सोमवार, 26 दिसंबर 2011

गुजर गया ये भी साल


गुजर गया दो हजार ग्यारह
आ ही गया दो हजार बारह
स्वागत में फिर से नये साल के
होंगे कईयों के पौ बारह ।

नया साल शुभ हो मंगल हो
होगा दान प्रदान वचनों का
फिर एक सिलसिला चलेगा
नये साल के संकल्पों का ।

राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री
देंगे शुभाशीष जन-जन को
नया वर्ष शुभ हो मंगल हो
सारे भारत के जन गण को ।

पर लायेगा नया साल क्या
होंगी खुशियां या गम होंगे
छुपा है क्या इसके आंचल में
अमन रहेगा या फिर दंगे

सुख चैन होगा नसीब क्या
या करेंगे आतंकी, हमले
बरपा मासूमों पे कहर
देखेंगे जन्नत के महले ।

सब को सुख शांति नसीब हो
मिले पेट भर भोजन सबको
मेहनत जितनी रब करवा ले
पर हक का मिल जाये सब को ।

नौ प्रतिशत हो विकास की दर
या कि रहे सात प्रतिशत ही
भ्रष्टाचार मिटाने आयें
अण्णा से सुरजन कई कई ।

पैसे की बचत ही है आमदनी
कब ये नेताजी समझेंगे
या फिर जाग रहे होंगे पर
नाटक, आंखें भींच करेंगे ।

पैसे की अब कमी नही है
कमी है तो बस है चरित्र की
नया साल तब सुखमय होगा
जब होगी सरकार सुजन की ।

सब बंधु भगिनियों को नये वर्ष की शुभ कामनाएं ।

रविवार, 11 दिसंबर 2011

बीज और वृक्ष


मेरी जडें फैली हैं दूर दूर तक,
और मेरी टहनियां व्याप रहीं हैं सारा आकाश
कब सोचा था मैने मेरा छोटा सा अस्तित्व इतना बनेगा विशाल
बीज से उठ कर लहरायेगी डाल डाल ।
छू लेंगी आसमान मेरी टहनियाँ
इन पर बैठ कर पंछी सुनायेंगे कहानियाँ
बनायेंगे छोटे छोटे घरौंदे
तिनका तिनका डोरा डोरा गूंथ के ।
नीचे बैठेंगे थके हारे पथिक
और मेरी टहनियां झुक जायेंगी अधिक
लडकियां डालेंगी झूले, युवतियाँ कजरी गायेंगी
और मेरी पत्तियाँ मुस्कुरायेंगी ।
बच्चे खेलेंगे मेरी छांव में
चढेंगे मेरे कंधों पर एक एक पाँव रख कर
और मैं खांचे बना कर उन्हें सम्हालूंगा ।
टहनियों में झुलाउंगा ।
कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये ।

रविवार, 27 नवंबर 2011

इस देस में वापस आकर

इस देस में वापस आकर, कितना अच्छा लगता है
इसका सच्चा झूठा किस्सा सारा सच्चा लगता है ।

इसकी धूल भरी सडकें और इसका धूमिल आसमान
गाता या रोता हर कोई अपना बच्चा लगता है ।

इसकी धुंद और इसके कोहरे, इसकी ठंडक और गर्मी
इसका हर मौसम इस दिल को सचमुच अच्छा लगता है ।

ताजे अमरूदों के ठेले, सिंघाडों की हरियाली
देख के ये प्यारे से नजारे मन कच्चा कच्चा लगता है ।

इसके वृक्ष बबूल के हों या हों रसीले आमों वाले
हम को तो हर पेड से लटका प्यार का गुच्छा दिखता है ।

पार्कों में मिलते वो पडोसी जो न कभी मुस्कायेंगे
उनकी चढी त्यौरियों पीछे कुछ अपनापा लगता है ।

सुंदर स्वच्छ परदेस में चाहे कितने ही सुख क्यूं न मिले
देसी घुडकी खा कर भी रबडी का लच्छा लगता है ।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

चलते चलते मोड पर

चलते चलते मोड पर
कैसे बदल गये रस्ते
तुम चले गये उधर
ठगे से हम रहे इधर ।

कहां तो पिरोये थे
बकुल पुष्प हार
कहा था खुशबू इनकी
रहेगी साल हजार

वे भी कहीं पडे होंगे
बकुल वृक्ष के नीचे
या कूडे के ढेर में
सोये हों अखियां मीचें ।

मेरी किताबों में दबे
वे खत तुम्हारे लिख्खे
वे प्रेम रस में पगे
अक्षर सारे पक्के ।

कैसे मै भूलूं उनको
कैसे मिटाऊँ दिल से
पलक की कलम से
उतारे जो गये दिल पे ।

ये क्या हुआ सोचूं
सोचूं ये क्यूं हुआ
वो प्यारा सा सपना
क्यूं हुआ धुआं धुआं ।

कभी राह में अब
जो मिल गये हम से
नज़र बचा कर जाना
न तकना, कसम से ।

सह न पाऊँगी तुम्हारी
वह बनावट की हंसी
गले की अटकी फांस
हाय ह्रदय में फंसी ।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

कुछ अच्छा नही लगता


चांद भी आज जाने क्यूं कुछ मुरझाया सा है,
इसे भी मै तुम्हारे बिन, कुछ अच्छा नही लगता ।

सांस आती भारी सी है, तनहाई में उदासी है,
रूह भी प्यासी प्यासी है और कुछ अच्छा नही लगता ।

तुम वहां खंबे से टिक कर शून्य में तक रही होगी,
सोचती तुम भी तो होगी कि कुछ अच्छा नही लगता ।

तुम्हारी यादों का चेहेरा तुम्हारी खिलखिलाती हंसी
मुझे कितना सताती है और कुछ अच्छा नही लगता ।

बहुत कुछ सोच कर हमने किया था फैसला ये फिर,
क्यूं तुमसे बिछड कर अब, कुछ अच्छा नही लगता ।

अब दूरी और ये मुझसे सही बिलकुल नही जाती
चली आओ तुम्हारे बिन अब अच्छा नही लगता ।


चित्र गूगल से साभार ।

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

कमल नयना कमल वदना


कमल नयना कमल वदना कमल दल निवासिनी
कमल हस्ता, कमल चरणा, कमल माला धारिणी
स्वर्ण, मौक्तिक, विविध मणिगण, आभूषण भूषिणी
सस्मित मुख, ममत्व युक्ता, अलक्ष्मी निवारिणी ।

सौभाग्य दाता वरद हस्ता मनाभिष्ट प्रदायिनी
क्षीर सागर जनित कन्या विष्णु पत्नि सुमोहिनी
तव आगमन सुलभ्य हो धन धान्य संपति अर्पिणी
मम नमन तव चरण अर्पित हे सुगंधा पद्मिनी ।

हो स्नेह दीप प्रज्वलित और ज्ञान का प्रकाश हो
हो प्रेम का वातावरण और निरापद आकाश हो
शांति का संदेश फैले, प्रहरी पर सचेत हों
मन का मिटे मालिन्य सब से मिलन का ये हेतु हो ।


आप सबकी दिवाली शुभ हो, मंगलमय हो ।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

निमंत्रण


चांदनी झरने लगी झर झर झऱ
सुनहरे रुपहले प्यारे से पल
रात रानी, बेला और मल्लिका
इठलाने लगीं रूप यौवन पर ।

ये नदिया का जल, कल कल कल
बलखाती मछलियां चंचल चंचल
मदमाती सुगंध, सर सर सर
हवा की रुनझुनी बजती पायल

पेडों की घनी घनी डालों पर
लेटा है चाँद बांहे फैला कर
रजनी अलकों को संवांर रही
तारों से ले रही मांग भर ।

ताल मे खिलने लगी कुमुदिनि
मन पुलकित, आनंदित निर्भर
स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर ।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

खिडकी


मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी, कभी तुम भी खुली रखते ।

बस आँखें बंद करने से, मुश्किलें कम नही होती
तुम भी यह जान ही जाते जो आँखों को खुला रखते ।

हमेशा खुद को वंचित करके, दूसरा खुश नही होता,
सच मानो मै भी खुश होती, जो तुम खुद के लिये जीते ।

मन के अंदर जो दुख पनपे, हँसी होंठों पे कैसे हो,
दिल से तब मुस्कुराते तुम, जो खुद अपनी खुशी चुनते ।

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते

मै तो इस प्यार से अपने, जगमगा कर रखूँ आंगन
कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ इस रस्ते ।


चित्र गूगल से साभार

सोमवार, 12 सितंबर 2011

फालतू

संवाद थम जाता है माँ के साथ,
जब छूट जाता है बचपन का आँगन
चिठ्ठियों का अंतराल लंबे से लंबा होता चला जाता है
और सब सिमट जाता है एक वाक्य में,
“ कैसी हो माँ “ ?
माँ का जवाब उससे भी संक्षिप्त,
“ठीक” ।
पर उसकी आँखें बोलती हैं,
उसकी उदासी कह जाती है कितना कुछ ,
उसका दर्द सिमट आता है चेहेरे की झुर्रियों में
जब होता है अहसास उसको अपने फालतू हो जाने का ।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

हे गणराय कुछ हमारी भी सुनो



आज आये हो तो अब रहोगे ना दस दिन
और सुनोंगे ना भक्तों की फरियाद,
तुम्हें तो रहता ही नही कुछ याद ।

कितने वर्षों से पूज रहे हैं तुम्हें
कि कुछ तो हमारी भी सुनी जाये
पर कुछ सुनवाई ही नही हो रही
लगता है भारत सरकार पे कुछ
ज्यादा ही मेहरबानी है तुम्हारी ।

इतने बडे कानों में हमारा रुदन
नही जा रहा कितनी अजीब है बात ?
पेट में डाले जा रहे हो
सरकार के तो सारे अपराध
और हमसे आँखें चुरा रहे हो ।

मत करो ना ऐसा,
तनिक हमारी और भी ये स्नेह
की सूंड बढाओ और करो स्नेह सिंचन
ता कि बोल उठे हमारा भी मन,
गणपति बाप्पा मोरया
मंगल मूर्ती मोरया ।


मंगलवार, 23 अगस्त 2011

एक लहर उठी

एक लहर उठी
धीरे धीरे
वह फैल गई
धीरे धीरे
उसमें फिर और
कई धारें
जुडती ही गईं
धीरे धीरे ।

पूरब से लेकर
पश्चिम तक
उत्तर से लेकर
दक्षिण तक
एक हवा बही
कुछ तेज चली
बनती ही गई
वो बवंडर सी
जो बात चली
धीरे धीरे ।

फिर जोर बढा
फिर शोर बढा
जन जन का
आक्रोश बढा
एक राई थी
बनती ही गई
वह पर्वत सी
धीरे धीरे ।

उस की हलचल से
सिंहासन और
सारे प्रभुता के आसन
बस डोल उठे
भयभीत हुए
सारे कायर
धीरे धीरे ।

इस लहर को
प्रलय बनाना है
ऐसा मंथन
करवाना है
विष का तो
पान किया अबतक
अब अमृत भी
चखवाना है
फिर इस भ्रष्ट
व्यवस्था को
करना है खतम
धीरे धीरे ।





शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

जयोस्तुते जयोस्तुते


स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर प्रस्तुत है स्वातंत्र्यवीर सावरकर की स्वतंत्रता पर एक रचना जयोस्तुते । सावरकर जी से क्षमा मांगते हुए इसके अनुवाद का धारिष्ट्य कर रही हूँ । गीत के अधिकतर शब्द संस्कृत में हैं उन्हें वैसे ही रहने दिया है ।

जयोस्तुते
जयोSस्तुते जयोSस्तुते
श्री महन्मंगले शिवास्पदे शुभदे
स्वतंत्रते भगवती त्वामहम् यशोयुतां वंदे ।
जयोस्तुते

सुराष्ट्र की चैतन्य मूर्ती तुम, नीती संपदा की
स्वतंत्रते भगवती श्रीमती राज्ञी तुम उसकी
परवशता के नभ में तुम थी, आशा जगमग सी
स्वतंत्रते भगवती ध्रूव के समान स्थिर मूर्ती
वंदे त्वामहम् यशोयुतां वंदे, यशोयुतां वंदे ।।
जयोस्तुते

कपोल के हो रंग कुसुम्बी या कुसुम कपोलों की
स्वतंत्रते भगवती तुम्ही हो वह प्रकाश लाली,
तुम भास्कर का तेज, उदधि का गांभीर्य भी तुम ही
स्वतंत्रते भगवती, अन्यथा ग्रहण नष्टता की
वंदे त्वामहम् यशोयुतां वंदे, यशोयुतां वंदे ।।
जयोस्तुते

मोक्ष,मुक्ति ये रूप तुम्हारे, वेद सार सब ही
स्वतंत्रते भगवती, योगि का परब्रह्म तुम ही
जो जो उत्तम उदात्त उन्नत महन्मधुर वह भी
स्वतंत्रते भगवती तुम्हारे रूप रुचिर सब ही
वंदे त्वामहम् यशोयुतां वंदे, यशोयुतां वंदे।।
जयोस्तुते

हे अधम रक्तरंजिते, सुजन पूजिते, श्री स्वतंत्रते,
चरण में मरण तव, जनन
तुझ बिन जीवन भी मरण
ये सकल चराचर शरण तव चरण, शरण ।।
श्री स्वतंत्रतेSS,श्री स्वतंत्रतेSS,श्री स्वतंत्रतेSS,
जयोस्तुते

मूल गीत की एम पी 4 यहां दी है जो आप अवश्य सुनें । हमारे निश्चेष्ट मन प्राणों में यदि राष्ट्र प्रेम ऊर्जा इससे भरे तो ये प्रयास सार्थक हुआ । Jayostute Vdo clip: Courtesy www.youtube.com

आप सब ब्लॉगर भाई बहनों को रक्षाबंधन की बहुत बधाई ।

बुधवार, 3 अगस्त 2011

चलते रहिये चलते रहिये -8 वॉटर फ्रंट, टेबल माउन्टेन और वाइनरीज


एक दिन यानि 27 तारीख को हमने सिर्फ ग्रॉसरी की और हौट बे पर जाकर बैठ गये वहां से थोडी सीपियाँ इकठठा कीं लहरे गिनते बैठे रहे फिर घर आकर विश्राम किया 7from7b

सी दिन शाम को एडम और एमी आगये उन्होने कहा कि कल हम वॉटर फ्रंट पर खाना खायेंगे और टेबल माउन्टेन देखने जायेंगे । यह एक एकदम ऊपर से समतल टेबल सा दिखने वाला पहाड है इसीसे नाम पडा टेबल माउऩ्टेन । तो दूसरे दिन हम सब तैयार होकर वॉटर फ्रंट गये। वहीं जहां हम रॉबिन आयलैन्ड के लिये बोट लेने गये थे । (विडियो) 8..1

वहां एक मल्याली रेस्तराँ खाना खाया वहां वे लोग एक स्पेशल रोटी बनाते हैं वह खायी । ये होती तो मोटी है नान की तरह पर बहुत ही मुलायम । सब्जी भी अच्छी थी पर मैंगो लस्सी कुछ खास नही थी । खाना खाने के बाद एमी ने तो टेबल माउन्टेन जाने से मना कर दिया उसे जुकाम हो गया था. पर हम सब गये । ड्राइव कर के माउन्टेन तक गये पर थोडी देर वहीं घूमे फिरे पूरे कैप टाउन को चिडिया की आँख से देखा (Bird’s eye view ) हवा खूब तेज थी बाल कपडे टोपी सब उडे जा रहे थे । पर सारा परिसर बहुत ही सुंदर था । हमें लगा कि बस हो गया, पर एडम ने कहा यहां केबल कार है जो पहाड के ऊपर ले जाती है । हमने पता भी किया पर वह मौसम (विडियो) 8..2 3



की वजह से उस दिन बंद थी । हमारी तो नाक आंख सब बहे जा रही थी तो हमने तो चैन की सांस ली पर एडम को बडा बुरा लगा कि वह हमें टेबल माउन्टेन ऊपर से दिखा नही पाया । (विडियो) 8..4

हम एमी को लेने वापिस वॉटर फ्रंट पर आये और से लेकर फिर घर गये । एडम और एमी डिनर करने बाहर जाना चाहते थे पर वे बाहर से खाना ले आये सब के लिये ।
कल हमें जाना था वाइनरी और चीज फेक्टरी देखने तथा वाइन और चीज टेस्टिंग के लिये । हमने केलिफोर्निया की नापा वेली वाइनरीज देखी थीं कुछ कुछ वैसी ही लगीं । परिसर बहुत ही स्वच्छ और सुंदर था एक तालाब में रंगीन मछलियां थी सफेद गुलाब के फूल लगे थे । एक दाढीवाला बकरा भी था । (विडियो) 8..5

प्रसाधन गृहों पर ही गोट और शी गोट लिखा था खूब हसीं आई । तरह तरह की रेड और व्हाइट वाइन टेस्ट की । बहुत प्रकार के चीज़ थे उनमें स्वीट पेपर और एप्रिकॉट चीज़ पसंद आये । (विडियो) 889..1..

