गुरुवार, 11 अक्टूबर 2007

हे देवी

हे समस्त जीवों की माता, दया, क्षमा, शांति रूपिणी
सब जीवोंमें तुम ही स्थित हो, दुर्गे मांगल्यकारिणी
शक्तीरूप तुम, भक्तीरूप तुम, कांतिरूप तुम ही भ्रांति
वीरों की आराध्या, तुम ही माया, छाया, सरस्वती



सिंहारूढा, असुर नाशिनी, तुम ही कष्टों की निवारिणी
भक्तिप्रिया तुम भक्त वत्सला, तुम ही सौभाग्य दायिनी
महेश्वरी तुम ही महाकाली, तुम ही सूक्ष्म स्वरूपिणी
सुमंगली, भैरवी, सती तुम, तुम ही माँ विघ्न नाशिनी
नवरात्री के शुभ पर्व पर तुमको माँ शत शत प्रणाम
आशिर्वाद रूप में देना भारत को सर्व-गुणी संतान




आज का विचार
अच्छा विचार चिर-स्थायी है



स्वास्थ्य सुझाव
हीमोग्लोबीन बढाने के लिये खाने में साबुत मूँग का प्रयोग करें .

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2007

वे दु:ख बेचते हैं

कालेज में किसी कवी की एक अंग्रेजी़ कविता पढी थी
उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं,

We look before and after
and pine for what is not
Our sincerest laughter
With some pain is fraught
Our sweetest songs are those
Which tell us the saddest thought

उसकी सच्चाई अब जाकर मालूम पड रही है । खास कर टी वी के धारावाहिक देख कर । कोई भी धारावाहिक देखिये,
बिलकुल व्यंग वाले ऑफिस-ऑफिस को ही ले लीजिये, दुख को ही भुनाया जाता है, बेचारे मुसद्दीलाल हमेशा हारते ही रहे हैं । उनकी परेशानियों का कोई अंत नही । पारिवारिक धारावाहिकों की नायिकाओं का दुःख है कि दूर ही नही होता । षड़यंत्री महिला रिश्तेदारों से उन्हे भगवान भी नही बचाते । जिग्यासाओं, कावेरियों, कुकी काकियों तथा सिंदूराओं से मेरा तो कभी पाला पडा़ नही, पता नही किन परिवारों में बसतीं हैं ये ? शायद अति पैसैवाले परिवारों में । और तो और कहानी का कोई सामान्य अंत भी नही होता ।


दुखों को भुनाने के चक्कर में वाहिनियाँ इन्हे खींचती ही चली जाती हैं तब तक, जब तक की जनता उनका टी आर पी कम नही कर देती । कई बार तो फिर हडबडाहट में इन्हें समेट लिया जाता है । सामान्य पारिवारिक कथाओं की कब मर्डर मिस्ट्री बन जाती है पता ही नही चलता । और कहाँ कहाँ से इनके नये रिश्तेदार पैदा होते हैं ये भी । पर हमारी जनता में भी अद्भुत सब्र है । यह सब परोसा हुआ कचरा वह बकरी की तरह खाती ही रहती है, एक दो नही पांच पांच सालों तक ।

पचास तथा साठ के दशकों में दुखान्त फिल्मों का बोलबाला था । मीना कुमारी, नूतन, निम्मी इन फिल्मों की रानियाँ थीं ।
इन्हे हिंदी फिल्मों की ट्रेजेडी क्वीन कहा जाता था । और लोग बाग खास कर महिलाएं इन फिल्मों को खूब देखतीं और भरभर के आंसू बहातीं । पैसे देकर दुख मोल लेतीं ।
तब से अब फिल्मों मे ये बदलाव आया है कि वे आंसू नही अब जिस्म की नुमाइश करने लगीं हैं । रुलाने का ठेका अब टी वी वाहिनियोंने ले लिया है । एक के बाद एक दुख इन नायिकाओं पर लादे जाते हैं, अगर कोई अभिनेत्री तंग आकर धारावाहिक छोड देती है तो नायिका की प्लास्टिक सर्जरी करवा के वे नायिका ही बदल देते हैं । लेकिन दुख बेचते ही जाते हैं, आखिर मुनाफे का सौदा जो है ।

