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बुधवार, 8 जनवरी 2014

शुभ नववर्ष




अब अंधेरे भी पिघलते जा रहे हैं,
फैलती हैं सूर्य की नव रश्मियाँ,
बह रही है पवन ताजी हर दिशा में,
खिल रही बदलाव की  नई कलियाँ।

धो कर के कर दो स्वच्छ, ये सारी व्यवस्था,
झाड दो  जाले वे भ्रष्टाचार के
उसको मिले वह लाभ जो जिसके लिये है,
बहने दो झरने अब सद्विचार के।

देश भक्ति के गीत अब सब मिल के गाओ
बच्चों का बचपन वो वापिस फिर से लाओ,
बंद कर दो बेशरमी के नाच गाने
प्रकृति के कुछ नये नगमें गुनगुनाओ।

नारी का सम्मान हो, न हो अपमान कोई
उसकी सुरक्षा देश सी सर्वोपरी हो
हो अगर संकट में अपनी बहन कोई
आगे बढे रक्षा को सारे पिता भाई।

देश को हम आगे आगे ले चलेंगे
हर काम अपना दिल से हम पूरा करेंगे
जो जहां पर है, रहे मुस्तैद बन कर 
तब ही तो वतन का सपना सच करेंगे। 


एक पूरा माह घुमक्कडी रही । इसीसे लेखन वाचन को विराम रहा। पर अब वापिस घर आ गई हूँ तो आप सब के ब्लॉग भी पढना है । शुरुवात लिखने से भले हो पर पढना भी जारी रहेगा। सभी को शुभ नववर्ष।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

ये मुझे क्या हुआ ?



पंछी नये गीत गाने लगे
फूल बगिया को महकाने लगे
कैसे मेरे दिन लहराने लगे ?
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
चाल मे नई बिजली सी भर गई
बालों में अनोखी महक भर गई
आखों में अजीब सी चमक भर गई
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
चेहरे पे नये भाव छाने लगे
कैसे बदलाव मुझ मे आने लगे
अच्छे भी लगे और डराने लगे
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
बिना कारण ही हंसी आने लगी
दर्पण देख देख मैं शरमाने लगी
सहेलियां भी मुझको सताने लगीं
ये मुझे क्या हुआ
किस पवन ने छुआ ।