वापसी पर हमें उस इलाके के पूरे वाइनरीज दिखाते हुए एडम ले गया बीच में इम्पाला हिरण और शुतुरमुर्ग भी दिखे । फिर हम समंदर किनारे एक बोर्ड वॉक पर सील देखने गये । कितने सारे सील थे खूब तस्वीरें खींची । तैरते हुए अपनी कलाबाज़ियाँ दिखा रहे थे । एक तो अपने फिन से अपना बदन खुजा रही थी । आप भी देखें । दूसरी तरफ तो बहुत सारे सील थे पर ये दूर थे । घर आये और फ्रोझन पिझ्जा बेक किया । एडम और एमी बाहर गये और पास्ता तथा केक लेकर आये । बढिया डिनर हो गया ।

तीस ताऱीख को हमें वापिस जाना था हमारी फ्लाइट पांच बजे की थी इंटरनेशनल फ्लाइट थी तो रिपोर्टिंग 3 घंटे पहले था । हम एक बजे निकल रहे थे तो कमरे की दूसरी चाभी ही ना मिले । खूब ढूंढा पर चाभी नही मिली तो नही मिली । खैर हम ने अपार्टमेन्ट के मालिक से कहा कि हम सामान में देखेंगे और आपको डाक से भेज देंगे और नही मिली तो हम एडम को पैसे देकर जायेंगे । खैर आदमी शरीफ था मान गया । एडम और एमी को भी हमारे साथ ही जोहान्सबर्ग लौटना था । एयरपोर्ट पहुंचते ही खूब बारिश शुरु हो गई बारिश क्या तूफान कहना ज्यादा ठीक होगा । अनाउन्समेन्ट हो रहे थे सारी फ्लाइट्स समय से कहीं ज्यादा देरी से बता रहे थे । हमारी फ्लाइट भी डिलेड बता रहे थे । फिर तो डिलेड इनडेफिनेटली लिख कर आ गया । अब क्या करें, हमारी अगली फ्लाइट जोहान्सबर्ग से थी साढे नौ बजे की । एडम और सुरेश जाकर एयरपोर्ट एथॉरिटी से बात कर आये हमारी कनेक्टिंग फ्लाइट जोहान्सबर्ग से वॉशिंगटन डी.सी. की है ये भी बताया तब जाकर उन्होने हमें दूसरी फ्लाइट में एडजस्ट करने की बात मान ली । वह फ्लाइट आठ बजे की थी उससे पहले हमारी सिक्यूरिटी भी होनी थी खैर जल्दी जल्दी करते हुए हम केप टाउन से तो उड गये । पर हमें फ्लाइट पर ही पता चल गया था कि हमें कनेक्टिंग फ्लाइट तो नही मिलेगी । जो होगा देखा जायेगा कर के बैठे रहे चुप चाप । हमारे साथ का एक लडका जिसे न्यूयॉर्क जाना था खूब छटपटा रहा था । जैसे ही हम जोहान्स बर्ग उतरे वह दौडते हुए निकल गया हम तो साउथ एयर लाइन्स के काउंटर पर जाकर हमारी अगली फ्लाइट कब है और हमारा रुकने का इन्तजाम क्या हो सकता है यह पता करने में लग गये पता चला अगली फ्लाइट चौबीस घंटे बाद है पर रुकने का इन्तजाम उन्होने सदर्न-सन नाम के पांच सितारा होटल में किया है तो जान में जाऩ आई । (विडियो) 889..2Last

होटल में फिर उसी लडके को देखा जो तेजी से निकल गया था बोला मैं तो उडान से पहले पहुँच गया था पर विमान का दरवाजा ही बंद हो गया था और मेरे लाख कहने पर भी उन्होने नही खोला । होटल मैनेजमेन्ट ने हमें ब्रेकफास्ट लंच और डिनर के कूपन भी दे दिये ।
हमने एडम को कॉल करके बता दिया कि हम ठीक हैं और अब कल जायेंगे । भूख लगी थी तो रात को सैन्डविचेज मंगवा कर खाये । बढिया से कमरे में चैन से रात बिताई दूसरे दिन ब्रेकफास्ट किया फिर एयर पोर्ट गये फ्लाइट का पता करने अपने सामान का पता लगाने । वापिस आकर नहायेंगे सोचा था । होटल आये, तो पानी ही नही, पता चला कोई पाइप फूट गया है तो पानी तो शाम तक ही आयेगा । लो जी, रहो बिना नहाये अब, सुबह सुबह नहा लेते तो अच्छा होता पर आराम से नहायेंगे सोचना भारी पड गया ।
खैर थोडी देर बाद ऊब गये तो लंच किया और एयरपोर्ट ही चले आये । आज कोई समस्या नही हुई । उडान समय से गई और समय से 18 घंटे बाद डलेस हवाई अड्डे पहुंच गई । जिम महाशय को सुहास ने फोन कर के बता दिया ता कि हम लोग एक दिन लेट पहुँच रहे है तो वे समय से हमें लेने भी आ गये और हम सुहास के घर वहाँ चार पाँच दिन और मज़े किये फिर अमित के यहां । जब हम वॉशिंगटन के डलास एयर पोर्ट पर बैठे अपने उडान का इंतजार कर रहे थे तो हमने दुनिया के सबसे बडे हवाई जहाज़ एयर बस-३८० की उडान देखी । (विडियो) Clip taken ofFlight:A380 Courtesy:www.youtube.com

इसने अपनी पहली उडान इसी साल ३१ सार्च को भरी थी । इसका टेक ऑफ समय कुल १६ सेकंड है । यह एक डबल डेकर हवाई जहाज़ है जिसका सामान्य वज़न उडान के समय १.२ मिलियन पाउंड होता है । इसमें कोई ६०० यात्री सफर कर सकते हैं हमें इतना मज़ा आया कि आपसे बाँटने का लोभ संवरण ना कर पाई ।
फिर पहुँच गये डरहम, अपने पोते को, अमित-अर्चना के नये बेटे यश को देखने । फिल हाल यहीं हैं । आपको ये हमारे साथ घूमना कैसा लगा ? और हाँ वह अपार्टमेन्ट की चाभी भी मिल गई यहां आकर, कैमेरे के बैग में थी ।
(समाप्त)

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

चलते रहिये चलते रहिये -7 कैप टाउन –रॉबिन आयलैन्ड


सुबह उठे चाय पी, बालकनी मे बैठ कर समंदर देखा । मन ललचा गया तो कमरे से बाहर निकल कर बीच पर गये । बीच तक पहुँचने के लिये कोई 30-35 सीढियाँ थीं । विजय (76 साल) ने कहा कि एक बार आ गया मै, अब और नही आउँगा । हमें भी थोडी मुश्किल तो हुई पर मज़ा बहुत आया । (विडियो) । 1


(विडियो) ।2

वापिस आकर नाश्ता किया तैयार हुए और 11 बजे निकल पडे ।
गाडी की कमान सुरेश ने संभाली । हमें जाना था वॉटर फ्रंट । यानि समंदर पर । जहां से बोट रॉबिन आयलैंड जाती है । रॉबिन को यहां रॉबेन लिखा जाता है । स्पेलिंग है ROBBEN हम Robin ढूँढ रहे थे तो मिल ही नही रहा था । खैर बाद में मिल ही गया । मैप में रास्ता कितना आसान लगता है पर गाडी चलाते हुए ढूँढना कितना मुश्किल । पहले तो एक जगह हमारी गाडी का कोई पार्ट निकल कर गिर गया सुरेश गाडी से उतर कर बहुत दूर तक पीछे देख भी आये पर कुछ भी दिखा नही । वह तो तीन दिन बाद जब गाडी वापिस करने गये तब पता चला कि व्हील कैप गिर गया था । फिर आगे हमें वॉटर फ्रंट तक का रास्ता ही ना मिले । एम -6 जिस पर हम चल रहे थे वह टेबल माउन्टेन के बाद अचानक खो गया फिर एक जगह गाडी ( एन वन street पर) रोकी, सुहास ने कहा, सुरेश रुको गाडी मै चलाती हूँ फिर पूछते पूछते पहुँचे वॉटर फ्रंट, वहां नेल्सन मंडेला गेट-वे गये । रिसेप्शन पर ही पता चला सारे बोट-टिकिट बिक चुके हैं । अब कोई सीट नही । “हाय राम अब दोबारा इसी रास्ते से आयेंगे “? हमारे बहुत बहुत अनुनय करने पर रिसेप्शनिस्ट बोली, “ठीक है आप टिकिट विन्डो पर जाकर खडे हो जाइये, यदि कोई कैन्सलेशन रहा तो आपको मिल सकता है टिकिट”। (विडियो) । 3

हालांकि हमारे पास दो दिन और थे पर एडम और एमी हमारे पास आने वाले थे और उनके साथ और और जगहें देखने का कार्यक्रम तय था । मै और विजय बैठ गये बैंच पर और सुहास और सुरेश टिकिट विंडो पर अपना भाग्य आजमाने खडे हो गये । बोट एक बजे निकलने वाली थी । बैठे बैठे मैं तो ऊब गई थी तो वहां एक स्लाइड शो ही देख लिया रॉबेन आयलैन्ड के बारे में । एक चित्र प्रदर्शनी भी लगी थी मैने कहा कि मै देख आती हूँ तो विजय बोले अभी वो दोनो आ जायेंगे, कहीं जाने की जरूरत नही है । एक बजने में दस मिनिट कम थे कि दोनों लोग आ गये, चलो चलो टिकिट मिल गये, फिर भागते भागते (!!!) बोट तक पहुँचे और सवार हो गये । क्या आश्चर्य कि करीब आधी बोट खाली थी, बहुत ही अजीब लगा । खैर हम तो बोट पर सवार हुए थे, तो इस बात को नजृर अंदाज किया । खूबसूरत पहाड और नीले समंदर की तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गये । (विडियो) । 4


ये कोई 45 मिनिट का नौका प्रवास था ।येS S बडी बडी लहरें उठ रही थीं कि हमारी इतनी बडी मोटराइज्ड बोट भी हिचकोले खा रही थी । सुहास की तबियत खराब हो गई बोट की वजह से । 5-6 लौंग खाने के बाद थोडा चैन मिला । दो महिलाओं नें बडी आस्था से उसे पूछा फिर मोशन सिकनेस के लिये गोलियां भी दीं और कहा वापसी पर बोट में चढने से पहले खा लेना । सुहास भूल गई ये बात अलग है ।
जब हम रॉबिन आयलैन्ड पहुँचे तो बोट से उतरते ही देखा कि बसें हमारे लिये तैयार थीं ताकि हम रॉबिन द्वीप का एक चक्कर लगा सकें । यह द्वीप दूसरे महायुध्द के इतिहास का साक्षी रहा है यहां हमने उस समय की दो तोपें देखीं । हमारा गाइड काफी जानकार आदमी था उसने हमें डच और ब्रिटिश लोगों के जमाने का इतिहास बताया और किस तरह इन लोगों ने यहां के लोगों को गुलाम बना कर रखा सारी दौलत हथिया ली और खुले आम वर्णभेद किया । हमारा सबसे पहला पडाव था सुबुक्वे जी का घर । हम बाहर के लोग सिर्फ नेल्सन मंडेला को ही जानते हैं । सुबुक्वे भी दक्षिण अफ्रीका के प्रसिध्द स्वतंत्रता सेनानी थे । ये पैन अफ्रीकन कॉंग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे हाँलाकि इससे पहले वे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस में ही थे जिसके अध्यक्ष नेल्सन मंडेला थे । पर कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होने अपनी अलग पार्टी बनाली । कह सकते हैं कि ये गरम दल के थे और मंडेला नरम दल के । इनके उग्र विचारों के चलते इन्हे कई सालों तक ऱॉबिन आयलैन्ड पर ही एक घर में कैद रखा । (विडियो) । 5

मंडेला जी को कुल 27 साल जेल में रखा जिसमे से 18 साल वे रॉबिन आयलैन्ड पर सुरक्षित विभाग में बंद रहे इन सब कैदियों से मजदूरी करवाई जाती थी । पत्थर तोडना गिट्टी बनाना, सडकें बनाना ये काम करवाये जाते थे । ये जेल भी इन्ही कैदियों से बनवाया गया और उन्ही को इसमें बंद करके रखा । शुरुआती दिनों में राजनीतिक बंदियों को दूसरे बंदियों के साथ ही रखा जाता था । बाद में ब्रिटिश सरकार को डर लगा कि ये राजनीतिक बंदी दूसरे बंदियों को ना बरगला लें । इसी कारण इन राजनीतिक बंदियों को अति सुरक्षित ए, सुरक्षित बी और ग्रूप जेल सी, ऐसे तीन विभागों में बाँटा गया हमें कैदियों के सेल देखने को मिले नेल्सन मंडेला जहां कैद थे वह सेल (कोठऱी) भी देखा । हाल ही में पढा कि मिशेल औबामा खराब मौसम के चलते रॉबिन आयलैंड तो नही जा सकीं पर मंडेला जी से उनके प्रीटोरिया के घर में मिल कर आईं, जब वे जून में दक्षिण अफ्रीका के टूर पर गईं थीं ।
हमें कैदियों को जो प्रतिदिन का खाना दिया जाता था उसकी भी जानकारी मिली । अति-सुरक्षित जेल में खतरनाक बंदियों को रखा जाता था जो कि अपनी कोठरी में एकदम अकेले रहते थे, इसमें उनकी फोटो समेत सारी जानकारी भी रहती थी ।
बी सेल में थोडे कम खतरनाक बंदी रखे जाते थे, ये भी अकेले ही रहते थे । मंडेला जी का सेल बी विभाग में था । सी विभाग मे कोठरी हॉलनुमा थी और इसमें 30-40 कैदी एक साथ रहते थे । कैदी पहले तो दरियों पर सोते थे पर बादमें इन्हे बंकर बेड दिये गये थे ।
औरतों को अलग जेल में रखा जाता था । पहले कोढियों को भी इसी द्वीप पर रखा गया था । यह सब देख कर दिल भर आया और वह सब जो हमने ब्रिटिश राज के बारे में पढा था याद आ गया ।
बहुत ही बुरा लग रहा था कि भारत की तरह ही यहां भी गरीब और दलित अभी भी स्वतंत्रता के फल चखने को तरस रहे हैं । सबसे ऊपरी पोस्ट्स पर अब भी गोरों का कब्जा है । वैसे ही सोने, हीरे, व प्लेटिनम की खदानें भी अंग्रेज या डच लोगों के कब्जे में हे ।
जब हम बोट पर वापिस आ रहे थे तब हमने 5-6 छोटे पेंगुइन पक्षी देखे । उनकी तस्वीरें भी लीं । इसके पहले एक जगह स्प्रिंग बक हिरण भी देखे । आप भी देखें (विडियो) । 6

