बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

खोया पाया

कितना कुछ खोना पडता है,
कुछ पाने के लिये।
और देना पडता है श्रमदान,
पाया बनाये रखने के लिये।

हम अक्सर गफलत कर जाते हैं,
पाये पर अपना मालिकाना हक समझने की।
नही जानते कि हमने किराये पर लिया है इसे,
हमारे इस देह की तरह।

इसको जतन करना है तो करना पडेगा श्रम,
ये तो हमारा ही है कहाँ जायेगा, नही पालना है ये भ्रम।

जहाँ किराया भरने से चूके, कि पाया खो जाता है,
देह को उपेक्षित किया कि घुन लग जाता है।
मन दुर्लक्षित हुआ कि मैला हो जाता है। 

देह को श्रम साध्य करना,
मन को रखना स्वच्छ, सरल निर्मल शिशुसा

फिर शायद पाया रहेगा पाया, लंबे समय तक।
पर चिरंतन तो कुछ भी नही।

   

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

इक लडकी






गेंहूँ के दाने सी इक लडकी
सुनहरी, चमकती, खनकती।
अपने नसीब से अनजान,
इठलाती, बलखाती, खिलखिलाती।

जानती कहाँ है पिसेगी वो,
पानी में भीगेगी, पिटेगी, मसली जायेगी
सिंकेगी जिंदगी के चूल्हे पर,
दुखों की आग में जलेगी,
परोसी जायेगी किसी के आगे,
फिर भी मुस्कुरायेगी, चाहे म्लान ही क्यूं न हो मुस्कान।

या फिर गाड दी जायेगी जमीन में,
लेकिन उसकी जिजिविषा देखो,
फिर उगेगी, लहरायेगी, खिलखिलायेगी, लौटायेगी तुम्हें सौ गुना।

ये लडकी गेंहूँ के दाने सी।

चित्र गूगल से साभार।

गणतंत्र दिवस की मंगल कामनाएँ।

शनिवार, 16 जनवरी 2016

याद करना मुझे

याद करना मुझे मेरे जाने के बाद।
याद करना मेरी बातें, मेरी आदतें
अपनी चाहतें।
याद करना मेरा सजना, संवरना
घर को सजाना।
याद करना मेरा प्यार, मेरा राग-अनुराग,
मेरा त्याग।
याद करना अपनी लडाई, मेरी बुराई,
थोडी अच्छाई।
मिलन के क्षण, थोडी जुदाई
प्यार की गहराई।
याद कर के खुश होना, रोना नही।
या फिर नही याद करना।
क्यूं कि याद करके दुखी होने से अच्छा है
भूल जाना।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

शुभ कामनाएँ

उज्वल, शांतिपूर्ण, यशदायी,
नया वर्ष हो सब को सुखमय,
औऱ कभी मुश्किल आये तो
उसका हल निकलना हो तय।

अच्छे नेताओं के हाथ,
करेंगे हम सदा मजबूत 
अपने अपने ही स्तर पर,
हम करेंगे परिश्रम अकूत।

छोटे छोटे लोभ मोह को,
तज ही देंगे हम प्रयत्न से,
तभी तो फिर आगे बढेगी
सच्चाई हर झूटे-पन से।

समय से सारा काम करेंगे,
तब जाकर आराम करेंगे
समय की पहचानेंगे कीमत
समय पर जायेंगे आयेंगे।

पानी, बिजली खर्च तो करेंगे,
नही कदापि व्यर्थ करेंगे,
घर को तो रखते ही हैं साफ
परिसर को भी साफ रखेंगे।

बस के टिकिट, छिलके मूंगफली के
एक थैली में पास रखेंगे
जब भी कूडादान मिलेगा,
उसी में ही उनको फेकेंगे।

प्लास्टिक की थैली का वापर
बहुत ही अब हम कम कर देंगे,
पुरानी पैंट और कप़डों के थैले
सिल कर उनसे ही काम लेंगे।

इन थोडी सी बातों से ही
बहुत बडा बदलाव आयेगा,
भारत के हम लोगों को फिर
विश्व जरूर नक्शे पे लायेगा।


