शनिवार, 13 दिसंबर 2008

राष्ट्रप्रिय है...


न कोई आयेगा हमको बचाने
न कोई हाथ ही आगे करेगा
जबाँ से ही जतायेंगे हम-दर्दी
मदद शायद ही कोई कुछ करेगा

दूसरे के भरोसे जो रहा है
काज उसका तो डूबा है हमेशा
अगर खुद मे नही है कोई हिम्मत
बिन लडाई ही, वो हारा है हमेशा

हमें अब एकजुट होना पडेगा
और बदलनी होगी किस्मत
ताकि अपने ही दम पे हम खडे हों
हमें खुद की बढानी होगी ताकत

उठे दुश्मन की आँख इससे पहले
डर, दृष्टि जाने का, उसे हो
हमारी एकता की शक्ति पर ही
नाज करने का हक हमको भी तो हो

हम किसी देश के दुष्मन नही हैं
पर अगर दुष्मनी पर कोई उतरे
लगा देंगे अब प्राणों की बाजी
मोल ले लेंगे, पथ में, जो हों खतरे

जवानों पर हमारे नाज़ हमको
अपने भूमी की रक्षा हक हमारा
त्याग जो भी हो करना वह करेंगे
राष्ट्र प्रिय है और राष्ट्र ध्वज है प्यारा

रविवार, 30 नवंबर 2008

सिंह हो तो


सिंह हो तो उठो गर्जना करो
और सियार हो, तो कुछ कहना नही है ।
दुष्मन के वार पर पलट वार तो करो
गर कायर हो, तो कुछ करना नही है ।

अपनी संख्या पर गर नाज़ है तुम्हें
उस नाज़ जैसा कुछ तो कर गुजरो
वरना तो कीडे भी जन्मते हैं करोडों
मरना है जो कीडों सा, कुछ कहना नही है ।

जिनके बाजू मे है ताकत और हिम्मत
एक बार जोश से उनकी जयकार तो करो
भरलो स्वयं में उनका ये जज्बा जोश का
कमजोर ही रहना है, तो कुछ कहना नही है ।

घर और पाठशाला बने केंद्र नीति का
राष्ट्र प्रेम से बच्चों को कर दो ओत प्रोत
हर बच्चा बनें एक आदर्श सैनिक भी
सिखाओ ये पाठ कभी डरना नही है ।

समय पडे तो खुद ललकारो दुश्मन को
एक दिन तो हम सबको मरना यहीं है
डिस्को नही, हमको है तांडव की जरूरत
वरना हम जैसों की फिर सजा यही है ।

आज का विचार
मान सम्मान किसी के देने से नही मिलते अपनी अपनी योग्यता के अनुसार मिलते हैं ।

स्वास्थ्य सुझाव

नियमीत व्यायाम करें,
बलशाली बनें ।

शनिवार, 22 नवंबर 2008

श्रध्दांजली


जैसे ही दिल्ली पहुँचे खबर मिली कि अण्णा की तबियत बहुत ज्यादा खराब है .
तुरत फुरत टिकिट कटवाकर जबलपूर गये । नलियाँ लगाकर बिस्तर पर लेटे भाई
को देखा तो दिल कचोट सा गया । पर उन्होंने सब को पहचान लिया ।
इतनी तकलीफ के बावजूद उनका पहेलियीँ बुझाने का स्वभाव वैसा ही था । शाम को
हम दोबारा मिलने अस्पताल गये तो मुझे और मिलिंद को देखकर एक सरगम गुनगुनाये
और कहा बताओ कौनसा राग है .। मैने कहा,” क्या अण्णा तुम भी किसे पूछ रहे हो “ तो
थोडा हँस कर चुप हो गये । उसी दिन उनके एक दोस्त मिलने आये और मजाक करने
लगे,” काले साब समोसा ले आऊँ” तो कहा ,”अरे तुम ले तो आओगे पर ये लोग मुझे खाने
नही देंगे, चुपके से ले आना बाद में” । उसके बाद तो ताकत जैसे हर दिन कम ही होती गई ।
और बोलना भी कम कम होकर सिर्फ दर्द के बारे में बात करने तक ही सीमित हो गया और
१९ नवंबर को सुबह साढेपांच बजे उन्हे इस पीडा से मुक्ति मिल गई । अण्णा और मै साथ साथ बडे हुए थे । खेलना लडाई झगडा क़ॉलेज जाना सब एक साथ आँखों के सामने से सरक गया । दूसरे दिन जबलपूर के अखबार में उनके लिये श्रध्दांजली छपी वही यहाँ दे रही हूं । और कुछ तो लिखा नही जा रहा ।

इसे दो बार क्लिक कर के पढें ।

रविवार, 2 नवंबर 2008

कभी तो चले आओ


कभी तो चले आओ मेहमान बन कर
और पूछो मेरा नाम अनजान बनकर ।

हमें हक्का बक्का कर दो तुम इतना
हम ना समझ पाये अचरज हो कितना
देखें कभी तुम को या फैले घर को
या चीजें सम्हालें परेशान बनकर । कभी तो......

कहें बैठने को या पानी पिलायें
चाय को पूछें या पंखा चलायें
न सूझे जो कुछ तो शरबत ले आयें
या खुद ही खडे हों गुलदान बनकर । कभी तो..

तुम्हारे ही चेहरे को पढते रहें हम
देखो जो तुम, तो नजरें चुरायें
या फिर ये सोचें झुका कर के पलकें
कि क्यूँ आये हो दिल का अरमान बनकर । कभी तो ...

तुम कुछ जो पूछो तो हम कैसे समझे
खयालों में जब हों अपने ही उलझे
तुम ही हमें फिर बता देना हँस के
कि क्या काम था और आये हो क्यूं कर । कभी तो.....

आज का विचार

याद रहे कि आप बहुत खास है और आपकी भूमिका आपके अलावा और कोई नही निभा सकता ।

स्वास्थ्य सुझाव

रक्त में लोह की मात्रा बढाने के लिये खायें
३ बादाम
३ खूबानी
३ खजूर
३ अंजीर
१५ मुनक्का
सबको मिला कर रोज नाश्ते में खायें ।
२ महीनें करें ।

रविवार, 26 अक्तूबर 2008

दीवाली


देखो धरती आज ले रही होड गगन से
जगमग जगमग लाख दिये लगते उडुगण से
त्याग मलिनता, लोग सजधज के आ रहे हैं
घर आँगन चमकते, दीप जगमगा रहें है ।

पकवानों के थाल, और फल फूल नारियल
पर इन सब में खील, बताशे ही हैं अव्वल
लक्ष्मी जी के नमन और पूजन के हेतु
गृहिणी, बालक सब सामग्री सजा रहे हैं ।

कब पूजा हो और फूलझडियाँ कब छूटें
खाने को कुछ मिले तो फिर पटाखे फूटें
बच्चे मनमे सोच सोच छटपटा रहे हैं
अभिभावक उनको आँखों से मना रहे हैं ।

पूजा कर लें फिर छुटाना खूब पटाखे
प्रसाद लेना और थोडा कुछ खा पी कर के
फिर हम सब भी तो होंगे साथ तुम्हारे
खुशियाँ ओर आनंद मनायेंगे मिल सारे ।

मेल जोल और हँसी खुशी की किरणें लाती
चेहरे पर उत्साह औ मनमें उमंग लाती
सब त्यौहारों की ये रानी बडी निराली
आती है हर वर्ष लक्ष्मी के साथ दिवाली ।

आज का विचार
मेरे अंदर ऊर्जा का प्रचंड स्त्रोत है और सामने असीम संभावनाएँ
और चारों और हजारों मौके, मुझे केवल इसे सार्थक बनाना है ।

स्वास्थ्य सुझाव
हिचकी रोकने के लिये नीबू की फाँक को चूसें ।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2008

चाँद के पार चलो

आज इस गाने की बहुत याद आ रही है
चलो दिलदार चलो
चाँद के पार चलो
हम है तैयार चलो हो ओ ओ ओ
सच में ३०-३५ साल पुराना ये गाना आज सच होने जा रहा है । कोई दिलदार तो अभी नही जा सकता उसमे, पर तैयारी तो है ही । बधाई सबको चंद्रयान के सफल उडान की ।

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

शरद की दूधिया चांदनी



शरद की दूधिया चांदनी
और उसमें नहाये से तुम
नीम की फुनगी पे चांद
और मेरे कितने पास तुम
दिल में जज्बातों की हलचल
बिलकुल अनजान उससे तुम
मेरी आँखों का सुख चैन
और सुकून भी दिल का तुम
कहूँ आज कैसे ये तुम से
कि दिल का अरमान भी तुम
तुम ही समझ लेना इसको
अब ये दिल जाने या तुम

आज का विचार
चाँद की असलीयत जान कर भी वह उतना ही खूबसूरत लगता है
जितना पहले लगता था ।

स्वास्थ्य सुझाव
शरद पूर्णिमा को चांद की रोशनी में दूध या खीर ठंडी कर के पीना
स्वास्थ्य वर्धक है । दूध को औटा कर या खीर बना कर बाहर छत पर
या बालकनी में चांद निकलने के बाद रख दें ताकि चांद की किरणें
पतीली के अंदर पडें, ३-४ घंटे कमसे कम उसे रख कर चांदनी में
ही ठंडा करें फिर आधी रात को पीयें । इसके साथ गाने की महफिल
भी जमाई जा सकती है । हमारे घर में यह किया जाता था तो मैं
भी करती हूँ । और वाकई दूध का स्वाद बढ जाता है ।

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

दशहरा

कोई भी केवल राम नही
है सिर्फ न कोई रावण
दोनों ही हैं अपने अंदर
दोनो ही अपने तन मन

आज दशहरे के अवसर पर
और रोज ही इसके आगे
भीतर का रावण जीतें हम
चाहे वह कितना ही भागे

तभी मना पायेंगे हम
सही माने में दशहरा
और बाधेंगे अपने सिर पर
राम के जीत का सेहरा

आज का विचार
अच्छी खबर ये है कि बुरी खबर अच्छी में बदली जा सकती है ।

स्वास्थ.सुझाव

वृक्क (किडनी) की पथरी तोडने के लिये चार भिंडी काट कर एक ग्लास पानी में डाल कर रात भर
छोड दें. दूसरे दिन सुबह भिडी को उसी पानी में मसल लें और पानी छान कर खाली पेट पी लें। ऐसा १०-१५ दिन करें पथरी टूट कर निकल जायेगी ।