बोट से हम वापिस आये तब तक पांच बज चुके थे । कार तक आते आते और आधा घंटा लग गया । मज़ा तो इसके बाद आया । हम जैसे ही बाहर निकले हमें एम 6 पर जाने के लिये दाहिने मुडना था पर हम बाये मुड गये । और आगे तक हम चलते चले गये पर कोई एक्झिट ही ना मिले मजबूरन सीधे सीधे कोई 4-5 मील निकल गये । जगह नई, रास्ते अनजाने और ऊपर से सबने बताया हुआ कि किसीसे कुछ पूछना नही । रात को तो बिलकुल नही । अंधेरा होने लगा था, फिर तय हुआ कि हम तो गलत जा रहे हैं और सीधे चलते गये तो शायद जोहान्सबर्ग पहुँच जायेंगे । हमें यह भी बता रखा था कि हमारे अपार्टमेन्ट में सिक्यूरिटी अलार्म हे जो आठ बजे के बाद एक्टिवेट हो जाता है । फिर एक जगह एक्झिट लेकर हम एक मॉल में गये और वहां पता किया । पता चला कि हम तो एकदम उलटा आ गये हैं और हमें वापिस वॉटर फ्रंट तक जाना पडेगा फिर वहां से एम 6 लेकर हम लुडाडनो जा सकते हैं । डर खूब लग रहा था पर जान मुठ्ठी में लेकर सब बैठे रहे और सुहास गाडी चलाती रही । वॉटर फ्रंट पहुंच कर थोडी राहत हुई फिर एम 6 मिल ही गया और थोडे पहचाने नाम आने लगे । करते करते रात 8 बजने में 2 मिनिट कम पर हम अपार्टमेन्ट पहुँच गये और कोई अलार्म भी नही बजा ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

चलते रहिये चलते रहिये -6 कैप टाउन - कैप-ऑफ गुड होप


चौबीस तारीख को सुबह ही हम तैयार होकर एयर पोर्ट रवाना हुए । वर्किंग डे होते हुए भी एमी ने मेहमान नवाजी पूरी तरह की और हमें टोस्ट और ऑमलेट का नाश्ता खिलाया । चूंकि यह एक वर्किंग डे था एडम ने हमारे लिये टैक्सी बुलवाई थी । पर किसी वजह से वह आई ही नही तो बेचारे एडम को ही हमें छोडने आना पडा । उसके लिये अपने ऑफिस में फोन कर के उसने कहा कि वह एक घंटा देरी से आयेगा । हाँलाकि उस हफ्ते के लिये वही बॉस था, उसके बॉस दौरे पर थे । हमारी केप-टाउन जाने वाली उडान साउथ अफ्रीकन एयर लाइन्स की थी । हमने टिकिट डी. सी. से कैप टाउन तक का ही लिया था और जोहान्सबर्ग में सफर तोड लिया था (Break journey ) । इससे हमने काफी पैसे बचा लिये थे । अब कैप टाउन से हमें सीधे ही डी सी वापिस जाना था (!!!!!) ।
इस उडान पर हमें कोई परेशानी नही हुई हम अंतर्राष्टीय प्रवासी जो थे । उडान अवश्य एक घंटा देरी से उडी । वेजीटेरियन खाना, चाय कॉफी जूस सब कुछ था । कोई दस बजे हम कैप टाउन पहुँच गये । वहाँ एयर पोर्ट से बाहर आते ही कार किराये से ले ली । छह दिन के 2,780 रैन्ड लगे (400$ ) ।यहां हमने Service apartment 6 दिनों के लिये लिया था उसके 720$ हम पहले ही दे चुके थे । हमारा यह अपार्टमेन्ट, 80-विला हारग्रीव्ज, एकदम लुडाडनो (spelling Llandudno) बीच पर था । बालकनी में से समुद्र के दर्शन हो जाते थे । यहां सुहास ने ड्राइव किया । अपार्टमेन्ट सुंदर था । दो बेड रूम्स, एक किचन कम लिविंग कम डाइनिंग रूम, दो बाथरूम्स,हमारे लिये एकदम बढिया । चाय कॉफी दूध सब की शुरुवाती व्यवस्था थी । पर हमें तो खाने का भी सोचना था । सुरेश और सुहास सामान लाने गये और मै और विजय रुक गये मैने सबके लिये चाय बनाई हमारे पास बिस्किट नमकीन वगैरा था वह निकाला । जब ये लोग वापिस आये तो फ्रोझन पास्ता भी लाया था वही बनाकर खाया । (विडियो) 1

फिर मैप देख कर कल का प्रोग्राम तय किया कि कल हम कैप ऑफ गुड होप याने कि आशा अंतरीप देखने जायेंगे इसका रास्ता चैपमन्स पीक होकर ही जाता है जो कि एडम ने हमें बताया था कि बहुत ही खूबसूरत है । सुबह उठे और बाहर बालकनी में बैठ कर चाय पी, तैयार हुए और नाश्ता कर के चल पडे । साउथ अफ्रीका में यह ठंड का मौसम होता है । और यहां तो हमारे और एन्टार्क्टिका के बीच में केवल समुद्र ही था । इस बार ड्राइव करने की बारी सुरेश की थी । हमारे अपार्टमेन्ट का रास्ता काफी घुमावदार और नीचे जाने वाला था तो बाहर निकलने के लिये चढाई होती थी । सुरेश धीरे धीरे आगे बढे और फिर हम अपने रास्ते पर लग गये । यह हमारी ड्राइव दुनिया की सबसे खूबसूरत ड्राइव थी । हमने लुडाडनो से एम 6 रोड पर शुरुवात की हौट बे से आगे निकले और यहीं से हमारी चैपमन्स ड्राइव शुरु हो गई जो हमें नूरडॉक तक ले गई । इसे सिर्फ खूबसूरत कहना इसको कमतर आँकना होगा । एक तरफ विशाल पर्वत माला और दूसरी तरफ गहरा नीला उफनता हुआ समंदर । साँस खींच कर नयनों में भर लें ऐसे दृष्य । 2, 3 (विडियो)



इस 9 किलोमीटर की ड्राइव में कोई 114 घुमाव थे और यह राह एक तरफ तो एटलांटिक सागर को बाहों में लेकर चलती है और दूसरी तरफ पर्वतों से बातें करती हुई । यह एक बहुत ही रोमांचक और आल्हददायक अनुभव था ।(विडियो) 4, 5




प्रकृती का ऐसा अद्भुत रूप जादू सा कर रहा था । आगे कैप ऑप गुड होप तक जाते जाते और भी अपूर्व पर्वत शिखर दिखें । हम चलते चले गये बिलकुल पश्चिमी तट के आखरी बिंदु तक । जिसे दुनिया का आखरी छोर भी कहा जाता है । कैप ऑफ गुड होप जिसे पार कर वास्को द गामा भारत पहुँचे । 6 ,(विडियो)

वहां बफेलो-फॉन्स्टीन विजिटर्स सेंटर था, वहां के हिल साइड कैफे में रुके । क़ॉफी नट्स और चॉकलेट बार खरीदे और नाश्ता किया, खूब भूख जो लग आई थी । वहीं पर व्हेल के जॉज (Jaws) और वर्टीब्रे सजाये हुए थे । वहां से आस पास के पौधे देखे एक लाल फूलों वाला पौधा था जिसका नाम है फिनबोस ।
वहां से फिर गये टेबल माउन्टेन नेशनल पार्क । टेबल माउन्टेन तो लुडान्डो से पास ही था पर उसी के नाम पर ये नेशनल पार्क बना है यहां से शिखर तक जाने के लिये पैदल भी चढ सकते हैं और एक ट्रेन भी जाती है । हमने तो ट्रेन के टिकिट खरीदे और ऊपर गये, यह था केप पॉइन्ट । कमाल का व्यू था एक तरफ हिंद महासागर दूसरी तरफ एटलांटिक महासागर और बीच में ये कैप पॉइन्ट जहां हम खडे थे । वहीं से दूर समंदर में एक जगह खूब फेना और एक्टविटि दिखी, वहां चार से पांच व्हेल्स थीं । थोडे थोडे अंतराल के बाद खूब फव्वारे बना रहीं थीं, 7 (विडियो)


उनका ब्रीडिंग सीझन चल रहा था । कभी कभी उनकी पूंछ दिखाई दे जाती थी । बहुत देर तक वहां रुक कर इसका आनंद उठाया । एक छोटासा काला पक्षी जमीन पर फुदक रहा था उसे सुहास ने एक काजू दिया तो लेकर तेजी से दूर भाग गया । वापसी का सफर भी उतना ही रोमांचक था । हमें साइमन टाउन रुकना था पेंगुइन्स (छोटे वाले) देखने के लिये पर कहीं दिखे ही नही । पर वही सारा प्राकृतिक रोमांचक सौंदर्य पहाड और महासागर देखते देखते वापिस आये । इस बार सुहास हमारी सारथी थी । शब्दों में इस प्राकृतिक वैभव को बांधना कठिन है आप देखें कैमरे ने कितना न्याय किया है । (विडियो) 8 ,9 (विडियो)




हमारे तजवीजी घर पर वापिस आये और खाने का इन्तजाम किया । थोडी देर टीवी देखा । कल हमें जाना था रॉबिन आयलैन्ड जहां नेलसन मंडेला को ब्रिटिश सरकार ने कैद किया था । अपनी कुल 27 साल के कैद वर्षों मे से 18 साल उन्होने इस जेल में बिताये । उसके लिये रास्ता देखा । मैप पर मार्किंग की और सो गये ।
(क्रमशः)

बुधवार, 13 जुलाई 2011

चलते रहिये चलते रहिये 5 -अफ्रीकी सफारी (पेलिनबर्ग)



सुबह जल्दी जल्दी तैयार हुए नाश्ता किया और निकल पडे । (विडियो) 2

इस बार सुहास हमारे साथ नही आई क्यूं कि उसने नाइजिरिया मे रहते सफारी की थी पर विजय हमारे साथ ही थे । हमें जाना था पेलीनबर्ग नेशनल पार्क । रास्ते में हमने वुलवर्थ नाम के दुकान से लंच का सामान खरीदा । जब हम पार्क के अंदर दाखिल हुए तो बडी देर तक कुछ भी नज़र नही आया फिर दो झेब्रा दिखे पर बडी दूर से । फिर अचानक दो तीन झेब्रा और दिखे एक बच्चा भी था । इस बार इनके दर्शन अच्छे से हुए । प्रकृति ने क्या क्या सुंदर दर्शनीय जानवर बनाये हैं । सफेद शरीर पर चमकदार काली धारियां खूब सज रही थीं । आगे जा कर हमने एक जगह देखी, रेस्तराँ था, वहां जानवरों के सिर लगे हुए थे चारों तरफ बरामदे की दीवारों पर । वहां की बालकनी से चारों तरफ का नजारा देखा ये काफी खुली खुली जगह थी और सबसे महत्वपूर्ण, यहां प्रसाधन गृह भी थे ।
फिर वहाँ से निकल कर आगे बढे तो देखे जिराफ, कोई 5 से 6 जिराफ थे, एक बच्चे के साथ था शायद थी । फिर दो जिराफ देखे एक दूसरे को प्यार से सहला रहे थे । लैमार्क के अनुसार धरती पर खाना धीरे धीरे कम हो गया तो जिराफों में गर्दन लंबी हो गई ताकि वे पेडों के पत्ते खा सकें ।(विडियो)3

उन्हे देखते देखते ये बात एकदम से याद आ गई । बहुत देर तक जिराफ देखते रहे फिर आगे बढे तो फिरसे झेब्रा दिखें । आगे दिखा भैंसा और घोडे के बीच का एक जानवर जिसको यहां कुडु कहते हैं और अंग्रेजी में ब्लू वाइल्ड बीस्ट कहते हैं । ये दिखता तो भैंसे की तरह है पर इसके आयाल होती है घोडे की तरह ( MANE) । बीच में लंच खाने रुके यहाँ सारी सुविधा थी जैसे रेस्ट एरिआ में होती है और लंच भी हमारा शानदार रहा एडम के सौजन्य से । वेज नॉनवेज दोनो तरह का पास्ता दही, फल, शैंपेन और केक भी । वहां कुछ बंदर आगये एक ने तो एडम का केला छीन लिया । हम वापस गाडी में बैठ कर आगे सडक पर आये तो एक कुडू हमारी गाडी के एकदम सामने आ गया एडम ने ब्रेक लगाया और उसे रास्ता पार करने दिया तब हम आगे बढे (विडियो) । फिर देखे हिरण जिन्हे स्प्रिंग बक कहते हैं ।
आगे जाते जाते हमें एक रस्ते का दो राहा मिला इनमे से एक रास्ता कच्चा था पर एडम ने कहा यहीं से चलते हैं । और कितना सही निर्णय रहा ये । हमें आगे दिखे बहुत से कुडु, शुतुरमुर्ग और इम्पाला हिरण, इनकी तो पूरी टोली थी । थोडे आगे गये तो गेंडे दिखे दो थे मजा ही आ गया । (विडियो) 4

पहलो तो हमें पीठ ही दिखाते रहे पर फिर चेहेरा भी दिखा ही दिया । और आगे आये तो एक सुंदरसा पीजेन्ट पक्षी दिखा उसका आधा चितकबरा रंग और नीला सिर कमाल का सुंदर था फिर देखे मीरकेट जो नेवले की तरह थे पर थे धारीदार । पूरी बारात थी इनकी तो और ऐसे सरसरा कर भाग रहे थे । आप भी मजा लें । (विडियो) 5

फिर एडम ने सुरेश से गाडी चलाने को बोला क्यूं कि कल हमें केप टाउन जाना था और हमने तय किया था कि हम किराये की गाडी लेकर घूमेंगे क्यूं कि शोफर के साथ टैक्सी काफी महंगी बैठ रही थी । यहां दिल्ली में तो गाडी चलाई हुई थी पर काफी साल हो गये थे छोडे हुए । तो सुरेश ने करीब 20 मिनिट गाडी चलाई और अंत में दिखा एक जंगली सूअर।(विडियो)6

फिर वापिस एडम जी ड्राइविंग सीट पर और हम घर वापिस । इधर सुहास ने भी एमी के साथ ट्रेनिंग ले ली थी यह हमें घर जाकर पता लगा । अमेरिका में दाहिनी तरफ का ड्राइविंग होता है और यहाँ अफ्रीका में बायीं तरफ का भारत की तरह ।
(क्रमशः)

बुधवार, 6 जुलाई 2011

चलते रहिये चलते रहिये 4 –चीता पार्क


हम वापिस लौटे 21 को और 22 को सुबह हमे जाना था चीता पार्क देखने । विजय ने कहा कि चलना बहुत पडेगा तो मै घर में आराम करता हूँ और शाम को थाइ-मसाज के लिये जाऊंगा । आठ बजे पहुंचना था, तैयार होते होते साढे सात बज गये तो लगा हम समय से न पहुँच पायेंगे, पर एडम ने क्या गाडी चलाई है करीब 150 किलोमीटर प्रति घंटा । 1

तभी तो हम 70 -75 किलो मीटर दूर के चीता पार्क समय से पहुँच गये । वहां गये तो कॉफी तैयार थी कॉफी पीकर थोडा पार्क के बारे में और चीतों के बारे में जानकारी हासिल की । 2

ये तो हम सभी जानते हैं कि चीता सबसे तेज जानवर है । यह भी जाना कि अफ्रीका में भी इनकी संख्या काफी कम हो रही है भारत से तो ये लुप्त ही हैं । यहां उनका प्रजनन और संवर्धन किया जा रहा है । यहां कोई तीन मादाएं है और दो या तीन नर हैं 3-4 बच्चे भी हैं । वे बता रहे थे कि ज्यादा तर ये चीते प्यार समझते हैं और कहना मानते हैं पर कभी कभी गुस्सा हो जाते हैं तब उन्हे अकेले छोडना चाहिये नही तो नोच खरोंच लेते हैं । एक लडकी के हाथ में जो हमारी गाइड भी थी बैन्डेज बंधा देख कर विश्वास हो गया ।
फिर हमने चीतों को उनके पिंजरे मे देखा । एक चीते के धब्बे कुछ अलग तरह के थे कुछ लंबे से । चीतों के बच्चे बहुत प्यारे थे । अब हमें उस जगह ले जाया गया जहां चीते दौडने वाले थे । कुछ कुछ डर तो था मन मे । हमे एक छोटी सी बाड के आड खडा कर दिया । हमें शुरु में ही बाताया था कि एक बेट नुमा चीज, जो मांस के टुकडे जैसी दिखने वाली, प्लास्टिक की होती है, मोटराइज्ड पुली से फर्राटे से दौडाई जाती है (70 कि.मी./ घंटा )और चीता उसके पीछे भागता है और उसे पछाड देता है । हमें बताया गया कि आज तीनो चीतनियां ही दौडेंगी क्यूं कि चीतों का मूड नही है । वैसे चीतनियाँ कम एकाग्र होती हैं चीते अपने लक्ष से ध्यान नही हटाते । हम वहाँ खडे होकर इंतजार कर रहे थे और हमारी गाइड लडकी हमें हर चीतनी के बारे में बताती जा रही थी । उसकी बात खतम करके वह चीतनीयों को लाने चली गई । उनके गले में पट्टा डाल कर उन्हे जीप में बिठा कर लाया जाता है । हमें बताया गया था कि हम ज्यादा हिले डुलें नही बस चुप से खडे रहें । पहले एलन को लाया गया और फिर प्यार से पट्टा खोल दिया गया । वह मीट का टुकडा (झूटा) फर्राटे से दौडा और चीतनी छलांगे लगाते हुए उसके पीछे यह सब मानों दो चार सेकंड में हो गया । इसी तरह थोडे थोडे अंतराल से दो चीतनियां और दौडी । इनके नाम थे ग्रॉस और बिग गर्ल । हर बार वही उत्कंठा आशंका और रोमांच । बहुत मज़ा आया । दौड के बाद चीतनियों को सचमुच का मांस तोहफे में मिला । (विडियो)3

