बुधवार, 30 अप्रैल 2014

सच्ची सरकार


हर बार लगाई उम्मीद कुछ अच्छा होने की

न हुआ अब तक, अब तो कुछ हो जाये।

 

हरबार किया भरोसा हर शख्स के वादे पर,

अब कोई तो इन्साँ, वादा करके निभा जाये।

 

झूट और मक्कारी की दुनिया है बहुत देखी

अब तो दीनो-ईमान की दुनिया नजर आये।

 

बहुत दिन जी लिये फुटपाथ औ सडकों पर,

सर पे हमारे भी अब एक छत तो बन जाये।

 

रोटी कपडा मकानों के वादे सुन लिये बहुत,

दो वक्त का निवाला तो हर-एक को मिल जाये।

 

हमारे नौनिहाल भी इसी देश के बच्चे हैं,

उनके भी लिये पढने की व्यवस्था तो हो जाये।

 

चुनाव तो हो जायेंगे, नारे होंगे ठंडे,

इस देश को अब सच्ची सरकार तो मिल जाये।

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

भारत भाग्यविधाता


अब फिर से खुलने वाले हैं किस्मत के द्वार,
हे देव, क्या होगा इस देश का,
जनता की जीत होगी या कि हार।
सुबुध्दी देना भारत के भाग्य विधाताओं को
ताकि लिखें अपनी किस्मत वो सही सही।
पहचान लें कि कौन है गलत और कौन नही।
किस पर लगायें निशान, कमल, पंजा या झाडू
कुछ ऐसा करो कि सही बैठे जोड
अच्छे लोग चुन कर आयें और हार जायें जुगाडू।
बहुत हुआ चोरों का राज, अब तो आ जाये सुराज।
सुन रहे हो ना दाता, ऐसी दो बुध्दी कि सुखी रहें सब भारत भाग्यविधाता।


गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के


फरवरी महीना इस २०१४ साल का हमेशा याद रहेगा। २ फरवरी को मेरी जरा सी तबियत खराब हुई। पता चला वाइरल फीवर है फ्लू जैसा ही कुछ । दो तीन दिन क्रोसीन और विटामिन खा कर मै तो ठीक हो गई पर सुरेश, मेरे पति, बीमार हो गये । मेरी ही तरह मै इन्हे क्रोसीन और विटामिन देती रही पर बुखार था कि हटने का नाम ही नही ले रहा था फिर मैने शशांक (मेरा भतीजा जो ए.आय़.आय एम एस में न्यूरो सर्जन है) को फोन किया, वह तो था नही तो सरिता को ( शशांक की पत्नी, ये भी सफदरजंग हॉस्पिटल में गायनेकोलॉजिस्ट है) इनका हाल बताया, कि ३-४ दिन हो गये पर बुखार नही कम हो रहा और खाँसी भी बहुत है। उसने लिवोफ्लॉक्सिसीन देने के लिये बताया। १-२ दिन वह भी दिया पर कोई फायदा नही।  फिर से फोन किया तो उसने कहा कि हम शाम को आ रहे हैं। यह ९ तारीख की बात है। बाद में शशांक का फोन आया कि आपको दोनों के कपडे एक बैग में डाल कर ३-४ दिन की तैयारी से यहां आना है, यानि कि उनके घर। कल फिर मैं काका की सारी जांच करवा दूँगा। शाम को वे दोनों आये और हमें लिवा ले गये। दो तीन दिनों से ये खांसी के मारे रात को सो नही पा रहे थे तो मैने शशांक से पूछा कि इनको नींद की गोली दूं क्या। उसने कहा दे सकती हो। मैने यह नही बताया कि इसके पहले इन्होने कभी नींद की गोली ली नही है। झोल फ्रेश नाम की एक गोली पूरी मैने इनको दे दी और ये सो गये। सो क्या गये जैसे बेहोश से हो गये साँस भी तेज तेज और मुश्किल से आने लगी ।  कोई ढाई बजे मैने शशांक और सरिता को आवाज़ दी। सरिता ने कहा चलो अभी, जल्दी से इनको केजुअल्टी में ले चलते हैं । उसी वक्त गाडी निकाल कर आनन फानन में केजुअल्टी में ले गये । सारे टेस्ट हुए शुगर बहुत बढी हुई थी ३७०। ब्ल़डप्रेशर भी हाइ था। शशांक ने कहा मै बेड की व्यवस्था करता हूँ तुम लोग घर चलो। 
एक घंटे में शशांक भी वापस आ गये कहा, मैने उन्हे आइ सी यू में एडमिट करा दिया है आक्सीजन की जरूरत थी और  सारी चीजें भी वहां ठीक से कंट्रोल हो जायेंगी। आइ सी यू सुन कर ही डर सा लगा। तीन दिन ये आइ सी यू में रहे। रोग निदान था अपर रेस्पिरेटरी ट्रेक इनफेक्शन ( हमें बाद में बताया गया कि इसका मतलब था निमोनिया)।इस बीच मैने दोनों बेटों को फोन करके जानकारी दे दी। तय हुआ कि राजीव पहले आयेगा और फिर अमित आयेगा। इस तरह पंधरा दिन रह कर वे दोनों जब तक वापिस जायेंगे इनकी तबियत काफी सम्हल जायेगी। वहां तो मै भी केवल पांच मिनिट मिल सकती थी।  इतने से देर में ये यही कहते कि मुझे यहां से निकालो मै यहां नही रहूँगा। मै समझाती कि आपके थोडा ठीक होते ही आपको प्रायवेट वॉर्ड के कमरे में ले जायेंगे। आय सी यू में खाना पीना सब आय वी से ही था तो तीन दिन बाद जब ये प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट हुए तब ऐसे लग रहे थे जैसे महीनों से बीमार हों । कमरे में आते ही पहला सवाल ये, कि क्या तुम्हारे पास मेरे लिये कुछ खाने को है। उस वक्त तो कुछ नही था, क्यूंकि हम तो इन्हें कमरे में शिफ्ट करवाने आये थे। मैने कहा मैं भाभी को फोन करती हूँ  वह शाम तक कुछ ले आयेगी। हस्पताल में पूछा तो पता चला कि सुबह ही खाने के बारे में बताना होता है और हम तो कमरे में कोई तीन बजे पहुंचे थे।  शाम के ८ बजे जब शशांक और सरिता खिचडी लेकर आये तो पहला निवाला मुंह में जाते ही इनके आँखों में जो चमक आई मै उसे भुला नही सकती। कमजोरी बहुत थी, अपने आप उठ कर बाथरूम तक जाने की भी ताकत नही। फिर इनके लिये हमने रात और दिन के दो अटेन्डन्ट रखे। मै तो थी ही वहां। दो तीन दिन बाद इनको हम थोडा थोडा कॉरिडॉर में टहलाने ले जाते। हम कोई हफ्ता रहे वहां उस कमरे में। यह भी जाना कि हस्पताल में रहना कितना मुश्किल है । हर आधे घंटे बाद कोई ना कोई नर्स आकर कभी ब्लड शुगर तो कभी ब्लड प्रेशर लेने तो कभी दवाइयां देने आ जातीं। यह रात के तीन बजे तक चलता रहता। लेकिन सब लोग बहुत तत्परता से और अच्छी तरह अपना काम कर रहे थे। उनके बिना हमारा क्या होता।
अस्पताल में जब कोई मिलने आता तो इन्हे बहुत अच्छा लगता। मेरी ननद का बेटा अजय यहां टूर पर आया था वह भी हम से मिल के गया। धनंजय मेरा भतीजा भी अपनी पत्नी के साथ मिल कर गया।  जिस दिन हमें अस्पताल से छुट्टी मिली उसी दिन राजीव पहुंच गया। मेरे कंधे से जैसे बोझ़ सा हट गया। कमजोरी तो इनको बहुत थी। राजू ने घर आते ही इनकी दवाइयां डायेट वगैरे सब ठीक कर दिया वहां अस्पताल में जो डाएटिशियन ने चार्ट दिया था उसी में तीनों मील्स मे नॉन वेज डाल कर। थोडा पार्क में टहलना, एक्सरसाइज भी बताईं। उसके सात दिन रहने के बाद ये काफी कुछ सम्हल गये। कमजोरी तो थी ही साथ में खांसी थी कि इन्हें छोड ही नही रही थी। राजीव के जाने के बाद दूसरे दिन ही अमित आया। उसने कहा कि बाबा मेरे अनुमान से कहीं बेहतर लग रहे हैं । सुनकर मुझे और इनको भी तसल्ली हुई। अमित ने भी एक बहुत लंबा एक्सरसाइझ प्रोग्राम इन्हें बना कर दिया और जब तक वह रहा, करवाता भी रहा। नॉनवेज खाना और व्यायाम इनसे मसल-मास वापिस बनने में मदद मिली। अमित के जाते जाते ये थोडे और बेहतर हो गये पर खांसी और कमजोरी अभी भी थी। अमित के जाने के एक दिन बाद मेरी सहेली सुशीला आ गई। उसका आने का तो पहले से ही था पर समय एकदम सही बैठ गया और उसकी भी बहुत मदद हुई। उसके आने से घर में भी रौनक सी रही। मेरा धीरज भी बंधा रहा। घर का माहौल भी बदल सा गया, गप्पें, कविताएं, पुरानी यादें इन सब में समय बहुत बढिया गया। वह भी हमारे साथ व्यायाम करती। जब तक वह गई ये करीब करीब करीब सामान्य हो चले थे। दो महीने हो गये इस बात को शुरू हुए। ये मुश्किल दिन अपनों के साथ और मदद से आसान हो गये। मेरे मनमें जागृती फिल्म के गाने की, हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, यही पंक्ति गूंज रही है। पर हम यानि हम सब, शशांक सरिता, भाभी, डॉक्टर्स, नर्सेज अटेन्डेन्टस् सभी, सिर्फ मै नही। अब ब्लॉग पर भी आना जाना चलने लगेगा।