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

जिंदगी



ये रास्तों पे खून है और चुप खडे हैं हम
संवेदनाएँ शायद सभी खो चुके हैं हम ।

जब कोई गिरता है यहाँ टकरा के कार से
अन देखा उसको करके आगे चले हैं हम ।

वो छेड रहे गुंडे कई, मासूम बहन को
मेरी बहन तो है नही, समझा रहे हैं हम ।

जंजीर उसकी छीन कर गया भाग वो कोई
अपनी ही जान बच जाये ये सोचते हैं हम

मौत तो आनी है सब को औ आनी है एक बार
फिर क्यूं नही इस जिंदगी को जी रहे हैं हम ।

आज का विचार
भय का अभाव धैर्य नही है। धैर्य है इस भय को मात देकर अपनी मंजिल पाने की पूरी कोशिश करना ।

स्वास्थ्य सुझाव
मूंग को अपने खानपान का आवश्यक हिस्सा बनाइये इसमें रक्त की गुणवत्ता बढाने
की क्षमता होती है ।

सोमवार, 29 सितंबर 2008

देवी स्तुती



सुहास्य वदना, विशाल नयना
मौक्तिक दशना मुक्त कुंतला
अंकुश, पाश, त्रिशूल धारिणी
सुरक्त वसना रक्त कुंडला

करुणा दया क्षमा भवतारा
शक्ति, पार्वती, विद्युत-चपला
सिंह वाहिनी, रिपु संहारिणि
दैत्य विनाशिनी भक्त वत्सला

मोहित, चकित भक्त भय-आतुर
आश्चर्यान्वित, हर्षित विपुला
आशिर्वाद हस्त आश्वासित
मातु-चरण वंदन करि सकला

शनिवार, 27 सितंबर 2008

दर्द

इस दर्द का करें क्या कि सहा नही जाता
दर्द को दिये बिन, उनसे रहा नही जाता ।

तनहाई है कि चिल्ला चिल्ला के कह रही है
यह बोझ अकेले से सम्हाला नही जाता ।

अब किससे करें बात, क्या किसको बतायें
ये हाले-दिल किसी से कहा नही जाता ।

हम अपने दर्द की कहें या उनकी भी सुनें
इस कहने सुनने में भी कुछ बहा नही जाता ।

शायद हो कि ये दर्द ही बन जाये दवा अब
हम से तो इसका कुछ भी किया नही जाता ।


आज का विचार

जो आदमी दूसरों को दुख देता है क्या वह कभी सच्ची खुशी पा सकता है

स्वास्थ्य सुझाव
यकृत (लिवर) को स्वस्थ रखने के लिये एक कप अनार के रस में आधा चम्मच हल्दी और आधा चम्मच सेंधा नमक डाल कर दिन में ३ बार लें ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

मौसम की पायल


ये कौन गुनगुनाया
हवा पे गीत आया
लहर बन के छाया
डालियाँ भी देखो लरजने लगीं
मौसम की पायल बजने लगी

पानी में तरंगे
आकाश में पतंगे
मन में उमंगे
उमड उमड कैसे मचलने लगीं
मौसम की पायल बजने लगी

कलियाँ लगीं खिलने
फूल मुस्कुराने
बुल बुल तराने
में, प्यार के फसाने सुनाने लगी
मौसम की पायल बजने लगी

अलसाई दुपहरी
धूप खूब गहरी
शाम ठहरी ठहरी
सहेलियाँ ठिठोली देखो करने लगीं
मौसम की पायल बजने लगी

चांद और बादल
नैना और काजल
चुनरी शामल शामल
तारों भरी रात देखो सजने लगी
मौसम की पायल बजने लगी


आज का विचार
अगर हम हर कार्य खुशी से करेंगे तो
हमें कोई भी कार्य कठिन नही लगेगा ।

स्वास्थ्य सुझाव

दांत को कीडे से बचाने के लिये १ चम्मच गुलाब जल में
१/४ चम्मच काला नमक, १/४ चम्मच पिसी काली मिर्च, १/4 चम्मच हल्दी
मिला कर मालिश करें ।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

अलास्का क्रूझ समापन और सीएटल- ७


दूसरे दिन जल्दी ही सारा निबटाना था क्यूं कि शिप के पहुँचते ही हमे साढे ग्यारह बजे
सीएटल के लिये बस लेनी थी । हमारे अर्ली बर्डस् आखरी बार शिप से सूर्योदय देखने ५ बजे से ही उठ के बैठ गये थे । (देखें विडियो )

शिप पर नाश्ते की व्यवस्था तो थी ही तो सब जल्दी जल्दी तैयार होकर नाश्ते के लिये गये । उसके पहली रात को ही हमारी सूटकेसेस हमने दे दी थीं ताकि वे हमें पोर्ट पर वापस मिलें । फिर अपना अपना हाथ का सामान लेकर हम वेटिंग एरिआ में आकर बैठ गये । शिप ७ बजे ही शिप डॉक हो गया था ।
करीब साढे ९ बजे हमारा नंबर आया फिर हम भी लाइन में लगे वही इमिग्रेशन वगैरा किया क्यूंकि केनडा मे प्रवेश कर रहे थे
। वहां से बाहर निकले सामान लिया, काफी ढूंढना पडा, पर मिल गया ।
(देखें विडियो )

बाहर आये तो वही समोसों की दूकान दिखी तो सब के लिये समोसे तथा सैंन्डविचेज़ पैक करवा लिये क्यूंकि आज यही हमारा लंच था । शिप वाली रईसी खतम । फिर खडे हुए टैक्सी के लाइन में । काफी टेन्स थे कि टाइम से बस स्टेंड तक पहुंचेंगे या नही पर सब कुछ ठीक ठाक हो गया । और हमें टैक्सी भी मिल गई और हम समय से पहले पहुँच भी गये । बस के आने में टाइम था ते सब ने खडे खडे ही लंच भी कर लिया । (देखें विडियो )

हमारा अगला पडाव था सीएटल । यहां हम जगदीश और सरला जी के मेहमान थे । ये लोग कुसुम ताई और अरुण जी के दोस्त थे । जगदीश हमें बस स्टेंड पर लेने आने वाले थे । सीएटल आने के पहले फिर एक बार इमिग्रेशन की परेड हुई ।
सीएटल पहुंचते पहुंचते सुहास ने जगदीश जी से फोन पर बात कर ली और हमारे पहुँच ने के थोडी ही देर बाद वो हमें लेने आ गये एक बडी सी गाडी लेकर ताकि हम सब लोगों का सामान ठीक से आ जाये ।
इसके लिये उन्हें अपने पडौसी की गाडी उधार लेनी पडी यह हमें बहुत बाद में मालूम पडा । । सीएटल पहुंचे थे हम चार बजे भूक भी लगी थी चाय भी पीनी थी पर जगदीश जी ने कहा कल तो आपको बोइंग फैक्टरी देखने जाना है तो आज अभी स्नोकालमी फॉल देखते हैं ।“ अ....भी.........”. सोचा सबने पर बोला कोई कुछ नही सुहास ने ही कहा कि घर ही चलते हैं चाय पीना है ।
“वो कोई बात नही पहले रेस्टॉरेन्ट में चाय पीयेंगे और फिर देखेंगे फॉल”, जगदीश जी ने सुझाव दिया और हमने किया भी वही । फॉल पर पहँचे रेस्टॉरेन्ट में चाय और कुकीज़ खाकर थोडे रिवाइव हुए और फिर देखा फॉल, क्या फॉल था साहब, मिनि नियाग्रा ही समझ लीजीये,
(देखें विडियो )

मन प्रसन्न तो हुआ ही थकान भी उतर गई । काफी देर वहाँ खडे खडे गिरते हुए नदी को देखते रहे फिर आस पास थोडा घूमें और घर ।
घर भी एकदम सुंदर था । मर्सर आयलेंड पर वॉशिंगटन लेक के किनारे । घर जाते ही सरला जी से मिले । पहली बार मिले थे लेकिन स्वागत जोरदार था एक अलग तरह का घर का बना फ्रूट पंच और चबेना , मुरमुरे के साथ मिला हुआ नमकीन । एकदम से मालवे के सेव परमल की याद आ गई । फिर उनका सुंदर सा घर देखा उसके खूबसूरत डेक पर खडे रह कर वॉशिंगटन लेक देखते रहे और देखते रहे उसमें डूबते हुए सूरज को । कुसुम दीदी के बारे में बहुत सारी बातें हुईं और सरला जी ने ये भी बताया कि उनके बातों से ही वे हमें भी जानती हैं । सुहास से तो उनका घनिष्ट परिचय था ही । शाम को जगदीश हम सब को आस पास टहलने के लिये ले गये । करीब ३०-३५ मिनिट उस खूबसूरत इलाके में घूमते रहे । यहां भी गुलाबों की कोई कमी नही थी ।
घर आकर डिनर किया खिचडी, एक अलग तरह का पिज्जा और बैंगन और पालक की अनोखी सब्जी जिसमे फ्रेश सोयाबीन भी डलीं थीं । अगले दिन हमें बोइंग की फेक्टरी देखने जाना था । सुहास का प्लानिंग एकदम परफेक्ट सबके टिकिट विकिट इंटरनेट पर ही बुक कर लिये थे । जगदीश जी निव़ृत्ती से पहले बोइंग में ही काम करते थे तो वे भी हमारे साथ आये अपने नाती किरण के साथ । नाती को भी तो दिखानी थी बोइंग फेक्टरी ।
हमने सरलाजी से चाय के सामान के बारे में पूछा तो बोलीं फिकर ना करो चाय मैं बना दूंगी । हमारे ५ बजे उठने वाले प्रकाश भाउजी के लिये एक सुखद आश्चर्य इंतजार कर रहा था । बाहर डेक पर योगा मेट बिछी थी और केतली में गरमा गरम मसालेदार चाय । और क्या मसाला था, चाय के मसाले के साथ तुलसी और पुदीने की पत्ती भी डाली थी शायद । ऐसी झन्नाटेदार चाय पीकर मजा आ गया । सरला जी तो सुबह ५ बजे ही घूमने चली जातीं हैं करीब ३ मील चल कर वे अपने व्यायाम शाला जातीं हैं और वहां व्यायाम कर के फिर उतना ही चल कर घर आतीं हैं । हम लोग जगदीश जी के साथ गये लेक पर घूमने ।
अच्छे खासे एक डेढ घंटे की घुमाई हुई, फिर घर आकर ब्रंच किया और गये बोइंग फेक्टरी। जैसा कि सब जानते हैं बोइंग दुनिया कि नंबर वन कमर्शियल ओर मिलिटरी जेट लाइनर बनाने वाली कंपनी है । दुनिया के सबसे बडी बिल्डिंग में स्थित है ( तकरीबन ४७२,०००,००० क्यूबिक फीट )। दुनिया भर में इसके कोई १००० ऑपरेटर्स हैं जो बोइंग जहाज खरीदते है या लीज करते हैं ।(देखें विडियो )

