सागर दर्शन होता रहता है । यह किसी तरह कैलिफोर्निया की Seventeen miles scenic drive से कम न थी । घर पहुँचे नहा धो कर खाना खाया और आराम किया। शाम को गये बीच पर घूमने लंबे खाली बीच पर दो चक्कर लगाये और सूर्यास्त का बहुत सुंदर दृष्य का आनंद लिया। सूर्यदेव धीरे धीरे उत्तरी गोलार्ध की और प्रस्थान कर रहे थे। क्षितिज पर जहां आकाश और सागर का मिलन होता सा लग रहा था, हम प्रतीक्षा में थे कि सूर्य देव अब सागर में डुबकी लगा कर उत्तरी गोलार्ध में कहीं उदित हो रहे होंगे, उनके इसी ही रूप को देख कर कवि ने कहा होगा,
उदये सविता रक्तः रक्तश्चास्तमने गतः
संपत्तौच विपत्तौच महताम् एकरूपता।
हमने कुछ फोटो भी क्लिक किये।
एक मिलिंद के हथेली पर सूरज का भी लिया था पर कहीं खो गया। ( CLICK VDO  MVI 0044)
जाते ही हमने मिलिंद से कह दिया कि हम तो कोकण दो तीन बार घूम चुके हैं, तो इस बार इरादा सिर्फ
सागर किनारे रहने का आनंद उठाने का है । रोज सुबह उठते ही चाय पान के बाद हम पहुंच जाते बीच पर। मिलिंद-अचला ओर अलका तथा वैद्य साहब की तो यह रोज की ही दिनचर्या थी।तो दूसरे दिन सुबह हम पहुंचे बीच पर तो सागर देख कर ही आनंद आ गया। (CLICK VDO  MVI 0056)
 हर दिन सागर का अलग ही रूप होता था एक दिन तो हमने इतने सी गल्स देखे कि मज़ा आ गया। आप भी आनंद उठायें। (CLICK VDO  MVI 0964 )
CLICK VDO  MVI 0965
CLICK VDO  MVI 0966
 मिलिंद को फिर भी चैन न था । रोज़ ही शाम को गाडी निकाल कर कभी कोई बीच तो कभी किसी मंदिर का प्रोग्राम बन ही जाता था। वैसे भी कोंकण में समंदर और मंदर ही हैं देखने को और है सम्पन्न प्रकृति जो हर दिन अपना नया रूप लेकर प्रस्तुत होती है। सागर को ही लें वह हर दिन अलग दिखता है, सुबह, शाम, दोपहर भी अलग दिखता । नारियल, आम और काजू के पेड और काजू तथा आम के फूलों की खुशबू एक अदभुत वातावरण की सृष्टि करती थी। इन फूलों को हिंदी में बौर तथा मराठी में मोहर बोलते हैं।
ऐसे ही एक दिन मिलिंद हमें जयगड के गणेश मंदिर ले गया। ये मंदिर जिंदल स्टील एन्ड पॉवर कंपनी के इलाके में है। बहुत ही सुंदर बनाया है। मंदिर का परिसर साफ सुथरा है तथा चारों तरफ बगीचा है जिसमें रंगबिरंगे फूल खिल रहे थे और तरह तरह के पेड  पौधे भी अपनी हरियाली बिखेर रहे थे। मंदिर के अंदर की गणेश प्रतिमा ने तो मन मोह लिया। । मन में अथर्वशीर्ष का गणेश वर्णन तैरने लगा।
एकदंतम् चतुर्हस्तम् पाशमांकुशधारिणम,
रदंचवरदम् हस्तै बिभ्राणम् मूषकध्वजम्।
रक्तम् लंबोदरम् शूर्प कर्णकम् रक्तवाससम्,
रक्तगंधानुलिप्तांगम् रक्तपुष्पैसुपूजितम।
बहुत देर तक मंदिर में ही रहे फिर चारों तरफ चक्कर लगाया, मन बहुत प्रसन्न था लगा कि शाम सार्थक हो गई । काश कि हमारे सारे मंदिरों का रख-रखाव ऐसा ही हो।  (CLICK VDO  विडियो ००६१)
रोज जब हम बीच पर टहलते मेरी आंखें रत्नाकर के द्वारा फेके गये रत्नों यानि विभिन्न प्रकार के शंख, सीपियां और दूसरे समुद्री जीवों के  अवशेषों की तलाश में रहतीं। इसमें अचला की बहुत मदद होती थी. उसकी आँखें इस कार्य के लिये काफी प्रशिक्षित थीं। मेरे लाये हुए रत्नों में से कुछ की तस्वीरें तो मै आपको दिखा ही सकती हूँ। (CLICK VDO  विडियो MVI 968)