यहां से हम एक हॉल में आकर बैठे जहां चीतों के बारे में एक फिल्म देखी । इस दौरान एक बडा सा चीता तेज तेज बाहर बगीचे में घूम रहा था ।4

मूवी के बाद हमारी गाइड और सूचना अधिकारी लडकी चीते को लेकर आई और एक टेबल पर लिटा दिया फिर बारी बारी सारे ग्रुप्स के लोग गये और चीते के साथ फोटो खिंचवाई और उसकी पीठ पर हाथ फेरा । हमने भी यह सब किया । 5 6 7 8(विडियो)







इसके बाद हमे एक आधी बंद गाडी में बिठा कर सफारी करायी गई । सफारी में सबसे पहले हमने देखे इम्पाला हिरण । इसका नर बहुत खूबसूरत होता है उसके सींगों की वजह से । फिर देखी जंगली बिल्ली । 9 10 11





यह देखने में तो आम बिल्लियों की तरह होती है पर इसके कान अंदर से गुलाबी होते है । खूंखार होती हैं । फिर देखे दक्षिण अफरीका के गिध्द । यहां गिध्दों की आठ प्रजातियाँ पाई जाती है जिनमें से सात लुप्तप्रायः (endangered ) हैं।
यहां पर एक बडे गिध्दों की एक प्रजाति हैं । इन गिध्दों के बारे में हमारी गाइड नें बडी रोचक जानकारियां दीं । ये गिध्द इस पार्क में भी अच्छी तरह प्रजनन कर रहे हैं। ये सबसे बडे गिध्द हैं जिनका वजन दस किलो के लगभग होता है । खुले पंखों का विस्तार 2.8 मीटर होता है । 12

ये काफी मोटी चमडी को भी छील सकते हैं । नर और मादा देनो मिल कर बच्चों का संगोपन करते हैं और इनकी जोडी आजीवन रहती है अगर साथी की मृत्यु हो जाये तो ये शोक में डूब जाते हैं । गिध्दों की एक छोटी प्रजाती भी यहां पाई जाती है जिनकी चोंच मोटी चमडी नही छील सकती इससे भूखों मरने की नौबत आ सकती है, तो ये शुतुरमुर्ग के अंडे को चोंच से पत्थर उठा कर मार मार कर कमजोर करते हैं और बाद में चोंच से छेद कर के सारा अंडा जो काफी बडा होता है खत्म तर देते हैं (मुर्गी के करीब 24 अंडों के बराबर माल इसमें होता है ) । शुतुरमुर्ग के ये अंडे वहां हमारे विक्टोरिया फॉल्स के होटल में भी सजा कर रखे थे आपने भी नोटिस किया होगा। यहां इन पर सुंदर सुंदर पेंटिंग भी की जाती है और बेचे जाते हैं ।
फिर हमने देखा एक भूरा लकडबघ्घा या हाइना । जो पहले तो छुपता रहा पर फिर सामने आ गया । हमारी गाइड इन सब के बारे में बताती जा रही थी । इसके बाद देखे जंगली कुत्ते । बाप रे ! क्या लडते हैं और क्या बखेडे करते हैं । खाना खाते वक्त बाप को खाने ही नही देते यदि वह खाने में मुह डालता है तो उसे काट कर भगा देते हैं । आप देखें बेचारा चुपचाप एक और खडा है । 13

यहां हमने शुतुरमुर्ग भी देखें । इसके बाद हम एक खुले से मैदान में गये और वहां हमारे लिये चीतों को बुलाया गया । बहुत देर मनाने के बाद आये, खाना खाया और क्या पोज दी हैं एकदम मैजेस्टिक, आप भी देखिये । हम बंद गाडी मे थे और ये खुले ।14

चीता पार्क की प्रवेश फीस थी 258$ चार व्यक्तियों के लिये । सफारी पूरी होने के बाद हम यहां के दुकान में गये । बेटों के लिये टी शर्टस् और पोते पोतियों के लिये चीता और जंगली कुत्ता खरीदा ( स्टफ्ड टॉयेज)। 15

( दो स्टफ्ड खिलोने और दो टी शर्ट्स की कीमत थी 450 रैंड यानि करीब 65 डॉलर । फिर एडम हमें फ्ली मार्केट ले गया वहां कुछ छोटी मोटी खरीदारी की । साउथ अफ्रीका काफी महंगा है यूरोप से भी, जो कि अमरीका से महंगा है । अब तक चार बज चुके थे और भूख जोरों की लगी थी तो एक ओपन एयर रेस्तराँ में पिज्झा खाया और अमेरुला वाइन पी जो दूध या आइसक्रीम में डाल कर पीते हैं । यह यहां के अमेरूला नामक फलों से बऩाई जाती है । कहते हैं कि इन फलों को खा कर हाथी, बंदर आदि जानवर मतवाले हो जाते हैं । ये अमेरूला कडवी थी पर अच्छी थी (विडोयो) । घर आये । थक तो गये ही थे । कल हमें जाना था सफारी पर । एडम ही गाडी लेकर ले जाने वाला था । मै कीमतें बता रही हूँ कि यदि आप में से कोई जाये तो अंदाजा रहे ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 जून 2011

चलते रहिये चलते रहिये 3-विक्टोरिया फॉल्स


कमरे में आकर नहाया और निकल पडे विक्टोरिया प्रपात देखने, इसका अफ्रीकी नाम है मोसी ओआ तून्या इसका अर्थ है धुआं जो गरजे । सबसे पहले तो वह बस ली जो होटल से हर आधे पौने घंटे पर चलती है । कोई दस मिनिट में पहुँच गये स्मोक दैट थंडर्स के गेट पर । बाहरसे कुछ भी दिखाई नही देता । वहां काफी दूकानें थी जहां चित्र, मूर्तियाँ, रेनकोट आदि मिल रहे थे तो रेन कोट किराये पर लिये और अंदर आये । (विडियो)1

30-30 $ टिकिट लिया । प्रपात में गिरने से पहले झाँबेझी नदी काफी चौडी हो जाती है पर ज्यादा गहरी नही है । इसमें काफी उप-नदियां आकर मिली हैं । प्रपात से पहले दो नदियां मिलती हैं इसमें लुआम्पा और कुआन्डो । टिकिट लेकर अंदर आये, अंदर जाकर चलते चले गये, और क्या नजारा था ! आंखें कृतार्थ हो गईं ।
व्योम से उतरे, पाताल गहन
जल का प्रचंड, अवतरण
छाया कुहरा, गहरा गहरा
अवगुंठन, न कोई दर्शन
उठीं फुहारें, बरसे सावन (विडियो)2

रिम झिम रिम झिम, बिना घन ।
हरियाला बन, मन हिरण
डोले, संग पवन, सनन सन
ऐसा सुखद, अनुभवन
मानो पा लिया, त्रिभुवन।
ये कोई कविता नही है मन के भाव हैं तो इसको अनदेखा किया जा सकता है ।
नायगारा प्रपात से दुगना गहरा और दुगने से कुछ ज्यादा लंबा है ये प्रपात । लगता है पूरी की पूरी झांबेझी नदी कूद पडी हो खाई में और ऐसा ही है । बीच बीच में जमीन के उठान है जो इसको गरमी में बहुत सी धाराओं में विभाजित कर देते हैं । पर हम गये तब इसमें 95 प्रतिशत पानी था तब भी इसे सात भागों में बांटा गया है सबसे पहला है डेविल्स कैटरेक्ट । मुख्य प्रपात सबसे लंबा है इसे मेन फाल्स कहते हैं । पानी इतने जोरों से इतने गहराई में गिरता है कि उससे होने वाली बौछार उँचे जाकर बारिश की तरह गिरती है । इसी की वजह से यहां रेन फॉरेस्ट बना हुआ है ।
यहां किस्म किस्म के पाम वृक्ष टीक, एबोनी, महोगनी आदि वृक्ष भी हैं और है लोह वृक्ष (आयरन वुड) । य़ह दुनिया के सात प्राकृतिक आश्चर्यों में गिना जाता है । इसकी खोज करने वाले पहले यूरोपियन थे डेविड लिविंगस्टन जिन्होने इस प्रपात को एक द्वीप पर से देखा जो अब लिविंगस्टन आयलेंड के नाम से जाना जाता है । लिविंगस्टन ने इसे रानी विक्टोरिया के नाम पर विक्टोरया फॉल्स नाम दिया । हालांकि यहां के लोग इसे पहले से ही जानते थे। अब आप सब प्रपात के विडियो से आनंद उठायें । (विडियो)3

बीच में मै और विजय थकान की वजह से एक बैंच पर बैठ गये । पर मै फिर से सुरेश और सुहास के साथ झांबेझी पुल देखने चली गई । यह काफी लंबा रास्ता था और बारिश हुए ही जा रही थी ।।
हम चल कर उस जगह तक गये जहां झांबेझी नदी पर पुल बना हुआ है जो झांबिया और झिंबाब्वे को जोडता है । रास्ते में एक जगह जहां रास्ता प्रपात की तरफ गया था वहां लिखा था खतरा!!!!! आगे अपने भरोसे जायें । हम भी आगे बढ गये ।
यह नदी कई खाइयाँ जिन्हें गॉर्ज कहते हैं, बनाती चलती है और प्रपात के रूप में गिरने के बाद संकरी हो जाती है पर बहती बहुत तेज है । यहां हमने एक साथ दो दो इंद्रधनुष बनते देखे ।
सुना है कि चांदनी रात को भी इस फॉल पर इंद्रधनुष बनता है हम तो देख नही पाये । खूब घुमाई हो गई थी भीग भी गये रेनकोट होते हुए पर चलते चलते सूख भी गये । बहुत मजा आया वापिस आये एक डीवीडी खरीदी फॉल्स की। वहां कुछ नर्तक नाच रहे तथे । हमारी बस अभी आनी थी तो वह नाच देखा और उसकी भी डीवीडी खरीदी । सुहास ने एक हाथी खरीदा । मेने एक हिप्पो । सचमुच का नही शो पीस । (विडियो) 4

बस तब तक आ ही गई । बस में बैठे और लंच करने उसी जगह गये जहां से वॉटर होल दिखता था । तब बहुत से पंछी दिखे चीलें, गिध्द, हॉक वगैरा (क्यूंकि होटल के लोग इन्हे मीट खिलाते हैं )। बंदर भी आ गये । तीन चार मगर भी देखे जो सुस्त से पडे हुए थे धूप सेंक रहे थे और शिकार की ताक में थे । एक जंगली सूअर भी देखा । हिरन तो थे ही । जकाना पक्षी भी थे । मगर के आस पास कोई भी नही फटक रहा था
खाना खा कर थोडा लेटे । साढे चार बजे बोट क्रूज़ के लिये जाना था । साढे तीन बजे उठे तैयार हुए और नीचे आकर बस की वेट करने लगे । तीन चार और और बसें आईं पर हमारी नही थीं आखिर कार हमारी बस आई और हम उसमें बैठ कर चल पडे । क्रूज़ के लिये बस ने हमें जहां उतारा वहां अफ्रीकी नर्तक हमारे स्वागत में खडे थे हमारे आते ही उन्होने नृत्य करना चालू किया । नर्तकों ने हमें भी अपने साथ नाचने को बुलाया तो हम भी नाचे वहां एक ड्रम बजाने वाले का पुतला था उसके साथ फोटो खिंचवाया । फिर चढे बोट में । हमारा जोरदार स्वागत हुआ । रेड वाइन मानो बह रही थी । साथ में थी नमकीन मूंगफली । इतने में शिप का कैप्टन आया और कहा क्षमा चाहता हूँ पर हम आगे नही जा सकेंगे । अभी तो क्रूज शुरू हो ही रही थी । हमारे सबके मुख पर प्रश्न चिन्ह टंग गये । तो उसने हंस कर कह मै देख रहा हूँ कि आप लोग वाइन पी ही नही रहे । तो पीजीये, फिर मै आगे बढता हूँ । (विडियो) Cruise1

उसके साथ जो लडकी मैनेजरियल असिस्टंट थी वह कहने लगी, “जो पीयेगा नही उसे गुलाबी हाथी नही दिखेंगे“, सारे लोग हँस पडे और हमारी बोट आगे बढी । सबसे पहले हमे दिखे हाथी, तीन थे, माँ बाप और बच्चा । झांबेझी नदी इतनी चौडी है कि देखते ही बनती है । विक्टोरिया फॉल्स से पहले इसमें दो बडी नदियां आकर मिलती हैं । इस बोट-क्रूज में हमे केरला की बैक व़ाटर सैर याद आ रही थी । पर वहां नदी इतनी चौडी नही थी । बोट आगे जा रही थी हम अब उत्सुक थे हिप्पो देखने के लिये । और अचानक शोर मचा हिप्पो हिप्पो । देखा पानी के ऊपर कुछ चट्टाने सी हिल रही थीं यह दरियाइ घोडों की पीठ थी । जैसे बोट कुछ आगे बढी उनके सिर नज़र आये । कोई पांच या छह हिप्पो थे । हमारी बोट को इनके बिलकुल पास ले जाने लगे तभी एक हिप्पो खडा हो गया उसका पूरा शरीर दिखाई दिया । ऐसे तन कर खडा था पठ्ठा कि और पास आये तो उलट दूंगा । उसके बाद देखा एक मगरमच्छ का बच्चा जो आराम से एक चट्टान पर लेटा था, इसे काफी अच्छे से देख पाये । (विडियो) Cruise2

फिर अचानक बादल घिर आये और हवा तेज चलने लगी । नैया डगमग डगमग डोलने लगी । बिजलियाँ चमकने लगी हमने कोशिश की कि इसे कैमरे में कैद करें । एक तरफ डर भी लग रहा था कि ठीक ठाक वापिस पहुंच जायें । खैर पहुंच तो गये और एकदम ठीक ठाक पहुँचे ।
वापिस जाकर डिनर खाया । बोमा रेस्तरॉँ में नही जा पाये क्यूं कि बारिश हो रही थी । सुहास बहुत मायूस थी तो मैनेजर ने पूछा क्या हुआ, क्यूं उदास हो ? सुहास ने कहा हमें बोमा रेस्तरॉं में जाना था नाच देखने ड्रम सुनने । तो बोले बस इतना ही ? नाच और ड्रम यहीं करवा देते हैं और वाकई हमने नाच भी देखा और ड्रम भी सुने पर बोमाँ मे ये कैसे होता ये सवाल तो रहा ही । यहाँ ये हमारा आखरी डिनर था, कल तो ब्रेकफास्ट के बाद हमें निकलना था । पर ब्रेकफास्ट करते हुए जानवर दिख जायें ये आस भी थी । दूसरे दिन सुबह आराम से उठे नहा धो कर तैयार हुए सामान पैक किया और नाश्ता करने गये । हमारे हमेशा के स्पॉट पर बैठे और एक बार और सफारी का आनंद उठाया । फिर कमरे में आये सामान उठाया और रिसेप्शन पर जाकर बैठ गये । हमारी टैक्सी आई और उसने हमें हवाई अड्डे छोडा । उडान समय से थी तो दो घंटे बाद वापिस जोहेन्सबर्ग और एडम के घर । गाडी में एडम ने हमे बताया कि कल हम चीता दौड देखने जायेंगे और परसों सफारी । (क्रमशः)

