चांदनी की झीनी ओढनी
प्रीत की सुमधुर रागिनि
यमुना जैसे मंदाकिनि
शरद की ऋतु सुहावनी
आओ ना गिरिधर।
तज दो ना ये विराग
बसा लो मन में अनुराग
गूंज रहा प्रेम राग
जाग रहा है सुहाग
देखो मुरलीधर।
सखियाँ करे ठिठोली
बोल कर मीठी बोली
चली आई यूँ अकेली
तेरी प्यारी सहेली
ना तरसाओ श्रीधर।
ये मधुऋतु सुहानी
बिन तुम्हारे विरानी
न रूठो राधा रानी
आ गये प्रियकर।
चित्र गूगल से साभार

