शनिवार, 27 जून 2015

सफर

होगा कैसा वह सफर जो करना बाकी है अभी
ज्ञात से अज्ञात तक का अस्ति से नास्ति का भी

कैसी होगी राह वो  ले जायेगी जो मंजिल तलक,
पथ पूर्ण से शून्य का क्या जगायेगा  कोई ललक।

कौन सा होगा वो वाहन, जो पहुँचायेगा गंतव्य तक,
राह सरल सुगम होगी या फिर हो भरी कंटक ।

राह में होगा अंधेरा या होगा क्या प्रकाश भी,
व्याप्त केवल शून्य होगा या कोई विचार भी।


क्या मिलेंगे वहाँ सारे जो गये मुँह मोड कर,
या मेरे होने से न होने का ही होगा सफर।

क्या मै मिल पाउँगी वहाँ ज्ञान-देव के विठ्ठल से,
व्यास जी के क़ष्ण से उस रुक्मिणि देवी के वर से।

गीता में जो कह गये सभी मुझ तक आयेंगे,
मानो चाहे या न मानो मुझमें ही समायेंगे।

चित्र गूगल से साभार

मंगलवार, 26 मई 2015

अपराध बोध

देखें हैं मैने अपनों के कष्ट,
देखा है उन्हें पल पल घुलते
तिल तिल मरते,
पूर्ण अनिच्छा से छोडते हुए ये संसार।
जब कि बाकी था कितना कुछ पाना, उन्हें, अपने हिस्से का।
कितना सुख, कितनी पूरी होती आशाएं, आकांक्षाएँ
जो अधूरी छोड,जाना पडा उन्हें।
नही पूछी किसीने उनकी मर्जी
बस सज़ा सुनादी, उन्हें भी और उनके अपनों को भी।
और फिर वह दवाओं का अंबार, जिसमें से एक भी कारगर नही हो सकी,
वह बिस्तर, वह अपनों के मायूस चेहरे। भरे मन से इर्द गिर्द घूमना।
और उनका दिन गिनना, बस दिन गिनना।
हर दिन कम होती शरीर की ताकत,
हर दिन गहरे धंसती आंखें, गालों के गहराते खड्डे
हाथों पावों की हड्डियां, पतली होती जाती सिकुडती त्वचा,
और मेरा मुझमें से रोज कुछ टूटते जाना।
स्वयं के जीवित होने का अपराध बोध गहराते जाना।

रविवार, 17 मई 2015

पचास सालों का साथ



पचास सालों का साथ
पचास सालों की दोस्ती
पचास सालों के विवाद
पचास सालों के संवाद





पचास सालों का रहना
पचास सालों का सहना
पचास सालों का संसार
के सागर में बहना

पचास सालों का हंसना
पचास सालों का रोना
पचास सालों का रूठना
पचास सालों का मनाना

पचास सालों के सुख
पचास सालों के दुःख
पचास सालों के वार
पचास सालों का प्यार

पचास सालों की हार
पचास सालों की जीत
पचास सालों से जो निभाई
वह रिवाज़ और रीत

पचास सालों की विफलता
पचास सालों का साफल्य
पचास सालों बाद अब
अब कुम्हलाता जाज्वल्य

यही है आस  
लें न जबतक अंतिम सांस
सालों का अपना ये साथ
चले यूं ही साथ ही साथ।


गत 12 मई को हमने अपने विवाह की पचास वी वर्षगांठ मनाई। उस वक्त मनमें उठे कुछ भाव थे ये।

रविवार, 3 मई 2015

पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

जो दे अब भी खुशी, पुरानी जेब का वो सौ का नोट
तो जान लो कि पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

बचपन के दोस्तों से मिलो अब भी जो गले लग कर,
तो जान लो कि पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

साबुन को इस्तेमाल करो घिस के पतला होने तक,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

गली में खेलते बच्चों की लपक लो तुम जो गेंद कभी,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

माँ के हाथ की रोटी जो लगे पिझ्झा से प्यारी,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

बच्चों को कहानी सुनालो जो किसी रात को तुम,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