करीब चार घंटे की टूर होती है यह और दो हिस्सों मे बटी हुई । इसमें ७४७ ,७६७, ७७७ और ड्रीम लाइनर इन सारे हवाई जहाजों के असेंबली आपको दिखाई जाती है और बने बनाये जहाज तो दिखाते ही हैं । बोइंग हवाई जहाजों के सारे पार्ट अन्यत्र बनाये जाते हैं जिनमें बहुतसे देशों की भागीदारी है । जी ई, प्राट एन्ड विटनी तथा रोल्स रॉईस इसके एन्जिन बनाते हैं । पहली टूर में कार्गो प्लेन देखने के बाद जब हम एसेंबली लाइन देखने आये तो एक जायजेन्टिक लिफ्ट में हमे जाना पडा । यहां हमने देखे ऊपर बताये सारे जहाज, मेन्यूफेक्चर के विभिन्न अवस्थाओं में । हमें बताया गया कि ३ मिनिट में एक पार्ट लग जाता है । बहुतसा काम मेन्यूअली हो रहा था । करीब ९० देश इसके कस्टमर हैं । ड्रीमलाइनर ही वो जहाज़ है जो नॉनस्टॉप उडानें भरता है जैसे न्यूयॉर्क-दिल्ली । तो बहुत मजा आया फिर एक्जीबीशन भी देखा कुछ लोगों ने बोइंग की टोपियां खरीदीं हमने ७७७ के २ मॉडल खरीदे । और वापिस आये घर । हमारी सीएटल यात्रा का यह आखरी दिन था कल हमे जाना था मिनियापोलिस (मिनिसोटा) माधुरी के घर ।(देखें विडियो )

उसके बाद हम सब अपने अपने ठिकानें पे जाने वाले थे । तो शाम को सरला जी और जगदीश से गप्पें मारीं उनकी बेटी लोपा से भी मुलाकात हुई । दूसरे दिन उन्होने हमें छोडा एयरपोर्ट । और हम चल पडे अपने आखरी पडाव पर ।
हम मिनियापोलिस के समयानुसार पहुँचे रात को ११ बजे माधुरी और अमित हमें लेने आये थे । घर पहुंच कर बढिया सा खाना खाया और सो गये कुसुम ताई भी वहाँ हमें मिलीं ।
तीन दिन माधुरी के यहाँ मौज मस्ती की उसका पती अमित बहुत ही मिलनसार और मजाकिया है खाना बनाने का भी शौक रखता है । लगा ही नही कि पहली बार मिल रहे हैं । माधुरी ने आमरस पूरी बनाई तथा एक दिन मसाला दोसा खिलाया और एक दिन चायनीज रेस्तराँ में गये हम सब । प्रकाश और जयश्री को वहीं रुकना था । तो माधुरी की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाकर हम बाकी सब ४ जुलै को अपने अपने ठिकाने वापिस आये । बहुत बुरा लगा बिछुडने का करीब महीने भर से साथ थे, और बहुत बढिया वक्त गुजारा था । बहुत एन्जॉय किया था हमने तो, क्या आप तक थोडासा मजा पहुँचा ।
(समाप्त)

बुधवार, 10 सितंबर 2008

अलास्का क्रूझ-६



सुबह हमेशा की तरह उठे और चाय नाश्ता निपटा कर तैयार हो गये । (देखें विडियो )

यहाँ जूनो के लिये
भी हमने शिप द्वारा आयेजित कोई टूर्स के टिकिट नही लिये थे । यही सोचा था कि बस या टैक्सी लेकर घूमेंगे । जैसे ही जूनो के पोर्ट पर शिप ने डॉक किया हम सब भी और सारे लोगों के साथ शिप के बाहर आ गये । अब हम एक अनुभव लेकर तैयार थे तो इनफॉर्मेशन सेंटर ढूँढ निकाला । (देखें विडियो )

वहाँ पता चला कि हम एक टैक्सी ( भाडा १ घंटे का ५५ $ ) लेकर २ घंटे में जूनो के महत्वपूर्ण स्थान देख सकते हैं । जूनो अलास्का की राजधानी है । यह माउंट जूनो और गस्टिनोउ कनाल के बीच में बसा हुआ है । जनसंख्या करीब ३०,००० । यहाँ के लोगों के जीवन यापन के साधन हैं टूरिज़म, मछली उद्योग और माइनिंग । शुरु शुरु में यहाँ नदी के पानी में सोने के नगेट्स मिल जाते थे पर बाद में वे कम हे गये तो माइनिंग से सोना निकलने लगा । और गोल्डरश भी अलास्का का तभी शुरू हुआ । जूनो में भी एक बहुत बडा ग्लेशियर है जिसका नाम है मेंडेनहाल ग्लेशियर, एक और भी है लेमन ग्लेशियर दोनों ही सडक से ही दिखाई देते है । जूनो से पहले अलास्का की राजधानी सिटका थी जो हमे कल देखना है । अलास्का में कई हजार साल तक तो ट्लिंगित इंडियन लोगों का ही राज़ रहा पर बादमें रशियाने इसपर अपना अधिकार कर लिया । १८६७ में यूनाइटेड स्टेट्स ने इसे खरीद लिया पर अमेरिकन यूनियन में इसका विलय १९४९ में जाकर हुआ । रिचर्ड हैरिस और जोसेफ जूनो नामक दो अमेरिकन प्रवासी यहाँ सोने के खोज में आये थे । यहाँ के मूल निवासियों ने ही उन्हे सोना खोजने की राह बताई । पहले कई सालों तक जूनो का नाम हैरिसबर्ग भी था जो १८३१ में बदल कर जूनो सिटी रख दिया और बाद में रहा केवल जूनो, जोसेफ जूनो के नाम पर।

हम बाहर निकल कर आये थे तो वहां हमें एकदम सामने ही एक बडी सी दूकान भी दिखी थी जिसमे से हम गिफ्ट्स खरीद सकते थे । सोचा पहले सैर हो जाये फिर करेंगे खरीदारी ।
थो हमने एक टैक्सी की, टैक्सी का नाम था ग्लेशियर टैक्सी सर्विस। टैक्सी ड्राइवर ने कहा कि करीब दो घंटे में वह हमें बिअर फेक्टरी और ग्लेशियर दिखा सकता है और साथ ही बॉल्ड ईगल भी । क्रूझ शिप की तरफ से ग्लेशियर पर चलना तथा कुत्तों की गाडी की सैर भी आयोजित थी, पर कीमत थी ३५०$ प्रति व्यक्ती और हम सीनीयर सिटिझन्स कहां ग्लेशियर पर चलते वलते । तो हमारे लिये हमने यह टैक्सी वाला ऑप्शन ही ठीक समझा ।
पहले हम गये मेंडेनहाल ग्लेशियर । इसे हम बहुत ही पास से देख पाये । इस के पास ही एक जल-प्रपात भी था जिसका पानी नीचे आकर एक तालाब का रूप ले रहा था और इस तालाब के ऊपरकी तरफ था ग्लेशियर वैसा ही मोटे बर्फ की शिलाखंड सा बहुत से लेयर्स वाला । और वैसे ही नीले सफेद थोडे से हरे और मटमैले रंगों के परतों वाला । (देखें विडियो )

और बहुत ही पास से हम इसे देख रहे थे, लग रहा था कि थोडी कोशिश से हम इस पर चढ भी सकते हैं । बहुत देर तक इस ग्लेशियर को देखते रहे , ढेर सारी तसवीरें लीं ऐसा नजारा एक बार अलास्का छोडने पर कहाँ मिलने वाला था । वहाँ आसपास घूमते रहे, फिर हमने वहाँ एक पॉरक्यूपाइन भी देखा और कोशिश की उसके फोटो ले सकें ।
बहाँ से फिर हम गये बीअर फैक्टरी- नाम था अलास्कन ब्रूअरी । वहाँ जाते ही हमारा स्वागत फ्रेश बीअर से से हुआ और फिर हमें डिस्टिलरी दिखाई गई । और एक बडा ही रोचक लेक्चर सुनने को मिला । लेक्चर देने वाला बडा ही मजाकिया किस्म का आदमी था ।(देखें विडियो )

फिर ब़ॉल्ड ईगल देखने गये । असल में यह ईगल कोई गंजा वंजा नही होता, क्यूंकि इसका सर सफेद होता हैं इसी कारण दूर से यह गंजा लगता है । इनकी खूब सारी तस्वीरें लीं । वापिस इनफॉर्मेसन सेंटर पर आये तो वहाँ रशियन डांसर्स का ट्रूप आया हुआ था उनके साथ फोटो खिंचवाये ।(देखें विडियो )

य़ह सब करते करते भूख लग आई थी और अभी तो शॉपिंग भी करनी थी । तो उसी टैक्सी से वापिस आये पोर्ट पर और शॉप में जाकर बेटों, बहुओं और पोतियों के लिये थोडे बहुत गिफ्ट आयटम्स लिये और वापस अपने अड्डे पर । लंच किया ।
खरीदारी को दुबारा देख कर एप्रिशिएट किया । शाम को फॉर्मल डिनर में हमें मिला भारतीय खाना । मसाले वाली आलूगोभी, बैंगन का भर्ता और दाल, साथ में पराठे । गोवानीज़ वेटर ने(देखें विडियो )

सचमुच ही अपना वादा निभाया था । खूब एन्जॉय किया और स्वीट डिश के रूप में पेश की गई खीर । खाने के बाद देखा रंगारंग कार्यक्रम और फिर वापिस अपने अड्डे पर । कल हमे देखना था सिटका । अलास्का की पुरानी राजधानी
तो दूसरे दिन सुबह सुबह तैयार होकर निकल पडे सिटका देखने । यह हमारा आखरी पडाव था इसके बाद तो एक दिन सफर और फिर वापिस वेनकुअर । सिटका भी केचिकन तथा जूनो की तरह बहुत खूबसूरत है । पहाडी घुमावदार रास्ते बर्फ से ढके पहाड और सुंदर सुंदर छोटे छोटे घर । सिटका जाने के लिये हमे हमारे शिप से हमें एक छोटी बोट में बैठना पडा जो हमे सिटका ले गई ।
सिटका का नाम यहां के मूल निवासियों की भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है द्वीप के बाहर बसे लोग । यह पहले रशियन अख्तियार में था इसीसे यहाँ रशियन तथा मूल अमेरिकन निवासियों की मिलीजुली संस्क़ृति दिखती है । शुरु में यहां की आमदनी भी सोने की माइनिंग तथा मछली उद्योग से ही होती थी । यहां की जनसंख्या है केवल ८००० और इनमे करीब १८% यहां के मूल निवासी हैं ।(देखें विडियो )