मंगलवार, 21 जून 2011

चलते रहिये चलते रहिये -2…. विक्टोरिया फॉल्स सफारी लॉज


सुबह साढे चार बजे उठे । नहा धो कर तैयार होकर नीचे आये । एडम और एमी ने चाय नाश्ता तैयार किया था सो नाश्ता कर के हमें साढे सात निकलना था दस बजे की हमारी उडान थी ब्रिटिश एयरवेज की । विक्टोरिया फॉल्स उसी नाम के शहर (गांव कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ) में स्थित है । यह झिंबाब्वे मे है । इसके लिये हमें अलग से विसा की जरूरत थी । पर वह हमें उतरने के बाद भी मिल सकता था तो वही तय किया था । उडान दो घंटे की थी । विमान में वेज खाना ही नही था ।हमें एक टॉफी खा कर ही संतोष करना पडा । हम पहुंचे बारा बज कर 10 मिनिट पर । उतर कर हमें विसा के लाइन में खडा रहना पडा । एयरपोर्ट छोटासा था और टूरिस्ट काफी थे तो हमें बाहर फुट पाथ पर लाइन में खडा रहना पडा । हम खडे थे, इतने में कुछ लोग एका-एक हमसे आगे चल कर अंदर चले गये । बस फिर क्या था हमें गुस्सा आ गया कि भेद भाव क्यों हो रहा है । पता चला वे सब एक ही ग्रूप के थे । थोडी देर बाद हमें भी अंदर बुला लिया गया तो विजय हंस कर बोले, “अब क्या करें ? मना कर दें अंदर जाने को, कि हम तो अपनी बारी आने पर ही जायेंगे ।“ क्या बोलती मै, चुप-चाप अंदर चली गई । तीस तीस डॉलर फीस जमा कराई तब वीसा मिल गया ।
फिर एयरपोर्ट से बाहर आये और हमारे लिये जो होटल से टैक्सी आने वाली थी उसको देखने लगे । हमारे होटल का नाम था विक्टोरिया सफारी लॉज और हमें लाने के लिये जो टैक्सी नियत थी वह थी वाइल्ड होरायझन नामक कंपनी की ।
यह तो हमने देखा नही बस टैक्सी पर विक्टोरिया सफारी लॉज देख कर एकदम से उसमें जा कर बैठ गये । यह भी ना देखा कि आदमी के हाथ में जो बोर्ड है उस पर किसका नाम लिखा है । उसने भी, ग्रूप ऑफ फोर, पूछ कर बिठा लिया । थोडी देर बाद और चार लोग आये तो ड्राइवर थोडा परेशान हो गया । फिर नाम पूछा तो गुप्ते और जोगळेकर नाम देख कर कहा ये आपकी टैक्सी नही है । तब तक हमने उसने जो पानी की बोतल वगैरा दी थी उन्हे खोलकर पानी वानी पी लिया था । खैर वह हमारे टैक्सी ड्राइवर को खोज कर लाया और हम हमारी टैक्सी में बैठ कर होटल की तरफ रवाना हो गये । रास्ते पर दोनो तरफ के जंगल देख कर मै सोचती जा रही थी कि ये तो कोई घना जंगल नही दिखता फिर यहां जानवर कैसे दिखेंगे । रास्ते पर लोग भी ज्यादा नही दिखे । धीरे धीरे होटल दिखने लगे । फिर एक शानदार मोड लेकर हमारी टैक्सी विक्टोरया सफारी लॉज के आगे आकर रुक गई । एकदम अफ्रीकन संस्कृति के दर्शन हो गये । हमारी टैक्सी रुकते ही अफ्रीकन लिबास में एक आदमी जिसका नाम नफात था हमारे स्वागत के लिये आगे आया और उसने हमारे पाँव जमीन पर ना पडें इसके वास्ते एक लंबी टाट-पट्टी सी बिछा दी और हम बडी शान से .. और मन में कुछ सकुचाते हुए उस पर चल कर स्वागत कक्ष में पहुँचे । वहां दो लोग थे, उनमे से एक का नाम था मेंबर जो याद रहा। यहां काफी लोग क्रिस्चियन हैं ।
होटल का गेट-अप एकदम पारंपरिक अफ्रीकन घरों की तरह था घास का बना मोटा छप्पर खंबों पर टिका हुआ पर अंदर से हमारे कमरे वगैरा एकदम आधुनिक सुख सुविधाओं (4 सितारा ) से सुसज्जित थे । कमरे और परिसर देख कर हम तो बहुत खुश हो गये । परिसर में सामने एक बगीचा था उसके बीचों बीच एक पेड था जिसका तना ऐसे लग रहा था मानो पत्थर का हो । हमारे इस पैकेज में जो कि ७०० डॉलर प्रति व्यक्ति था जोहेन्सबर्ग से विक्टोरिया फॉल्स और वापसी का हवाई भाडा, होटल में तीन दिन तक रुकने का डबल बेड कमरा, नाश्ता तथा रात का भोजन शामिल था और इस के साथ एयरपोर्ट से लाने ले जाने की सुविधा और एक बोट क्रूज भी थी जिस मे पानी में रहने वाले जानवरों के दर्शन हो जाते थे । सबसे पसंद आई बेड के ऊपर लगी मसहरी जो पलंग के नीचे तक श्री देवी की साडी की तरह लटकती तो मच्छर घुसने का कोई चान्स ही नही रह जाता । स्वागत काउंटर पर जो लोग थे बहुत ही आतिथ्य शील और विनम्र थे । यह हमारा पहला खास अफ्रीकी अनुभव था और बहुत सुखद था । स्वागत कक्ष की सजावट भी एकदम पारंपारिक थी । स्वागत कक्ष के साथ ही थी एक अफ्रीकन शो पीसेज की दुकान भी पर जाहिर है कि ये दुकान बहुत महंगी थी । स्वागतकों ने हमे कमरों की चाभियां तो दी हीं साथ ही साथ वहां के खाने पीने के रेस्तराँ तथा खाने के समय के बारे में भी बताया । यह भी बताया कि पास ही उनका एक बोमा रेस्तराँ भी है, यह एक विशेष रेस्तराँ होता है, जहां अगली रात को नृत्य तथा ड्रम्स का प्रोग्राम है । सुबह साढे चार से उठे हम लोगों को तो काफी थकान हो गई थी । तो कमरे की चाभियां लीं और कमरे में आकर नेशनल प्रोग्राम चालू । (विडियो)

शाम साढे चार बजे उठे और सुहास विजय के कमरे में गये । चाय पी। कमरे में चाय कॉफी की व्यवस्था थी । फिर बाहर बालकनी में बैठ कर पंछी देखते रहे । एक पक्षी तो, जो बचपन में घुमा कर टर्र टर्र आवाज करने वाला खिलौना होता था वैसी आवाज निकाल रहा था और थी बया चिडिया की तरह चिडिया थीं जिनके घोंसले होते तो वैसे ही हैं जैसे बया के पर थोडे बेतरतीब से होते हैं । सुहास विजय के कमरे के बालकनी से एक पानी का तालाब भी दिखाई देता था पर वहां जाना मना था । बहुत से जानवर वहां पानी पीने आते थे । हम काफी देर तक वहां देखते रहे पर बडे सारस जैसे पंछियों के अलावा कुछ न दिखा । अब शाम होने वाली थी । काफी देर बैठने के बाद अंदर आने ही वाले थे कि 4-5 हाथियों का एक झुंड आ गया उसमें एक बडा हाथी, जो पिता होगा, पहरा देने खडा हो गया और बाकी के बारी बारी पानी पीते रहे । उनमें से एक माँ थी और बाकी बच्चे । खूब मज़ा आया । (विडियो)

ऐसे स्वतंत्र हाथी वो भी इतने सारे हमने कब देखे थे । रात का डिनर वहीं था और कॉम्लीमेंट्री था । डिनर में बहुत प्यार से वहां के हेड वेटर नें पूछ ताछ की हमारे टेबल पर आकर हमारा ऑर्डर लिया । जब चीज तैयार होकर आती थी तो से खोलने का एक उत्सव सा होता ढक्कन जोर से उठाकर वे एक तरह की आवाज निकालते और सब खुश होकर ताली बजाते । खाना खाते हुए नाच गाने का प्रोग्राम भी हुआ । डाइनिंग हॉल के हर सेक्शन के लिये यह कार्यक्रम दोहरा दिया जाता , हम ने भी बहुत आनंद उठाया । होटल का स्टाफ सचमुच ही बहुत विनम्र और हर तरह की मदद के लिये तत्पर था । (विडियो)

वापिस कमरे में आकर हम चारों ने कल का प्रोग्राम तय किया हमारे पास कल का ही दिन था परसों तो हमारी वापसी थी । कल सुबह हम जायेगे विक्टोरिया फॉल्स देखने । शाम को हमारी बोट क्रूज़ थी । तो तय किया कि उठेंगे आराम से और नाश्ता कर के चल पडेंगे फॉल्स के लिये ।
सुबह आराम से उठे, चाय के लिये गये सुहास के कमरे में, वहां के बालकनी से तालाब जो दिखाई देता था । होटल में ही एक जगह एक खूबसूरत तालाब और झरना था वहां से भी वॉटर होल दिखाई देता था । वहां एक हिरन आया फिर दो तीन चार बहुतसे हिरन आ गये । वे सारस जैसे बडी चोंच वाले बडे पक्षी जिन्हे जकाना कहते है बहुत से थे एक तो बिलकुल बुत की तरह एक पेड़ पर बैठा था जैसे कोई पुतला हो । फिर एक सफेद हंस की तरह का पक्षी भी दिखाई दिया । हमने सोचा नाश्ता करने चलते हैं वहां के खिडकी से सब साफ दिखाई देगा । तो गये । कैमरा ,दूरबीन सब साथ ले गये क्यूंकि वहां से तालाब जिसे ये लोग वॉटर होल कहते है काफी नजदीक है और साफ दिखाई देता था । वहां और भी हिरण देखे और देखे मगर मच्छ । मन तो था कुछ देर और बैठें पर जाना जो था (विडियो) ।


(क्रमशः)

बुधवार, 15 जून 2011

चलते रहिये चलते रहिये- घूमना दक्षिण अफ्रीका

इस बार जब सुहास दिल्ली आई थी तभी तय हो गया था कि अगली ट्रिप हमारी दक्षिण अफ्रीका की होगी । एडम, उनका एक शिष्य जिसे हम भी अच्छी तरह जानते हैं (दिल्ली में जो था वह दो साल ), आज कल प्रीटोरिया में पोस्टेड है । कोई अपना हो तो जाने की सुविधा तो रहती ही है ।
तो जब हमारा वार्षिक अमरीका प्रवास शुरू हुआ तो सुहास नें कहा कि तुम लोग यहां (मारटिन्सबर्ग वेस्ट वर्जीनिया) मई में ही आ जाओ क्यूं कि हमें १६ मई को ही चल देना है और ३१ मई की हमारी वापसी होगी । दिल्ली से चल कर हम २६ अप्रेल को पहुँचे एन्डरसन, साउथ केरोलाइना राजू के यहाँ । वहाँ राजू- रुचिका और मानसी- साक्षी के साथ १२-१३ दिन रहे और चल पडे अपने हमेशा के रूट पर । यानि पहले कुसुम ताई के घर और फिर सुहास के यहाँ । सुहास के यहां ६ दिन खूब मौज मस्ती की हमारे शादी की वर्षगांठ थी 12 को तो चायनीज रेस्तरॉँ मे खाना खाया । (विडियो)

सोला तारीख को हमारी उडान थी ५ बजकर 40 मिनिट पर, साउथ आफ्रीकन एयर वेज की । पूरे १७ घंटे की उडान थी एक घंटे का पडाव डकार, सेनेगल में था पर हमें उतरने की इजाज़त नही थी । साफ सफाई और इंधन लेने के लिये ही यहां रुकना था कुछ यात्री अवश्य उतरते और चढते हैं । हमारा गंतव्य था जोहान्सबर्ग जो प्रीटोरिया से एक घंटे की दूरी पर
है ।
हम घर से १२ बजे ही चल पडे सुहास के पडोसी जिम लवीन ने हमें एयरपोर्ट पर छोडा । सुहास के यहां ये अच्छी व्यवस्था है कहीं भी जाना हो जिम जी का ट्रक हाजिर है । ये ट्रक बडा वाला नही छोटा घरेलू ट्रक है पर हम लोगों का सामान और ६ व्यक्ती आराम से आ सकते हैं । इस बार प्रकाश और जयश्री हमारे साथ नही थे । किरण ( उनकी सबसे छोटी बेटी ) को मुंबई जाना था और वह मेडिकल के प्रथम वर्ष में यू एस में पढ रही है, फिर अगले चार साल तक मुंबई नही जा पायेगी इसी से वे लोग नही आये ।
हम चैक इन सिक्यूरिटी वगैरा सब कर करा के 2 बजे अपने गेट पर पहुँच गये । वहाँ पिझ्जा पास्ता का लंच किया । इस बार प्रकाश नही थे तो कोई पूरी भाजी वगैरा नही थी वरना नका हमेशा आग्रह रहता है कि जहां तक हो सके घर का खाना हो । तो हमारी यात्रा नियत समय पर आरंभ हुई । साउथ अफ्रीकन एयर लाइन का विमान अच्छा है सीटों के बीच थोडी ज्यादा जगह है इकोनोमी क्लास में भी । पर प्रवास बहुत लंबा था और मनोरंजन की व्यवस्था लचर । साउंड ठीक नही था, और टी वी स्क्रीन हमसे दूर टंगा था । खैर हम चार लोग थे तो बोरियत को कम तो कर ही लिया । आधा समय तो सोने में निकल गया बचा हुआ खाने पीने में बातें करने मे ।
सतरा घंटे प्रवास कर के हम पहुँचे जोहान्सबर्ग, 17 मई को शाम पाँच बजे । एडम, हमें लेने आ गया था । पहुँचते ही सबसे पहले रैंड लिये जो वहां की करंसी है । एक डॉलर सात रैंड के बराबर है पर बहुत से टैक्स काट कर हमें हजार डॉलर के ६८५८ रैंड मिले । एडम के साथ घर आये हमारे लिये उसने एक बडी गाडी किराये पर ले रखी थी । घर पर पहुँचे तो अंधेरा । भारत की याद गई । घर में सारे उपकरण बिजली के हैं तो खाना नही बन पाया था । तो हम सब गये नमस्कार रेस्टॉरेन्ट में खाना खाने और चाय भी तो पीनी थी । मसाला चाय तो बहुत ही बढिया थी और खाना भी अच्छा था । रेस्तरॉँ के मालिक गुजराती थे बडे मिलनसार । एडम तथा एमी को जानते भी थे तो बहुत सी बातें भी हुई । जब वापिस एडम के घर आये तो बिजली आ गई थी एडम ने हमें अपने अपने कमरे दिखाये । थके तो हम थे ही तो तुरंत ही निद्रा देवी के आधीन हो गये । (विडियो)