रविवार, 7 अक्टूबर 2007

समझ की समझ




बहुत पहले किसी सिनेमा में अमिताभ बच्चन ने एक संवाद कहूँ या छंद, बोला था ।
समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है
समझ समझ के भी जो न समझे, मेरी समझ में वो नासमझ है
तो भैया अपनी अपनी समझ होती है और दूसरे उसे समझ पाये ये जरूरी नही ।

बचपन में कोई ४-५ साल की रही हूँगी मैं, तब एक गाना सुना था ।
चुप चुप खडे़ हो ज़रूर कोई बात है,
पहली मुलाकात है जी पहली मुलाका़त है ।
तब मेरी अदना सी बुध्दी में ये आया कि हो न हो दो लड़कियाँ हैं जो चोरी से कुछ खा रहीं हैं ।
मेरी परेशानी ये थी कि अगर पहली मूली ( मराठी में मूली को मुळा कहते हैं) खा रही है तो दूसरी
क्या खा रही है ? शायद गाजर । मेरी बाल बुध्दी ने मुलाका़त को अपने हिसाब से मूला खात कर
लिया और चुपचाप भी खडी हैं, तो जाहिर है चोरी से ही खा रही होंगी । बहुत छोटी थी इसलिये तब ये
बात किसी को बताई नही।

मेरी एक और समझ की कहानी सुनिये । उन दिनों रिश्ते-दारी में जिसकी भी जनेऊ (व्रतबंध) होती उस लडके का
पूरा मुंडन होता और उसकी घुटी चप्पी पर मुहल्ले के बच्चे खूब टप्पियाँ मारते । तो उस बार हमारे मामाजी
जिनका नाम अरविंद था उनकी जनेऊ हुई थी और दूसरे लडके उनके सिर पर मार मार कर यह तुक्तक
बोलते थे ।
चम्मन गोटा, लाल बटाटा
हिरवा कांदा, काळा अरविंदा (हरा कांदा काला अरविंदा )
मामाजी बडे धाकड़ थे वे भी उन लडकों की जमकर पिटाई करते । पर मेरे मन में यह बात बैठ गई कि चमन या चम्मन याने सिर । फिर एक फिल्म आई थी शायद हम पंछी एक डाल के । बच्चों की फिल्म थी
तो गणेश उत्सव में मुफ्त दिखाई गई थी । उसमें एक गाना था,

ये चमन हमारा अपना है इस देश पे अपना राज है
मत कहो कि सर पे टोपी है कहो सर पे हमारे ताज है ।
गाना सुन कर तो मुझे पूरा विश्वास हो गया कि मेरी धारणा बिलकुल सही है । और सर पे टोपी वाली बात ने
तो मानो इसे पक्का कर दिया । फिर देश और राज वाली बात पर कौन ध्यान देता । और उर्दू किस
चिडिया का नाम है यह किसे पता था । और तो और यह बात सबको पता भी चल गई । फिर क्या था
इस बात पर तब तो जो खिंचाई हुई सो हुई पर आज भी भाई तो भाई मेरे अपने बच्चे भी मुझे चिढाने
से बाज़ नही आते ।

तो सारी समझ की बातें हैं जिसकी जैसी भी हो । अब अगर कुछ राजनीतीबाजों की समझ में न्यूक्लीयर डील नहीं आती तो ये उनकी समझ है । और कुछ समझकर नहीं समझते तो ये उनकी । अपनी अपनी समझ और जरूरतों के साथ जनता की जरूरतों को भी तो समझो भाई लोगों । जरूरत है आज बिजली की जिसकी किल्लत तो राजधानी में भी अच्छी तरह महसूस हो रही है । फिर दूर दराज के गाँवों की तो बात ही क्या । एक बिजली की समस्या हल होने से कितने और सवाल हल हो जायेंगे यह किसी की भी समझ में आ सकता है । उत्पादन बढेगा, रोज़गार बढेंगे, चीजों की आवक ज्यादा होगी तो दाम गिरेंगे, निर्यात बढेगा, खुशहाली आयेगी ।
और अभी तो आगे वहुत से व्यवधान हैं जिन्हे पार करना है । फिर अपनी तरफ से तो रुकावटें मत डालो भाई । ईश्वर करे सबकी समझ में आ जाये ।



शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2007

दुश्मनी दोस्ती जो हो जाये






तू भी आबाद रहे, मैं भी न बरबाद रहूँ
राह कुछ ऐसी निकल आये तो क्या अच्छा हो ।
तेरे गुलशन में बहारें आयें,
मेरा गुलशन खिला-खिला सा हो
मौसम गर ऐसे बदल जाये तो क्या अच्छा हो ।
तेरी तलवारें म्यान के अंदर,
मेरे तरकश में कोई तीर न हो
जंग गर खत्म ये हो जाये तो क्या अच्छा हो ।
तू भी आगे बढे और मै भी न पीछे को रहूं
दौड कुछ ऐसे हमारी हो तो क्या अच्छा हो ।
तू भी खुशीखुशी रहे, मैं भी न नाशाद रहूँ
मन्नतें पूरी जो हो जायें तो क्या अच्छा हो ।
तू भी अपना हाथ बढा, मैं भी कुछ आगे बढूँ
दुश्मनी दोस्ती जो हो जाये तो क्या अच्छा हो



आज का विचार
वाचन, चिंतन , मनन ।

आज का स्वास्थ्य सुझाव

रोज तिल (कच्चे या भुने आपके हाजमे पर निर्भर है )खाने से हड्डियाँ स्वस्थ रहेंगी ।

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2007

कविता का शौक








कविता हमें घु्ट्टी में नहीं तो चाय में जरूर पिलाई गई थी।
मुझे याद है गरमी की छुट्टियों में छत पर बिस्तर पर लेटे लेटे अंताक्षरी खेलना जिसमें हम भाई बहन ही नही
हमारे काका (पिताजी) और ताई (माँ) भी शामिल होते थे, बशर्ते कि फिल्मों के गानें नहीं गाये जायेंगे ।
केवल कविताओं का ही प्रयोग होगा । और क्यूंकि सबके साथ ज्यादा मजा़ आता हम भी खुशी खुशी तैयार हो जाते थे ।
ताई और काका का संस्कृत का खजा़ना प्रचंड था । हमें हिंदी और मराठी कविताओं का ही सहारा होता था, अनिवार्य़ संस्कृत के
सहारे थोडे बहुत श्लोक हमें भी बचा लेते थे। पर ये एक बडा कारण रहा कविता के शौक का । मुझे याद है मुझसे बडा मेरा भाई अनिल तो दिन भर कविता की पुस्तकें लेकर बैठा रहता था और रातमें अंताक्षरी खेलने का प्रस्ताव सबसे पहले हमेशा उसी के तरफ से आता।
कविताएँ याद करना और उन्हे पसंद करना यह एक आदत सी बन गई थी ।

सबसे बडे दादा (डाक्टर शरद काले) तो बचपन से कविताएँ लिखते थे । रात का खाना सब एक साथ खाते और यही वक्त होता था दादा की नई ताजी कविता सुनने का । कब खाना खत्म हुआ यह पता भी न चलता । झूठे हाथ सूख जाते पर थाली से उठकर कोई हाथ धोने भी न जाता । कविता और उसके रसग्रहण में ही हम सब डूबे रहते ।

मैने एक बार दादा को राखी पर एक कविता लिख भेजी । उसके जवाब में जो कविता दादाने भेजी वह मुझे हमेशा याद रहेगी।

मानस हुआ प्रफुल्लित मेरा पाकर पत्र तुम्हारा आशा
पत्र नही वह थाल तु्म्हारा नीरांजन थी उसकी भाषा
उस भाषा के नीरांजन की ज्योति तुम्हारी सुंदर कविता
जिसकी अलंकार आभा से छुप जाता कुम्हलाकर सविता

ये पहली चार पंक्तियाँ थीं। और अंतिम चार थीं ,

भाव भरे भैया के मुख सा भविष्य मंगल बहिन तुम्हारा
तुमसे झरती रहे हमेशा काव्य सुधा की रिमझिम धारा
आशिर्वाद यही देता हूं राखी के बदले में आशा
आशा है तुम भी न करोगी विफल कभी यह मेरी आशा