सोला तारीख को दत्त जयंती थी । मिलिंद ने कहा, यहां गांव के दत्तमंदिर में जन्मोत्सव होता है देखोगी, मैने कहा,” नेकी और पूछ पूछ। और इस तरह हम शाम को गांव के मंदिर जा पहुँचे। मंदिर सुंदर ढंग से सजाया गया था और ठसाठस भरा था, जैसे सारा गांव उमड पडा हो। यही हकीकत थी। गाँव के सारे लोग वहीं थे।
पहले तो दत्तगुरु के भजन हुए। फिर नामस्मरण हुआ, दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा। फिर दत्त जन्म हुआ। जैसे सचमुच हुआ हो इसी तरह औरतों नें उन्हें पालने में डाल कर झूला झुलाया, लोरियां गाईं । जन्मोत्सव के पेडे बाँटे गये और नामकरण हुआ। फिर  नवजात दत्तात्रय को दर्शन हेतु गोदी में उठा कर हर भक्त के पास ले जाया गया। यह सब मेरे लिये अनोखा था, लगा गोपाल नीलकंठ दांडेकर जी के किसी उपन्यास में मेरा प्रवेश हुआ है और में उसका एक हिस्सा बन गई हूँ। अद्भुत अनुभव। फिर दत्तात्रय जी  की आरती के बाद हम सब विदा हुए। बहुत ही आग्रह के साथ हमें दूसरे दिन के खाने का (पारणं) न्योता मिला पर हमारा अन्य कार्यक्रम था तो हम इसका आनंद नही उठा पाये। रात का वक्त होने से हम फोटो नही खींच पाये इसका मलाल रहेगा।  रात को छत पर गये और चांद देखा मिलिंद गुनगुनाया चांद फिर निकला और सुरेश ने चांद को कैमरे में कैद कर लिया।(CLICK VDO  विडियो MVI 1034)
फिर एक दिन मिलिंद ने कहा चलो आज मालगुंड के सारे मंदिर घुमाता हूँ तुम्हे । और हम गांव देवी,
विठ्टल मंदिर, राम मंदिर तथा एक अलग सा मंदिर जिसमें कई देवी देवताओं की मूर्तियां थीं। जाखा देवी, चंडी देवी, रवळनाथ, शिव आदि (CLICK VDO  विडियो 1006&7)
राम मंदिर छोटासा था किन्तु मूर्तियां बहुत सुंदर थीं। हमने वहां रामरक्षा का पाठ भी किया। (CLICK VDO  विडियो विडियो MVI1027)
 शिव मंदिर तो हमने पहले भी देखा था वहां का रख रखाव और मंदिरों के मुकाबले ज्यादा अच्छा है। आप भी देखें (CLICK VDO  विडियो mvi 1028)
अचला रोज़ कुछ न कुछ खास बनाती और मिलिंद अपने चुटकुले सुनाता या फिर बांसुरी बजाता।  आप भी सुनें बांसुरी की धुन। (CLICK VDO  विडियो MVI 991&992)
मिलिंद के वहाँ से नेवरे गांव बहुत पास था वह हमारे मामा (गाडगीळ) लोगों के पूर्वजों गांव था तो  मिलिंद ने कहा चलो मामा के गांव चलते हैं। वहां गये वहां पर गजानन महाराज का अच्छा सा मंदिर है जहां हर साल उत्सव होता है। पर अब वहां हमारे मामा के गोत्र का कोई भी व्यक्ति नही रहता। सुन कर बडा अजीब लगा कैसे सारे के सारे लोग अपना गांव छोड कर शहर चले जाते हैं। पिछली बार आये थे तो हम अपने गांव गये थे ( मायके का गांव घोळप) पर वहां कम से कम एक परिवार तो हमारे नाम और गोत्र का था और हेदवी गांव (ससुराल का गांव) में तो अभी भी काफी सारे जोगळेकर हैं।
यह सब करते और रोज बीच पर सैर करते, दिन पर लगा कर निकल गये और आखिर हमारा पुणे जाने का समय आ ही गया। पर मालगुंड में बिताया समय हमेशा याद रहेगा। और हाँ इस प्रवास की एक और उपलब्धी रही, अचला बहुत अच्छे रसगुल्ले घर में बनाती है तो मैने भी सीख लिये। कभी बताऊंगी आपको दाल चावल रोटी पर।