आज 18 तारीख थी मई क, एडम हमें प्रीटोरिया घुमाने वाला था । मेरी जब सात बजे आँख खुली तो बाकी सब लोग उठ कर चाय पी चुके थे । यू एस के हिसाब इस वक्त रात का डेढ बजा था । मैने चाय पी और बिस्किट खाया जिसे यहाँ और यूएस में भी कुकी कहते हैं । नाश्ते में एडम को पोहे खाने थे । हम खास यू एस से उसके लिये लेकर आये थे । तो सुहास नें पोहे बनाये, एमी ने ऑमलेट और चाय । मैने तथा बाकी लोगों ने तैयार होने और खाने का काम किया । साढे ग्यारह बजे हम लोग निकले प्रीटोरिया घूमने ।
सबसे पहले हम यूनियन बिल्डिंग देखने गये । ये यहाँ का राष्ट्रपती भवन है । यह भी उसी आर्किटेक्ट ने डिझाइन किया है जिसने हिंदुस्तान का राष्ट्रपती भवन किया है । क्यूं न हो दोनों के मालिक तो वही ते गोरे अंग्रेज़ साहब । इसके साथ ही एक सुंदर पार्क था और दोनों के बीच सडक के फुटपाथ पर ठेले टाइप दुकानें । मालाएं, इयर रिंग्ज और बहुत से शो पीस बिक रहे थे हमने भी की थोडी खरीदारी । रास्ते में हमने प्रीटोरिया यूनिवर्सिटी, इंडियन हाय कमिशन और दूसरे देशों के दूतावास देख सच मानो चाणक्यपुरी की याद आ गई ।
इसके बाद सौ साल पुराने एक कैफे में गये कैफे-रिचे नाम के । यह पूरे दक्षिण अफ्रीका का सबसे पुराना कैफे है । यहाँ कॉफी बोल में पेश की जाती है कप में नही । कॉफी बढिया थी । सैंडविचेज और मफिन्स भी खाये । यहाँ एडम ने हमें सावधान कर दिया था कि सडक पर कैमरा, पर्स आदि बाहर न निकालें, छिन सकता है । तो हमने कैफे में बैठ कर ही तस्वीरें खींची । (विडियो)

घर आये तो हमने खाना बनाया । एडम को भारतीय खाना खाना था और उसके एक दोस्त क्रिस जो भारतीय मूल के हैं पर यहीं पले बढे हैं अपनी दो बेटियों के साथ आने वाले थे । खाने से पहले एडम, सुहास और विजय को, थाइ मसाज करवाने ले गया । ऱात को क्रिस अपनी बेटियों के साथ आये उनके साथ खूब गप शप हुई । उन्होने ही हमें बताया कि कहा कहां जाना चाहिये । रात को जल्दी सोये सुबह जल्दी उठना था । कल हमें जाना था विक्टोरिया फॉल्स ।
(क्रमशः)

रविवार, 5 जून 2011

ग्रीष्म

जलता सूरज
गरम गरम धरती
रोटी की तरह दिन भर सिकती ।

घिसी चप्पल जलाती पांव
सूखे ठूँठ पर कौवों की काँव काँव।
पीपल के पत्ते भी स्तब्ध
हवा के डैने कैद बंद ।

सूखे होंठों को गीला करती जीभ
दूर तक पानी की नही कोई सींच ।
सूना पनघट, खाली गगरी
छांव से खाली आंगन, देहरी ।

पसीने की चिपचिपाहट
खीझ, झुंझलाहट, पॉवरकट ।
घूंघट के नीचे माथे पर पसीने
बच्चे नंगे अन-तराशे नगीने ।

पानी के लिये सब तरसे
कब आयें बादल और कब बरसे ।
गरमी है ये जेठ की गरमी
नही बरतेगी कोई नरमी ।

शनिवार, 14 मई 2011

जिंदगी



लहर में बहती
बिना पतवार
एक नांव

हिचकोले खाती
उछलती
ठांव ठांव

एक माझी
एक चप्पू
जोरों की हवा

हवा से लडती
और उखडती
एक नाव

जिंदगी क्या इसीका नाम है ?
कभी उलटती
फिर सम्हलती
एक नाव ।

जिंदगी-२

पानी में बहते
पत्ते सी
मेरी जिंदगी
कभी तेज
तो कभी धीमें चलती
जिंदगी ।

हवा के झोंके , पत्थर
पेडों के तने
इनके असर पर
डगमगाती जिंदगी ।

एक लहर साथी को
कर देती अलग
अफसोस में फिर
आह भरती जिंदगी

अपना नही चलता
जब कोई जोर है
तो घुटन में
कसमसाती जिंदगी

कोई दिशा
मिलेगी क्या
इसको कभी
या फिर यूं ही
कटेगी जिंदगी ?

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

सूरज से बडे




रात की महफिल में छलके जाम कितने
किसने गिने हैं किसने देखे ख्वाब कितने ।

किसने सुनाई नज्म यार-ए बेरुखी की
और मुहब्बत को नवाज़ा किसने किसने ।

अपनी बारी का किये हम इन्तजार,
पर शम्मा को आगे बढाया, हाय, किसने ।

कितनी आहें, कितने उफ, तौबायें कितनी
कह न पाये कुछ, हुए गुमनाम इतने ।

वो रकीब, वो बन गया महफिल का सूरज
वो ही रहा कहता गज़ल, वाह, वाह, कितने ।

हम उठे मेहफिल से जब मायूस हो कर
पूछा किया वह आसमाँ में चांद कितने ।

दूर हैं बस, टिम टिमा कर आह भरते
वरना सूरज से बडे, हैं सितारे कितने ।

रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्यार की कुछ क्षणिकाएँ

मन में मचती है खलबली सी
आ जाती हैं जब वो, अच्छे नसीब सी
जाते जाते हो जाती हैं कुछ और करीब सी

मेरे मन की तरह ही समंदर में उठती लहरें
मेरे मन जैसे ही इसके भाव कुछ छिछले, गहरे
पर ये उन्मुक्त, और मुझ पर कितने पहरे

कुछ दिन कैसे बन जाते हैं खास
मन में जगाते हैं कोमल कोमल अहसास
वो आयें या ना आयें लगे कि बस हैं आस ही पास

प्यार किसे कहेंगे, कैसे समझायेंगे
कोशिश करते हैं, शायद कामयाब हो जायेंगे
जैसे आ जाता है न बुखार, वैसे ही हो ही जाता है प्यार ।

कितनी उदासी छा जाती है ,
जैसे सूरज पे बदली मंडराती है
जब कई कई दिन फोन नही आता, न कोई मेल आती है ।

पॉवर कट के बाद बिजली की तरह, जब तुम आते हो
यूं लगता है कि गरमी में ए सी की ठंडक लहराती है
तबियत बाग बाग मन में हरियाली छा जाती है ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

दुनिया झुकती है


ये कौनसा सूरज निकला है
ये किरण कहां से फूटी है
जो सालों में नही हुई
हो रही वो बात अनूठी है ।

“झुकाने वाला चाहिये”
आज फिर सच होते देखा
सैलाब ये जनता का हमने
फिर आज उमडते देखा ।

आंदोलन किसको कहते हैं
जनता की ताकत क्या होती
ये आज पता लग जायेगा
मगरूर सी इस सरकार को भी ।

जड से है हिला दिया इसको
ये डर के मारे ही चुप है
चलते चुनाव में क्या होगा
यही तो इसकी धुक धुक है ।

इसकी ही क्यूं उन सारों की
है अब खडी हुई खटिया
राजनीति के नाम पे ही
जनता को जिनने सदा दुहा ।

अण्णा तुम बापू बन आये
और बन आये तुम जयप्रकाश
मिटाने भ्रष्टाचार का तम
और फैलाने सच का प्रकाश ।

अब देश का बदलेगा स्वभाव
इसका चरित्र भी बदलेगा
जब हम सब साथ खडे होंगे
और युवा देश उठ गरजेगा ।

सोमवार, 28 मार्च 2011

हासिल



आसमान के चांद तारे तोड लाने की बात करते थे तुम
फूल तक तो ला नही पाये कभी आज तक

ऐसा क्यूं होता है कि पत्नि बनते ही
प्रेमिका की अर्थी उठ जाती है
रोमांस और रोमांच खुदकुशी कर लेते हैं
या फिर जर्जर हुए, दम टूटने का इन्तजार

क्यूं मै हमेशा रही हासिल की तरह, तुम्हारे लिये
कभी उत्तर नही बन पाई हमारे गणित का

मेरे साथ चलते हुए भी इधर उधर भटकती तुम्हारी आँखें
फूल फूल पर मंडराने वाले भौरें की ही याद दिलाती रहीं
मै तो नन्दादीप बनी जलती रही तुम्हारे मंदिर में
पर तुमने कब आंख खोली मेरे लिये

छोडो अब, इस बहस की कोई जगह नही
मैनें सीख लिया है अपने लिये जीना ।

सोमवार, 21 मार्च 2011

चलते ही जाना ४-हेदवी, वेळणेश्वर, हरिहरेश्वर


हेदवी, ये जोगळेकर लोगों का यानि हम लोगों का गांव है यहां ज्यादा तर लोगों का आखरी नाम जोगळेकर है । यहां पर दशभुजा गणपती का एक सुंदर मंदिर भी है । हमारी बस खूब ऊँचे नीचे रास्तों से जा रही थी शायद विजय ने कोई शॉर्ट कट ढूँढा था । वनस्पती की यहां भी भरमार थी । सच में कोकण प्रदेश की यह हरियाली बहुत सुख और आनंद दे रही थी । तो कोई दो घंटे बाद हम हेदवी के मंदिर पहुँचे । सीढियां चढ कर ऊपर गये मंदिर में प्रवेश कर गणपति की सुंदर मूर्ती के दर्शन किये । यह दशभुज लक्ष्मी-गणेश कहलाते हैं । गणपति के दसों भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं । बाहर काफी बडा प्रांगण है, दीप स्तंभ भी हैं । प्रदक्षिणा की और बाहर थोडी देर बैठे । (विडियो देखें)

भूख लगी थी तो पता किया नाश्ता कहां मिलेगा । वहां दो किशोर वय के ल़डके बैठे थे उनसे पूछा तो वे बोले आप को हरि-हरेश्वर जाना है ना तो आप वेळणेश्वर होते हुए जाइये और वहां दर्शन कर के नाश्ता कीजिये, नंबर वन पोहे मिलेंगे । उनकी बातों में इतना रस था कि हम फौरन ही चल पडे वेळणेश्वर के लिये । हेदवी में नाश्ता नही किया पर खोये के मोदक और आमरस का गोला खरीदा । नीचे उतर कर बस में बैठे और चल पडे वेळणेश्वर के लिये । (विडियो देखें)

लगभग एक घंटे में हम वेळणेश्वर पहुंच गये यह स्थान गुहागर से कोई २६ कि.मी. है पर हम तो हेदवी से आये थे । वेळणेश्वर एक बहुत पुरातन महादेवजी का मंदिर है । मंदिर बहुत बडा और सुंदर है । यहां हर वर्ष शिवरात्री पर बडा उत्सव होता है । वैसे भी भक्तों की भीड तो हमेशा ही होती है । हम मंदिर में गये तो पूजा हो रही थी सुंदर सुंदर भजन गाये जा रहे थे । एक भक्तिमय वातावरण की सृष्टी हो रही थी । वेळणेश्वर का समुद्र किनारा भी बहुत सुंदर है । दर्शन तो हो गये अब हमें तो पहले पेट पूजा करनी थी साड़ेग्यारह बज चुके थे और नाश्ते का भी अता पता नही था । तो हम मंदिर के पास ही एक रेस्तरॉं में गये वहां तो खाना भी तैयार था सबने खाना खाया, पर मुझे और विजुताई को एक नंबर के पोहे खाने थे तो हमने तो वही ऑर्डर किये । पोहे वाकई बहुत अच्छे थे । सोलकढी पी और श्रीखंड भी खाया । फिर गये बीच पर । नारियल और सुपारी के पेडों से सुशोभित ये किनारा शांति से आराम करने के लिये एकदम उपयुक्त है । तो वहीं थोडी देर बैठे । आज ही हमें हरिहरेश्वर पहुंचना था । हरिहरेश्वर में हमारा पडाव था दो दिन । हमारा एम टी डी सी में बुकिंग था । हरिहरेश्वर को जाते हुए बहुत ही सुंदर एक घाटी लगी एकदम बादलों से भरी हुई । प्याली में सफेद रंग के ‘बुढ्ढी के बाल’ भरे हों जैसे । वहां हमने बहुत से फोटो भी खींचे ।
हरिहरेश्वर पहुंचते पहुंचते शाम हो गई थी । हम गये एम टी डी सी । हमारी कॉटेजेज बहुत ही सुंदर थीं, साफ सुथरी । तो सामान रख कर हम परिसर देख आये । हम यहां दो रात रहने वाले थे और २८ को चल कर दिवे-आगर होते हुए ठाणे वापिस जाना था । हमने प्लान बनाया कि हम कल सुबह उठ कर हरिहरेश्वर मंदिर जाकर दर्शन करेंगे फिर समुद्र किनारे जायेंगे । प्लान के अनुसार ही हम लोग तैयार होकर निकल पडे । हम जब एक दूसरे के लिये वेट कर रहे थे तो एक छोटू अपने पापा के साथ ऊपर से देख रहा था, पापा की गोदी में से ही खूब बातें चल रही थीं । नीचे भी आना था । उसे बाय कर के बस में बैठे ।
हम सब पहले मंदिर गये यहां दो मंदिर हैं एक हरिहरेश्वर जी का और एक काल-भैरव का । कालभैरव मंदिर में दर्शन कर के ही हरिहरेश्वर के मंदिर में जाना होता है । यह मंदिर काफी प्राचीन है शायद शिवाजी के काल का इसका जीर्णोध्दार प्रथम बाजीराव पेशवा ने किया । समंदर के साथ जो पहाड है उसका नाम है हरिहर एक और नाम भी है पुष्पाद्री । इसे दक्षिण की काशी कहा जाता है । इस मंदिर में ब्रम्हा विष्णु महेश के साथ साथ देवी पार्वती की भी प्रतिमा है । काल भैरव के अलावा यहां योगेश्वरी मंदिर भी है । मंदिर के प्रांगण से ही समुद्र दर्शन किये जा सकते हैं । मंदिर के रास्ते में ही एक अच्छा सा रेस्तरॉं देख कर हमने हेवी नाश्ता कर लिया । फिर हम गये बीच पर, मंदिर से दूर था यह बीच इसीलिये शायद हमारे अतिरिक्त यहां कोई भी नही था । हम लोग थोडी देर तक तो बीच पर घूमते रहे फिर सुहास ने सबको पानी मे भिगो दिया और अंततः हम सब महिलाओ ने तो स्नान ही कर लिया । बहुत मज़ा आया । हमारे प्रकाश भाउजी को बडी शरम आ रही थी शायद, वे वहां से काफी दूर टहलने लगे । सुरेश ने तो हमारे मौजमस्ती की शूटिंग कर ली । समंदर से बाहर निकले तो दूर एक बगुलों का झुंड था उनकी तस्वीरें खींचने के लालच से मै दूर तक चली गई उससे दो फायदे हुए तस्वीरें तो खींची ही साथ ही साथ कपडे भी सूख गये । समंदर के आसपास केवडे के जंगल थे । वहां से बाहर आये तो सीधे अपने ठिकाने पर । कपडों में बदन पर रेत ही रेत चिपकी थी तो नहाना तो जरूरी था । कोई आधा किलो रेत निकली होगी ।(विडियो देखें)bath

फिर थोडी देर आराम करने के बाद सब को चाय की तलब लग गई, तो हम गये एम टी डी सी रेस्तराँ । वहां के मेनेजर से खूब बातें की । वे बताते रहे कि कैसे उन्होने ये रेस्तराँ के आस पास के बगीचे को लगाया और उसका रखरखाव अब भी कर रहे हैं । बहुत अच्छा लग रहा था वहां बैठ कर । तभी वहां पर एक मुर्गी अपने खूब सारे चूजों सहित आ गई तो सबका ध्यान उधर ही चला गया, काफी देर तक हम उन्हीं की एक्टिविटी देखते रहे । मुर्गी आगे आगे चूजे पीछे पीछे ।(विडियो देखें)

