मंगलवार, 8 मार्च 2011

चलते ही जाना – २- तारकर्ली


चलते ही जाना – २- तारकर्ली
सुबह उठ कर तैयार हुए । बैठ गये अपनी अपनी सीटों पर टेम्पो ट्रैव्हलर में । रत्नागिरि से तारकर्ली का रस्ता कोई चार घंटे का है ।अभी तक हमने जो भी प्रवास किया वह मुंबई गोवा हाय-वे पर ही था और आगे भी कुडाळ तक वही रास्ता है । कोकण के रास्ते यानि पहाड, हरियाली, आम, काजू, नारियल, और सुपारी के पेड । तो रास्ते के सुंदरता का आनंद उठाते हुए चल रहे थे । बीच बीच में खाना पीना तो चल ही रहा था । सुंदर सुंदर नदियां कल कल करती बह रहीं थीं । तारकर्ली मालवण से कोई ६ किलोमीटर दक्षिण में है । य़ह एक छोटा सा मछुआरों का गांव है पर यहां के बीचेज बहुत सुंदर है । हमारा बुकिंग महाराष्ट्र टूरिजम् डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के कॉटेजेज में था । हमने तय किया कि हम सीधे तारकर्ली जायेंगे सामान कमरों में रख कर फिर खाने पीने और घूमने की सोचेंगे । तो विजय (ड्राइवर) जी को वही बताया और पहुँचे तारकर्ली । एम टी डी सी के कॉटेजेज की तरफ चल पडे, वहां जाने का रास्ता बहुत ही सुंदर था दोनो तरफ नारियल और सुपारी के बगीचे । दोनों पेडों की तुलना करें तो नारियल का तना मोटा होता है और सुपारी का पतला यानि एक स्थूला तो दूसरी तन्वंगी । नारियल और सुपारी दोनों में फल लगे थे । सुपारी तैयार थी नारंगी रंग के खोल वाली ये ताजी सुपारी देखने में बहुत ही सुंदर लगती हैं । काजू के पेडों में अभी सिर्फ बौर था । वे फलीभूत नही हुए थे । तो ऐसे खूबसूरत रास्ते से होकर पहुँचे अपनी मंजिल तक । वहां एम टी डी सी के ऑफिस में जाकर अपने बुकिंग का प्रमाण दिया और चाभी लेकर चल पडे कमरों की और । कमरे अच्छे थे साफ सुथरे बिस्तर लगे हुए । पानी रखा हुआ हालांकि हम तो बिसलेरी की ५ लिटर वाली ५ बॉटल्स ( बरनी कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ) लेकर आये थे । हमारे साथ अमरीकन मेहमान जो थे । यहां एक मजेदार बात देखी पलंग परमानेन्ट बने हुए थे सीमेंट ईंटों के । मेन्टेनन्स नही और सालों साल चलें भी । हम सब ने सामान रखा । हमारा एक कमरा डॉर्म था जहां पांच लोग सो सकते हैं वह सुहास और विजय ने लिया । हैमॉक देख कर सुहास तो बहुत खुश हुई और उसीपर बैठ गई । (विडियो देखें ) 286_344_Two