सिटका में हमने फिर टैक्सी ली टैक्सी चालक एक लडकी थी नीना उसकी टैक्सी पर भी नीनाज टैक्सी लिखा हुआ था । उसने कहा कि वह हमें पहले ग्रिजली बेअर दिखाने ले जायेगी और बाद में यहाँ की चॉकलेट फेक्टरी । बाकी चीजों के लिये तो आपको हेलीकॉप्टर या बोट राइड लेनी होगी । हम ने व्हेल वॉचिंग पहले केपकॉड में भी की थी तो सोचा चलो ठीक है ।

तो पहले गये हम भालू देखने । वहां के प्रवेश द्वार पर ही एक तालाब मे खूब सारी बत्तखें थीं
हमें देखते ही खाना मांगने लगीं । हमारे पास तो कुछ था भी नही उन्हें देने के लिये पर वहां के जेनीटर ने बताया कि आज इनका ब्रेकफास्ट लाने वाला आदमी लेट हो गया है इसीसे इतना चिल्ला रहीं हैं । वैसे भी इन्हें आप कुछ खाने को नही दे सकते । बाद में भालू भी देखे बडे बडे पर थोडे सुस्त से थे ।(देखें विडियो )

थोडी देर वहां रुक कर फिर चॉकलेट फेक्टरी गये । जातेही हमें सेंपल के तौर पर एक एक चॉकलेट मिली । बाद मे फेक्टरी भी देखी और चॉकलेट भी खरीदे । छोटी सी फेक्टरी थी इसे देख कर सालों पहले ग्वालीयर में देखी जे बी मंघाराम की बिस्किट फेक्टरी की याद आ गई । (देखें विडियो )

टैक्सी से वापस अपने ठिकाने आगये जहाँ से हमें बोट में बैठ कर शिप तक पहुंचना था ।
इस बार हम खाना खाकर विजय के साथ कसीनो भी गये पर किसी को भी खेलना आता नही था । विजय से ही सीख कर थोडी देर खेले, जब एक डॉलर खत्म हो गया तो वापिस रूम पर आ गये । डेक पर गये एक केबल कार ऊपर जा रही थी उसकी तस्वीरें खींचीं ।
कल सारा दिन शिप पर ही रहना था और फिर परसों सुबह वापिस वैनकुअर । हमने तय किया कि कल भी हम सारा शिप एक बार फिर से घूम कर देखेंगे कुछ चीजें खरीदेंगे अगर ठीक लगीं तो और क्रूझ का भरपूर मजा लेंगे क्यूं कि कल के बाद तो इस शिप को, इस वीआयपी ट्रीटमेन्ट को अलविदा कहना है । और हाँ अपना सोने का नेशनल प्रोग्राम वह भी करना ही है ।
और सब कुछ ठीक वैसा ही किया । पर हमें और भी बहुत से काम करने थे मसलन सारे वेटर्स और अटेन्डन्टस को शिप के नियमानुसार टिप देनी थी । इन लोगों की तनखा तो बहुत कम होती है टिप्स पर ही सारा दारो-मदार रहता है । इसलिये शिप का मेनेजमेंट आपको इस संबंध में गाइड करता है । तो हमने वे फॉर्मस भरे और उनके सर्विसेस के लिये उन्हे नवाजा भी । वाकई बहुत अच्छी सर्विस दी सबने हमारे अटेंडेन्ट Clemence तो पता नही कितनी बार हमारा कमरा ठीक करता रहता था । जब भी हम बाहर से आते कमरा और बाथरूम हमेशा चकाचक मिलते । (देखें विडियो )

रोज ताजे फूल और फल लाकर रखता और केन्डीज़ भी । उसी तरह हमारे फॉर्मल डाइनिंग रूम का गोवानीज़ वेटर Marvin, हमारे लिये आउट ऑफ वे जाकर पसंद का खाना पेश करता । वह रहने वाला भी ठाणे का था जहाँ हमारे देवर देवरानी का घर है तो थोडा भावनात्मक जुडाव भी हो गया था । और हाँ जनरल डाइनिंग के स्टर फ्राय बनाने वाले बंगाली बाबू पॉल जी को कैसे भूल सकते हैं हमे देखते ही बढिया सी स्टर फ्राय पेश करते थे । और हाँ हमें बैग्स भी तो पैक करनी थी ।

(क्रमश:)

रविवार, 7 सितंबर 2008

अलास्का क्रूझ-५



सुबह सुबह सब लोग जल्दी उठे । उतरने से पहले नहाना तथा ब्रेक फास्ट करना था । तो जल्दी से तैयार हुए नाश्ता किया और १३ वे डेक पर आकर खडे हो गये ।(देखें विडियो )

शिप की चाल अब धीमी हो गई थी और बस अब आने ही वाला है केचिकन ऐसा लगते लगते पूरा एक घंटा बीत गया तब जाकर केचिकन की कोस्ट लाइन दिखना शुरू हुई ।(देखें विडियो )

इसके करीब आधे घंटे बाद हमारा शिप डॉक हुआ । और हम अपने अपने आय कार्ड और मनी बैग लेकर क्यू में लग गये ताकि उतर सकें । केचिकन के लिये हमने कोई शिप के द्वारा आयोजित टूर के टिकिट नही लिये थे क्यूं कि वे थे मोटर बोट से वॉ’टर वर्ल्ड की सैर , या प्रायोजित टूर । हमने तय किया कि हम उतर कर टैक्सी लेंगे और सारा केचिकन घूम आयेंगे । तो उतरे बाहर निकलते हुए हम में से हर एक को कुछ कूपन मिले वे हमने एकदम सम्हाल कर रख लिये । उतरने के बाद पता चला यहाँ टैक्सी नही है टूरिस्ट बसें हैं और घोडे की बग्घी है । पर दोनो ही बहुत महंगी थीं ३०$ से ४० $ प्रतिव्यक्ती । थोडे और आगे बढने पर हमें टूरिस्ट इनफॉर्मेशन सेंटर दिखा । वहाँ पता चला कि हम १ $ प्रति व्यक्ती देकर एक घंटे तक सारा केचिकन घूम सकते हैं । यह हमें एकदम पसंद आ गया और हम बस स्टेंड पर आकर खडे होगये । पता चला कि बस आने में अभी २० मिनिट हैं उतने में हमें वह दूकान दिख गई जो हमें कूपन के ऐवज़ में फ्री ब्रेसलेट देने वाली थी । और थी भी बिल्कुल ५ मिनिट के रस्ते पर तो मैं और जयश्री दोनो फटाफट जाकर वो ब्रेसलेट ले आये । किसी काम का नही था पर रख लिया कि पोतियों के लिये खेल ही सही । अब तक थोडी थोडी बारिश भी शुरू हो गई थी । वापिस स्टॉप पर आये तब तक बस का भी समय हो चला था और थोडी ही देर में वह आ भी गई । और हम सब बस मे आराम से बैठ गये । बस चली और हमे ड्राइवर बताता जा रहा था कि कौन जगह क्या है ।(देखें विडियो )

सुंदर सा शहर है केचिकन ।. पहाडी घुमाव दार रास्ते । बर्फ से ढके पहाड और नदी झरने और नेटिव अमेरिकन संस्कृति को दर्शाते हुए टोटम पोल । और ढेर सारी हरियाली तथा सुंदर सुंदर फूल ।बीच में एक जगह पानी के पास से बस जा रही थी तो पता चला कि यहाँ नदी में सोना भी मिलता है ।
तो केचिकन तो देख लिया बस में बैठे बैठे । शिप के पास ही आखरी स्टाप था तो उतर कर
वापिस शिप पर । जल्दी जल्दी लंच के लिये गये और बढिया सा खाना खाया तरह तरह के आईसक्रीम और कुकीज भी थीं तो सोचा क्यूं न डिझर्ट भी हो जाये । विजय को आइसक्रीम का बडा शौक था । तो वे तो रोज ही तरह तरह की आइसक्रीम ट्राय करते थे ।
और क्यूंकि केचिकन देख कर थक गये थे तो दोपहर में सोने का कार्यक्रम बना था । शाम को चाय के बाद थोडा डेक पर चले । इतने मे डिनर टाइम हो गया । हमारी जिंदगी जैसे थोडी थोडी खाने के बीच बीच में ही चल रही थी । हम डिनर के लिये जा रहे थे कि हमारी एक सहयात्री ने कहा,” अरे इतनी भूक लग रही है, पिछले १५ मिनटों से मैने कुछ भी नही खाया है”। कहा तो गया था ये मजाक में, पर सचाई इससे बहुत अलग नही थी । पर फॉर्मल डिनर का हमें फायदा ही हुआ कि हम थोडा, कम से कम डिनर पर, ओवर-ईटिंग से
बच गये ।
हमारे गोवानीज़ वेटर ने जब देखा कि हम देसी लोगों को रोज़ रोज के इस साहबी खाने में कुछ मजा नही आ रहा तो उसने कहा कि वह अपने हेड-वेटर से बात करके हमारी पसंद का
खाना बनवाने की कोशिश करेगा । पर खाना अच्छा ही था सिर्फ वेज़ लोगों के लिये वेरायटी थोडी कम हो जाती थी ।
उस दिन डिनर के बाद मूवी दिखाने वाले थे, कसीनो रॉयल । तो सबने मूवी देखी जो १० बजे खत्म हुई । कमरे में आकर हमनें अब तक की अपनी की हुई सारी शूटिंग देखी और सो गये । कल हमें देखना था हबर्ड ग्लेशीयर । इसके लिये हमें कहीं उतर कर नही जाना था । शिप में बैठे बैठे ही देकना था इसे ।(देखें विडियो)