पुणे में विजूताई इनकी चचेरी बहन की और मेरी भाभी अर्चना की मेहमान नवाज़ी का लुत्फ उठाया। दो मराठी मूव्हीज देखीं उनमें से एक पितृऋण बहुत ही अच्छी लगी। मेरी दोस्त सुशीला से मिले खूब सारी कविताएं सुनी और सुनाई। पनवेल में मेरे भांजे रवी उसकी पत्नी जयू और मेरे जीजाजी से मुलाकात की। ठाणें में देवर प्रकाश और देवरानी जयश्री से मिले। मराठी नाटक देखें । खान पान तो सब जगह हर घर का स्पेशल रहा।  जनवरी ७ तारीख को वापिस दिल्ली पहुंचे और ठंड का वो कहर कि बस। पर घर तो घर ही है, ठंड हो या गरमी।

रविवार, 13 मार्च 2011

चलते ही जाना- ३ - गणपतीपुळे


सुबह ५ बजे उठकर चाय पीकर नहा धो कर तैयार हुए । सात बजे ठीक निकलना जो था हमारे टीम लीडर प्रकाश समय के एकदम पाबंद सात मतलब पौने सात बजे वे दोनो तैयार होकर बाहर खडे मिलते विजय गाडी के साथ सामान लोड करने को तैयार, तो जो भी आता उसे यही लगता कि देर हो गई शायद । तो निकल पडे चाय भरवा ली थी २५ कपी थर्मास में । ब्रेकफास्ट रास्ते में करना था पोहे या वडा पाव । हम सेटल हुए और बस चल पडी तो मैने कहा चलो अंताक्षरी खेलते हैं पर सब ने मेरी बात काटने की ठान रखी थी ।
तो जवाब आया, नही।
मैने कहा हाँ ।
हाँ क्या हाँ, अभी नही खेलना ।
नही तो मत खेलो मेरी बला से ।
समझा करो अभी तो नाश्ता भी नही किया, कणकवली में नाश्ता करेंगे फिर खेलेंगे ।
गणपति बाप्पा देखना इनको ।
हमारे संवाद सुन कर लगा कि ये तो गद्य़ अंताक्षरी हो गई और हम खूब हंसें ।
फिर कणकवली में वडा पाव का नाश्ता किया और लतिका ने जोक सुनाया कि वट पौर्णिमा के दिन औरतें व्रत रखती हैं और दिन भार वडा पाव, वडा पाव करती रहती हैं । (वडा पाव माने “हे वट वृक्ष मुझे प्रसन्न हो ।“ ) तो हम हंसते हंसाते चलते जा रहे थे ।
पहले हमें जाना था गणपतिपुळे, यहां के गणपतिजी समुद्र के किनारे विराजे हैं । हमारा रास्ता रत्नागिरि होकर ही जाता था । रत्नागिरि ४ घंटे और फिर करीब एक घंटा गणपतिपुळे । हमारे एक रिश्तेदार मालगुंड में रहते थे उनसे हमने अच्छी खानावळ के बारे में पूछा था उन्होने बताया । उन्हें हमारी पसंद बता दी थी । उन्होने कहा कि आप एमटी डी सी कॉटेजेज में रुके हो तो वहां से पास ही भाऊ जोशी का रेस्टॉरेन्ट है वहां आपको अच्छा खाना मिलेगा । जो चाहिये उन्हें पहले ही बता दें तो वे तैयार रखेंगे तो हमने जोशी जी से सम्पर्क कर के उन्हे हमारा प्लान तथा पसंद बता दी थी । (विडियो देखें )

कोकण के सुंदर रास्ते पार करते हुए हम करीब दो बजे पहुंचे एम टी डी सी । वहां ऑफिस में बात कर के हमारे कॉटेजेज की चाबियाँ ले लीं, सामान रखा और चल पडे खाना खाने । भूख जो लगी थी बहुत । रेस्टराँ अच्छा था और वरायटी भी बहुत थी मराठी, पंजाबी गुजराती सब तरह का खाना था । मोदक भी थे और सोल कढी भी । खा पी कर बाहर आये तो वहीं रेस्तरॉं के बाहर मेंगो-शेक पाउडर मिल रहा था वह खरीदा । बाहर छोटा मोटा हाट था वहां घूमें चीजें देखीं फिर अपने ठिय्ये पर आराम करने चले गये । शाम को मंदिर गये । यह थोडे ही दूर थी पर रास्ता ऊबड खाबड था तो हम बस से ही गये ।
हरे भरे नारियल और ताड के पेडों के झुरमुट में यह करीब हजार साल पुराना मंदिर स्वयंभू है । स्वयंभू का अर्थ है कि यह मूर्ती गढी नही गये वरन ऐसी ही पाई गई है जिसे भक्तों नें स्थापित कर यहां मंदिर बनाया । (विडियो देखें )