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

दिन नीके नीके



रस, रंग, सुगंध, उमंग भरे
दिन नीके नीके औ निखरे।


मन में प्रिय सुधि जागे ऐसे
कोहरे से धूप छने जैसे
मन आकुल व्याकुल मीलन को
जगे रोम रोम में पुलक कैसे
फूलों पे मंडराते भंवरे
दिन नीके नीके औ निखरे।

खेतों में सोने सी सरसों
उनको आ जाना है परसों
कल का दिन बीतेगा कैसे
पिय की छवि देखत हूँ हर सों
बादल से धवल सुंदर संवरे
दिन नीके नीके औ निखरे।

शिशिर की हुई हलकी सिहरन
कोमल सी धूप खिली आंगन
बजते हवा के घुंगरू छनछन
गोरी के थिरक उठे कंगन
एक लहर उठी शब्दों के परे
दिन नीके नीके औ निखरे।

दुलहन सी धरा सजी सँवरी
मेहेंदी रचे, केसर की क्यारी
दूल्हे ऋतुराज के स्वागत में
छेडती तान कोयल प्यारी
गायक न्यारे, पंछी, भँवरे,
दिन नीके नीके औ निखरे



चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

कुछ और क्षणिकाएँ


एक पत्थर उछाल तो दिया है कस कर
कि करे सूराख उनके ऊँचे महलो में
और झरें उसमें से हमारे प्राप्य,
पर अगर नही कुछ हुआ तो समझ लेना
कि गिध्दों नें दबोच लिया है उसे,
ताकि वे फोड सकें, हमारे जतन से
सेये हुए अंडे, अपनी हवस के लिये।

बहुत चाहते हैं कि तुम्हें मिले सफलता
पहली ही बार में, व्यवस्थापन के नियम की तरह
अगर कर सको, हमेशा सही, हर बार, पहली ही बार
पर मत होना निराश अगर ऐसा न हो,
क्यूं कि असफलता ही सफलता की पहली सीढी है।

वे करेंगे हर कोशिश तुम्हें बदनाम करने की
पर जारी रहे ये संघर्ष, यह मन में रखते हुए
कि बदनाम वही किया जाता है जिसका कोई नाम हो।

स्वार्थों की होड लेकर,
सब से आगे दौड कर
लड रहे हैं वे सारे खास
सिर्फ आम आदमी के लिये।

बुधवार, 8 जनवरी 2014

शुभ नववर्ष




अब अंधेरे भी पिघलते जा रहे हैं,
फैलती हैं सूर्य की नव रश्मियाँ,
बह रही है पवन ताजी हर दिशा में,
खिल रही बदलाव की  नई कलियाँ।

धो कर के कर दो स्वच्छ, ये सारी व्यवस्था,
झाड दो  जाले वे भ्रष्टाचार के
उसको मिले वह लाभ जो जिसके लिये है,
बहने दो झरने अब सद्विचार के।

देश भक्ति के गीत अब सब मिल के गाओ
बच्चों का बचपन वो वापिस फिर से लाओ,
बंद कर दो बेशरमी के नाच गाने
प्रकृति के कुछ नये नगमें गुनगुनाओ।

नारी का सम्मान हो, न हो अपमान कोई
उसकी सुरक्षा देश सी सर्वोपरी हो
हो अगर संकट में अपनी बहन कोई
आगे बढे रक्षा को सारे पिता भाई।

देश को हम आगे आगे ले चलेंगे
हर काम अपना दिल से हम पूरा करेंगे
जो जहां पर है, रहे मुस्तैद बन कर 
तब ही तो वतन का सपना सच करेंगे। 


एक पूरा माह घुमक्कडी रही । इसीसे लेखन वाचन को विराम रहा। पर अब वापिस घर आ गई हूँ तो आप सब के ब्लॉग भी पढना है । शुरुवात लिखने से भले हो पर पढना भी जारी रहेगा। सभी को शुभ नववर्ष।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

दर्द इतना बढा







दर्द इतना बढा सम्हाला न गया,
लाख चाहा मगर छुपाया न गया।



जाम आंखों के जो छलकने को हुए,
बहते अश्कों को फिर रुकाया न गया।

जख्म इतने दिये जमाने ने,
हम से मरहम भी लगाया न गया।

कोशिशें लाख कीं मगर फिर भी,
उनको आना न था, आया न गया।

ऊपरी तौर पे सब ठीक ही लगता लेकिन,
हाल अंदर का कुछ बताया न गया।

हम चल देंगे यकायक कि खाट तोडेंगे,
किसने जाना, किसी से जाना न गया।

जिंदगी का आज ये पल सच्चा है

इससे आगे को कुछ विचारा न गया।

चित्र गूगल से साभार