बुधवार, 28 मार्च 2018

मज़ा

सुनो, सुन रहे हो ना
सुनो मेरा गीत जो आ जाता है होठों पर
सिर्फ दुम्हारे लिये ।

सुनो पुकार रही हूँ मै तुम्हें
दिखाना चाहती हूँ अपने हाथों में सद्य खिला गुलाब
जिसकी ताजगी आजाती है मेरे चेहरे पर
तुम्हें देखते ही।


सुनो तुम्हारे एक झलक के लिये
कितना तरसी हूँ मैं
पर इसमें भी एक तडप,
एक मज़ा है।

लगता है कि क्या ही अच्छा हो कि
हम देख सकें एक दूसरे को
सदा ही।

पर मज़ा तो कभी कभी पकवान खाने में है।

रविवार, 19 नवंबर 2017

चलते हीजानाहै।

कितना तो चल चुकी मैं
कितना अभी चलना है।
थक गये हैं पाँव लेकिन
राह बीच न रुकना है।

कहाँ खत्म रास्ता है
कोन सी मंजिल है मेरी
राह चाहे हो कँटीली
या हो फिर चाहे पथरीली
चलते ही जाना है मुझको
कँही ना ठहरना है

खत्म हो गये वे रस्ते
फूल पत्ती घाँस वाले
अब तो राह मरुथली है
पाँव में पड गये हैं छाले।
चलते ही जाना है लेकिन
राह में ना रुकना है।

ठहराव

भँवर में फँसी थी नाव
नाव में फँसा था पाँव
अनुकूल ना थी हवा
माकूल ना थी दवा
गर्त में था गहरा खिंचाव।

घबराहट चेहरेपर
धडधडाहट थी दिल में
कैसे निकले मुश्किल से
छटपटाहट थी मन में
दूर था किनारे का गाँव।


समय चल रहा था खराब
मुश्किलों का न कोई हिसाब
कोई न तरकीब ऐसी
कूद के पार हों ऐसी
वक्त का हो रहा रिसाव।

मुश्किल से सही
ये भी निकला समय
धीरे धीरे सही कट ही गया
वह समय
चलने लगी आखिर नाँव।

ठंडी हवा कुछ सुकूँ दे गई
साँस संयत हुई
कुछ तो राहत हुई
कुछ तो आया ठहराव।



शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

छह महीनों के लम्बे अंतराल के बाद मैं वापस पढ़ना लिखना शुरु कर रही हूँ। पहले आप सब को पढ़ूँगी फिर कुछ लिखूँगी भी। आशा है आप सबका सहयोग मिलता रहेगा।


शनिवार, 5 अगस्त 2017

दर्द ओ ग़म तो




दर्दों ग़म तो लाखों हैं इस ज़माने में,
ख़ुशी को लेकिन अक्सर ढूँढना ही पड़ता है ।

रंजिशों की तो  यहाँ सदा बिछी है बिसात
मात देने को सिकंदर ही बनना पड़ता है।

टी वी अख़बार तो छापते हैं बस बुरी ख़बरें
अच्छी ख़बरों को तो कोने में घुसना पड़ता है।

भूखे चेहेरों पे लाने के लिये छोटी हँसी
अपनी रोटी में से थोड़ा खिलाना पड़ता है।

अपनी कमाई में से कुछ तो थोड़ा सा
दूसरों की ख़ातिर भी रखना पड़ता है।

ग़मों में टूटने से बचने के लिये
दुख में भी मुस्कुराना पड़ता है।

हम हँसे तो लोग भी मुस्कुरा देंगे
रोशनी  हो तो अंधेरों को हटना पड़ता है।

ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम सनम
ऐसे तो फिर जीना सभी को पड़ता है ।


शुक्रवार, 5 मई 2017

कितने जतन किये

कितने जतन किये
तुमसे मिलने के

भिजवायें अनगिनत संदेसे
चिठिया पत्तर भेज के देखे
हवा पखेरू के संग अपने,
दुखडे कथन किये
कितने जतन किये।

सखा तुम्हारे, सखियाँ मेरी
दुखसे मोर जो थीं दुखियारी
जा जा कर के पास तिहारे
कष्ट निवेदन किये
कितने जतन किये।

तुम न पसीजे,तुम ना आये
क्यूं इतने कठोर हो पाये
क्या ऐसी मोसे भूल हो गई
जो ये मरन जिये
कितने जतन किये।

अब आजाओ न और रुलाओ
एक बार दरस दे जाओ
फिर चाहे वापिस ना आओ
कोई रहे या कि मिये
कितने जतन किये