यहां प्रति वर्ष लाखों की संख्या में यात्री यहां आते हैं और दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं । पुळे मतलब रेत के टीले (सैंड ड्यून्स ) रेतीले किनारे का गणपती इसी से गणपती पुळे । इन ड्यून्स के साथ खेलता समुद्र का नीला पानी, लहराती हवा और इसके साथ बलखाते नारियल और ताड के वृक्ष एक बहुत ही सुंदर दृष्य की सृष्टी करते हैं । यहां के समुद्र में तैरना मना है । यह काफी खतरनाक माना जाता है । मंदिर के अंदर गणपति के दर्शन कर के मन प्रसन्न हो गया ।
ओम नमस्ते गणपतये,
त्वमेव प्रत्यक्षम् तत्वमसी,
त्वमेव केवलं कर्ता सी
त्वमेव केवलं धर्ता सी
त्वमेव केवलें हर्ता सी
त्वमेव सर्वम् खल्विदम् ब्रम्हा सी
मन में गूंज उठा ।
मंदिर में घूम कर प्रदक्षिणा नही कर सकते प्रांगण के बाहर से करनी पडती है जिसमें एक से डेढ घंटा लग जाता है । हमने तो वह नही किया । थोडी देर समंदर को देखते रहे पर वहां भीड बहुत थी । फिर हम थोडा घूम घाम कर वापिस आये। हमें तो बापट जी के यहां, जो मेरे छोटे भाई मिलिंद के साडू साहब हैं, खाना खाने जाना था वे हमें एम टी डी सी के गेट पर लेने आ गये थे । बाकी लोग वापिस कमरों में गये ।
बापट जी मालगुंड में रहते हैं मिलिंद भी यहीं शिफ्ट हो रहा है एप्रिल में । यहां मराठी के प्रसिध्द कवि केशव सुत का स्मारक है । मिलिंद ने कहा था कि हम बापट जी के साथ जा कर उसका बना हुआ घर देख कर आयें, तो बापट जी ने पहले हमें मिलिंद का घर दिखाया फिर अपना दिखाने से पहले हमें समंदर पर ले गये एकदम अनछुआ किनारा । केकडों की ऐसी अद्भुत चित्रकारी देखी कैमरा हाथ में ना होना बहुत खला । वहां उस क्वांरे समुद्रतट को देख कर मन बहुत ही प्रसन्न हो गया फिर घर गये । बापट जी ने तो अच्छा खासा बगीचा बना लिया है उसमें नारियल, काजू, और कोकम के पेड दिखाये । एक बिल्ली घूम रही थी पता चला एक नही दो हैं । कोकण में सांप बहुत निकलते हैं और जहरीले भी होते हैं इसलिये बिल्लियां । बिल्ली सांपों को खाती है यह हमें यहीं पता चला । बापट जी ने बढिया खाना खिलाया । हमने उनसे कहा कि हमें कल सुबह ही निकलना है तो वे हमें रात में ही हमारे ठिकाने पर छोड दें । जाते हुए अलका ने मुझे दो बडी बडी कौडियां दीं जो उसने खुद समंदर के किनारे से पाईं थीं । रात को घर (आज के लिये घरj ) आये बापटजी के साथ , प्रकाश के कमरे में टी वी चल रहा था थोडी देर वहां बैठ कर फिर अपने कमरे में, और आनंद मंगल ।
कल ही हम यहां से निकलने वाले थे हेदवी होते हुए हरि-हरेश्वर के लिये । (क्रमशः)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

चलते ही जाना – २- तारकर्ली


चलते ही जाना – २- तारकर्ली
सुबह उठ कर तैयार हुए । बैठ गये अपनी अपनी सीटों पर टेम्पो ट्रैव्हलर में । रत्नागिरि से तारकर्ली का रस्ता कोई चार घंटे का है ।अभी तक हमने जो भी प्रवास किया वह मुंबई गोवा हाय-वे पर ही था और आगे भी कुडाळ तक वही रास्ता है । कोकण के रास्ते यानि पहाड, हरियाली, आम, काजू, नारियल, और सुपारी के पेड । तो रास्ते के सुंदरता का आनंद उठाते हुए चल रहे थे । बीच बीच में खाना पीना तो चल ही रहा था । सुंदर सुंदर नदियां कल कल करती बह रहीं थीं । तारकर्ली मालवण से कोई ६ किलोमीटर दक्षिण में है । य़ह एक छोटा सा मछुआरों का गांव है पर यहां के बीचेज बहुत सुंदर है । हमारा बुकिंग महाराष्ट्र टूरिजम् डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के कॉटेजेज में था । हमने तय किया कि हम सीधे तारकर्ली जायेंगे सामान कमरों में रख कर फिर खाने पीने और घूमने की सोचेंगे । तो विजय (ड्राइवर) जी को वही बताया और पहुँचे तारकर्ली । एम टी डी सी के कॉटेजेज की तरफ चल पडे, वहां जाने का रास्ता बहुत ही सुंदर था दोनो तरफ नारियल और सुपारी के बगीचे । दोनों पेडों की तुलना करें तो नारियल का तना मोटा होता है और सुपारी का पतला यानि एक स्थूला तो दूसरी तन्वंगी । नारियल और सुपारी दोनों में फल लगे थे । सुपारी तैयार थी नारंगी रंग के खोल वाली ये ताजी सुपारी देखने में बहुत ही सुंदर लगती हैं । काजू के पेडों में अभी सिर्फ बौर था । वे फलीभूत नही हुए थे । तो ऐसे खूबसूरत रास्ते से होकर पहुँचे अपनी मंजिल तक । वहां एम टी डी सी के ऑफिस में जाकर अपने बुकिंग का प्रमाण दिया और चाभी लेकर चल पडे कमरों की और । कमरे अच्छे थे साफ सुथरे बिस्तर लगे हुए । पानी रखा हुआ हालांकि हम तो बिसलेरी की ५ लिटर वाली ५ बॉटल्स ( बरनी कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ) लेकर आये थे । हमारे साथ अमरीकन मेहमान जो थे । यहां एक मजेदार बात देखी पलंग परमानेन्ट बने हुए थे सीमेंट ईंटों के । मेन्टेनन्स नही और सालों साल चलें भी । हम सब ने सामान रखा । हमारा एक कमरा डॉर्म था जहां पांच लोग सो सकते हैं वह सुहास और विजय ने लिया । हैमॉक देख कर सुहास तो बहुत खुश हुई और उसीपर बैठ गई । (विडियो देखें ) 286_344_Two