ग्लेशियर होता क्या है इसके बारे में जानकारी देने के लिये सुबह एक लेक्चर भी अरेंज किया था शिप पर ।
ग्लेशियर एक बडी सी खूब धीरे बहने वाली बर्फ की नदी होती है जो बर्फ के सतह पर सतह जमा होने से बनती है यह ग्लेशियर अक्सर वातावरण के दाब से प्रभावित होता रहता है । जिससे बर्फ के बडे बडे शिला खंड या छोटे छोटे टुकडे टूट कर गिरते रहते हैं ।ठूटते समय इनमें से कभी धीमी तो कभी तेज विस्फोट की तरह आवाजें निकलती रहती हैं । इन शिलाखंडों को आइसबर्ग कहते हैं । आइस बर्ग का केवल दसवां हिस्सा ही पानी के ऊपर तैरता है ऐसा समुद्र के पानी और शुध्दबर्फ के घनत्व में फर्क के कारण होता है ।(देखें विडियो )

दूसरे दिन सुबह देखा कि शिप बिलकुल पतली सी पानी की लेन में से जा रहा है । इसको इन वॉटर्स कहते हैं । समुद्र तो लग ही नही रहा था । पर हम बालकनी छोडकर गये ही नही कहीं, ब्रेकफास्ट और लंच पर भी खिडकी के पास ही जगह ढूढ ली । धीरे धीरे पतली गली छोडकर शिप थोडे चौडे पानी में आगया और पानी में बर्फ के छोटे छोटे टुकडे दिखाई देने लगे ।
धीरे धीरे इन टुकडों की संख्या और आकार बढने लगे । शिप मे से तो यह ऐसा लग रहा था जैसे अस्पताल का कचरा समुद्र में फेंक दिया हो । पर हमारा शिप बहुत सम्हाल सम्हाल कर धीरे धीरे चल रहा था ताकि किसी बर्फ की शिला से टकरा ना जाये ।(देखें विडियो )

और थोडी ही देर में जिसका सुबह से इन्तजार था वह हबर्ड ग्लेशियर दिखाई देने लगा । एक लंबी चौडी बर्फ की शिला की तरह ही दिख रहा था वह जिसका ओर छोर दिखाई नही दे रहा था । कितनी तो इसकी सतहें थीं, और कितने तो रंग दिख रहे थे इन बर्फ के सतहों में नीले रंग का बर्फ जो सबसे पुरानी पर्त को दर्शा रहा था ( ग्लेशियर की यह सतह करीब ४०० साल पुरानी है )।, और सफेद रंग का बर्फ सबसे नवीन पर्त को । बीच बीच में हरे और मटमैले रंग भी थे जो बर्फ में अटके हुए वानस्पतिक अवशेषों को दर्शा रहे थे ।(देखें विडियो )

हबर्ड ग्लेशियर एक टाइडल वॉटर ग्लेशियर है जो करीब १२२ किलोमीटर लंबा है । इसका मूल स्त्रोत समुद्री सतह से ११,००० फीट ऊँचा है । यह ग्लेशियर अभी भी बढता जा रहा है ।
जब कि दूसरे ग्लेशियर कम होते चले जाते हैं ।
जीवन में पहली बार ग्लेशियर को देखा । हमारा शिप करीब आधा मील दूरी पर था । शिप भी चारों तरफ से घूम घूम कर ग्लेशियर दिखा रहा था तोकि कोई भी देखने से वंचित ना रह जाये । हम भी भाग भाग कर सब तरफ से व्यू देख रहे थे और तसवीरें खींच रहे थे ।(देखें विडियो )

हम में से हर एक ने बहुत सारी तसवीरे खींचीं और ग्लेशियर के बैकग्राउंड में अपनी अपनी खिंचवाईं भी । काफी देर तक करीब डेढ घंटा वहां रुकने के बाद शिप धीरे धीरे चल पडा । बाकी सारा दिन कैसे बीता पता ही नही चला ।
शाम को डिनर और उसके बाद का एन्टरटेनमेंट तो अच्छा था ही हमारा सबका ग्लेशियर को लेकर बातों का सेशन भी बढिया रहा । कल देखना था जूनो या जुनोऊ, अलास्का की राजधानी उसी की खुशी में रात बीत गई ।
(क्रमश:)

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

अलास्का क्रूझ- ४

आराम से सोफे पर, बिस्तर पर पसर कर बैठे ही थे कि अनाउन्समेन्ट हुआ कि साढे चार बजे सेफ्टी ड्रिल के लिये जाना है । देखा कि सवा चार तो बज चुके हैं चाय की बडी तलब लग रही थी । पता चला कि टॉप डेक पर चाय नाश्ते का इंतजाम है तो पहुँच गये ये सोचकर कि चाय तो पी ही सकते हैं । और चाय पी कर वापिस रूम पर आये ड्रिल के लिये सेफ्टी जैकेट जो रूम में रखा था लिया और पहुंचे पांचवे डेक पर । यह शिप १२ मंजिला था जिसके ४ थी से लेकर १२ वीं मंजिल तक क्रूझर जा सकते थे। नीचे की तीन मंजिल स्टाफ के लिये थीं जिनमें कोई व्यू नही था, पानी के नीचे जो रहती थीं । सारे पेसेंजर्स के लिये यह ड्रिल अटेंड करना जरूरी था तो बार बार पुकार लगाई गई जब तक सारे आ नही गये और फिर बताया गया कि सेफ्टी जैकेट कैसे पहनते हैं और बोट्स कहाँ रहती हैं इमरजेन्सी में कैसे डेक ३ पर पहुंचना है वगैरा वगैरा (इसका विडियो पिछले भाग में देख सकते हैं) । हमारा सामान अब तक नही पहुँचा था तो हम रिसेप्सन पर जाकर जो कि डेक ५ पर था रिपोर्ट कर आये पर मेनेजर ने कहा कि चिंता की कोई बात नही है आपका सामान पहुंच जायेगा। फिर भी ऊपर आकर हमने रूम अटेंडंट से पता लगाने को बोला और उस ने सामान आखिर लाकर दे ही दिया .

वहाँ से आये तो पता चला हमारा डिनर टाइम हमारे अपग्रेडेशन के साथ ही अपग्रेड हो गया है यानि ८ बजे के स्थान पर ६ बजे । इतने जल्दी खाने की हम देसी लोगों को आदत तो नही थी पर करते क्या सुंदर कमरे के साथ हमारे खाने का टाइम भी अपग्रेड हो गया था ।
इतने में ही शिप चलने लगा इसी लिये हम सब बालकनी में आकर खडे हो गये । हमारे कमरे साथ साथ और बालकनी दोनों कमरों की साथ साथ ही थी । समंदर की लहरें शाम के रंग और धीरे धीरे आगे को बढता जहाज हम सभी इस का आनंद उठा रहे थे । तय किया कि आज तो हम जनरल डायनिंग में ही खाना खायेंगे । कल से देखते हैं फॉर्मल डायनिंग का शो । और हम सारे थोडी देर लेट गये फिर आराम से साढे सात बजे तैयार हुए और खाना खाने पहुंच गये । और क्या खाना था,(देखें विडियो )

इटालियन पास्ता, सलाद, सूप तथा पिज्जा । खाया पीया और रूम पर वापिस आये तो हमारा रूम अटेंडेंट हमारी राह देख रहा था बोला , “अरे आप फॉर्मल डाइनिंग में नही गये आपके टेबल पर कोई नही था और वहां का वेटर भी गोवा का है आप लोगों के न जाने से उसकी बडी निराशा हुई । वह तो आपकी उत्सुकता से राह देख रहा था” । तो उसे, कल अवश्य जायेंगे बोल कर रूम मे आ गये और जिसको किताब पढनी थी वो किताब पढने मे लग गया जिसे टी वी देखना था उसने टी वी देखा और सो गये । अगले दिन सारा दिन ट्रेवल ही करना था ।
हम में से सुहास ,सुरेश और प्रकाश जल्दी उठने वालों में से थे तो उनका सुबह जल्दी उठ कर सनराइज़ यानि सूर्योदय देखने का प्रोग्राम बन गया मै, जयश्री और विजय ठहरे सूर्यवंशी तो हमने तो ७ बजे तक सोने का तय कर लिया था । चाय–कॉफी तो सबसे ऊपर यानि १२ वे डेक पर रात १० बजे तक और सुबह फिर ६ बजेसे मिलने लगती । तो जब मेरी आंख खुली साढे ६ बजे तो जयश्री तैयार थी मै उठी तो उसने पूछा ,चलें ऊपर, सब लोग तो चले गये । हाँ बस ५ मिनिट कह कर मैं भी बाथरूम मे जाकर जल्दी जल्दी तैयार होकर आ गई ।

हम दोनों डेक पर जाने के बजाय सीधे रेस्तराँ मे गये और एक एक कप चाय पी । डेक पर आये तो ये तीनों अपने केमरे वैमरे सहित वापस रूम में जा रहे थे । हम दोनों ने डेक पर कम से कम ६ चक्क्रर लगाये । नीचे आये तो रूम में आज के कार्यक्रम का फ्लायर पडा था यह प्रोग्राम जरूर देखना है मैने फ्लायर देख कर कहा । रात को ८ बजे डांस प्रोग्राम था ।
वैसे दिनभर लेक्चर , योगा, जिम, स्विमिंग, हाउसी, वॉल क्लाइंबिंग जैसे कई कई कार्यक्रम थे जयश्री का और मेरा बडा मन था तंबोला खेलने का पर वह तो १० बजे से था और शुरू हो चुका था । पर हम सब मिलकर यानि दोनों कमरों की जनता, पहले नाश्ते के लिये गये जहाँ अमेरिकन और एशियन और यूरोपियन नाश्ता हमारा इन्तजार कर रहा था । नाश्ता किया और पूरा शिप देखने चले गये ।
सारे डेक घूम घूम कर देख लिये । असल डेक थे ५,६,७,११,और १२ कहीं केप्टन साहब का स्पेशल क्लब था तो कहीं शापिंग और कहीं कसीनो और ७ वे पर था फॉर्मल डाइनिंग हॉल
और थिएटर ,११ वी पर ही हमारे कमरे थे और एक्झीबीशन। बाकी डेक्स पर रहने के कमरे थे या स्वीटस थे । १२ वे पर जनरल डाइनिंग था एक तरफ एशियन ओर दूसरी तरफ अमेरिकन और युरोपियन बाहर की तरफ स्विमिंग पूल थे, चलने का ट्रेक था और और ऊपर जाने की सीढी यानि १३ वे डेक पर जहां सिवा डेक के और कुछ भी नही था । पर वहाँ से व्यू एकदम साफ था ।
फिर लंच करने गये सच मानिये सजे हुए खाद्य पदार्थों को देख कर भूख भी खूब लगती थी
और मैने तो तय कर लिया था वजन बढने की बिलकुल परवाह न करते हुए खाना भी खूब एन्जॉय करना है । उस दिन हमने एशियन लंच किया खूब बढिया स्टर फ्राय था जिसे बनाने वाले थे एक बंगाली बाबू । पर क्या स्टर फ्राय बनाते थे । मसाले, लोग देख कर और हां पूछ कर भी , डालते थे । इसके अलावा सूप सेलेड और, और भी बहुत सी चीजें थीं । मांसाहारियों की तो खासी मौज थी पर हमारे लिये भी बहुत वेरायटी थी । एक दो इंडियन चीजें भी होती ही थीं ।
खाना वाना खाकर थोडी देर रूम में आकर सारे पसर गये ।
आज फॉर्मल डिनर के लिये जाना था ६ बजे तो सारे लोग तैयार हुए अपने अपने बेस्ट अटायर में । रात को ८ बजे फिर डांस प्रोग्राम भी देखने जाना था । तो ठीक ६ बजे पहूंच गये । हमारा वेटर जो गोवा का था तेजी से हमारे पास आया और हमें अपने टेबल पर ले गया टेबल ८ लोगों का था । हमारे साथ एक गोरा कपल भी था । उस दिन तो उन लोगों ने बडे प्यार मोहब्बत से बातें की पर अगले ही दिन से उनहोने अपनी टेबल बदल ली ओर हमने भी चैन की सांस ली । हमारी प्रायवेसी जो वापिस बहाल हो गई थी । उस दिन तो हमारा डिनर मेनू फ्रेंच था और छोटे छोटे पोर्शन बडे नजाकत और नफासत से पेश किये गये। पांच कोर्स डिनर था । परोसने और खाने में पूरे पौने दो घंटे लग गये । फिर वहां से फारिग हुए तो पहुँच गये डांस देखने और खूब मजा आया ।
लौट कर जिसने जो करना था किया पर पहले शैंपेन खोली और सेलिब्रेट किया । अगले दिन हमें देखना था केचिकन ।
(क्रमश:)