फिर डिनर किया और थोडी देर टीवी देखा गप्पें लगाई और सो गये । हमें कल निकलना था दिवे-आगर के लिये । वहां पर सोने के गणपति जी का मंदिर है वही सबको देखना था । वहीं बापट जी के खानावळ में यहां खाना खाने का तय किया । सुबह हमें सात बजे तैयार रहना था तो रात को ही सामान बांध के तैयार थे हम ।
यहां से दिवे-आगर कोई ४ घंटे का रास्ता था । दिवे आगर जाते हुए हमने अंताक्षरी खेली । पहले गणपति मंदिर पहुँचे । इन गणपति जी की भी एक कथा है। ये गणपति का १.२५ फीट लंबा सोने का मुखौटा श्रीमति द्रौपदी धर्मा पाटील को उनकी वाडी (बगीचे) में काम करवाते हुए मिला । गणपतिजी एक तांबे के एक बडे से बक्से में पाये गये इसके साथ ही मिला गणपति जी के आभूषणों का डिब्बा । महिला ने इसे स्वयं रखने की जगह समाज को दान करने का ही निश्चय किया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग दर्शन का लाभ उठा सकें । वही यह मंदिर है । मंदिर में पूजा हो रही थी वह देखी दर्शन किये थोडी देर बैठे और चल पडे । बापट जी का भोजनालय ढूँढना था ।
रास्ते में बहुत सुंदर एक वाडी थी वहां जमीन पर सुपारीयां गिरी हुई थी सुंदर नारंगी रंग की कच्ची सुपारी । एक लडकी को मांगा तो उसने दो फल दे दिये । बापट जी का भोजनालय तो मिला नही पर एक अन्य मिल गया वहां पर पोहे खाये क्यूं कि खाना डेढ़ बजे से पहले नही । और खायी आंबोळी । आंबोली चावल के आटे को फरमेन्ट करके बनाये चीले होते हैं जो काफी स्वादिष्ट थे । (विडियो देखें)

यहां का बगीचा बहुत सुन्दर था तरह तरह के फूलों वाले पौधे थे । हमारा पेट भर गया तो गये समुद्र देखने । रास्ते में फिर केवडे के वन मिले एक दो भुट्टे (फूल) पीले हो गये थे और भीनी भीनी खुशबु फैल रही थी । । समुद्र देख कर फिर वापिस अपने बस पर । बस को अब वापसी का रास्ता पकडना था मै और सुरेश पनवेल में मेरे भांजे के यहां रुकने वाले थे बाकी लोगों को ठाणे जाना था । पनवेल में रवि और बहू ने बडी खातिरदारी की, नई बंबई के मॉल में भी घुमाया । हम दो दिन बाद ठाणे पहुँच तो लतिका अपने घर चली गई थी विजूताई भी एक दिन बाद चली गईं । हम चारों सुहास विजय मै और सुरेश ३१ को इंदौर होते हुए दिल्ली पहुँचे । इंदौर में विजय के भतीजे अनिल और शैला से मिले । महाकालेश्वर के दर्शन करने उज्जैन गये । ट्रिप में खूब मज़ा आया जो सब के साथ होने से दुगना हो गया । सबसे बिछुडते हुए बुरा तो लगा, पर साथ कुछ ही दिनों का हो तो उसकी मिठास कुछ और ही होती है ।

रविवार, 13 मार्च 2011

चलते ही जाना- ३ - गणपतीपुळे


सुबह ५ बजे उठकर चाय पीकर नहा धो कर तैयार हुए । सात बजे ठीक निकलना जो था हमारे टीम लीडर प्रकाश समय के एकदम पाबंद सात मतलब पौने सात बजे वे दोनो तैयार होकर बाहर खडे मिलते विजय गाडी के साथ सामान लोड करने को तैयार, तो जो भी आता उसे यही लगता कि देर हो गई शायद । तो निकल पडे चाय भरवा ली थी २५ कपी थर्मास में । ब्रेकफास्ट रास्ते में करना था पोहे या वडा पाव । हम सेटल हुए और बस चल पडी तो मैने कहा चलो अंताक्षरी खेलते हैं पर सब ने मेरी बात काटने की ठान रखी थी ।
तो जवाब आया, नही।
मैने कहा हाँ ।
हाँ क्या हाँ, अभी नही खेलना ।
नही तो मत खेलो मेरी बला से ।
समझा करो अभी तो नाश्ता भी नही किया, कणकवली में नाश्ता करेंगे फिर खेलेंगे ।
गणपति बाप्पा देखना इनको ।
हमारे संवाद सुन कर लगा कि ये तो गद्य़ अंताक्षरी हो गई और हम खूब हंसें ।
फिर कणकवली में वडा पाव का नाश्ता किया और लतिका ने जोक सुनाया कि वट पौर्णिमा के दिन औरतें व्रत रखती हैं और दिन भार वडा पाव, वडा पाव करती रहती हैं । (वडा पाव माने “हे वट वृक्ष मुझे प्रसन्न हो ।“ ) तो हम हंसते हंसाते चलते जा रहे थे ।
पहले हमें जाना था गणपतिपुळे, यहां के गणपतिजी समुद्र के किनारे विराजे हैं । हमारा रास्ता रत्नागिरि होकर ही जाता था । रत्नागिरि ४ घंटे और फिर करीब एक घंटा गणपतिपुळे । हमारे एक रिश्तेदार मालगुंड में रहते थे उनसे हमने अच्छी खानावळ के बारे में पूछा था उन्होने बताया । उन्हें हमारी पसंद बता दी थी । उन्होने कहा कि आप एमटी डी सी कॉटेजेज में रुके हो तो वहां से पास ही भाऊ जोशी का रेस्टॉरेन्ट है वहां आपको अच्छा खाना मिलेगा । जो चाहिये उन्हें पहले ही बता दें तो वे तैयार रखेंगे तो हमने जोशी जी से सम्पर्क कर के उन्हे हमारा प्लान तथा पसंद बता दी थी । (विडियो देखें )

कोकण के सुंदर रास्ते पार करते हुए हम करीब दो बजे पहुंचे एम टी डी सी । वहां ऑफिस में बात कर के हमारे कॉटेजेज की चाबियाँ ले लीं, सामान रखा और चल पडे खाना खाने । भूख जो लगी थी बहुत । रेस्टराँ अच्छा था और वरायटी भी बहुत थी मराठी, पंजाबी गुजराती सब तरह का खाना था । मोदक भी थे और सोल कढी भी । खा पी कर बाहर आये तो वहीं रेस्तरॉं के बाहर मेंगो-शेक पाउडर मिल रहा था वह खरीदा । बाहर छोटा मोटा हाट था वहां घूमें चीजें देखीं फिर अपने ठिय्ये पर आराम करने चले गये । शाम को मंदिर गये । यह थोडे ही दूर थी पर रास्ता ऊबड खाबड था तो हम बस से ही गये ।
हरे भरे नारियल और ताड के पेडों के झुरमुट में यह करीब हजार साल पुराना मंदिर स्वयंभू है । स्वयंभू का अर्थ है कि यह मूर्ती गढी नही गये वरन ऐसी ही पाई गई है जिसे भक्तों नें स्थापित कर यहां मंदिर बनाया । (विडियो देखें )

यहां प्रति वर्ष लाखों की संख्या में यात्री यहां आते हैं और दर्शन कर अपने आप को धन्य मानते हैं । पुळे मतलब रेत के टीले (सैंड ड्यून्स ) रेतीले किनारे का गणपती इसी से गणपती पुळे । इन ड्यून्स के साथ खेलता समुद्र का नीला पानी, लहराती हवा और इसके साथ बलखाते नारियल और ताड के वृक्ष एक बहुत ही सुंदर दृष्य की सृष्टी करते हैं । यहां के समुद्र में तैरना मना है । यह काफी खतरनाक माना जाता है । मंदिर के अंदर गणपति के दर्शन कर के मन प्रसन्न हो गया ।
ओम नमस्ते गणपतये,
त्वमेव प्रत्यक्षम् तत्वमसी,
त्वमेव केवलं कर्ता सी
त्वमेव केवलं धर्ता सी
त्वमेव केवलें हर्ता सी
त्वमेव सर्वम् खल्विदम् ब्रम्हा सी
मन में गूंज उठा ।
मंदिर में घूम कर प्रदक्षिणा नही कर सकते प्रांगण के बाहर से करनी पडती है जिसमें एक से डेढ घंटा लग जाता है । हमने तो वह नही किया । थोडी देर समंदर को देखते रहे पर वहां भीड बहुत थी । फिर हम थोडा घूम घाम कर वापिस आये। हमें तो बापट जी के यहां, जो मेरे छोटे भाई मिलिंद के साडू साहब हैं, खाना खाने जाना था वे हमें एम टी डी सी के गेट पर लेने आ गये थे । बाकी लोग वापिस कमरों में गये ।
बापट जी मालगुंड में रहते हैं मिलिंद भी यहीं शिफ्ट हो रहा है एप्रिल में । यहां मराठी के प्रसिध्द कवि केशव सुत का स्मारक है । मिलिंद ने कहा था कि हम बापट जी के साथ जा कर उसका बना हुआ घर देख कर आयें, तो बापट जी ने पहले हमें मिलिंद का घर दिखाया फिर अपना दिखाने से पहले हमें समंदर पर ले गये एकदम अनछुआ किनारा । केकडों की ऐसी अद्भुत चित्रकारी देखी कैमरा हाथ में ना होना बहुत खला । वहां उस क्वांरे समुद्रतट को देख कर मन बहुत ही प्रसन्न हो गया फिर घर गये । बापट जी ने तो अच्छा खासा बगीचा बना लिया है उसमें नारियल, काजू, और कोकम के पेड दिखाये । एक बिल्ली घूम रही थी पता चला एक नही दो हैं । कोकण में सांप बहुत निकलते हैं और जहरीले भी होते हैं इसलिये बिल्लियां । बिल्ली सांपों को खाती है यह हमें यहीं पता चला । बापट जी ने बढिया खाना खिलाया । हमने उनसे कहा कि हमें कल सुबह ही निकलना है तो वे हमें रात में ही हमारे ठिकाने पर छोड दें । जाते हुए अलका ने मुझे दो बडी बडी कौडियां दीं जो उसने खुद समंदर के किनारे से पाईं थीं । रात को घर (आज के लिये घरj ) आये बापटजी के साथ , प्रकाश के कमरे में टी वी चल रहा था थोडी देर वहां बैठ कर फिर अपने कमरे में, और आनंद मंगल ।
कल ही हम यहां से निकलने वाले थे हेदवी होते हुए हरि-हरेश्वर के लिये । (क्रमशः)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

चलते ही जाना – २- तारकर्ली


चलते ही जाना – २- तारकर्ली
सुबह उठ कर तैयार हुए । बैठ गये अपनी अपनी सीटों पर टेम्पो ट्रैव्हलर में । रत्नागिरि से तारकर्ली का रस्ता कोई चार घंटे का है ।अभी तक हमने जो भी प्रवास किया वह मुंबई गोवा हाय-वे पर ही था और आगे भी कुडाळ तक वही रास्ता है । कोकण के रास्ते यानि पहाड, हरियाली, आम, काजू, नारियल, और सुपारी के पेड । तो रास्ते के सुंदरता का आनंद उठाते हुए चल रहे थे । बीच बीच में खाना पीना तो चल ही रहा था । सुंदर सुंदर नदियां कल कल करती बह रहीं थीं । तारकर्ली मालवण से कोई ६ किलोमीटर दक्षिण में है । य़ह एक छोटा सा मछुआरों का गांव है पर यहां के बीचेज बहुत सुंदर है । हमारा बुकिंग महाराष्ट्र टूरिजम् डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के कॉटेजेज में था । हमने तय किया कि हम सीधे तारकर्ली जायेंगे सामान कमरों में रख कर फिर खाने पीने और घूमने की सोचेंगे । तो विजय (ड्राइवर) जी को वही बताया और पहुँचे तारकर्ली । एम टी डी सी के कॉटेजेज की तरफ चल पडे, वहां जाने का रास्ता बहुत ही सुंदर था दोनो तरफ नारियल और सुपारी के बगीचे । दोनों पेडों की तुलना करें तो नारियल का तना मोटा होता है और सुपारी का पतला यानि एक स्थूला तो दूसरी तन्वंगी । नारियल और सुपारी दोनों में फल लगे थे । सुपारी तैयार थी नारंगी रंग के खोल वाली ये ताजी सुपारी देखने में बहुत ही सुंदर लगती हैं । काजू के पेडों में अभी सिर्फ बौर था । वे फलीभूत नही हुए थे । तो ऐसे खूबसूरत रास्ते से होकर पहुँचे अपनी मंजिल तक । वहां एम टी डी सी के ऑफिस में जाकर अपने बुकिंग का प्रमाण दिया और चाभी लेकर चल पडे कमरों की और । कमरे अच्छे थे साफ सुथरे बिस्तर लगे हुए । पानी रखा हुआ हालांकि हम तो बिसलेरी की ५ लिटर वाली ५ बॉटल्स ( बरनी कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ) लेकर आये थे । हमारे साथ अमरीकन मेहमान जो थे । यहां एक मजेदार बात देखी पलंग परमानेन्ट बने हुए थे सीमेंट ईंटों के । मेन्टेनन्स नही और सालों साल चलें भी । हम सब ने सामान रखा । हमारा एक कमरा डॉर्म था जहां पांच लोग सो सकते हैं वह सुहास और विजय ने लिया । हैमॉक देख कर सुहास तो बहुत खुश हुई और उसीपर बैठ गई । (विडियो देखें ) 286_344_Two

सब कुछ सैटल कर के हम ने खाने की तलाश करना उचित समझा । हमें बताया गया कि मालवण में अच्छा खाना मिल सकता हे तो हम मालवण चल दिये । वहां घूमते घूमते हमें कामत का रेस्तरॉं दिखाई दिया प्रकाश ने कहा कि यहां खाना अच्छा मिलेगा, तो वहीं घुस गये पर पता चला कि डेढ बजे से पहले खाना सर्व नही होगा । वहां आस पास काजू की दुकाने दिखीं तो मै और लतिका वहां चले गये और काजू खरीदे । सुहास ,प्रकाश और जयश्री नें कुछ स्कूल की लडकियों से बातें कीं, उनके विषयों के बारे में ओर टीचर्स के बारे में । सुहास स्वयं भी अमेरिका में केमिस्ट्री पढाती थीं हाल ही में रिटायर हुई हैं उसने पहले अजमेर में भी पढाया था तो उसकी शिक्षा पध्दती में बहुत ज्यादा रुचि है ।
तब तक डेढ बज गया था और खाना भी तैयार था तो कामत जी के यहां खाना खाया । यहां मोदक तो नही मिले पर श्रीखंड मिल गया । बाकी दाल, चावल, रोटी, सब्जी, उसळ, सैलेड, दही सब था । खाना हमे जरा मालवणी यानि मसालेदार लगा । लोगों से बात करके हमें पता लगा कि यहां एक बहुत सुंदर गणेश मंदिर है । पास ही में एक अच्छी मराठी शाकाहारी खानावळ भी है तो सोचा कल यहीं आयेंगे । मंदिर बहुत ही सुंदर था । आप भी देखेंगे।
तारकर्ली में हम तीन दिन रुकने वाले थे । पिछली बार जब हम आये थे तो तूफान की वजह से सिंधु दुर्ग नही देख पाये थे । तो वह तो पक्का देखना ही था । कल सुबह सुबह के लिये यही कार्यक्रम बना । इतना सब कर के काफी थक गये थे तो सोचा अब आराम किया जाय शाम को बीच पर जायेंगे । जो लेटे तो सीधे पौने छै बजे आंख खुली सब लोग चाय पी कर बीच पर चले गये थे हम दोनों ने भी जल्दी जल्दी चाय पी और चल पडे बीच की और । पांच मिनिट चल कर ही बीच था हमारे कॉटेज में से दिखता भी था । वहां जाकर अपनी पार्टी के अन्य लोगों से मिले और बीच पर चलते चले गये । सूर्यास्त हो ही रहा था । समंदर मे डूबता सूरज कितनी भी बार देख लो उसका आकर्षण कम नही होता हर बार आSह ऊSह करने का मन करता है । और रंगों का छलावा वह भी कम अदभुत नही होता । मायाविनि प्रकृति कितने कितने अनुपम रूप दिखा कर हमें छलती रहती है । थोडा बीच-वॉक करके फिर हम सब के साथ आकर बैठ गये । कुछ बच्चे घर बना रहे थे । एक जीप के पीछे पैराशूट लगा कर लोग हवा में उडने का मजा लूट रहे थे । अंधेरा होते तक बैठे रह और फिर वापिस कॉटेज पर । लतिका ने भेळ बनाई और हम सब उस पर टूट पडे । इतनी भेळ, लड्डू आदि खा लिया कि फिर खाना खाने की इच्छा नही रही । काफी देर तक गप शप लगाई और फिर कमरों में जाकर निद्रादेवी के अधीन हो गये ।
दूसरे दिन सुबह उठ कर झट पट तैयार हुए नाश्ता मालवण मे ही करने की सोची । तो चल पडे मालवण वहीं से आगे बोट लेकर सिंधुदुर्ग जाना था । (विडियो देखें ) clip286_344_three

