जलता सूरज
गरम गरम धरती
रोटी की तरह दिन भर सिकती ।
घिसी चप्पल जलाती पांव
सूखे ठूँठ पर कौवों की काँव काँव।
पीपल के पत्ते भी स्तब्ध
हवा के डैने कैद बंद ।
सूखे होंठों को गीला करती जीभ
दूर तक पानी की नही कोई सींच ।
सूना पनघट, खाली गगरी
छांव से खाली आंगन, देहरी ।
पसीने की चिपचिपाहट
खीझ, झुंझलाहट, पॉवरकट ।
घूंघट के नीचे माथे पर पसीने
बच्चे नंगे अन-तराशे नगीने ।
पानी के लिये सब तरसे
कब आयें बादल और कब बरसे ।
गरमी है ये जेठ की गरमी
नही बरतेगी कोई नरमी ।