सब कुछ सैटल कर के हम ने खाने की तलाश करना उचित समझा । हमें बताया गया कि मालवण में अच्छा खाना मिल सकता हे तो हम मालवण चल दिये । वहां घूमते घूमते हमें कामत का रेस्तरॉं दिखाई दिया प्रकाश ने कहा कि यहां खाना अच्छा मिलेगा, तो वहीं घुस गये पर पता चला कि डेढ बजे से पहले खाना सर्व नही होगा । वहां आस पास काजू की दुकाने दिखीं तो मै और लतिका वहां चले गये और काजू खरीदे । सुहास ,प्रकाश और जयश्री नें कुछ स्कूल की लडकियों से बातें कीं, उनके विषयों के बारे में ओर टीचर्स के बारे में । सुहास स्वयं भी अमेरिका में केमिस्ट्री पढाती थीं हाल ही में रिटायर हुई हैं उसने पहले अजमेर में भी पढाया था तो उसकी शिक्षा पध्दती में बहुत ज्यादा रुचि है ।
तब तक डेढ बज गया था और खाना भी तैयार था तो कामत जी के यहां खाना खाया । यहां मोदक तो नही मिले पर श्रीखंड मिल गया । बाकी दाल, चावल, रोटी, सब्जी, उसळ, सैलेड, दही सब था । खाना हमे जरा मालवणी यानि मसालेदार लगा । लोगों से बात करके हमें पता लगा कि यहां एक बहुत सुंदर गणेश मंदिर है । पास ही में एक अच्छी मराठी शाकाहारी खानावळ भी है तो सोचा कल यहीं आयेंगे । मंदिर बहुत ही सुंदर था । आप भी देखेंगे।
तारकर्ली में हम तीन दिन रुकने वाले थे । पिछली बार जब हम आये थे तो तूफान की वजह से सिंधु दुर्ग नही देख पाये थे । तो वह तो पक्का देखना ही था । कल सुबह सुबह के लिये यही कार्यक्रम बना । इतना सब कर के काफी थक गये थे तो सोचा अब आराम किया जाय शाम को बीच पर जायेंगे । जो लेटे तो सीधे पौने छै बजे आंख खुली सब लोग चाय पी कर बीच पर चले गये थे हम दोनों ने भी जल्दी जल्दी चाय पी और चल पडे बीच की और । पांच मिनिट चल कर ही बीच था हमारे कॉटेज में से दिखता भी था । वहां जाकर अपनी पार्टी के अन्य लोगों से मिले और बीच पर चलते चले गये । सूर्यास्त हो ही रहा था । समंदर मे डूबता सूरज कितनी भी बार देख लो उसका आकर्षण कम नही होता हर बार आSह ऊSह करने का मन करता है । और रंगों का छलावा वह भी कम अदभुत नही होता । मायाविनि प्रकृति कितने कितने अनुपम रूप दिखा कर हमें छलती रहती है । थोडा बीच-वॉक करके फिर हम सब के साथ आकर बैठ गये । कुछ बच्चे घर बना रहे थे । एक जीप के पीछे पैराशूट लगा कर लोग हवा में उडने का मजा लूट रहे थे । अंधेरा होते तक बैठे रह और फिर वापिस कॉटेज पर । लतिका ने भेळ बनाई और हम सब उस पर टूट पडे । इतनी भेळ, लड्डू आदि खा लिया कि फिर खाना खाने की इच्छा नही रही । काफी देर तक गप शप लगाई और फिर कमरों में जाकर निद्रादेवी के अधीन हो गये ।
दूसरे दिन सुबह उठ कर झट पट तैयार हुए नाश्ता मालवण मे ही करने की सोची । तो चल पडे मालवण वहीं से आगे बोट लेकर सिंधुदुर्ग जाना था । (विडियो देखें ) clip286_344_three

सिंधु दुर्ग का इतिहास बडा ही रोचक है यह पहला कदम था, भारत में नेवी यानि आरमार स्थापित करने का । ऐसे ही आरमार की सहायता से कोकण किनारे पर आधिपत्य जताने वाली परकीय सत्ताओ (डच, पोर्तूगीज़,ब्रिटिश ) तथा जंजीरा के सिद्दी जौहर (हब्शी) को जवाब देने के लिये छत्रपति शिवाजी महाराज़ ने यह किला बनाने का निश्चित किया । इसके इजिनियर थे हिरोजी इंदुलकर । इस के निर्माण को तीन साल लग गये । इस दौरान परकीय सत्तां के आक्रमण का जवाब देने के लिये इस किनारे पर ५००० सैनिकों की सेना रखी गई । १६६५ तक इस आरमार में ८५ छोटे जहाज, ३ बडे जहाज थे जो बढकर १६६६ तक १६० हो गये । (विडियो देखें )286_344_Four