किसी बुजुर्ग को देखते ही रोक लो जो कार,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

मेहमाँ के आते ही खिल जाये अब भी जो बाँछें
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

नयी जिंदगी में जो याद आयें पुराने हमदम
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।



चित्र गूगल से साभार
इस कविता का आधार वॉटसएप पर पोस्टेड एक मराठी गद्य कविता है।




शनिवार, 18 अप्रैल 2015

तुम सुंदर हो ।




तुम सुंदर, तुमसे ये जग सुंदर
इस जग की सब बातें सुंदर
नदिया, पर्वत, बादल सुंदर
पशु, पक्षी और जंगल सुंदर
सागर, बालू, सीपी सुंदर
लहरातीं फसलें सुंदर
इस धरती की गोदी सुंदर
और आसमान की छत सुंदर
चंदा, तारे, बादल सुंदर
सूरज की किरणें सुंदर
बारिश की बूंदे सुंदर
पवन के झकोरे सुंदर
बिजली की चमकारें सुंदर
बादल की गड गड सुंदर
तेरा वह शांत रूप सुंदर
रौद्र रूप भी तो सुंदर
मै भी सुंदर, वह भी सुंदरं
तेरा प्रकाश सबके अंदर
हरलो मानव मन की कालिख
कर दो उसको निर्मल सुंदर
क्यूं कि तुम सुंदर हो।


चित्र गूगल से साभार।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

जनम हुवा राम का

पवित्र अति मास चैत्र , शुध्द नवमी की तिथी,
समय मध्यान्ह का, ना शीत ऊष्ण ना अति,
शीतल, सुगंधी पवन, मुक्त चहुं दिशि विचरता
जनम हुवा राम का, जनम हुवा राम का।

अयोध्या है हुई धन्य, कौशल्या तृप्त नयन,
दशरथ अति आनंदित,पुलकित रोमांचित तन
नया नया शिशु रुदन, रनिवास में गूंजता
जनम हुवा राम का...



सुहागिने चलीं लेकर जल कलश, थाल स्वर्ण
वाद्य मंगल बजते, गूंजते शगुन गान
आनंदित अवधपुरी, सरयू का जल महका
जनम हुवा राम का...

मोहक, राजिव नयन, कोशल्या के नंदन
पुत्र रूप नारायण, नीरद से शाम वरण
अवतरित हुए आज, आनंद बन जन जन का
जनम हुवा राम का...

सुमित्रा के पुत्र लखन, सुंदर अति शुभ लक्षण
कैकयी के पुत्र गुणी, भरत और शत्रुघन
हर्षित सब नर नारी, पूरण आंगन घर का
जनम हुवा राम का...

सुखमय सब अवधपुरी, आशाएँ हुईं पूरी
माता के हाथ आज झूले की रेशम डोरी
राजा ने खोल दिया द्वार भंडार का
जनम हुवा राम का...

कैसे शब्द अकिंचन, करें जन्मोत्सव वर्णन
भाव मन में सघन भरे, अश्रू पूरित नयन
नयनों के द्वार कैसे आनंद का घन बरसा
जनम हुवा राम का...



चित्र गूगल से साभार।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कविता



टप टप टप बूँदों से आते शब्द नाचते,
झर झर झर धारा सी बहती है कविता।

सर सर सर लहराता जाता किसी का आँचल,
पायल की रुनझुन सी खनकती है कविता।

गुलशन में चटखती नन्ही नन्ही कलियाँ,
खुशबू वाली हवा सी बहती है कविता।




माँ की घुडकी, झिडकी और मीठी सी थपकी,
फिर उसकी लोरी सी बहती है कविता।

जच्चाघर से आती अजवायन की खुशबू,
और नन्हे रुदन सी बिलखती है कविता।

बादल की शिव के डमरू सी गड गड गड गड
और बिजली की लहर सी कडकती है कविता।

मन की कभी उदासी, कभी वो बेहद खुशियाँ,
मन के इन भावों सी बदलती है कविता।

तेरे, मेरे, और हम सब के जीवन जैसी,
कभी सरल तो कभी हठीली है कविता।


चित्र गूगल से साभार।