सारे ब्लॉगर बंधु भगिनियों को नये वर्ष की मंगल कामनाएँ।

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

तुमसे अलग

,


कितना खालीपनहोता है,
 कितना सन्नाटा,
रहती हूं जब, तुमसे अलग

कितना सुरक्षित, लगता है उडना
मन पंखों पर,
रहती हूँ जब तुम्हारे साथ।

मेरा क्या है, हूँ भी या नही
क्या फर्क पडता है,
होकर तुमसे अलग। 

तुम्हारे साथ मै, 
मै कहाँ होती हूँ,
रहते हो बस तुम ही।

न कोई साज, 
न सजने की कोई इच्छा
जगती है, हो कर तुमसे अलग।

चहरे पर रौनक ,मन रुनझुन,
खनकते हैं कंगना,
तुम्हारे साथ।

रहना है यूँ ही साथ साथ,
बस नही रहना
तुमसे अलग। 


चित्र गूगल से साभार।



शनिवार, 21 नवंबर 2015

दीवाली तो मन गई

दीवाली तो मन  गई, फैला खूब उजास,
दीवाली के बाद अब कूडा करकट त्रास।

साफ एक दिन और बाकी सब दिन मैले मैले,
ऐसा तो नही चलता भैये, सीख कुछ ले ले।

रोज ही घर  रखना चमका कर सुथरा सुथरा,
पकवान भले ना रोज पर हो खाना सुधरा।

घर के बाहर का भी थोडा ध्यान रखोगे,
कूडा, करकट, जूठन गली में ना फेंकोगे।

तली, खुली, चीजों का सेवन नित-नित करना,
फल सब्जी को धोने के पहले ही चिरना।

इन सब से बचना खुली हुई चीज न खाना,
सब्जी हो या फल इनको धोकर ही खाना।

थोडासा ये ध्यान यदि हम सब रक्खेंगे,
सदा रहेंगे स्वस्थ, मस्त, और काम करेंगे।

मोदीजी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित


शनिवार, 7 नवंबर 2015

बचपन की दीवाली





बचपन में दीवाली की खुशी कुछ और ही होती थी। पांच या छह दिन मनाया जाता था ये त्यौहार। गोवत्स द्वादशी या वसुबारस के दिन से दीवाली शुरु, फिर धन तेरस, नरक चौदस या छोटी दीवाली, लक्ष्मी पूजन या बडी दीवाली, पडवा या अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) और भाई दूज।
दीवाली से आठ दिन पहले ही शुरु हो जाती थी घर की साफ सफाई, रंगाई पुताई। सारे साल का जमा कूडा करकट निकाला जाता, कबाड हटाया जाता या फिर साफ सूफ कर के वापिस रख दिया जाता। कुम्हारिनें घर घर दिये बेचने आतीं, और सौ पचास दिये बेचे बगैर नही जातीं। हाट में से गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां खरीदी जातीं और लक्ष्मीजी का चित्र जो हर साल नया खरीदना जरूरी होता और यह चित्र हमेशा गजान्त लक्ष्मी का होता। बीच में लक्ष्मी जी और दोनो तरफ माला लिये हाथी या फिर लक्ष्मीजी का अभिषेक करते हुए। कपास की बत्तियां बना कर रख ली जातीं।
दिये रात भर पानी में भिगो के रखे जाते ताकि तेल वे खुद ही ना सोख लें।
  वसु-बारस के दिन माँ का व्रत होता, ये व्रत वे संतान की लंबी आयु के लिये रखतीं। शाम को ग्वाला आता गाय और बछडा लेकर, हमारे यहां कोई गाय तो थी नही। मां उनकी पूजा करतीं आरती उतारतीं और उन्हें गेहूँ और गुड खिलातीं।