महाराज के मृत्यु के पश्चात फिर से मुगल और पुर्तगालियों ने अपना धर्मपरिवर्तन कराने का खेल शुरु किया । इसके बाद के इतिहास में इस दुर्ग की और इस किनारे की रक्षा करने वालों में कान्होजी आंग्रे और उनके वंशजों का कार्य उल्लेखनीय है । आंग्रे की दुर्ग भक्ती और स्वामी भक्ती( भोसले परिवार से ) से पेशवा इतने डर गये कि उन्होने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और इस पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया ।
तो नाश्ते के बाद हम लोग धक्के पर आये जहाँ से हमे बोट लेनी थी । ये थी तो मोटरबोट पर बहुत छोटी थी । इस समुद्र में पानी के अंदर खूब सारे खडक (पत्थर) हैं इन से बचा बचा कर नाव दुर्ग तक ले जाना यहां के नाविक ही कर सकते हैं । इसी कारण शिवाजी महाराज नें दुर्ग बनाने के लिये यह जगह चुनी होगी । इन्हीं पत्थरों से इस दुर्ग का निर्माण हुआ है ।
यहां का मौसम जून से सेप्टेंबर तक बडा ही तूफानी होता है उस समय दुर्ग पर जाना संभव नही है । हम तो पिछली बार अक्तूबर में भी नही जा पाये थे । पर इस बार किस्मत हमारे साथ थी हम गये दुर्ग में घूमे भी । अंदर का सब अच्छी तरह देखा । (विडियो देखें ) 311_334One

अंदर प्रवेश करते ही थोडा गोल घूम कर फिर प्रवेश द्वार है किले के चारों और दीवार और बुर्ज हैं ताकि एकदम से प्रवेश द्वार का पता नही चलता । यहीं हनुमान जी का मंदिर है । अंदर सीधा चल कर है शिवराजेश्वर मंदिर । इसे छत्रपति राजाराम महाराज ने बनवाया था । यहां शिवाजी महाराज की नाविक के वेश में मूर्ती है । दुर्ग पर अभी भी लोग रहते हैं उनके लिये बच्चों के स्कूल है । भगवती मंदिर के पास दो मीठे पानी के कुएं भी हैं इसी तरह के कुएं हमने जंजीरा किले पर भी देखे थे । इसी तरह साखरबाव नामक कुआँ शिवजी के मंदिर के पास है (बाव=बावडी) । एक ऊँचा बुर्ज है जिसे टेहळणी बुरुज़ कहते हैं टेहळणी माने पहारा । अन्न के गोदाम, शस्त्रगार, सैनिकों के घर, कचहरी, किल्लेदार की कोठी सब अब देखरेख के अभाव में टूट फूट गया है । किले की दीवार भी टूट रही है खूब झाड झंखाड भी उग आये हैं । इस की इस तरह की उपेक्षा खलती हैं । इस किले की वजह से ही भारत का पारतंत्र्य कुछ साल के लिये ही सही आगे खिसक गया । थोडा गर्व और थोडे दुख के साथ हमने वापसी की बोट ली । किनारे पर आये तो बहुत सी चीजें बिक्री के लिये थी शंख सीपियों की मालायें, मसाले । आम पापड कटहल पापड, कुलथी का आटा सेम के बीज आदि । हम ने भी की खरीदारी । और फिर गणपती मंदिर गये सोने की या पीतल की बहुत ही सुंदर चमकदार मूर्ती से शोभित ये मंदिर मन मे सहज ही भक्तिभाव जगाता है । इसके पीछे ही थी कलसेकर जी की खाणावळ जहां हमने खाना खाया । आधा पौना घंटा इंतजार करना पडा क्यूं कि खाना ऑर्डर से ही बनता है पर मोदक मिले और खाना भी बढिया था । (विडियो देखें )311_334two

खाना खा कर फिर वापिस ठिय्ये पर । शाम को अपना कार्यक्रम बीच पर जाकर आनंद मनाने का था ।
कल हमें धामापुर तलाव देखने जाना था ।
सुबह उठ कर नहा धो कर तैयार हुए । मंदिर जाना था तो नाश्ता नही किया धामापुर लेक के पास ही बहुत प्राचीन भगवती मंदिर भी है । विशाल मंडप वाला ये मंदिर बहुत ही सुंदर है और मूर्ती को देखते ही मन में भक्तिभाव उपजता है । स्वच्छ और सुंदर ये मंदिर हमें बहुत ही अच्छा लगा । मंदिर के सामने ही है धामापुर तालाब । हरे भरे पहाडों से घिरा यह लेक अपने आप में एक सौंदर्य है इसके साफ स्वच्छ पानी मे से अंदर का तल और खडक साफ दिखते हैं । इस स्थान को सुंदर बनाने में वन विभाग का भी बडा हाथ है जिन्होने तालाब के किनारे सुंदर सुंदर पेड लगाये हैं करीब १० एकड क्षेत्र में फैला हुआ तालाब बहुतसे जलक्रीडाओं के उपयुक्त है जिनमें बोटिंग और स्नॉर्कलिंग हैं । (विडियो देखें )345_444one

