शनिवार, 26 जुलाई 2014

धुंधली सी उम्मीद


राह खत्म है फिर भी चल रहा हूँ मै
कागज़ नही पर शब्द ही छलका रहा हूँ मै।

आँखों के आँसू सूख गये बडे दिन हुए,
दिल में कहीं नमी की, खोज में रहा हूँ मैं.

कैसे कोई किसी से इतनी बेरुखी करे,
सवाल का जवाब नही पा रहा हूँ मै।

मैने तो अपनी ओर से कोशिश भी की बहुत,
उस बंद दर को कहाँ खुलवा सका हूँ मै।

एक धुंधली सी उम्मीद कि शायद खुलेगी राह,
इसी आस को दिल में बसाये जा रहा हूँ मै.






चित्र गूगल से साभार।

शनिवार, 28 जून 2014

बुढापे का सुख















बुढापे में भी सुख होता है।

सुख- किसी भी बात की जल्दी ना होने का,

सुख- कोई जिम्मेवारी ना होने का,

सुख- दोपहर में किताब लेकर लेट पाने का,

सुख- नाती पोतों को प्रति-दिन बडा होते देखने का,

सुख- नातेरिश्ते में गप्पे लगा पाने का,

सुख- दोस्तों से लंबी बातें कर पाने का,

सुख छुट्टी ही छुट्टी होने का,

सुख सिर्फ ३० से ५० प्रतिशत किराये में इधर उधर घूम पाने का,

सुख- फटी बिवाइयों में घंटों मरहम मलने का,

बुढापे में भी सुख होता है, सिर्फ उसे मजे लेकर भोगना आना चाहिये।



चित्र गूगल से साभार



मंगलवार, 17 जून 2014

यादें

घने कोहरे सी मन को भर देती हैं यादें
भूल तो जाऊँ पर भूलने कहाँ देती हैं यादें।

वह पुराना गीत जब कोई गुनगुनाता है,
जाने कहां से जहन में चली आती हैं यादें।

पलटने लगती हूँ जब कोई पुरानी सी किताब,
कोई सूखा सा फूल कर देता है ताज़ा यादें।

किसी सहेली को जब देखती हूँ प्रेम में मगन
जाने क्यूं आँखों से आंसू सी छलकती हैं यादें।

वे नोट्स के मार्जिन में तुम्हारे मैसेज
पढूं या ना पढूं दिल पे लिखी रहती हैं यादें।

यह क्या मेरे ही जहन की हैं खुराफातें
या फिर सब को ऐसे ही सताती हैं यादें।

क्या तुम सचमुच ही भूल गये हो मुझको
या फिर कभी कभी आती हैं तुम्हें मेरी यादें।


मंगलवार, 10 जून 2014

मेरा सब सामान गया



शमा जली है जलने दे
मन को आज मचलने दो
तेरा मेरा किस्सा क्या
जो किस्सा है चलने दो।

हमने सबसे प्यार किया
कोई जलता है जलने दो
मैं क्यूँ उस पर ध्यान करूं
मुझे अपने रस्ते चलने दो।

अफसर को ये कहते सुना
लोग बला हैं टलने दो
ये कैसा जनतंत्र चला
कि जनता को कुचलने दो।

सब सबूत जिस फाइल में
हैं, उसको ही जलने दो,
या फिर तेजाब में डुबो
और फिर उसको गलने दो।