हमारी ताई भी प्रसंगानुसार कविता करती थीं । शादी का मंगलाष्टक, नामकरण की लोरी उनकी विशेषता थी । पर मराठी में ।
काका थे तो इंग्लिश के प्राध्यापक परंतु हिंदी, मराठी संस्कृत तथा इंग्लिश चारों भाषाओं पर उनका अद्भुत प्रभुत्व था
गणेशोत्सव कालेज के गेदरिंग, कवि सम्मेलन, व्याख्यान, संगीत की महफिल, कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम ऐसा न होता जहां हमारा परिवार न जाता हो । काका ने कभी कविताएं नही लिखीं पर वे शीघ्र कवि थे । एक बार वे तत्कालीन भाषण प्रतियोगिता के अध्यक्ष थे । विषय था लड़ गया छकड़ा हमारा उनकी मोटर कार से । सब के भाषण हुए , समारोप करते हुए काका ने समाँ बांध दिया । उन्होंने कहा
लेम्प गुल, घंटी नदारद, ब्रेक था चलता नही
लड गया छकडा़ हमारा उनकी मोटर कार से ।
ये बात तबकी है जब क्या विद्यार्थी क्या प्राध्यापक सब साइकल से ही आया जाया करते थे ।
अक्का और मै भी यदा कदा कलम चला लेते थे । और तो और हमारे सबसे छोटे भैया मिलिंद ने दूसरी कक्षा में ही दो लाइन की पेरोडी बना दी । तब मन मोरा बावरा गाना खूब चला था । इसने अपनी कक्षा में सुनाया
पेट मोरा हावरा, निस दिन खाये भजिये बेसन के ।
हावरा का अर्थ मराठी में खाने का लालची होता है । तो ऐसे पनपा हमारा कविता का शौक ।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2007

हक




हमें न आये कभी ख्वाब वाब महलों के
मगर हमें भी तो हक है कि छत तो सर पर हो ।
न हमने चाहा कभी बादलों में जा उडना
मगर अपनें पाँवों के नीचे इक रह-गुजर तो हो ।
तुम्हें मुबारक हो तुम्हारे मखमली बिस्तर
मगर हम थककर जो लौटें कोई दर तो हो ।
न की थी आस कभी भी चमन के फूलों की
मगर बहार का आँखों पे कुछ असर तो हो ।
नसीबों वाले हो खा रहे हो मालपुए
हमको रोटी ही सही मगर पेट-भर तो हो ।
तुम्हींने लूट लिये सारे चैन ओ सुख मेरे
किसी अदालत में अब फरियाद की सहर तो हो ।
कुछ मेरे पास अब तो नही रहा बाकी
ले दे कर इक वोट बचा है, न बे-असर वो हो ।


आज का विचार
सलाह और मदद बिन मांगे न दें ।

स्वास्थ्य सुझाव
जुकाम से बचें, सुबह की चाय अद्रक वाली और शहद डाल कर पीयें ।

गुरुवार, 27 सितंबर 2007

बुरे फँसे बेचारे




मौज और मस्ती
तब जो थी सस्ती
जोशे जवानी
सारी मनमानी

होटल सिनेमा
लंच डिनर खाना
प्यारी प्यारी बीवी
नया नया टीवी

जब जो चाहा
वो ही तो पाया
इससे ही पनपा
प्यार जो इनका

गुल खिला प्यारा
मुन्ना हमारा
तब से है हाथ में
और है साथ में

दूदू की बोतल
और पेसीफायर
बैग में डाय़पर
और थोडे वायपर

थोडे से बिब
और दो चार पोंछे
कहाँ गये मस्ती के
दिन हम यूँ सोचें

नींद गई रातकी
चैन दिन का गया
यार इनका तो
हाल बुरा हो गया

कहाँ थे ये
और पहुँचे कहाँपर
छोडो जी इन्हें
इनके ही हाल पर



आज का विचार
यत्न, यत्न, यत्न.........यश ।

स्वास्थ्य सुझाव
खाना ... दिन में भरपेट रातमें आधा पेट।