बुधवार, 10 मार्च 2010

पलक की झपकनी

थोडी सुनी तुम्हारी, कितनी सुनाई अपनी
इस तरह रात गुजरी, इक पलक की झपकनी ।
बरसों से जो दबा कर इस हृदय में रखा था,
हमनें तो दे उंडेला, बाकी रहा छिटकनी ।
चुपचाप ही रहे तुम, न कहा कुछ जबां से,
कानों में दिल बसा कर, सुनते रहे धडकनी ।
जब रात हुई गहरी काजल गया था बहता,
आखों को लग गई थी जैसे कोई टपकनी ।
हाथों से आपने, मेरे अलकों को था संवारा,
उंगली पे आंसुओं को, यूं तोला ज्यूं हिरकनी ।
फिर धीमे से कहा था, मेरे प्राण बसते तुम में,
आंसू से धुल न जाये, तेरे आंख की चमकनी ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होरी


होरी पे ऐसे रंग ना डारो,
रार ना मचाओ बनवारी ।
खिलत रहे फुलवा गुनगुनाए भंवरा
देख देख मोर हंसत काहे पियरा
सखी सहेली करत ठिठोली
काहे दो उन्हें अवसर गिरिधारी । रार न मचाओ बनवारी

रंग भिगोया गुलाल गाल मले
चूनर भीगी भीगे मोर केश पडे
थर थर कांपत, गात सुकोमल
और न मारो न मारो पिचकारी । रार न मचाओ बनवारी

गोप गोपी संग रास रचायें
जमुना तट पे धूम मचायें
हम बूंद, सागर तो आप प्रभु
बिनती करो स्वीकार हमारी । रार न मचाओ बनवारी

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

अहसास



तुम्हारे प्यार का अहसास लपेटे रहता है मुझे कोहरे सा
कानों में गुनगुनाता है एक मधुर रागिनी
पायल की छनछन, बन जाती है मेरे दिल की धडकन
मन मोर नाचने लगता है उसके ताल पर
और इस अहसास में मै, हो रहता हूं मगन
अपने में ही ।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

दुनिया तो...


सब कुछ कितना बेमानी है
दुनिया तो आनी जानी है ,
हर पल सदा बदलने वाली
नित्य ही ये नई कहानी है । सब कुछ....

वो इच्छाएँ, वो आशाएँ,
अगणित अगणित अभिलाषाएँ,
जिनके पीछे रहे दौडते
लेकर सालंकृत भाषाएँ
व्यर्थ किया जिस पर इतना श्रम
कमल-पत्र ऊपर पानी है । सब कुछ..

वो बचपन की छोटी छोटी
सपनों वाली बीरबहूटी
वो साथी से आगे होना
लड-झगड कर हंसना रोना
याद आ रही है बचपन की
आँखों मे लेकिन पानी है । सब कुछ.....

यौवन की मदमाती मस्ती
कुछ तो अपनी भी थी हस्ती
दुनिया अपने मुठ्ठी में थी
जीत की इच्छा घुट्टी में थी
धन,साफल्य, सम्मान, प्रियतमा
केवल मुझको ही पानी है । सब कुछ....

अब उम्र के इस पडाव पर
पंछी से बच्चे छोड गये घर
रहे अकेले वृध्द दंपति
रिश्ते नाते होते जर्जर
जीवन क्या ये सार्थ मान लें?
या ये बातें बचकानी है । सब कुछ....

एक बात पर समझ गये हैं
जितने भी अब बाकी पल हैं
ये पल जन हित में लग जाये
तो अपनी बात बन जाये
तभी शांति पायेगा मन और
तभी जिंदगी रास आनी है । सब कुछ......

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

देख लो


मौत में भी जिंदगी को देख लो
गम के पीछे की खुशी को देख लो ।
मेरे तेरे आंसुओं का मोल क्या
उनका हंसना कीमती है देख लो ।
खुशियां तो होती हैं बूंदे ओस की
दुख मरुथली रेत है तुम देख लो ।
आदमी की बात तो करते हैं वे
आदमी को दफन करता देख लो ।
मैने कब चाहा था कोई आसमां
पांव से धरती खिसकती देख लो ।
हम अगर नुकसान से हों बेखबर
महल आशाओं के ढहते देख लो ।
धरती घूरा बन रही है क्या करें
सांस में घुलता प्रदूषण देख लो ।
बच्चों को तो सपनों से फुरसत नही
बुजुर्गों का दम निकलता देख लो

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

नव वर्ष की शुभ कामनाएँ !



रात्रि के घने तिमिर से जब प्रभात का नया सूरज फैलायेगा अपनी किरणें इस दुनिया पर तो क्या सचमुच सब कुछ नया नया होगा ? क्या पुराने दुख सुख में बदल जायेंगे, क्या भ्रष्टाचार के मकड जाल से मिलेगी हमें मुक्ती ? क्या नारी का योग्य सम्मान उसे मिलेगा ? क्या बालश्रम खत्म होगा, क्या कुछ और ज्यादा बच्चे जा पायेंगे स्कूल ? क्या सुधरेंगे राजनीतिज्ञ (!), सत्ताधारी ? क्या दरिंदों को सजा मिलेगी ? क्या न्याय मिलेगा जनता को आसानी से या कि हमेशा की तरह इतनी देर से कि वह अंधेर ही साबित हो । क्या जागेगा राष्ट्रप्रेम ? क्या राष्ट्रकुल खेलों के आयोजन में भारत साबित कर पायेगा अपनी क्षमता ? क्या हम सब यानि आम आदमी कर पायेगा निश्चय कि वह अपने स्तर पे नही देगा भ्रष्टाचार को बढावा । हर एक अपने स्तर पर रहेगा अडिग नही होने देगा अन्याय बच्चे पर, कमजोर पर, नारी पर ।
कुछ कुछ आशा बंध तो रही है । समाचार माध्यम कुछ जिम्मेदार नजर आ तो रहे हैं । हम सब नये साल के अवसर पर ये प्रतिज्ञा तो कर ही सकते हैं कि हम अपने अंदर का एक दुर्गुण हटायेंगे और दो अच्छे गुणों को अपनायेंगे । फिर शायद गुजरे साल से ये नया साल बेहतर हो ।
नव वर्ष शुभ हो, मंगल हो ।
आओ,
हम खोलें एक नया पन्ना
उसमें लिखें नई इबारत
अपने यश की उत्कर्ष की
सीख लें अपनी भूलों से
गलती न करे उन्हें दोहराने की
तभी होगी आवभगत सफल
नये वर्ष की ।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

गम ना कर

कैसा ये धोखा हमारे साथ हुआ
कांधे पे सिर रखा जिसके
वही कातिल हुआ ।

जिसको बना के राज़दार
हम थे बेफिक्र
वही भेदी हमारे घर का हुआ ।

हर बार सोचते रहे
अब कुछ अच्छा होगा
हाल हमारा बद से बदतर हुआ ।

सुकून से तो जीते थे
चाहे रोटी कम थी
अब जान का दुष्मन हर निवाला हुआ ।

भोर जायेंगे तो क्या
शाम को घर लौटेंगे
इस सवाल का पक्का, न जवाब हुआ ।

अब तक कटी है तो
आगे भी कट जायेगी
सपना अपना चाहे पूरा न हुआ ।

ऐसे ही जिया करते है
हजारों में लोग
गम ना कर, तू अकेला न हुआ ।