रविवार, 12 सितंबर 2010

बारिश

कभी तो ये आंगन छिडकती है बारिश
कभी पेड-पौधे धुलाती है बारिश ।
कभी तो झमाझम बरसती है बारिश
और मोर छमाछम नचाती है बारिश ।
बादल के ढोलक बजाती है बारिश
कभी बिजली में नाचती है ये बारिश ।
पवन में कभी सनसनाती है बारिश
कभी घोर गर्जन सुनाती है बारिश ।
कहीं आँसुओं को छुपाती है बारिश
तो चेहरे पे खुशियाँ खिलाती है बारिश ।
घटा में कभी घिर के आती है बारिश
कभी धूप मे मुस्कुराती है बारिश ।
कहीं नन्हे मुन्ने रुदन में है बारिश
बाढ आये तो सबके सदन में है बारिश ।
रास्तों बाजारों में पानी है बारिश
इन्सां की मुश्किल बढाती, ये बारिश ।
कभी आंधियों सी उखडती, ये बारिश
गाँवों, घरों को उजडती ये बारिश ।
कभी खेत में लहलहाती है बारिश
कभी दूर प्रीतम सी रहती है बारिश ।

41 टिप्‍पणियां:

सुनीता शानू ने कहा…

सुप्रभात आशा जी, लगता है बारिश में इस बार बहुत नहा लिये...बारिश से सराबोर खूबसूरत रचना के लिये बधाई ।

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ....

मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
(क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
(क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है आपने। किसी के लिये ये बारिश वरदान है तो किसी के लिये अभिशाप।
on a lighter note, इस पोस्ट को ’आदमी जो कहता है, आदमी जो सुनता है’ यह गाना सुनते हुये पढ़कर देखें, शायद एक अलग ही रंग उभरे = बूंद कभी मिलती नहीं, प्यास कभी बुझती नहीं, और कभी रिमझिम .......।
आभार।

मनोज कुमार ने कहा…

घटा में कभी घिर के आती है बारिश
कभी धूप मे मुस्कुराती है बारिश ।
कितनी प्यारी-प्यारी है बारिश। इन पंक्तियों ने खास आकर्षित किया।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!

Unknown ने कहा…

...बारिश के सुहाने मौसम का सुंदर वर्णन!
!...बारिश में भीगने का मजा आ गया!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कभी शब्दों में ढल जाती है बारिश ..

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बारिश के अनेकों रूप को लिखा है आपने ... बहुत खूब ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

कहीं आँसुओं को छुपाती है बारिश
तो चेहरे पे खुशियाँ खिलाती है बारिश ।
घटा में कभी घिर के आती है बारिश
कभी धूप मे मुस्कुराती है बारिश ।
वाह...बारिश के कितने रूप पेश कितने हैं आपने.
बहुत अच्छा प्रयास...बधाई.

Abhishek Ojha ने कहा…

फिलहाल तो मुश्किलें ही बढ़ा देती है. ठंढ हो जाती है :(
अच्छी प्रस्तुति.

दिव्यांशु भारद्वाज ने कहा…

कभी बारिश की पहली बूंद का इंतजार रहता था। अभी तो दिल्ली में बारिश उस अतिथि की तरह है जिसे लोग कहते हैं कि तुम कब जाओगे। बारिश को आपने शब्दों में बखूबी बांधा है।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कहा सच है
सुन्दर है बारिश

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

vah ji bahut sunder maja aa gaya padhkar

ओशो रजनीश ने कहा…

अच्छी पंक्तिया, बहुत अच्छा लिखा है आपने। ......

एक बार पढ़कर अपनी राय दे :-
(आप कभी सोचा है कि यंत्र क्या होता है ..... ?)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बारिश से सराबोर खूबसूरत रचना लिखी है आपने....

राजभाषा हिंदी ने कहा…

राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज़्ज़त करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिन्दी की इज़्ज़त न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिन्दी की जड़ें पताल तक पहुँचा दी हैं। उन्हें उखाड़ने का दुस्साहस निश्‍चय ही भूकंप समान होगा। - शिवपूजन सहाय

हिंदी और अर्थव्यवस्था-2, राजभाषा हिन्दी पर अरुण राय की प्रस्तुति, पधारें

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन भिगाया! :)




हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

Kusum Thakur ने कहा…

वाह...हमें भी बारिश का आनंद आ गया !!