मैने और सुरेश ने पैडल बोट से तालाब की सैर की । बहुत मज़ा आया । सुहास पता नही क्यूं नही गई । मुझे तो तैरना भी नही आता पर पानी का जबरदस्त आकर्षण है । वहां काफी समय बिताया मंदिर के प्रांगण में फोटो भी खींचे । अब भूक लग आई थी तो गये कलसेकर जी की खाणावळ में और पेट पूजा की। वे हमारे लिये मोदक की व्यवस्था जरूर करते थे तो इस कोकण प्रवास में हमने साल भर के मोदक खा लिये । दिन भर घूम कर पेटपूजा करो तो नींद आना स्वाभाविक है और सीनियर सिटिझन्स को तो ये कन्सेशन तो मिलना ही चाहिये क्या कहते हैं ?
शाम को तारकर्ली के सुंदर बीच पर भी तो समय बिताना था, चाय पीनी थी और पांच बजे जगने वाले भोर पंछियों के लिये चाय लेकर भी आनी थी । आज का ये अंतिम दिन था तारकर्ली का कल हमें जाना था गणपतीपुळे ।
( क्रमशः )

बुधवार, 2 मार्च 2011

चलते ही जाना



सुहास और विजय ने कुछ दिन दिल्ली में बिताये, बाजारों में घूमे फिरे । फिर हम सब निकल पडे राजधानी एक्सप्रेस से ठाणे के लिये, पता है पता है राजधानी ठाणे नही जाती, तो हम मुंबई सेंट्रल से वहां गये भाई । कोई ५-६ साल पहले हम लोग कोकण घूमने गये थे वहां की हमारी कुछ तस्वीरें सुहास ने देखी थीं और खास तौर पर हैमॉक पर बैठे हुए हमारी तस्वीरें तो सुहास ने तो कोकण घूमने का पूरा मन तब से बना लिया था । उसी के मुताबिक हमारा ये प्लान बना और धीरे धीरे इस प्लान में ११ लोग शामिल हो गये जो कि अंततः सिर्फ ८ रह गये । सुहास, विजय, सुरेश, मै, प्रकाश, जयश्री विजूताई ( सुरेश प्रकाश की चचेरी बहन) और लतिका (हमारी चचेरी देवरानी) ।
हम २१ तारीख को सुबह ठीक ७ बजे निकले । उसके भी पहले हम ५-६ दिन पुणे हो आये । सुहास को तुळशी बाग जो जाना था ।
(विडियो देखें) Clip242to265


पुणे का तुळशी बाग यानि दिल्ली का अजमल खाँ मार्केट । सुरेश और सुहास के मौसियों से भी हम मिले जो उमर में हम से काफी बडी हैं । पुणेमें वासंती और अर्चना वहिनी से मिले । अर्चना वहिनी ने अण्णा-रचित अंबा भजन सुनाया । पुणे से बहुत सा खाने पीने का सामान खरीदा । चिवडा चकली शंकरपाळे । लतिका ने डोंबिवली से भेळ का सामान, गुड की रोटियां और मेथी के लड्डू लाये थे (सर्दियों में मेथी के लड्डू यानि टॉनिक ) । मतलब की पेट पूजा की पूरी तैयारी थी । आज के लंच के लिये पराठे और बटाटा भाजी भी साथ थी । तो सुबह साढेचार बजे से हम तैयारी में जुटे और तय समय यानि ठीक सात बजे चल पडे । हमारी मिनि बस थी १७ सीटर टेम्पो-ट्रैवलर । ड्राइवर थे श्री विजय । हम सब के सब खूब उत्साहित थे । सुबह के सूरज की कोमल कोमल धूप एक सुखद गर्माहट दे रही थी । ठाणे शहर छूटा और कोकण देश का हमारा प्रवास सुरू हुआ । कोकण के चार मुख्य जिले हैं ठाणे, रायगड, रत्नागिरि और सिंधुदुर्ग । कोकण जमीन की एक संकरी पट्टी है जिसके पूर्व में है सह्याद्री पर्वत की शृंखला और पश्चिम में अरबी समुद्र । इसके सागर किनारे, हरियाली, पहाड, मंदिर और किले इसको एक अनोखा सौंदर्य प्रदान करते हैं ।
ठाणे शहर छूटा तो शुरु शुरू में तो पहाड भूरे ज्यादा हरे कम दिखाई दिये । पर दोनों तरफ पेड जरूर थे । पर थोडी ही देर में कोकण अपने पूरे सौंदर्य के साथ अवतरित हुआ । इसके पहले हम कोकण गये थे अक्टूबर में, तब क्या नजारा था हरे भरे, बादलों से ढके, पहाड, कल कल बहते झरने और नदियां और खेतों की हरियाली, मानो स्वर्ग में पहुँच गये हों । इस बार दृष्य कुछ अलग था दोनो तरफ आम के पेड आमों मे बौर लगा हुआ था और उसका एक मादक सुगंध सारे आसमंत में फैल रहा था । आम के साथ साथ ही काजू के पेड भी बौरा रहे थे । गांवों में घुसते ही नारियल सुपारी, केले के बगीचे जिन्हें यहां वाडी कहते हैं दिखते । (विडियो देखें)

