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शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
खिडकी
मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी, कभी तुम भी खुली रखते ।
बस आँखें बंद करने से, मुश्किलें कम नही होती
तुम भी यह जान ही जाते जो आँखों को खुला रखते ।
हमेशा खुद को वंचित करके, दूसरा खुश नही होता,
सच मानो मै भी खुश होती, जो तुम खुद के लिये जीते ।
मन के अंदर जो दुख पनपे, हँसी होंठों पे कैसे हो,
दिल से तब मुस्कुराते तुम, जो खुद अपनी खुशी चुनते ।
तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते
मै तो इस प्यार से अपने, जगमगा कर रखूँ आंगन
कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ इस रस्ते ।
चित्र गूगल से साभार
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