शुक्रवार, 4 जून 2010

वतनी



इस जिंदगी को, जीने का सलीका क्या है ?
मै जानता नही, कोई मेरे सरीखा क्या है ।
हम अपने आप को, देखें जो मन के शीशे में ,
जान जायेंगे असल क्या, और दिखावा क्या है ।





वो जो करते थे, दावा-ए-मुहब्बत हमसे,
अब हाल ये कि सलाम क्या और दुआ क्या है ।
मैं जो इतना हूँ परेशान, तो भला क्यूं कर ,
क्यूं सोचता हूँ, कि ये हाल वतन का क्या है ।
ये जो हैं चाट रहे देश, लगे दीमक से,
इन नेताओं का धरम क्या है औ ईमाँ क्या है ।
नेता तो मान लिया बस हैं पांच सालाना,
इन बाबुओं को जनम भर का मिला ठीका है ।
जब आप-हम ही न सोचें वतन के बारे में,
वतनी कहलाने का फिर अपना तरीका क्या है ।

26 टिप्‍पणियां:

kshama ने कहा…

जब आप-हम ही न सोचें वतन के बारे में,
वतनी कहलाने का फिर अपना तरीका क्या है ।
sach hai...sochna ham sabhee ne chahiye...aur use kruti me bhi utarna chahiye...

दिलीप ने कहा…

bahut khoob....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

bahut sundar vichaaron kee abhivyakti

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जब आप-हम ही न सोचें वतन के बारे में,
वतनी कहलाने का फिर अपना तरीका क्या है ..

sach hai .. aaj ki raajnitik aur samaajik sthiti ka dard nazar aa raha hai aapki in panktiyon mein ...

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

bahut sunder bhaavabhivyakti ke saath..... sunder vichaar.....

शारदा अरोरा ने कहा…

बढ़िया ,
जीने का सलीका क्या है ?
वो जो करते थे, दावा-ए-मुहब्बत हमसे,
अब हाल ये कि सलाम क्या और दुआ क्या है ।

ज्योति सिंह ने कहा…

ati sundar ,main ek mahine bahar rahi is karan aa na saki .

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बेहद उम्दा रचना है जी | सच में इस विषय पर केवल सोचने से कुछ हासिल नहीं होगा ............हम सब को अपने अपने स्थर पर कुछ ना कुछ करना ही होगा |

शोभना चौरे ने कहा…

आशाजी बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पार आना हुआ |आपकी केरल यात्रा ने मेरी केरल यात्रा की यादे ताजा कर दी |
बहुत ही खूबसूरत यात्रा संस्मरण है आपने घुमक्कड़ी नाम को सार्थक कर दिया है |
"वतनी "की भावनाए अंतर्मन को छु गई |

संजय भास्‍कर ने कहा…

अभिव्यक्ति का यह अंदाज निराला है. आनंद आया पढ़कर.

संजय भास्‍कर ने कहा…

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wahwa.....kya baat hai g....

Suman ने कहा…

bahut khoob.........

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर कविता ।

Alpana Verma ने कहा…

बहुत सही लिखा है नेता पांच साल का टारगेट रख कर कुर्सी संभाले रहते हैं ..बाकि देश की कितनो को फ़िक्र है?
अच्छी रचना

mridula pradhan ने कहा…

bahot sunder .

M VERMA ने कहा…

ये जो हैं चाट रहे देश, लगे दीमक से,
इन नेताओं का धरम क्या है औ ईमाँ क्या है ।
यही तो हर कोई जानना चाहता है
सुन्दर भावनात्मक रचना

दिनेश शर्मा ने कहा…

आपने बिल्कुल सही लिखा है ।साधुवाद।

Unknown ने कहा…

सही कहा आपने आशाताई!....

ये जो हैं चाट रहे देश, लगे दीमक से,
इन नेताओं का धरम क्या है औ ईमाँ क्या है ।
नेता तो मान लिया बस हैं पांच सालाना,
इन बाबुओं को जनम भर का मिला ठीका है!.....यही हमारे वतन का हाल है!

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

ASHA MA,
AAJ KE SATYA KO BAKHOOBI PARILAKSHIT KARTEE RACHNA...
SAADAR NAMAN!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

भावनात्मक रचना....!!

पवन धीमान ने कहा…

Ji bahut khoob.. bahut sunder rachna.
.. Aapko evm apke sevabhavi beto ko mera pranam. Ishwar kare ki budhaape ki taraf badhte maa baap ko meri kavita jaise nahi, balki aapke jaise bahu bete naseeb hon.

Vinay ने कहा…

अमेज़िंग

शरद कोकास ने कहा…

करारा व्यंग्य है ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वो जो करते थे, दावा-ए-मुहब्बत हमसे,
अब हाल ये कि सलाम क्या और दुआ क्या है ।

मैं जो इतना हूँ परेशान, तो भला क्यूं कर ,
क्यूं सोचता हूँ, कि ये हाल वतन का क्या है ।
वाह वाह.....आपकी हर रचना में संदेश होता है.

Md Firoj Akhtar ने कहा…

kya bat hai