ZEAL ने कहा…

.
कभी खेत में लहलहाती है बारिश
कभी दूर प्रीतम सी रहती है बारिश ।

खूबसूरत रचना के लिये बधाई ।

.

SATYA ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति।
यहाँ भी पधारें :-
अकेला कलम...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

घटा में कभी घिर के आती है बारिश
कभी धूप मे मुस्कुराती है बारिश ।

कमाल की रचना है बारिश पर आपकी...कितने ही रंग बिखेर दिए हैं आपने...वाह...आनंद आ गया..

नीरज

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

यहाँ भी भिगोये जा रही है .....
पर मन है की भीगता ही नहीं .....
मुबारक ......
ये भीगा मौसम .......!!

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

इन्सां की मुश्किल बढाती, ये बारिश ।
कभी आंधियों सी उखडती, ये बारिश
गाँवों, घरों को उजडती ये बारिश ।
कभी खेत में लहलहाती है बारिश
कभी दूर प्रीतम सी रहती है बारिश ।

बारिश की व्याख्या के क्या कहने...बहुत खूब लिखा है...
http://veenakesur.blogspot.com/

Shabad shabad ने कहा…

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ...
आनंद आ गया बारिश का!!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

बारिश पर अच्छी बौछार की भावनाओँ की ।

Suman ने कहा…

asha tai barish ka sunder varnan kiya hai..........

प्रिया ने कहा…

Kabhi man bhi to bhigoti hai barish....bheeg gaye :-)

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह खूब बारिश करवाई आपने.

Urmi ने कहा…

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !
बहुत सुन्दर और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

rashmi ravija ने कहा…

कभी खेत में लहलहाती है बारिश
कभी दूर प्रीतम सी रहती है बारिश ।

क्या बात है...बारिश पर बहुत ही प्यारी सी रचना लिख डाली...बहुत ही सुन्दर

daanish ने कहा…

बारिश की बूंदों में ख़ूबसूरती से भीगी हुई
आपकी ये रचना मन के कोनों को सराबोर कर गयी
शब्द-शब्द आपने बारिश से सम्बंधित
सभी पहलुओं को उजागर कर दिया है
आभार .

शरद कोकास ने कहा…

वाह बारिश के इतने आयाम , पढ़कर अच्छा लगा ।

ZEAL ने कहा…

कहीं आँसुओं को छुपाती है बारिश
तो चेहरे पे खुशियाँ खिलाती है बारिश ।
घटा में कभी घिर के आती है बारिश
कभी धूप मे मुस्कुराती है बारिश

पुनः पढ़ा...और भी अच्छी लगी...आभार

. ।

निर्मला कपिला ने कहा…

इस शब्दों की बारिश ने हमे भी भिगो दिया। बहुत सुन्दर। बधाई।

Alpana Verma ने कहा…

बारिश के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को बताती हुए अच्छी कविता .उत्तर भारत में तो आजकल बारिश कहर ढाए हुए है.

davbindu ने कहा…

कहीं आँसुओं को छुपाती है बारिश
तो चेहरे पे खुशियाँ खिलाती है बारिश ....
बहोत खुब...जितनी बारिश पसंद है उतनीही यह कविता भी पसंद आयी...
-एक बारिश का दीवाना

Parul kanani ने कहा…

hmm..boond boond shbd chamak rahe hain!

शोभना चौरे ने कहा…

sbhi rang dikha diye aapne barish ke hmare bhi tan mn ko bhigo gai ye
"BARISH"

Swarajya karun ने कहा…

बारिश की तस्वीर के दोनों पहलू आपने दिखाए . बहुत अच्छा वर्णन किया है . बधाई और शुभकामनाएं इन पंक्तियों के साथ-

ये अनमोल अमृत है, भाई , इसे बचाना कब सीखेंगे .
कुदरत के तोहफे को नदियों -झीलों में सजाना कब सीखेंगे !
समझ न पाए मोल इसका , तभी कहर बन जाता है .
इसके सैलाबों में जीवन सच खंडहर बन जाता है !

संजय भास्‍कर ने कहा…

खूबसूरत रचना के लिये बधाई ।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह! सुंदर वर्षा गीत।
..बधाई।