आज का बेटा ये कहता
समय के साथ बदलने दो
हुई पुरानी आपकी बात
नई हवा को चलने दो।

इन बातों के बीच कोई
गर्माये तो उबलने दो
मेरा सब सामान गया
अब मुझको भी चलने दो।




गुरुवार, 29 मई 2014

मालगुंड (कोकण) की सैर




इस बार वापिस आने के बाद महीने के अंदर ही हमने घूमने का कार्यक्रम बना लिया। मालगुंड, पुणे,  पनवेल, ठाणे और वापिस।
मालगुंड- गणपतिपुळे के साथ ही लगा हुआ कोकण का एक गाँव जो अभी भी अपने गांव-रूप को जतन किये हुए है। मिलिंद और अचला ( मेरा छोटा भाई और भावज) ने वहीं अब अपना घर बसा लिया है। रांची में बहुत साल किर्लोस्कर इंजिनों की मरम्मत और बिक्री का काम करने के बाद अवकाश का शांत सा बसेरा।
इन दोनों के वहां जाकर बसने का एक कारण अचला की बहन अलका और बहनोई श्री वैद्यजी की मालगुंड में जा कर बसना था।  वे चाहते थे संग साथ तो बस उन्होने ही जमीन खरीदवाई और मकान भी बनवा दिया। मिलिंद अचला को सिर्फ २-४ बार वहां चक्कर लगाने और चेक काटने की जरूरत पडी और चाभी उनके हाथ में। सुंदरसा  दो तल्ला मकान २ शयनागार ऊपर दो नीचे, नीचे ही बडा सा हॉलनुमा ड्रॉइंगरूम कम लिविंग रूम कम किचन और डायनिंग। ऊपर बडी सी छत और नीचे बाहर अहाता पेड पौधे लगाने के लिये। सडक पार करते ही एक बडी सी केवडे की झाडी और झाडी के तुरंत  बाद सुंदर सा रत्नाकर यानि समंदर। यह मै इस लिये बता रही हूँ क्यूं कि हम रहते हैं दिल्ली जैसे महानगर के एक फ्लैट में और ये सब कुछ कल्पना ही है। बहर हाल हमारे सफर पर आते हैं।
रत्नागिरि स्टेशन पर जब हमारी त्रिवेंद्रम राजधानी कोई २२ घंटे के सफर के बाद पहुँची तो मिलिंद अचला को स्टेशन पर पाया वे गाडी लेकर हमें लेने आये थे क्यूं कि रत्नागिरि से मालगुंड के लिये वही सही था। बस सेवा नही के बराबर तो गाडी या टेम्पो ही हैं जाने आने के साधन।
हमारा सामान जिसे उठाने के दिल्ली में कुली ने ६०० रुं लिये थे मालगुंड में महज १२० रूं लिये। इस के बाद हम मिलिंद की ईको में बैठ कर चल पडे मालगुंड की और। कोई एक घंटे की सुखद यात्रा जिसमें बराबर आपको सागर दर्शन होता रहता है । यह किसी तरह कैलिफोर्निया की Seventeen miles scenic drive से कम न थी । घर पहुँचे नहा धो कर खाना खाया और आराम किया। शाम को गये बीच पर घूमने लंबे खाली बीच पर दो चक्कर लगाये और सूर्यास्त का बहुत सुंदर दृष्य का आनंद लिया। सूर्यदेव धीरे धीरे उत्तरी गोलार्ध की और प्रस्थान कर रहे थे। क्षितिज पर जहां आकाश और सागर का मिलन होता सा लग रहा था, हम प्रतीक्षा में थे कि सूर्य देव अब सागर में डुबकी लगा कर उत्तरी गोलार्ध में कहीं उदित हो रहे होंगे, उनके इसी ही रूप को देख कर कवि ने कहा होगा,
उदये सविता रक्तः रक्तश्चास्तमने गतः
संपत्तौच विपत्तौच महताम् एकरूपता।
हमने कुछ फोटो भी क्लिक किये।
एक मिलिंद के हथेली पर सूरज का भी लिया था पर कहीं खो गया। ( CLICK VDO  MVI 0044)
जाते ही हमने मिलिंद से कह दिया कि हम तो कोकण दो तीन बार घूम चुके हैं, तो इस बार इरादा सिर्फ
सागर किनारे रहने का आनंद उठाने का है । रोज सुबह उठते ही चाय पान के बाद हम पहुंच जाते बीच पर। मिलिंद-अचला ओर अलका तथा वैद्य साहब की तो यह रोज की ही दिनचर्या थी।तो दूसरे दिन सुबह हम पहुंचे बीच पर तो सागर देख कर ही आनंद आ गया। (CLICK VDO  MVI 0056)
 हर दिन सागर का अलग ही रूप होता था एक दिन तो हमने इतने सी गल्स देखे कि मज़ा आ गया। आप भी आनंद उठायें। (CLICK VDO  MVI 0964 )
CLICK VDO  MVI 0965
CLICK VDO  MVI 0966
 मिलिंद को फिर भी चैन न था । रोज़ ही शाम को गाडी निकाल कर कभी कोई बीच तो कभी किसी मंदिर का प्रोग्राम बन ही जाता था। वैसे भी कोंकण में समंदर और मंदर ही हैं देखने को और है सम्पन्न प्रकृति जो हर दिन अपना नया रूप लेकर प्रस्तुत होती है। सागर को ही लें वह हर दिन अलग दिखता है, सुबह, शाम, दोपहर भी अलग दिखता । नारियल, आम और काजू के पेड और काजू तथा आम के फूलों की खुशबू एक अदभुत वातावरण की सृष्टि करती थी। इन फूलों को हिंदी में बौर तथा मराठी में मोहर बोलते हैं।