गांव याने आदमी, आदमी यानि कचरा, प्लास्टिक की उडती थैलियां, गीला, सूखा, कचरा,नालियां और सडकों पर इकट्ठा पानी। किंन्तु जैसे ही गांव छूटते प्रकृति अपना सौंदर्य बिखेरने लगती । जैसे जैसे दक्षिण की तरफ हम बढ रहे थे आमों के जंगल के जंगल दिख रहे थे । नदियां स्वच्छ सुंदर । पहाड भी अब ज्यादा हरे भरे हो चले थे । आंखें जैसे सारी परिवेश अपने अंदर भर लेना चाह रही थीं । बच्चे स्कूल जा रहे थे । औरतें अपने कामों में लगी थीं । कोई सर पे गठ्ठर उठा के जा रहा था तो कोई सब्जियां ले जा रहा था । हम कोकण के छोटे छोटे गांवों से होकर जा रहे थे । मजेदार से नाम- नागोठणे, वाटुळ, वाकड, परशुराम वगैरा । हमारा पहला पडाव रत्नागिरि था यह चिपळुण के पास है । रास्ते में हमने थोडा नाश्ता किया जो हम साथ ले आये थे । प्रकाश के पास एक २५ कप वाला थर्मास था अलखोबार से लाया हुआ उसमें चाय भी थी । कमाल की बात ये कि ये चाय २४ गंटे गरमा गरम रहती । हमारा लंच भी हमारे पास ही था बस हमें जगह खोजनी थी । हमने हमारे ड्राइवर विजय को ये बता दिया था और विजय ने एक बहुत ही बढिया जगह खोज निकाली, ये एक वडा पाव केंद्र था जो दोपहर को खाली पडा था यहां शायद सुबह शाम ही दुकान लगती होगी खैर हमें तो लंच के लिये इससे बेहतर जगह मिल नही सकती थी । बेंन्चे, टेबल सब तैयार, हमने सारा सामान पानी आदि निकाला- पेपर व प्लास्टिक की प्लेटस्, पराठे, आलू की सब्जी, गुड की रोटी सब निकाला और टूट पडे, हरहर महादेव ।

ठाणे से रत्नागिरि का प्रवास कोई ६ घंटे का है । चिपळूण आते ही सब खुश हो गये कि अब रत्नागिरि आने ही वाला है ।
रत्नागिरि पहुँच कर हम अपने होटल पहुँचे । होटल विवेक, वहां फ्रेश हो लिये फिर सुहास ओर मै जरा आस पास का जायजा लेने एक चक्कर लगा आये हम चलते चलते थीबा पैलेस पहुँच गये । यहां अंग्रेजों ने ब्रम्हदेश के राजा को कैद करके रखा था । यह पैलेस हम अपनी पिछली ट्रिप में देख चुके थे । यहां पर उस जमाने का फर्निचर और राजा की वस्तुएँ रखी हुईं हैं । उस वक्त तो पांच बजने वाले थे यानि सब कुछ बंद होने का समय ।
रत्नागिरि यानि लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक का जन्मस्थान । वही लोकमान्य टिळक, जिन्होनें घोषणा दी थी कि, ”स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और वह मै लेकर ही रहूँगा” । रत्नागिरि में सेन्ट्रल पार्क के पास सौ साल पुराना एक वाचनालय है और उससे थोडी ही दूर है लोकमान्यजी का घर जो अब इनका स्मारक है। यहां तिलक जी के चलाये हुए अखबार केसरी के कुछ पुराने अंक हैं और उनके भाषणों के कटिंग्ज भी फ्रेम किये हुए हैं । तिलक जी की वस्तुएँ भी यहां सजायी हुई हैं । हम यहां पहले हो आये थे और हमारे साथ के अधिकांश लोगों का यह देखा हुआ था ।
हम सब ने तय किया कि हम समंदर की सैर करेंगे और फिर खाना खाने जायेंगे । तो वही किया समंदर के किनारे गये वहां सूर्यास्त देखा और बहुत देर तक समंदर पर धीरे धीरे फैलता हुआ अंधियारा देखते रहे । कैसे पूरब का सिंदूरी लाल पीला रंग सलेटी-गुलाबी और फिर काले में बदलता है । समंदर के पानी पर रंगों की अठखेलियां, समंदर का यह अनोखा रूप एकदम अलग था । बहुत देर तक हम यह रूप हम अपनी आंखों में भरते रहे फिर उठ कर खाना खाने के लिये रेस्टॉरेन्ट ढूंढा । रेस्तरां सुंदर था वहां एक एक्वेरियम में रंगबिरंगी खूबसूरत मछलियां तैर रही थीं जो सुंदरता को चार चांद लगा रहीं थीं । आप भी आनंद लें । (विडियो देखें)

जम कर खाना खाया । मोदक भी मिले । होटल लौट कर गपशप की और सो गये सुबह जल्दी ही मालवण की तरफ बढना था ।
सबसे ऊपर के फोटो में प्रकाश, जयश्री, मै और सुरेश हैं । विडियो में सफेद बॉब्ड बालों वाली सुहास है और सफेद बालों वाले विजय हैं । लतिका सबसे छोटी और विजूताई नीले साडी में हैं ।

(क्रमशः)