शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

गांधी का दर्शन चाहिये



मौत के तांडव में भी
जीवन को होना चाहिये
सोच हो शारीर तब भी
मन तो कोमल चाहिये ।
स्वार्थ के माहौल में भी
निस्वार्थ तन मन चाहिये
तेरे मन में मेरे मन में
इक आस दर्पण चाहिये ।
इस आस के साथ थोडा
कर्म होना चाहिये
तब ही डलेगी नीव
मन में स्वप्न होना चाहिये ।
एक एक पग धरके बनेगी
राह अपने सु-राज की
इस वक्त अब संसार को
गाँधी का दर्शन चाहिये ।

17 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त ने कहा…

कितनी सुंदर कविता लिखी है आपने दर्शन के लिए ...

अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

रंजू भाटिया ने कहा…

इक आस दर्पण चाहिये ।
इस आस के साथ थोडा
कर्म होना चाहिये
तब ही डलेगी नीव
मन में स्वप्न होना चाहिये ।

सही कहा आपने सुंदर रचना

P.N. Subramanian ने कहा…

कविता के मध्यम से आपने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर दी. यही तो अद्वानटेज है कविता की क्षमता रखने का.. बड़ी सुंदर अभिव्यक्ति रही. आभार.

chopal ने कहा…

स्वार्थ के माहौल में भी
निस्वार्थ तन मन चाहिये
तेरे मन में मेरे मन में
इक आस दर्पण चाहिये ........

बहुत खूब

vikram7 ने कहा…

कर्म होना चाहिये
तब ही डलेगी नीव
मन में स्वप्न होना चाहिये
अति सुन्दर बधाई

Abhishek Ojha ने कहा…

बड़ी सामयिक और सुंदर कविता है !

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

सुन्दर कविता मय गुहार जी!

ishq sultanpuri ने कहा…

ek behtareen drishti ..........

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना है।

Anil Pusadkar ने कहा…

बापू की आज ज्यादा ज़रूरत है।

संगीता पुरी ने कहा…

सही कहा....गांधी का दर्शन चाहिए।

राज भाटिय़ा ने कहा…

आज सभी चाहते है, लेकिन जब कोई बम पर बम मारे, तो क्या हम गांधी जी के कहे अनुसार, उन्हे फ़ूल माला पहनाऎ, या फ़िर उन के लिये जो अपने बचे है उन्हे भी मरने के लिये पेश कर दे....
राम ने ओर कृषणा भगवान ने जो उपदेश दिया क्या उसे भुल जाये???
चाहिये तो सभी को गांधी दर्शन लेकिन किस कीमत पर????
धन्यवाद

नीरज गोस्वामी ने कहा…

स्वार्थ के माहौल में भी
निस्वार्थ तन मन चाहिये
तेरे मन में मेरे मन में
इक आस दर्पण चाहिये ।
बहुत सुंदर भाव और पूरी की पूरी रचना....बधाई आपको...
नीरज

विवेक ने कहा…

आपका प्रयास सराहनीय है...आप अमेरिका से हमें यह बता सकती हैं कि वहां का आम जनमानस क्या सोचता है भारत से जुड़े मुद्दों पर...?

Vinay ने कहा…

ज़रूर पढ़ें: हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

कडुवासच ने कहा…

इस आस के साथ थोडा
कर्म होना चाहिये
तब ही डलेगी नीव
मन में स्वप्न होना चाहिये ।
... प्रसंशनीय व प्रभावशाली रचना है।

Rajat Narula ने कहा…

स्वार्थ के माहौल में भी
निस्वार्थ तन मन चाहिये !

Bahut sunder rachna hai!