रविवार, 31 अगस्त 2008

सात राज्यों की सैर और अलास्का क्रूझ-3


इक्कीस जून की सुबह जल्दी उठ कर नहा धो कर तैयार हो गये । नाश्ता किया और सामान लेकर पहुंचे रेल्वे स्टेशन । अजित, साँन्ड्रा और कुसुम ताई सब हमें छोडने आये । कुसुमताई अब हमें माधुरी (प्रकाश-जयश्री की बेटी ) के यहाँ मिलने वाली थीं मिनियापोलिस (मिनिसोटा) में, अलास्का तो वे २-३ बार देख चुकीं थीं । अमेरिका में रेल-यात्रा का हमारा यह पहला मौका था । ट्रेन में अभी वक्त था तो पहले तो सब ने खूब गप्पें मारी ।

फिर जब
पता चला कि यहाँ रेल में भी एयर-लाइन की तरह सामान चेक-इन कराना पडेगा । तो वह किया । बाकायदा सारी सूट केसेस का वजन हुआ और उनको रेल्वे वालों ने अपने कब्जे में ले लिया । हमारी तो मौज हो गई सिर्फ हैन्ड-लगेज लेकर चढ गये डिब्बे में । राजधानी की तरह आराम-देह ट्रेन और राजधानी से कहीं ज्यादा साफसुथरी, मेरा मतलब राजधानी एक्सप्रेस से है । और लोग कम । तीन घंटे का सफर था सीएटल तक का । हम जाकर उनका केन्टीन भी देख आये । अब तक हम अमेरिका में भी खाना साथ ले कर चलने का महत्व समझ चुके थे तो इस बार भी वही किया था । (चित्र शो)

तो अपना खाना और रेल्वे से खरीदी कॉफी बस हो गई पेट पूजा । सीएटल पहुँचे, उतर कर देखा हमारा सामान स्टेशन के अन्दर बडे सलीके से रखा हुआ है । सामान लिया । और स्टेशन से बाहर आकर बैठ गये । स्टेशन का फाउन्टेन खराब था तो पानी खरीद कर पीना पडा ।
वहाँ से हमें चार बजे बस लेनी थी वेनकुअर (कनाडा ) के लिये । ठीक चार बजे बस आई हम तो वैसे ही बैठे बैठे बोर हो रहे थे तो बस के आते ही चढने को लालायित हो उठे । लेकिन ड्राइवर ने हमें अपने टाइम से ही चढने दिया । पंधरा मिनिट के बाद बस मे बैठे। बस भी हमारी वॉल्वो बसेस की तरह ही थी । मुश्किल से एक सवा घंटा बस चली होगी कि रुक गई बस । अब क्या, यह प्रश्न हमारे दिमाग में उथल पुथल मचाने लगा ।
ड्राइवर ने बताया कि यहाँ इमिग्रेशन होगा क्यूं कि बस केनडा में यानि दूसरे देश में प्रवेश करने वाली है । सारा सामान उतारा, पासपोर्ट आदि लेकर खडे हो गये छहों के छहों लाइन में । इस पूरी उठापटक में ४० मिनिट चले गये सोचा कि अब तो पहुँचने में देर हो जायेगी पर ट्रेवल टाइम में यह ४० मिनिट भी इनक्लूडेड थे । तो बस और डेढ घंटे बाद ड्राइवर ने बताया कि यह बस वेनकुअर मे ३ जगह रुकेगी । रिचमंड और डाउन टाउन वेनकुअर ।
हमारा होटल टेवल-लॉज रिचमंड में था तो हम वहीं उतरे और कहाँ तो हम सोच रहे थे कि वेनकुअर से रिचमंड ३०-३५ डालर खर्च होंगे तो यहाँ तो हमें हमारा होटल बस में से ही दिखाई दे गया । उतरने के बाद महज ४-४ डॉलर में हम अपने होटल पहुँच गय़े । बडा सुंदर होटल था और कमरे भी अच्छे थे । मैं, जयश्री और सुहास एक कमरे में तथा सुरेश, प्रकाश और विजय कमरे में तो दो ही कमरों में काम हो गया था । थकान हो गई थी तो वैनकुअर देखने का विचार रद्द कर दिया और शाम को पिज्जा मंगवा कर खाया । TV पर हमारी अब तक की शूटिंग देखी । जाकर पता किया कि होटल से port तक जहाँ से हमारी क्रूझ शुरू होनी थी कोई ट्रांसपोर्ट है या नही पता चला कि होटल से ही बस जाती है और उसका टिकिट है १० $ प्रति व्यक्ती । पर जाना तो था ही । बस सुबह ११ बजे जाने वाली थी।(चित्र शो)

तो हम जल्दी सो गये ता कि थकान अच्छी तरह उतर जाय ।
तो भाई दूसरे दिन सुबह सब लोग आराम से उठे सुहास और मैने प्राणायाम भी किया ।
तैयार हुए और नाश्ता किया फिर होटल के आसपास थोडा घूमें । एकदम से याद आया कि समीर भाई तो इसी देश में रहते हैं पर पता किसे मालूम था नही शहर का नाम तक तो पता नही , तय किया कि घर जाकर उडन तश्तरी देखनी पडेगी पते के लिये । वैसे मेरी ये सोच बिलकुल उन दादी माँ जैसी थी जो भारत में अक्सर मुझसे पूछती हैं,” हमारे दिनू से मुलाकात होती है क्या कभी, वह भी तो अमरीका में ही रहता है “।
बस ठीक ११ बजे आई, पर हमारी कुलबुलाहट ने हमें १०:३० से ही रिसेप्शन पर लाकर बैठा दिया । खैर बस अपने टाइम पर ही आई और हम चल पडे गंतव्य की और । रास्ते में खिडकी से झाँक झाँक कर देखते रहे कि थोडा सा वेनकुअर ही देख लें । करीब डेढ घंटा लगा हमें पहुंचने मे । और पहुंच गये हम पोर्ट पर । और पोर्ट के अन्दर दुकानें भी थीं और हमें वहाँ मिल गये समोसे । हम में से कुछ लोगों का संकट चतुर्थी का उपवास था तो वे तो
बस देखते ही रह गये । और हम बाकी लोगों ने मजे किये समोसा और चाय के साथ ।
फिर इंतजार करते रहे कि कब शिप पर बुलावा आये । शिप को तो ५ बजे चलना था ।
पर लगभग ३ बजे हमें बुला लिया गया और फिर वापिस इमिग्रेशन क्यूंकि शिप तो यू एस
जा रहा था अलास्का । (चित्र शो)

इमिग्रेशन के बाद हमने शिप में प्रवेश किया और चेक इन किया तो हमें हमारे कमरे की कार्ड चाभी मिल गई । अपने कमरे के सामने आकर खडे हो गय़े ( कमरा नंबर हमें पहले ही मिल चुका था), और चाभी लगाई पर यह क्या, कमरा तो खुला ही नही । हम परेशान फिर वहाँ के फ्लोर अटेंडेंट से मदद मांगी । उन्होने भी कोशिश की पर कमरा फिर भी नही खुला फिर उस अटेंडेंट ने रिसेप्शन पर जाकर पता किया तो पता चला कि हमारे कमरे बदल गये हैं यानि अपग्रेड किये गये हैं । सुहास ने क्यूंकि बुकिंग काफी जल्दी करा ली थी और बाद में और ज्यादा लोगों ने बुक कराया तो हमें कमरे, ऊपर के फ्लोर यानि पेंटहाउस फ्लोर पर मिल गये । अटेंडंट ने कहा कि हम उसके साथ चलें वह हमें कमरे तक पहुंचा भी देगा और हमारा सामान भी हमें वहीं मिल जायेगा । तो हम गये साहब और उसने कमरा खोल भी दिया और हम महिलाएं अपने कमरे में और पुरुष अपने कमरे में गये और क्या कमरे थे सुखद अनुभव था । सारी झंझट को भूल गये ।(चित्र शो)

खूबसूरत डबल बेड और तीसरे व्यक्ति के लिये सोफा कम बेड । बडे टेबल पर ताजे फूल । एक टोकरी में फल और साथ में एक शेंपेन की कॉम्लीमेंट्री बॉटल । साइड टेबल पर टेबल लैंप, हरेक के लिये २-२ केन्डी एक छोडासा सुंदर सा बाथरूम , एक क्लॉझेट और पीछे के दरवाजे के बाहर एक खूबसूरत नज़ारा दिखाती हुई बालकनी । अब आयेगा मजा क्रूज का ।

(क्रमश:)

