मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

निमंत्रण


चांदनी झरने लगी झर झर झऱ
सुनहरे रुपहले प्यारे से पल
रात रानी, बेला और मल्लिका
इठलाने लगीं रूप यौवन पर ।

ये नदिया का जल, कल कल कल
बलखाती मछलियां चंचल चंचल
मदमाती सुगंध, सर सर सर
हवा की रुनझुनी बजती पायल

पेडों की घनी घनी डालों पर
लेटा है चाँद बांहे फैला कर
रजनी अलकों को संवांर रही
तारों से ले रही मांग भर ।

ताल मे खिलने लगी कुमुदिनि
मन पुलकित, आनंदित निर्भर
स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर ।

34 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

आज शरद पूर्णिमा को तो यह सचमुच चरितार्थ ही हो रहा है

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति |
हमारी बधाई स्वीकारें ||


http://dcgpthravikar.blogspot.com/2011/10/blog-post_10.html

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब स्वागत में खड़े हुये हैं,
मानों इस हित बड़े हुये हैं।

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत सुन्दर मनभावन रचना .....आभार !

sushma 'आहुति' ने कहा…

ताल मे खिलने लगी कुमुदिनि
मन पुलकित, आनंदित निर्भर
स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर ।भावपूर्ण रचना.....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पेडों की घनी घनी डालों पर
लेटा है चाँद बांहे फैला कर
रजनी अलकों को संवांर रही
तारों से ले रही मांग भर ।... यूँ लगता है , प्रकृति आपकी रगों में भर जाती है

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात है! वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई

डा. अरुणा कपूर. ने कहा…

अति सुन्दर!..शरद पूर्णिमा का बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने आशा जी!..धन्यवाद!

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

ये दरिया किनारा
ये रुनझुन से पल
ये आज की बेला
ना मिल पायेगी कल


मौन रह कर आवाहन करता निमंत्रण
सुन्दर अभिव्यक्ति

Arvind Mishra ने कहा…

वाह पूर्ण चन्द्र की शरद यामिनी साकार हो उठी ....
खिली चांदनी में कौन निमंत्रण देता मुझको मौन .. :) ?

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com

mridula pradhan ने कहा…

bahot pyari kavita hai......

Suman ने कहा…

स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर !
शरद पूर्णिमा का सुंदर वर्णन किया है
बहुत बढ़िया रचना !

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

dheerendra11 ने कहा…

आशा जी,-मै पहली बार आपके ब्लॉग में आया,आपकी कुछ रचनाओ पढा,मुझे बेहद पसंद आयी
आपकी रचनाओ में शब्दों की सादगी शब्दों चयन शब्दों का संयोंजन आपने बहुत अच्छे ढंग किया है,...

समय निकाल सके तो कभी मेरे ब्लॉग आइये आपका स्वागत है,

बेनामी ने कहा…

मन मोह लेने वाली सुंदर-सरल-निर्मल कविता।

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

sandeep sharma ने कहा…

ये नदिया का जल, कल कल कल
बलखाती मछलियां चंचल चंचल
मदमाती सुगंध, सर सर सर
हवा की रुनझुनी बजती पायल

कौन ऐसा शक्श होगा जो ऐसा निमंत्रण स्वीकार नहीं करेगा...

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

प्रकृति का सुंदर वर्णन॥

कुमार राधारमण ने कहा…

भाव इतना प्रवाहमय है कि लगा,कविता अचानक ख़त्म हो गई।
प्रकृति और प्रेम का समन्वय शाश्वत है। आपने इन्हें स्वर देकर अपनी सहजता का परिचय दिया।

रचना दीक्षित ने कहा…

सुंदर प्रकृति चित्रण व् भाव संयोजन. बहुत बधाई.

Rewa Smriti ने कहा…

ताल मे खिलने लगी कुमुदिनि
मन पुलकित, आनंदित निर्भर
स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर ।

Bahut bahut achchi lagi!

P.N. Subramanian ने कहा…

मनमोहक प्रस्तुति.

Babli ने कहा…

पेडों की घनी घनी डालों पर
लेटा है चाँद बांहे फैला कर
रजनी अलकों को संवांर रही
तारों से ले रही मांग भर ।
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! मनभावन रचना!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

प्राकृति और प्रेम का सुन्दर चित्रण है इस लाजवाब रचना में ... भावमयी रचना ...

amrendra "amar" ने कहा…

बेहतरीन रचना.....बधाई स्वीकारें ||

veerubhai ने कहा…

ताल मे खिलने लगी कुमुदिनि
मन पुलकित, आनंदित निर्भर
स्नेह का ये निमंत्रण मौन, पर
आवाहन कर रहा है प्रियवर ।
सुन्दर प्रस्तुति .दिवाली मुबारक .

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत ही मनमोहक शब्द चित्र ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

Unlucky ने कहा…

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हरकीरत ' हीर' ने कहा…

चांदनी झरने लगी झर झर झऱ
सुनहरे रुपहले प्यारे से पल
रात रानी, बेला और मल्लिका
इठलाने लगीं रूप यौवन पर ।

मन भवन गीत .....!!

Gyandutt Pandey ने कहा…

लगता है उतर आया हो पूर्णिमा का चांद।
बहुत सुन्दर कविता!

संजय भास्कर ने कहा…

रजनी अलकों को संवांर रही
तारों से ले रही मांग भर ।
.........बहुत सुन्दर पंक्तियाँ!

संजय भास्कर ने कहा…

जरूरी कार्यो के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

mehek ने कहा…

aise laga jaise chandani man par jhar rahi ho,awesome,simply awesome.