सब कुछ सैटल कर के हम ने खाने की तलाश करना उचित समझा । हमें बताया गया कि मालवण में अच्छा खाना मिल सकता हे तो हम मालवण चल दिये । वहां घूमते घूमते हमें कामत का रेस्तरॉं दिखाई दिया प्रकाश ने कहा कि यहां खाना अच्छा मिलेगा, तो वहीं घुस गये पर पता चला कि डेढ बजे से पहले खाना सर्व नही होगा । वहां आस पास काजू की दुकाने दिखीं तो मै और लतिका वहां चले गये और काजू खरीदे । सुहास ,प्रकाश और जयश्री नें कुछ स्कूल की लडकियों से बातें कीं, उनके विषयों के बारे में ओर टीचर्स के बारे में । सुहास स्वयं भी अमेरिका में केमिस्ट्री पढाती थीं हाल ही में रिटायर हुई हैं उसने पहले अजमेर में भी पढाया था तो उसकी शिक्षा पध्दती में बहुत ज्यादा रुचि है ।
तब तक डेढ बज गया था और खाना भी तैयार था तो कामत जी के यहां खाना खाया । यहां मोदक तो नही मिले पर श्रीखंड मिल गया । बाकी दाल, चावल, रोटी, सब्जी, उसळ, सैलेड, दही सब था । खाना हमे जरा मालवणी यानि मसालेदार लगा । लोगों से बात करके हमें पता लगा कि यहां एक बहुत सुंदर गणेश मंदिर है । पास ही में एक अच्छी मराठी शाकाहारी खानावळ भी है तो सोचा कल यहीं आयेंगे । मंदिर बहुत ही सुंदर था । आप भी देखेंगे।
तारकर्ली में हम तीन दिन रुकने वाले थे । पिछली बार जब हम आये थे तो तूफान की वजह से सिंधु दुर्ग नही देख पाये थे । तो वह तो पक्का देखना ही था । कल सुबह सुबह के लिये यही कार्यक्रम बना । इतना सब कर के काफी थक गये थे तो सोचा अब आराम किया जाय शाम को बीच पर जायेंगे । जो लेटे तो सीधे पौने छै बजे आंख खुली सब लोग चाय पी कर बीच पर चले गये थे हम दोनों ने भी जल्दी जल्दी चाय पी और चल पडे बीच की और । पांच मिनिट चल कर ही बीच था हमारे कॉटेज में से दिखता भी था । वहां जाकर अपनी पार्टी के अन्य लोगों से मिले और बीच पर चलते चले गये । सूर्यास्त हो ही रहा था । समंदर मे डूबता सूरज कितनी भी बार देख लो उसका आकर्षण कम नही होता हर बार आSह ऊSह करने का मन करता है । और रंगों का छलावा वह भी कम अदभुत नही होता । मायाविनि प्रकृति कितने कितने अनुपम रूप दिखा कर हमें छलती रहती है । थोडा बीच-वॉक करके फिर हम सब के साथ आकर बैठ गये । कुछ बच्चे घर बना रहे थे । एक जीप के पीछे पैराशूट लगा कर लोग हवा में उडने का मजा लूट रहे थे । अंधेरा होते तक बैठे रह और फिर वापिस कॉटेज पर । लतिका ने भेळ बनाई और हम सब उस पर टूट पडे । इतनी भेळ, लड्डू आदि खा लिया कि फिर खाना खाने की इच्छा नही रही । काफी देर तक गप शप लगाई और फिर कमरों में जाकर निद्रादेवी के अधीन हो गये ।
दूसरे दिन सुबह उठ कर झट पट तैयार हुए नाश्ता मालवण मे ही करने की सोची । तो चल पडे मालवण वहीं से आगे बोट लेकर सिंधुदुर्ग जाना था । (विडियो देखें ) clip286_344_three

सिंधु दुर्ग का इतिहास बडा ही रोचक है यह पहला कदम था, भारत में नेवी यानि आरमार स्थापित करने का । ऐसे ही आरमार की सहायता से कोकण किनारे पर आधिपत्य जताने वाली परकीय सत्ताओ (डच, पोर्तूगीज़,ब्रिटिश ) तथा जंजीरा के सिद्दी जौहर (हब्शी) को जवाब देने के लिये छत्रपति शिवाजी महाराज़ ने यह किला बनाने का निश्चित किया । इसके इजिनियर थे हिरोजी इंदुलकर । इस के निर्माण को तीन साल लग गये । इस दौरान परकीय सत्तां के आक्रमण का जवाब देने के लिये इस किनारे पर ५००० सैनिकों की सेना रखी गई । १६६५ तक इस आरमार में ८५ छोटे जहाज, ३ बडे जहाज थे जो बढकर १६६६ तक १६० हो गये । (विडियो देखें )286_344_Four

महाराज के मृत्यु के पश्चात फिर से मुगल और पुर्तगालियों ने अपना धर्मपरिवर्तन कराने का खेल शुरु किया । इसके बाद के इतिहास में इस दुर्ग की और इस किनारे की रक्षा करने वालों में कान्होजी आंग्रे और उनके वंशजों का कार्य उल्लेखनीय है । आंग्रे की दुर्ग भक्ती और स्वामी भक्ती( भोसले परिवार से ) से पेशवा इतने डर गये कि उन्होने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और इस पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया ।
तो नाश्ते के बाद हम लोग धक्के पर आये जहाँ से हमे बोट लेनी थी । ये थी तो मोटरबोट पर बहुत छोटी थी । इस समुद्र में पानी के अंदर खूब सारे खडक (पत्थर) हैं इन से बचा बचा कर नाव दुर्ग तक ले जाना यहां के नाविक ही कर सकते हैं । इसी कारण शिवाजी महाराज नें दुर्ग बनाने के लिये यह जगह चुनी होगी । इन्हीं पत्थरों से इस दुर्ग का निर्माण हुआ है ।
यहां का मौसम जून से सेप्टेंबर तक बडा ही तूफानी होता है उस समय दुर्ग पर जाना संभव नही है । हम तो पिछली बार अक्तूबर में भी नही जा पाये थे । पर इस बार किस्मत हमारे साथ थी हम गये दुर्ग में घूमे भी । अंदर का सब अच्छी तरह देखा । (विडियो देखें ) 311_334One