ऐसे ही एक दिन मिलिंद हमें जयगड के गणेश मंदिर ले गया। ये मंदिर जिंदल स्टील एन्ड पॉवर कंपनी के इलाके में है। बहुत ही सुंदर बनाया है। मंदिर का परिसर साफ सुथरा है तथा चारों तरफ बगीचा है जिसमें रंगबिरंगे फूल खिल रहे थे और तरह तरह के पेड  पौधे भी अपनी हरियाली बिखेर रहे थे। मंदिर के अंदर की गणेश प्रतिमा ने तो मन मोह लिया। । मन में अथर्वशीर्ष का गणेश वर्णन तैरने लगा।
एकदंतम् चतुर्हस्तम् पाशमांकुशधारिणम,
रदंचवरदम् हस्तै बिभ्राणम् मूषकध्वजम्।
रक्तम् लंबोदरम् शूर्प कर्णकम् रक्तवाससम्,
रक्तगंधानुलिप्तांगम् रक्तपुष्पैसुपूजितम।
बहुत देर तक मंदिर में ही रहे फिर चारों तरफ चक्कर लगाया, मन बहुत प्रसन्न था लगा कि शाम सार्थक हो गई । काश कि हमारे सारे मंदिरों का रख-रखाव ऐसा ही हो।  (CLICK VDO  विडियो ००६१)
रोज जब हम बीच पर टहलते मेरी आंखें रत्नाकर के द्वारा फेके गये रत्नों यानि विभिन्न प्रकार के शंख, सीपियां और दूसरे समुद्री जीवों के  अवशेषों की तलाश में रहतीं। इसमें अचला की बहुत मदद होती थी. उसकी आँखें इस कार्य के लिये काफी प्रशिक्षित थीं। मेरे लाये हुए रत्नों में से कुछ की तस्वीरें तो मै आपको दिखा ही सकती हूँ। (CLICK VDO  विडियो MVI 968)
सोला तारीख को दत्त जयंती थी । मिलिंद ने कहा, यहां गांव के दत्तमंदिर में जन्मोत्सव होता है देखोगी, मैने कहा,” नेकी और पूछ पूछ। और इस तरह हम शाम को गांव के मंदिर जा पहुँचे। मंदिर सुंदर ढंग से सजाया गया था और ठसाठस भरा था, जैसे सारा गांव उमड पडा हो। यही हकीकत थी। गाँव के सारे लोग वहीं थे।
पहले तो दत्तगुरु के भजन हुए। फिर नामस्मरण हुआ, दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा। फिर दत्त जन्म हुआ। जैसे सचमुच हुआ हो इसी तरह औरतों नें उन्हें पालने में डाल कर झूला झुलाया, लोरियां गाईं । जन्मोत्सव के पेडे बाँटे गये और नामकरण हुआ। फिर  नवजात दत्तात्रय को दर्शन हेतु गोदी में उठा कर हर भक्त के पास ले जाया गया। यह सब मेरे लिये अनोखा था, लगा गोपाल नीलकंठ दांडेकर जी के किसी उपन्यास में मेरा प्रवेश हुआ है और में उसका एक हिस्सा बन गई हूँ। अद्भुत अनुभव। फिर दत्तात्रय जी  की आरती के बाद हम सब विदा हुए। बहुत ही आग्रह के साथ हमें दूसरे दिन के खाने का (पारणं) न्योता मिला पर हमारा अन्य कार्यक्रम था तो हम इसका आनंद नही उठा पाये। रात का वक्त होने से हम फोटो नही खींच पाये इसका मलाल रहेगा।  रात को छत पर गये और चांद देखा मिलिंद गुनगुनाया चांद फिर निकला और सुरेश ने चांद को कैमरे में कैद कर लिया।(CLICK VDO  विडियो MVI 1034)
फिर एक दिन मिलिंद ने कहा चलो आज मालगुंड के सारे मंदिर घुमाता हूँ तुम्हे । और हम गांव देवी,
विठ्टल मंदिर, राम मंदिर तथा एक अलग सा मंदिर जिसमें कई देवी देवताओं की मूर्तियां थीं। जाखा देवी, चंडी देवी, रवळनाथ, शिव आदि (CLICK VDO  विडियो 1006&7)
राम मंदिर छोटासा था किन्तु मूर्तियां बहुत सुंदर थीं। हमने वहां रामरक्षा का पाठ भी किया। (CLICK VDO  विडियो विडियो MVI1027)
 शिव मंदिर तो हमने पहले भी देखा था वहां का रख रखाव और मंदिरों के मुकाबले ज्यादा अच्छा है। आप भी देखें (CLICK VDO  विडियो mvi 1028)
अचला रोज़ कुछ न कुछ खास बनाती और मिलिंद अपने चुटकुले सुनाता या फिर बांसुरी बजाता।  आप भी सुनें बांसुरी की धुन। (CLICK VDO  विडियो MVI 991&992)
मिलिंद के वहाँ से नेवरे गांव बहुत पास था वह हमारे मामा (गाडगीळ) लोगों के पूर्वजों गांव था तो  मिलिंद ने कहा चलो मामा के गांव चलते हैं। वहां गये वहां पर गजानन महाराज का अच्छा सा मंदिर है जहां हर साल उत्सव होता है। पर अब वहां हमारे मामा के गोत्र का कोई भी व्यक्ति नही रहता। सुन कर बडा अजीब लगा कैसे सारे के सारे लोग अपना गांव छोड कर शहर चले जाते हैं। पिछली बार आये थे तो हम अपने गांव गये थे ( मायके का गांव घोळप) पर वहां कम से कम एक परिवार तो हमारे नाम और गोत्र का था और हेदवी गांव (ससुराल का गांव) में तो अभी भी काफी सारे जोगळेकर हैं।
यह सब करते और रोज बीच पर सैर करते, दिन पर लगा कर निकल गये और आखिर हमारा पुणे जाने का समय आ ही गया। पर मालगुंड में बिताया समय हमेशा याद रहेगा। और हाँ इस प्रवास की एक और उपलब्धी रही, अचला बहुत अच्छे रसगुल्ले घर में बनाती है तो मैने भी सीख लिये। कभी बताऊंगी आपको दाल चावल रोटी पर।