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

सात राज्यों की सैर और अलास्का क्रूझ-2

दूसरे दिन सुबह चार बजे उठ गये ८ बजे की फ्लाइट जो पकडनी थी । और फ्लाइट वॉशिंगटन डी सी से लेनी थी । पोर्टलेंड में ३-४ दिन अजित (बडी दीदी का बेटा ) के यहाँ रुकना था । सफर में ८ घंटे लगने वाले थे । हालाँकि वेस्ट कोस्ट तीन घंटे पीछे होने की वजह ले पोर्टलेन्ड समय के अनुसार तो हम साढे ग्यारह बजे ही पहुंचने वाले थे । इतने सब लोगों के लिये खाने पीने की खूब सारी चीजें ऱख लीं और तो और पूरी आलू भी बनाकर ले लिये । ताकि शिकागो एयर-पोर्ट पर जहाँ से पोर्टलेंड की फ्लाइट लेनी थी, खाने पीने के पैसे बच जायें । यकीन मानिये उस आलू-पूरी में वह मजा आया कि कोई भी पिझ्जा विझ्जा उसके सामने पानी भरता नजर आता । तो पोर्टलेंड समय के अनुसार साडेग्यारह बजे हमारी उडान पहुँच गई ।


अजित हमें लेने आया था । अजित की पत्नी सांड्रा अमेरिकन है परंतु उसके घर जाते ही एक सरप्राइझ हमारा इंतजार कर रहा था । सांड्रा ने हमारे लंच के लिये विशुध्द भारतीय खाना तैयार किया था दाल सब्जी और रोटी । कुसुम दीदी की एक दोस्त चित्रा भी पोर्टलेंड में ही रहतीं हैं उन्होने चटनी रायते की व्यवस्था कर दी थी । हम तो इस बहू के कायल हो गये ।
विदेशी होकर भी देशी सासों, ससुरों के लिये इतनी मेहनत ।

खाने के बाद अजित हमें एक सुंदर सा जलप्रपात (फॉल) दिखाने ले गया । नाम आप चित्र में देख सकते हैं । बहुत ही सुंदर फॉल और खूबसूरत दृश्य । मै, मेरे पती सुरेश और देवर प्रकाश ऊपर तक जाकर बिलकुल नजदीक से फॉल देख कर आये । (चित्र शो) इसके बाद अजित हमें उसका लॉ कॉलेज दिखाने ले गया । सबसे पहले अमेरिकन ट्रेव्हलर्स लुईस और क्लार्क के नाम पर है यह कॉलेज और बहुत ही खूबसूरत परिसर । बहीं से देखा बर्फ से ढका माउन्ट सेंट हेलन ।(चित्र शो)

दूसरे दिन नाश्ते के बाद हम सब अजित के साथ रोज़-गार्डन गये । कुसुम दीदी घर पर ही रुक गईं बहू की मदद के लिये । और क्या कमाल का रोज़-गार्डन था वह । जिधर तक नजर जाये गुलाब ही गुलाब । छोटे गुलाब बडे गुलाब पीले गुलाब, सिंदूरी गुलाब, जामुनी गुलाब, शेडेड गुलाब, गुलाबी और सफेद तो थे ही उसके अलावा मेरून के विविध शेडस् लाल के विविध शेडस् एक लाल गुलाब तो इतना गहरा कि उसे नाम देना पडा ब्लेक रोज़ । करीब २-३ घंटे उस गुलाबी बागीचे में घूमते रहे । जिधर देखती हूँ उधर तुम ही तुम हो वाला हाल था । यहाँ हर साल गुलाबों की प्रतियोगिता होती है और सर्वोत्तम गुलाब को इनाम भी मिलता है और वह इस बागीचे का हिस्सा बन जाता है । ऐसे कई प्राइझ विनिंग गुलाब (चित्र शो)

इस बागीचे में देखने को मिलते हैं । हम सब ने खूब तसवीरें खींची और खिंचवाईं । ( स्लाइड शो देखें और साथ साथ दुर्गा स्तुति का आनंद लीजीये) ।

अगले दिन हमें स्टर्जन एक्वेरियम और सामन लेडर देखने जाना था । तो हम सुबह सुबह तैयार होकर चल पडे । तो पहले गये स्टर्जन पार्क यह एक एक्वेरियम है जहाँ बडी बडी स्टर्जन मछलियाँ हमने देखी । उनकी हेचरीज भी देखीं । फिशरीज़ की पढाई करने के बावजूद कभी ऐसी बडी मछलियाँ प्रत्यक्ष देखने का मौका नही लगा था । बहुत मजा आया । वहीं पर कुछ काली और मोरपंखी रंग की बतखें भी देखी ।(चित्र शो)

फिर गये पॉवर हाउस जहाँ पर हमें सामन सीढी (Salmon Ladder) देखने जाना था । यह प़ॉवर हाउस कोलंबिया नदी पर स्थित है और इसका पात्र इतना चौडा है कि समुद्र ही लगता है । सामन एक समुद्री मछली होती है जो सिर्फ प्रजनन के लिये मीठे पानी में सही कहें तो एस्चूरी (जहां नदी समुद्र से मिलती है) में आती हैं और यह समुद्र से नदी तक का सफर बहुत मुश्किल होता है क्यूं कि प्रवाह के विरुध्द तैर कर आना पडता है (नदी का पानी तो तेजी से समुद्र से मिलता रहता है) इनकी सुविधा के लिये बांधों में इस तरह की सीढीयाँ बनाई जातीं हैं ताकि इन मछलियों का प्रवास थोडा बहुत सुखकर हो और प्रजनन में बाधा न पडे । इसमें भी इन्सान का निजी स्वार्थ तो होता ही है । (चित्र शो)

ये सीढियाँ इस तरह बनाई जातीं हैं कि मछली नदी की तरफ आगे को चली जाये और पानी भी इस तरह छोडा जाता है कि उसमें वेग तो हो पर इतना भी नही कि मछलियाँ थक कर वहीं दम तोड दें । चालीस साल पहले पढी हुई बातों को सामने घटते देखा तो बडा मजा आया । ये मछलियां प्रजनन के बाद थक कर दम तोड देती हैं पर उनके बच्चे थोडी ताकत आते ही वापस समुद्र में चले जाते हैं ।(चित्र शो)

घर आये तो लंच तैयार था । खाना खाया गप्पें मारीं ओर थोडा लेटे । फिर अजित और सांड्रा का पियानो सुना । दोनो बहुत अच्छा पियानो बजाते हैं । अजित ने तो इंजीनियरिंग और लॉ के साथ साथ म्यूजिक मेजर भी किया है । (चित्र शो)

अगले दिन अजित हमें जंगल में ट्रेल-वॉक के लिये ले गया । जिंदगी में पहली बार ट्रेल पर गये। वैसे तो छोटी सी ट्रेल थी कोई २० मिनट की वॉक पर जंगल काफी घना था । एक पगडंडी पर चल रहे थे हम । तरह तरह के पेड पौधे ऊँचे ऊँचे भी इतने कि मानो आसमान छू रहे हों और छोटे झाडीनुमा भी और बीच के से पेड भी जैसे हमारे यहाँ आमतौर पर दिखते हैं । (चित्र शो)

खूब इच्छा थी जानने की कौनसा पेड कौनसा है , पर मेपल, ओक, पाइन और सायकस और क्रिसमस ट्री के अलावा ज्यादा किसी को कुछ मालूम नही था । धूप बहुत छन छन के आरही थी । इसीसे सब बहुत सुखद लग रहा था । पक्षी थे पर बडे पशु नही दिखे गनीमत । मोटी मोटी गिलहरियाँ जो सब जगह दिख जातीं हैं अवश्य दिखीं । रात का खाना हमारा चित्रा और कुमार (कुसुम दीदी के मित्र) के घर था । दूसरे दिन सुबह ११ बजे की हमारी ट्रेन थी सीएटल के लिये । साँन्ड्रा ने हमारे टिकिट पहले से ही निकाल रखे थे ।
(क्रमश:)

शनिवार, 23 अगस्त 2008

सात राज्यों की सैर और अलास्का क्रूझ

मार्च की बात है रात को ऐसे ही लेट कर एक किताब पढ रही थी कि फोन की घंटी बज उठी फोन उठाया तो सुहास (मेरी छोटी ननद) थी लाइन पर । न दुआ न सलाम बस छूटते ही बोली, “इस बार पक्का अलास्का जा रहे हैं भाभी, और तुम लोग भी आ रहे हो” ।


“क्या अलास्का, पता है कितनी ठंड होगी वहाँ और मेरा आरथ्राइटिस, मेरे घुटने जाम करवाने हैं क्या”, मेरा जवाब । अरे क्रूझ पर जा रहे हैं, शिप में, पैदल नही । और हर बार तेरे लिये तापमान देख कर जगह चुनेंगे तो बढिया बढिया जगह कैसे देख पायेंगे । तू चल तो कुछ नही होगा तेरे घुटनों को और मुझे देख मै कुछ कह रही हूँ ३ साल बडी हूँ तुझसे । और तय हो गया कि इस बार जैसे ही अप्रेल में हम यू.एस. पहुँचेंगे एक डेढ महीने बाद ही हमें बडी दीदी के यहाँ पहुँचना है जहाँ एक लंबा चौडा कार्यक्रम हमारा इंतजार कर रहा होगा ।
और इस प्लान के तहत हम राजू (हमारा बडा बेटा ) के यहाँ से १ जुलै को निकल पडे एन्डरसन (साउथ केरोलाइना) से । हमारा पहला पडाव था ब्लेक्सबर्ग (वर्जीनिया) जहाँ सुरेश की बडी दीदी कुसुम ताई रहती हैं । उनके पास ३-४ दिन रहे उनके साथ मेरी बहुत बनती है, इत्तेफाक से हम दोनों की जन्म तारीख एक ही है । कुसुम ताई को जो मूवी या जो किताब अच्छी लगती है उसे वे बार बार देखती या पढती हैं । उनके यहाँ जोधा अकबर देखी जो उन दिनों की उनकी पसंदीदा मूवी थी मुझे भी अच्छी लगी । वे हमे क्लेटर लेक की सैर कराने ले गईं जो बहुत ही सुंदर लेक है (चित्र-शो में देखें ) । वहाँ से सुहास के यहाँ पहुँचे ६ तारीख को ७ को वहाँ प्रकाश और जयश्री (सुरेश के छोटे भाई और भावज) भी आ गये ।