अंदर प्रवेश करते ही थोडा गोल घूम कर फिर प्रवेश द्वार है किले के चारों और दीवार और बुर्ज हैं ताकि एकदम से प्रवेश द्वार का पता नही चलता । यहीं हनुमान जी का मंदिर है । अंदर सीधा चल कर है शिवराजेश्वर मंदिर । इसे छत्रपति राजाराम महाराज ने बनवाया था । यहां शिवाजी महाराज की नाविक के वेश में मूर्ती है । दुर्ग पर अभी भी लोग रहते हैं उनके लिये बच्चों के स्कूल है । भगवती मंदिर के पास दो मीठे पानी के कुएं भी हैं इसी तरह के कुएं हमने जंजीरा किले पर भी देखे थे । इसी तरह साखरबाव नामक कुआँ शिवजी के मंदिर के पास है (बाव=बावडी) । एक ऊँचा बुर्ज है जिसे टेहळणी बुरुज़ कहते हैं टेहळणी माने पहारा । अन्न के गोदाम, शस्त्रगार, सैनिकों के घर, कचहरी, किल्लेदार की कोठी सब अब देखरेख के अभाव में टूट फूट गया है । किले की दीवार भी टूट रही है खूब झाड झंखाड भी उग आये हैं । इस की इस तरह की उपेक्षा खलती हैं । इस किले की वजह से ही भारत का पारतंत्र्य कुछ साल के लिये ही सही आगे खिसक गया । थोडा गर्व और थोडे दुख के साथ हमने वापसी की बोट ली । किनारे पर आये तो बहुत सी चीजें बिक्री के लिये थी शंख सीपियों की मालायें, मसाले । आम पापड कटहल पापड, कुलथी का आटा सेम के बीज आदि । हम ने भी की खरीदारी । और फिर गणपती मंदिर गये सोने की या पीतल की बहुत ही सुंदर चमकदार मूर्ती से शोभित ये मंदिर मन मे सहज ही भक्तिभाव जगाता है । इसके पीछे ही थी कलसेकर जी की खाणावळ जहां हमने खाना खाया । आधा पौना घंटा इंतजार करना पडा क्यूं कि खाना ऑर्डर से ही बनता है पर मोदक मिले और खाना भी बढिया था । (विडियो देखें )311_334two

खाना खा कर फिर वापिस ठिय्ये पर । शाम को अपना कार्यक्रम बीच पर जाकर आनंद मनाने का था ।
कल हमें धामापुर तलाव देखने जाना था ।
सुबह उठ कर नहा धो कर तैयार हुए । मंदिर जाना था तो नाश्ता नही किया धामापुर लेक के पास ही बहुत प्राचीन भगवती मंदिर भी है । विशाल मंडप वाला ये मंदिर बहुत ही सुंदर है और मूर्ती को देखते ही मन में भक्तिभाव उपजता है । स्वच्छ और सुंदर ये मंदिर हमें बहुत ही अच्छा लगा । मंदिर के सामने ही है धामापुर तालाब । हरे भरे पहाडों से घिरा यह लेक अपने आप में एक सौंदर्य है इसके साफ स्वच्छ पानी मे से अंदर का तल और खडक साफ दिखते हैं । इस स्थान को सुंदर बनाने में वन विभाग का भी बडा हाथ है जिन्होने तालाब के किनारे सुंदर सुंदर पेड लगाये हैं करीब १० एकड क्षेत्र में फैला हुआ तालाब बहुतसे जलक्रीडाओं के उपयुक्त है जिनमें बोटिंग और स्नॉर्कलिंग हैं । (विडियो देखें )345_444one

मैने और सुरेश ने पैडल बोट से तालाब की सैर की । बहुत मज़ा आया । सुहास पता नही क्यूं नही गई । मुझे तो तैरना भी नही आता पर पानी का जबरदस्त आकर्षण है । वहां काफी समय बिताया मंदिर के प्रांगण में फोटो भी खींचे । अब भूक लग आई थी तो गये कलसेकर जी की खाणावळ में और पेट पूजा की। वे हमारे लिये मोदक की व्यवस्था जरूर करते थे तो इस कोकण प्रवास में हमने साल भर के मोदक खा लिये । दिन भर घूम कर पेटपूजा करो तो नींद आना स्वाभाविक है और सीनियर सिटिझन्स को तो ये कन्सेशन तो मिलना ही चाहिये क्या कहते हैं ?
शाम को तारकर्ली के सुंदर बीच पर भी तो समय बिताना था, चाय पीनी थी और पांच बजे जगने वाले भोर पंछियों के लिये चाय लेकर भी आनी थी । आज का ये अंतिम दिन था तारकर्ली का कल हमें जाना था गणपतीपुळे ।
( क्रमशः )
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