पुणे में विजूताई इनकी चचेरी बहन की और मेरी भाभी अर्चना की मेहमान नवाज़ी का लुत्फ उठाया। दो मराठी मूव्हीज देखीं उनमें से एक पितृऋण बहुत ही अच्छी लगी। मेरी दोस्त सुशीला से मिले खूब सारी कविताएं सुनी और सुनाई। पनवेल में मेरे भांजे रवी उसकी पत्नी जयू और मेरे जीजाजी से मुलाकात की। ठाणें में देवर प्रकाश और देवरानी जयश्री से मिले। मराठी नाटक देखें । खान पान तो सब जगह हर घर का स्पेशल रहा।  जनवरी ७ तारीख को वापिस दिल्ली पहुंचे और ठंड का वो कहर कि बस। पर घर तो घर ही है, ठंड हो या गरमी।

शुक्रवार, 23 मई 2014

खामोशी



















डूबना चाहती हूँ मै खामोशी के इस तालाब में
नही अच्छी लगती हैं ये आवाजें
रेलो की, हवाई जहाज़ों की, मशीनों की, ट्रक और कारों की
आदमियों की भी नही। झूटे मेकअप में सजी झूटी बातें।

बारिशों, आंधियों, तूफानों, बिजलियों की भी नही, गुनगुन, चिकमिक,
पत्तों की सरसराहट भी नही।
अपने अंदर सिमटना चाहती हूँ मै, बे-आवाज़।
हवा जो सरसराती है त्वचा पर वही ठीक है।

लेकिन बाहरी खामोशी जगा देती है भीतरी कोलाहल
इसका क्या करूँ?
आवाजें क्रोध की, अपूर्ण इच्छाओं की, अहंकार की
मत्सर की, मोह की, इनसे कैसे पीछा छुडाऊँ?
मै स्तब्ध हूँ, आँखें बंद। एक आवाज आती है, फिर से आवाज़.........
पर इस बार एकदम अंतस से, गंभीर
शायद इन सब आवाज़ों की औषधी।
S गं गणपतये नमः
S गं गणपतये नमः
S गं गणपतये नमः

और शांत हो जाती हैं बाकी आवाज़ों की तरंगे।


चित्र गूगल से साभार।

गुरुवार, 15 मई 2014

छोटी बातों में
























छोटी बातों में बडा दम है,
बडों के पास बडा अहम है।

हमने कब किसीसे होड करी
जो है हम पे वो भी क्या कम है।

सवाल तो बस टिके रहने का है
चमकार तो केवल भरम है।

रूप पे इतना दंभ क्यू गोरी
माना के अभी तेरा परचम है।

सूरतें तो बदल ही जाती हैं
इल्मो-सीरत का हम पे भी करम है।

इन्सां की शक्ल भेडिये का दिल
जो दिखाये न रब वही कम है।

जिस जनता की करनी है सेवा
लूटते उसी को बन के हमदम हैं।

अब जो भी आयेंगे आगे
देखते हैं सख्त या नरम हैं

मैं भी क्या करूं न कैसे लिखूं,
मेरे पास भी तो कलम है.



चित्र गूगल से साभार।