रविवार, 19 नवंबर 2017

ठहराव

भँवर में फँसी थी नाव
नाव में फँसा था पाँव
अनुकूल ना थी हवा
माकूल ना थी दवा
गर्त में था गहरा खिंचाव।

घबराहट चेहरेपर
धडधडाहट थी दिल में
कैसे निकले मुश्किल से
छटपटाहट थी मन में
दूर था किनारे का गाँव।


समय चल रहा था खराब
मुश्किलों का न कोई हिसाब
कोई न तरकीब ऐसी
कूद के पार हों ऐसी
वक्त का हो रहा रिसाव।

मुश्किल से सही
ये भी निकला समय
धीरे धीरे सही कट ही गया
वह समय
चलने लगी आखिर नाँव।

ठंडी हवा कुछ सुकूँ दे गई
साँस संयत हुई
कुछ तो राहत हुई
कुछ तो आया ठहराव।



1 टिप्पणी:

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