मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

सूरज से बडे




रात की महफिल में छलके जाम कितने
किसने गिने हैं किसने देखे ख्वाब कितने ।

किसने सुनाई नज्म यार-ए बेरुखी की
और मुहब्बत को नवाज़ा किसने किसने ।

अपनी बारी का किये हम इन्तजार,
पर शम्मा को आगे बढाया, हाय, किसने ।

कितनी आहें, कितने उफ, तौबायें कितनी
कह न पाये कुछ, हुए गुमनाम इतने ।

वो रकीब, वो बन गया महफिल का सूरज
वो ही रहा कहता गज़ल, वाह, वाह, कितने ।

हम उठे मेहफिल से जब मायूस हो कर
पूछा किया वह आसमाँ में चांद कितने ।

दूर हैं बस, टिम टिमा कर आह भरते
वरना सूरज से बडे, हैं सितारे कितने ।
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