धनतेरस के दिन शाम को बर्तन खरीदारी होती इस दिन नया बर्तन खरीदना शुभ होता है। बर्तन बाजार, लोगों से और बर्तनों से भरे रहते। चमकते पीतल तांबे और स्टील के बर्तन बहुत प्यारे लगते। इस शाम एक दिया बाहर जरूर जलाया जाता इसकी जोत दक्षिण दिशा की और की जाती ताकि किसी की अपमृत्यु ना हो। 
इन्ही दिनों घर में पकवान बनने शुरु हो जाते। बाजार की मिठाई भोग के लिये नही चलती थी।  लड्डू, गुजिया, शक्करपारे, चकली, सेव, अनरसे और क्या क्या।
  नरक चौदस के दिन अभ्यंग स्नान होता, सब का। वह भी सूर्योदय से पहले।
माँ हमें चार बजे ही उठा देती। उसके पहले तांबे के चमकते बंबे में गरम पानी तैयार रहता दीवाली से पहले हम उसे इमली लगा कर, राख से मांज कर चमका देते। माँ हमें सुगंधी तेल से मालिश  करती फिर तिल के उबटन से मल मल कर सारा तेल हटाती। खुशबूदार शिकेकाई पाउडर से जो घर में ही माँ बनाती केश धुलाती इस खुशबू का राज था कपूर कचरी और जटा मासी,जो इसमें कूट कर मिलाई जाती। जो नहा रहा होता उसके लिये दूसरे भाई बहन फुल-झडियां जलाते।
नये कपडे पहना कर आरती उतारती और फिर होता बहु-प्रतीक्षित फराळ। शाम को कम से कम पांच दिये घर के बाहर और हर कमरे में एक ऐसे जलाये जाते, इसमें स्नान घर और शौचालय भी शामिल थे। कई बार नर्कचौदस और दीवाली एक ही दिन पडते तब तो बस सुबह से रात तक धूम ही धूम।

पिताजी थोडे थोडे पटाखे सबके हिस्से के लाते। अनार, चिटपिटी जो जमीन पर घिसते ही हरी पीली रोशनी देती और आवाज भी करती, सांप जो जलाने पर सांप की शकल में राख बनता, फुलझडी जो रोशनी के फूल झराती, चक्री जो सुदर्शन चक्र की तरह जमीन पर तेजी से गोल गोल घूमती, लहसनी पटाखे जो जोर से जमीन पर फेंकते ही धमाका करते।
शाम होते ही बीस पच्चीस दिये बाहर जलाये जाते और हर कमरे में एक। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिये हर कमरा उजास से भरा।  लक्ष्मी पूजा की तैयारी की जाती, मूर्ती, चित्र तथा नयी झाडू की भी पूजा होती। खील बताशे और पकवान सजाये जाते। खील बर्तन में तब तक भरी जाती जब तक बिखरे ना यह समृध्दी के लिये किया जाता।
पूजा के बाद फिर प्रसाद ग्रहण और पटाखे चलाना जो सबसे आनंद-दायी काम लगता कम से कम तब तो। बारह बजे तक सब जगे रहते द्वार भी खुला रहता।
अगले दिन पडवा होता इस दिन माँ और बेटियां पिताजी की तेल और उबटन से मालिश करतीं आरती उतारतीं और उपहार पातीं। हमारी बूआजी के यहां अन्नकूट का भंडारा होता तो शाम का खाना उनके यहां।
भाईदूज को भाइयों का औक्षण किया जाता और उनके लंबी आयु की कामना की जाती। भाई लोग चिढा चिढा कर खूब मालिश करवा लेते, उपहार तो मिलता ही। हर दिन खाने पीने की रेल चेल रहती।
और भाई दूज के साथ ही दीवाली का ये त्यौहार समाप्त हो जाता। इसी दिन बचे खुचे पटाखे भी जला कर खत्म किये जाते।
आज उस दीवाली की याद बहुत जोरों से आई तो सोचा आपके साथ बाटूँ ये यादें। तो,
लक्ष्मी जी की प्रार्थना से करें इसका समापन।

पद्माक्षी, पद्मगंधा, पद्मवदना, पद्मिनि,
लक्ष्मी, अदिति, दीप्तां, श्रिया, दारिद्र्यध्वंसिनि,
धनधान्य-करीं, सौम्या, विष्णुह्रदय वासिनि,
नमामि भास्करीं, अनघा, दारिद्र्य, दुःख हारिणि।

सब ब्लॉगर बंधु भगिनियों को दीवाली की बहुत शुभ कामनाएँ।


चित्र गूगल से साभार।