शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

झंझावात



झंझावात की तरह आ कर लपेट ले वह मुझे
उठाले हवा में ऊपर
पांव तले ना रहे जमीं 
जकड ले बाहों में कस कऱ
नजर से बांधे नजर
अधरों से अधर
सांस से खींच ले सांस
गले में अटके कोई फांस
क्या हो रहा है ये समझने से पहले
ले ले कब्जे में मन ओर प्राण
उसकी बाहों में  मै पडी रहूं

नीरव, निश्चल, निष्प्राण ।


27 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

उसको इतना समय कहाँ
समय पर ही आता है
वो वहाँ जहाँ से
खीचना होता है
उसे भी वो
जिसे खींचने
के लिये उससे
कहा गया होता है !

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मतदान से पहले और मतदान के बाद - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

खुशनसीब व्यक्तियों की ही आकांक्षायें पूरी होती हैं.

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

भीष्म पितामह बनना पड़ेगा इस इच्छा की पूर्ति के लिए
latest postएक बार फिर आ जाओ कृष्ण।

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

जीवन से ऐसी नाराजी और विरक्ति क्यों भला । जाना तो है ही । जितना समय मिला है रहने का तो रहा जाए पूरी तरह यहीं ।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत बढ़िया उम्दा प्रस्तुति,,,आशा जी,,,

RECENT POST : फूल बिछा न सको

Suman ने कहा…

क्या हो रहा है ये समझने से पहले
ले ले कब्जे में मन ओर प्राण
उसकी बाहों में मै पडी रहूं
ताकि सार्थक हो मेरा होना !
ताई इस सुन्दर रचना को मै
प्रियतम की जगह रखकर देख
रही हूँ !

Suman ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Suman ने कहा…

प्रिय,
आज तुम मुझे
तुम्हारे मन
प्राण की
सघन तरु की
छांव में
छुपा लो मै
अकेली थक
गई हूँ
चलते !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

झंझावत जग, रहे सहारा,
रहे धार पर पास किनारा।

ओंकारनाथ मिश्र ने कहा…

चाहे वो मूर्त हो या अमूर्त, रचना की ये समर्पित पंक्तियाँ निश्छल रक्ति की द्योतक हैं.

kshama ने कहा…

Wah!Priytam ho ya maut....donoke liye sarthak!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ख्वाहिशें भी अजब गज़ब

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात वाह!

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति -
बधाई- आदरेया-

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सुंदर बिंब के द्वारा अभिव्यक्त भाव.

रामराम.

मनोज कुमार ने कहा…

ख़्वाहिशें पूरी हों!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्रेम की पराकाष्ठा हो जायगी ...
अनंत से अनंत का मिलन नव प्राण बन के महकने लगेगा तब ...

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

एक ख़्वाहिश ऐसी भी ...... वाह !

Satish Saxena ने कहा…

मैं आपसे सहमत नहीं ..
:(

Asha Joglekar ने कहा…

सहमत होना या न होना आपका हक है सतीश जी ।

मैने अपने जीवन में लोगों को महीनो मौत से लडते देखा है, तो मेरी ऐसी चाह हुई। बाकि ये तो तय है कि मिलना तो वही है जो नियोजित है। अपेक्षित मिल भी सकता है और नही भी।

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi sundar likha hai ,aap aai dil se aabhari hoon .

ज्योति सिंह ने कहा…

bahut hi sundar likha hai ,aap aai dil se aabhari hoon .

virendra sharma ने कहा…

पूर्ण समर्पण और पूर्ण वैराग्य में सम भाव।

Jyoti khare ने कहा…

मन के गहरे तक उतरती रचना
बहुत खूब
उत्कृष्ट प्रस्तुति

सादर
"ज्योति"

संजय भास्‍कर ने कहा…

मन के गहरे तक उतरती रचना
बहुत खूब