सोमवार, 26 जनवरी 2015

आस हरियाली रहे



आसमाँ पे जो हुकूमत बाज़ और गिध्दों की हो,
शान्ति के नन्हे परिंदे बोलो फिर जायें कहाँ।

आस पे ही अब तलक जिंदा रहे थे हम सनम,
तुम जो ना आने की ठानों, बोलो तब जाये कहाँ।

स्कूलों में महफूज़ हैं बच्चे यही सोचा किये,
वहीं गोली चलने लगे तो बच्चे फिर जायें कहाँ।

जिंदगी का आजकल कोई भरोसा ना रहा,
सुबह का निकला न लौटे शाम, तब जाये कहाँ।

अच्छे दिन अब आ रहे हैं कितना तो सुनते रहे,
जाने कहाँ वो छुप रहे हैं उनको हम पाये कहाँ।

गणतंत्र बनने का जशन हर साल मनता है यहाँ
जन के लिये जो तंत्र है, उसको हम जानें कहाँ।

आस पर कायम है दुनिया इसको दें ना टूटने,
आस हरयाली रहे, आबाद सपनों का जहाँ।



रविवार, 18 जनवरी 2015

नया दिवस


















मंद सौम्य उज्वलता उसकी
झरती, नभ से धरती पर

उसमें फिर दिखने लगते हैं
रजकण औ उत्तुंग शिखर।

सुखद अनुभूति लगे व्यापने
शरीर और मन के अंदर,

हलका हलका सा धुंधलका
सरकने लगता ज्यूँ चादर।

फिर छाने लगती ऊषा की
लज्जा नभ की छाती पर

लाल सुनहरी भोर छमाछम
आती आंगन के अंदर

इक नये दिवस का  उदय
हो जाता इस धरती पर।



बुधवार, 31 दिसंबर 2014

शुभ नववर्ष



खुल रही है एक नई किताब जिसका हर सफा है कोरा,
लिखना है हमें ही इसमें हर दिन का हिसाब हमारा।

कितनी की मक्कारियाँ कितने बोले झूठ
कितनों को लगाया चूना, किस पेड को बनाया ठूँठ।

कितनी फैलायी गंदगी नजरें सबकी बचाके,
कितने तोडे वादे, झूटे बहाने बनाके

कितना किया अपमान सज्जनों का
कितना निभाया साथ दुर्जनों का

क्या यही सब लिखना है इसमें,
और अंत में रोना पडेगा
या कि फिर हम चुनेंगे इक नई राह
जिस पर चल कर सुख मिलेगा।

इस राह पर मुश्किलें तो होंगी पर
पर दिवस का अंत सुखमय होगा
मनमें जगेगा विश्वास,
कर्तव्य पूर्ती का निश्वास होगा।

हम लायेंगे हँसी कई चेहरों पर,
पोछेंगे आंसू कई आँखों से
हम करेंगे मेहनत ताकि आगे बढें
और हमारे साथ सब आयें।

ले जायेंगे देश को खुशहाली के रास्ते पर
कदम दर कदम
साथ साथ चलेंगे आगे बढेंगे सभी हम।

पर इसका चुनाव करना है खुद हमें,
 ताकि किताब का अंत हो सुखद
और हम फिर सबसे सच्चे दिल से कहें
शुभ नव वर्ष।


सारे ब्लॉगर भाई बहनों को नववर्ष की हार्दिक बधाई।



शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

हौसला रख

राह निबिड गहन वन की, हौसला रख,
रात मेहमाँ कुछ पलों की, हौसला रख।

भोर का तारा उगा है, हौसला रख
जल्द फूटेगी किरण भी, हौसला रख।

मिहनत में जब कोताही ना की, हौसला रख,
अब प्रतीक्षा नतीजों की, हौसला रख।


घिर गया जो दुष्मनों से, हौसला रख,
मदद दोस्तों से मिलेगी हौसला ऱख.

चलते  रहने से ही मंजिल, हौसला रख
समय से होता है सब कुछ, हौसला रख।


कट ही जायेगा बुढापा, हौसला रख
ज्यूँ गये बचपन, जवानी, हौसला रख।

खुलेंगे अब दर सनम के, हौसला रख
वस्ले-सुबह के रंग खिलेंगे, हौसला ऱख।


चित्र गूगल से साभार।

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

वापसी

वापसी हर बार दे जाती है एक नया सुकून
हर बार क्यूं लगता नया, मेरा पुराना सा शहर।

इसके रस्ते, पेड पौधे, बगीचे और बस्तियाँ,
हर बार दिल में हैं जगाते, हसरती कोई सहर।

दुनिया के रंगी नजारे नही देते वह खुशी
सांसें ज्यूँ इसके हवा की देती अहसासे इतर।

जो भी मिलता रास्ते पर बूढा बच्चा और जवान।
अपना दोस्त, अपना ही बेटा और पोता आता नजर।

अपने देश का खाना पीना अपने शहर की ये धूल
इसके आगे फीका अमृत, फिर क्या अमरीकी डिनर।
 
सोचना चाहती नही कि जब न लौट पाउंगी,
खुदा उतना ऊँचा उठाना, कि देख पाऊँ ये शहर।

कुछ कर पाते इसके लिये यह तो न हो सका हमसे
गान इसका कम से कम मेरे होठों पर रहे अगर।

 






चित्र गूगल से साभार।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

जल्दी आना -2






कल चले जाओगे सीमा पर
अपने कर्तव्य पूर्ति हित
अभिमान है तुम पर।

पर क्या करूं इन आखों का
इतना रोकने पर भी
आती हैं भर भर।

कितनी आयेगी तुम्हारी याद
तुम्हारे जाने के बाद
कैसे बताऊँ।

खबरों पर ही टिकी रहेंगी
जरा ना डिगेंगी
मेरी ये नजरें।


हर फोन, हर चिठ्ठी
हर मेल को तरसेंगी,
पनियाली आँखे।

दुष्मन को हल्के ना लेना
लोहे के चने चबवाना
रक्षा करना देश की।

विजयी हो कर आना
यहां की चिंता न करना
वापिस जल्दी आना।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

जल्दी आना





मंदिर के घंटियों की टुन टुन,
तुम्हारे भजन की गुन गुन
बना देती है दिन मेरा।

चाय के कप से उठती भाप
ठंड में उसका सुखद ताप
अद्भुत अहसास-ए-सवेरा।

गर्म नाश्ता ही सर्दी में
तुम्हारे नियम हिदायतें
मै बस नही तोडता।

शाम के चाय की प्याली
तुम्हारी ये अदा निराली
भाती है खूब मुझे।

जाना है तुम्हें पिता घर
मन को खुशी से भर
क्या अब होगा मेरा।

वापस जब तुम आओगी
घर को ऐसा ही पाओगी
तुमसे वादा है मेरा

वहां मन को ना लगाना
मेरी याद ना भुलाना
बस जल्दी आना।


Picture from Google with thanks.