सिंधु दुर्ग का इतिहास बडा ही रोचक है यह पहला कदम था, भारत में नेवी यानि आरमार स्थापित करने का । ऐसे ही आरमार की सहायता से कोकण किनारे पर आधिपत्य जताने वाली परकीय सत्ताओ (डच, पोर्तूगीज़,ब्रिटिश ) तथा जंजीरा के सिद्दी जौहर (हब्शी) को जवाब देने के लिये छत्रपति शिवाजी महाराज़ ने यह किला बनाने का निश्चित किया । इसके इजिनियर थे हिरोजी इंदुलकर । इस के निर्माण को तीन साल लग गये । इस दौरान परकीय सत्तां के आक्रमण का जवाब देने के लिये इस किनारे पर ५००० सैनिकों की सेना रखी गई । १६६५ तक इस आरमार में ८५ छोटे जहाज, ३ बडे जहाज थे जो बढकर १६६६ तक १६० हो गये । (विडियो देखें )286_344_Four

महाराज के मृत्यु के पश्चात फिर से मुगल और पुर्तगालियों ने अपना धर्मपरिवर्तन कराने का खेल शुरु किया । इसके बाद के इतिहास में इस दुर्ग की और इस किनारे की रक्षा करने वालों में कान्होजी आंग्रे और उनके वंशजों का कार्य उल्लेखनीय है । आंग्रे की दुर्ग भक्ती और स्वामी भक्ती( भोसले परिवार से ) से पेशवा इतने डर गये कि उन्होने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और इस पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया ।
तो नाश्ते के बाद हम लोग धक्के पर आये जहाँ से हमे बोट लेनी थी । ये थी तो मोटरबोट पर बहुत छोटी थी । इस समुद्र में पानी के अंदर खूब सारे खडक (पत्थर) हैं इन से बचा बचा कर नाव दुर्ग तक ले जाना यहां के नाविक ही कर सकते हैं । इसी कारण शिवाजी महाराज नें दुर्ग बनाने के लिये यह जगह चुनी होगी । इन्हीं पत्थरों से इस दुर्ग का निर्माण हुआ है ।
यहां का मौसम जून से सेप्टेंबर तक बडा ही तूफानी होता है उस समय दुर्ग पर जाना संभव नही है । हम तो पिछली बार अक्तूबर में भी नही जा पाये थे । पर इस बार किस्मत हमारे साथ थी हम गये दुर्ग में घूमे भी । अंदर का सब अच्छी तरह देखा । (विडियो देखें ) 311_334One

अंदर प्रवेश करते ही थोडा गोल घूम कर फिर प्रवेश द्वार है किले के चारों और दीवार और बुर्ज हैं ताकि एकदम से प्रवेश द्वार का पता नही चलता । यहीं हनुमान जी का मंदिर है । अंदर सीधा चल कर है शिवराजेश्वर मंदिर । इसे छत्रपति राजाराम महाराज ने बनवाया था । यहां शिवाजी महाराज की नाविक के वेश में मूर्ती है । दुर्ग पर अभी भी लोग रहते हैं उनके लिये बच्चों के स्कूल है । भगवती मंदिर के पास दो मीठे पानी के कुएं भी हैं इसी तरह के कुएं हमने जंजीरा किले पर भी देखे थे । इसी तरह साखरबाव नामक कुआँ शिवजी के मंदिर के पास है (बाव=बावडी) । एक ऊँचा बुर्ज है जिसे टेहळणी बुरुज़ कहते हैं टेहळणी माने पहारा । अन्न के गोदाम, शस्त्रगार, सैनिकों के घर, कचहरी, किल्लेदार की कोठी सब अब देखरेख के अभाव में टूट फूट गया है । किले की दीवार भी टूट रही है खूब झाड झंखाड भी उग आये हैं । इस की इस तरह की उपेक्षा खलती हैं । इस किले की वजह से ही भारत का पारतंत्र्य कुछ साल के लिये ही सही आगे खिसक गया । थोडा गर्व और थोडे दुख के साथ हमने वापसी की बोट ली । किनारे पर आये तो बहुत सी चीजें बिक्री के लिये थी शंख सीपियों की मालायें, मसाले । आम पापड कटहल पापड, कुलथी का आटा सेम के बीज आदि । हम ने भी की खरीदारी । और फिर गणपती मंदिर गये सोने की या पीतल की बहुत ही सुंदर चमकदार मूर्ती से शोभित ये मंदिर मन मे सहज ही भक्तिभाव जगाता है । इसके पीछे ही थी कलसेकर जी की खाणावळ जहां हमने खाना खाया । आधा पौना घंटा इंतजार करना पडा क्यूं कि खाना ऑर्डर से ही बनता है पर मोदक मिले और खाना भी बढिया था । (विडियो देखें )311_334two

खाना खा कर फिर वापिस ठिय्ये पर । शाम को अपना कार्यक्रम बीच पर जाकर आनंद मनाने का था ।
कल हमें धामापुर तलाव देखने जाना था ।
सुबह उठ कर नहा धो कर तैयार हुए । मंदिर जाना था तो नाश्ता नही किया धामापुर लेक के पास ही बहुत प्राचीन भगवती मंदिर भी है । विशाल मंडप वाला ये मंदिर बहुत ही सुंदर है और मूर्ती को देखते ही मन में भक्तिभाव उपजता है । स्वच्छ और सुंदर ये मंदिर हमें बहुत ही अच्छा लगा । मंदिर के सामने ही है धामापुर तालाब । हरे भरे पहाडों से घिरा यह लेक अपने आप में एक सौंदर्य है इसके साफ स्वच्छ पानी मे से अंदर का तल और खडक साफ दिखते हैं । इस स्थान को सुंदर बनाने में वन विभाग का भी बडा हाथ है जिन्होने तालाब के किनारे सुंदर सुंदर पेड लगाये हैं करीब १० एकड क्षेत्र में फैला हुआ तालाब बहुतसे जलक्रीडाओं के उपयुक्त है जिनमें बोटिंग और स्नॉर्कलिंग हैं । (विडियो देखें )345_444one

मैने और सुरेश ने पैडल बोट से तालाब की सैर की । बहुत मज़ा आया । सुहास पता नही क्यूं नही गई । मुझे तो तैरना भी नही आता पर पानी का जबरदस्त आकर्षण है । वहां काफी समय बिताया मंदिर के प्रांगण में फोटो भी खींचे । अब भूक लग आई थी तो गये कलसेकर जी की खाणावळ में और पेट पूजा की। वे हमारे लिये मोदक की व्यवस्था जरूर करते थे तो इस कोकण प्रवास में हमने साल भर के मोदक खा लिये । दिन भर घूम कर पेटपूजा करो तो नींद आना स्वाभाविक है और सीनियर सिटिझन्स को तो ये कन्सेशन तो मिलना ही चाहिये क्या कहते हैं ?
शाम को तारकर्ली के सुंदर बीच पर भी तो समय बिताना था, चाय पीनी थी और पांच बजे जगने वाले भोर पंछियों के लिये चाय लेकर भी आनी थी । आज का ये अंतिम दिन था तारकर्ली का कल हमें जाना था गणपतीपुळे ।
( क्रमशः )

बुधवार, 2 मार्च 2011

चलते ही जाना



सुहास और विजय ने कुछ दिन दिल्ली में बिताये, बाजारों में घूमे फिरे । फिर हम सब निकल पडे राजधानी एक्सप्रेस से ठाणे के लिये, पता है पता है राजधानी ठाणे नही जाती, तो हम मुंबई सेंट्रल से वहां गये भाई । कोई ५-६ साल पहले हम लोग कोकण घूमने गये थे वहां की हमारी कुछ तस्वीरें सुहास ने देखी थीं और खास तौर पर हैमॉक पर बैठे हुए हमारी तस्वीरें तो सुहास ने तो कोकण घूमने का पूरा मन तब से बना लिया था । उसी के मुताबिक हमारा ये प्लान बना और धीरे धीरे इस प्लान में ११ लोग शामिल हो गये जो कि अंततः सिर्फ ८ रह गये । सुहास, विजय, सुरेश, मै, प्रकाश, जयश्री विजूताई ( सुरेश प्रकाश की चचेरी बहन) और लतिका (हमारी चचेरी देवरानी) ।
हम २१ तारीख को सुबह ठीक ७ बजे निकले । उसके भी पहले हम ५-६ दिन पुणे हो आये । सुहास को तुळशी बाग जो जाना था ।
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पुणे का तुळशी बाग यानि दिल्ली का अजमल खाँ मार्केट । सुरेश और सुहास के मौसियों से भी हम मिले जो उमर में हम से काफी बडी हैं । पुणेमें वासंती और अर्चना वहिनी से मिले । अर्चना वहिनी ने अण्णा-रचित अंबा भजन सुनाया । पुणे से बहुत सा खाने पीने का सामान खरीदा । चिवडा चकली शंकरपाळे । लतिका ने डोंबिवली से भेळ का सामान, गुड की रोटियां और मेथी के लड्डू लाये थे (सर्दियों में मेथी के लड्डू यानि टॉनिक ) । मतलब की पेट पूजा की पूरी तैयारी थी । आज के लंच के लिये पराठे और बटाटा भाजी भी साथ थी । तो सुबह साढेचार बजे से हम तैयारी में जुटे और तय समय यानि ठीक सात बजे चल पडे । हमारी मिनि बस थी १७ सीटर टेम्पो-ट्रैवलर । ड्राइवर थे श्री विजय । हम सब के सब खूब उत्साहित थे । सुबह के सूरज की कोमल कोमल धूप एक सुखद गर्माहट दे रही थी । ठाणे शहर छूटा और कोकण देश का हमारा प्रवास सुरू हुआ । कोकण के चार मुख्य जिले हैं ठाणे, रायगड, रत्नागिरि और सिंधुदुर्ग । कोकण जमीन की एक संकरी पट्टी है जिसके पूर्व में है सह्याद्री पर्वत की शृंखला और पश्चिम में अरबी समुद्र । इसके सागर किनारे, हरियाली, पहाड, मंदिर और किले इसको एक अनोखा सौंदर्य प्रदान करते हैं ।
ठाणे शहर छूटा तो शुरु शुरू में तो पहाड भूरे ज्यादा हरे कम दिखाई दिये । पर दोनों तरफ पेड जरूर थे । पर थोडी ही देर में कोकण अपने पूरे सौंदर्य के साथ अवतरित हुआ । इसके पहले हम कोकण गये थे अक्टूबर में, तब क्या नजारा था हरे भरे, बादलों से ढके, पहाड, कल कल बहते झरने और नदियां और खेतों की हरियाली, मानो स्वर्ग में पहुँच गये हों । इस बार दृष्य कुछ अलग था दोनो तरफ आम के पेड आमों मे बौर लगा हुआ था और उसका एक मादक सुगंध सारे आसमंत में फैल रहा था । आम के साथ साथ ही काजू के पेड भी बौरा रहे थे । गांवों में घुसते ही नारियल सुपारी, केले के बगीचे जिन्हें यहां वाडी कहते हैं दिखते । (विडियो देखें)

गांव याने आदमी, आदमी यानि कचरा, प्लास्टिक की उडती थैलियां, गीला, सूखा, कचरा,नालियां और सडकों पर इकट्ठा पानी। किंन्तु जैसे ही गांव छूटते प्रकृति अपना सौंदर्य बिखेरने लगती । जैसे जैसे दक्षिण की तरफ हम बढ रहे थे आमों के जंगल के जंगल दिख रहे थे । नदियां स्वच्छ सुंदर । पहाड भी अब ज्यादा हरे भरे हो चले थे । आंखें जैसे सारी परिवेश अपने अंदर भर लेना चाह रही थीं । बच्चे स्कूल जा रहे थे । औरतें अपने कामों में लगी थीं । कोई सर पे गठ्ठर उठा के जा रहा था तो कोई सब्जियां ले जा रहा था । हम कोकण के छोटे छोटे गांवों से होकर जा रहे थे । मजेदार से नाम- नागोठणे, वाटुळ, वाकड, परशुराम वगैरा । हमारा पहला पडाव रत्नागिरि था यह चिपळुण के पास है । रास्ते में हमने थोडा नाश्ता किया जो हम साथ ले आये थे । प्रकाश के पास एक २५ कप वाला थर्मास था अलखोबार से लाया हुआ उसमें चाय भी थी । कमाल की बात ये कि ये चाय २४ गंटे गरमा गरम रहती । हमारा लंच भी हमारे पास ही था बस हमें जगह खोजनी थी । हमने हमारे ड्राइवर विजय को ये बता दिया था और विजय ने एक बहुत ही बढिया जगह खोज निकाली, ये एक वडा पाव केंद्र था जो दोपहर को खाली पडा था यहां शायद सुबह शाम ही दुकान लगती होगी खैर हमें तो लंच के लिये इससे बेहतर जगह मिल नही सकती थी । बेंन्चे, टेबल सब तैयार, हमने सारा सामान पानी आदि निकाला- पेपर व प्लास्टिक की प्लेटस्, पराठे, आलू की सब्जी, गुड की रोटी सब निकाला और टूट पडे, हरहर महादेव ।

ठाणे से रत्नागिरि का प्रवास कोई ६ घंटे का है । चिपळूण आते ही सब खुश हो गये कि अब रत्नागिरि आने ही वाला है ।
रत्नागिरि पहुँच कर हम अपने होटल पहुँचे । होटल विवेक, वहां फ्रेश हो लिये फिर सुहास ओर मै जरा आस पास का जायजा लेने एक चक्कर लगा आये हम चलते चलते थीबा पैलेस पहुँच गये । यहां अंग्रेजों ने ब्रम्हदेश के राजा को कैद करके रखा था । यह पैलेस हम अपनी पिछली ट्रिप में देख चुके थे । यहां पर उस जमाने का फर्निचर और राजा की वस्तुएँ रखी हुईं हैं । उस वक्त तो पांच बजने वाले थे यानि सब कुछ बंद होने का समय ।
रत्नागिरि यानि लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक का जन्मस्थान । वही लोकमान्य टिळक, जिन्होनें घोषणा दी थी कि, ”स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और वह मै लेकर ही रहूँगा” । रत्नागिरि में सेन्ट्रल पार्क के पास सौ साल पुराना एक वाचनालय है और उससे थोडी ही दूर है लोकमान्यजी का घर जो अब इनका स्मारक है। यहां तिलक जी के चलाये हुए अखबार केसरी के कुछ पुराने अंक हैं और उनके भाषणों के कटिंग्ज भी फ्रेम किये हुए हैं । तिलक जी की वस्तुएँ भी यहां सजायी हुई हैं । हम यहां पहले हो आये थे और हमारे साथ के अधिकांश लोगों का यह देखा हुआ था ।
हम सब ने तय किया कि हम समंदर की सैर करेंगे और फिर खाना खाने जायेंगे । तो वही किया समंदर के किनारे गये वहां सूर्यास्त देखा और बहुत देर तक समंदर पर धीरे धीरे फैलता हुआ अंधियारा देखते रहे । कैसे पूरब का सिंदूरी लाल पीला रंग सलेटी-गुलाबी और फिर काले में बदलता है । समंदर के पानी पर रंगों की अठखेलियां, समंदर का यह अनोखा रूप एकदम अलग था । बहुत देर तक हम यह रूप हम अपनी आंखों में भरते रहे फिर उठ कर खाना खाने के लिये रेस्टॉरेन्ट ढूंढा । रेस्तरां सुंदर था वहां एक एक्वेरियम में रंगबिरंगी खूबसूरत मछलियां तैर रही थीं जो सुंदरता को चार चांद लगा रहीं थीं । आप भी आनंद लें । (विडियो देखें)

जम कर खाना खाया । मोदक भी मिले । होटल लौट कर गपशप की और सो गये सुबह जल्दी ही मालवण की तरफ बढना था ।
सबसे ऊपर के फोटो में प्रकाश, जयश्री, मै और सुरेश हैं । विडियो में सफेद बॉब्ड बालों वाली सुहास है और सफेद बालों वाले विजय हैं । लतिका सबसे छोटी और विजूताई नीले साडी में हैं ।

(क्रमशः)