और फिर १३ तारीख तक हम सब सीनीयर सिटिझन्स ने बडे मजे किये । हम में जयश्री सबसे छोटी थी (५९की) उसे हम बेबी ऑफ दि ग्रूप कहते थे । तो हमने खूब खाने बनायें और खायें भी, जोक्स सुनायें घूमें फिरे और मूवीज देखीं और तो और हिन्दी सीरीयल भी देखें और जम के क्रिटिसाइज़ किया और हँसे भी खूब । सत्य नारायण जी की पूजा भी की मजे उडाते उडाते भगवान जी की याद भी आ गई (न न यह पहले से ही तय था )।
(चित्र शो में देखें )

तेरह को पहुँचे अजय (सुहास का बेटा) के यहाँ, न्यू जर्सी के ओशन सिटी । मनमें थोडी हिचक थी कि इतने सारे लोग जा रहे हैं पहली बार कैसा रहेगा पर खूब मजा आया । अजय ने केवल हम लोगों को घुमाने के लिये वीक-एन्ड फ्री रखा था । पहले दिन शाम को वह हमें ओशन सिटी बीच पर ले गया वहाँ बोर्ड वॉक किया और एक जलेबी नुमा चीज खाय़ी उसे फ्राइड केक कहते हैं जैसे जलेबी के घोल को छोटे छोटे पकोडों के आकार में एक के ऊपर एक चिपका कर एक केक सा बना दिया हो । दूसरे दिन सुबह फिर बीच पर गये पानी में घूमें और रेत का किला बनाने में आकाश (अजय का बेटा) की मदद की । रेत पर चले पर यहाँ शंख सीपी कुछ नही मिले क्यूंकि यह रीक्लेम किया हुआ बीच है । घर आये तो मीनू (अजय की पत्नी) ने पाव-भाजी और सूप तथा सेलेड का प्रोग्राम बनाया था । अमित भी अर्चना और श्रेया के साथ (हमारा छोटा बेटा, बहू, और पोती) आ गया था । खूब मजा आया श्रेया तो जैसे सब के लिये खिलौना बन गई थी (चित्र शो)। शाम को एटलान्टिक सिटी घूमें ये लास वेगास की तरह की ही जगह है सब दूर खाना पीना और कसीनो । पर हर कसीनो है बहुत सुन्दर । कोई ३ मील का बोर्ड वॉक है और कोई २५-३० अलग अलग कसीनो । एक ताज़महल नामका भी कसीनो था । (चित्र शो )

वहाँ पर खूब घूमें । काफी कसीनो देखें भी, पर जूआ नही खेला । पैसे किसके पास थे । पंधरा को सुबह वापिस मार्टिन्सबर्ग । रास्ते में एक फूड कोर्ट में खाना खाया । सतरा की सुबह हमें पोर्टलेन्ड के लिये फ्लाइट लेनी थी ।

(क्रमश:)

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

राखी

आज हिंदु केलेंडर के हिसाब से इस ब्लॉग को एक बर्ष पूरा हुआ । पहली कविता भी राखी पर ही थी और उस पर उन्मुक्त जी की टिप्पणी पाकर बहुत खुशी हुई थी । पूरे साल आप सब ब्लॉग मित्रों का जो स्नेह मिला है उससे बहुत ज्यादा खुशी मिली है मुझे । यही स्नेह बनाके रखें.


भैया तुम राखी पे आते,
कितने बीते सावन हम तुम फिर दोहराते । भैया...

यादों के वे मधुर मधुर स्वर
अपनी अपनी आवाजों में उनको गाते
फिरभी हम कोई बडे गवैया नही कहाते ।भैया...

वो बचपन का छोटा आंगन
आंगन की छोटी फुलवारी
फुलवारी में शायद कुछ कुछ हम तुम बोते ।भैया..


खेल खेल में हँसना रोना
गुस्सा करना और मनाना.
कितने कितने हंगामें तो दिन में होते । भैया...

वो थाली वो दीपक रोली
वो राखी कुछ चमकी वाली
बांधती मैं और तुम जवरन रुपए रख देते ।भैया...

ऱाखी पर अब मिल नही पाते
पर यादों के कितने सोते
इस मनमे अक्सर कल कल कल
बहते रहते । भैया....
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आज का विचार
मुसीबत के हर पहाड के सामने कोई न कोई
चमत्कार जरूर होता है बस प्रयत्न पूरे होना चाहिये ।
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स्वास्थ्य सुझाव
दुबले पतले लोगों को वजन बढाने और स्वस्थ रहने के लिये
१ कटोरी अंजीर , १ कटोरी खूबानी, १ कटोरी बादाम और आधी कटोरी मिश्री
टुकडे कर के एक डिब्बे में रख लें दिन में ३ बार खाय़ें ।
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शनिवार, 9 अगस्त 2008

पंद्रह अगस्त

पात हरे,पातों के बीच रंगबिरंगे
फूल खिले चटखीले, लहरायें ज्यूं तिरंगे
फूल कुछ सफेद और हैं कुछ नारंगी
जैसे धरती माँ की चुनरी हो तिरंगी

ये तो धरा की छवि, और आसमाँ है नीला
और नीले आसमाँ पे सूरज कुछ पीला
पीले सूरज को ढकने आये कुछ बादल
कुठ ऊदे, कुछ सफेद, कुछ काले काजल


जगह जगह झंडे पताकाएँ फहराते
बच्चे कुछ शरमीले, कुछ गीत गाते
भारत माता का ये अर्चन करते हैं
और वीरों का उसके वंदन करते हैं

याद किये जाते हैं वीरों को अपने
जिन्होंने कभी देखे और सच किये सपने
करते हैं प्रतिज्ञाएं कि बनेंगे वीरवर
जियेंगे वतन के वास्ते मरेंगे तो वतन पर

देख कर ये जश्ने आजादी आँख भर आई
अपना देश तो अब सुरक्षित है भाई

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

मौका परस्त

नफरत करें या प्यार वो हम उनके हो लिये
दो चार दिन को ही सही बस साथ हो लिये ।

अब देखना है करवट किस, बैठता है ऊँट
अपना है क्य़ा, दायें तो कभी बायें हो लिये

जनता का क्या है उसको तो देना किसीको वोट
हम उसके साथ थे कभी, अब इसके हो लिये


सिक्का तो उसका चलता है जो मौका न छोडता
मौका जो छोड दे, उसे फिर क्या तो बोलिये

इस स्यासती अखाडे में पहलवान हैं सभी
हम है उसी के साथ कि जय जिसकी, बोलिये


आज का विचार

अगर हम आज भी बीते हुए कल में जीयेंगे
तो आनेवाले कल को कैसे देख पायेंगे ।

स्वास्थ्य सुझाव

दाँत के दर्द को कम करने के लिये एक टुकडा अद्रक
नमक लगा कर गरम करें और दुखते दाँत के नीचे रख लें
धीरे धीरे चबाते रहें दर्द अवश्य कम होगा ।

रविवार, 27 जुलाई 2008

बैंगलोर में ७ धमाके, अहमदाबाद में १६ विस्फोट और Three Cups of tea


बैंगलोर में ७ धमाके, अहमदाबाद में १६ विस्फोट और एक किताब Three Cups of tea


बैंगलोर में ७ धमाके एक की मौत पंघरा घायल । अहमदाबाद में १६ विस्फोट ४० मरे ।
क्यूं होता है ये सब और क्यूं है हम बेबस । क्या है इसे रोकने का तरीका । हाल ही में मैने एक किताब पढी है नाम है ,” Three Cups of tea by Greg Mortenson and David Oliver Relin. और यह एक सत्य घटना पर आधारित है ।

ग्रेग मॉर्टेन्सन नामका एक अमेरिकन माउन्टेनियर १९९३ में काराकोरम २ की चढाई में आखरी क्षणों में असफल होकर बेहोशी
की हालत में पाकिस्तान के अफगानिस्तान वाले एक सरहदी गाँव कोरफे में पहुँच जाता है जहां तिब्बती मूल के बाल्टी लोग बसते हैं ।। उस गाँव के लोग उसकी बहुत सहायता करते है और वह गाँव के लोगों की सह्रदयता का कायल हो जाता है । वहाँ जब वह बच्चों को बिना इमारत के स्कूल में बिना शिक्षक की सहायता के जमीन पर पेड की टहनी से अक्षर लिखते देखता है तो वह वादा करता है कि वह वापिस आयेगा और गाँव के बच्चो के लिये एक स्कूल अवश्य बनायेगा ।


यह किताब अगले एक दशक तक ग्रेग मॉर्टेन्सन द्वारा किये गये अविश्रांत परिश्रम की कहानी है जो वह पाकिस्तान के सुदूर पहाडी इलाके में जो अफगानिस्तान से सटा हुआ है वहाँ के पचपन गाँवों में लडकियों के लिये स्कूल खोलने के लिये और उनको चालू रखने के लिये करता है । उसके रास्ते में क्या क्या बाधाएं आतीं हैं और वह उनसे कैसे निबटने में सफल होता है इसका सजीव वर्णन है यह किताब । निरे अनपढ लोग भी ह्रदय से की गई सहायता से कैसे उसके कायल हो जाते हैं और कैसे अपने सीमित साधनों के बावजूद उसकी मदद करते हैं और कैसे वह अपनी दुर्दम्य इच्छाशक्ती और अथक परिश्रम के बल पर सफल होता है इसका अनुपम उदाहरण है यह किताब ।

Three Cups of tea इस लिये क्यूं कि इस कबीले का मानना है कि जब आप के साथ कोई पहली बार चाय पीता है तो वह आपके लिये अजनबी होता है और दूसरी बार चाय पीनेसे आपका दोस्त बन जाता है और तीसरी बार तो वह आपके परिवार का ही हो जाता है ।

हो सके तो आप लोग इसे अवश्य पढें, हो सकता है आप में से बहुतों ने पढ रखी हो । इसके बारे में अगर कोई सार्थक चर्चा हो तो शायद हमारे बहुतसे सवालों का जवाब हमें मिल जाये ।

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

सावन

बरस बरस बरस बरस
बरसो अब बदरा
तरस तरस तरस तरस
तरस गयो जियरा


जरत जरत जरत जरत
जरत रही धरती
तपत तपत तपत तपत
रही सिर्फ तपती
बाट तेरी देख देख
आंख गई पथरा
आ जाओ छा जाओ
बहुत भयो नखरा । बरस बरस ........


घनन घनन घनन घनन
घनन मेघ गरजे
सनन सनन सनन सनन
सनन पवन लरजे
चमक चमक चमक चमक
चमकती बिजुरिया
टपक टपक टपक टपक
बूंदन का सेहरा । बरस बरस ....

बूंदन की धार भई
धार भयो मूसल
धरती के कण कण में
जाय बसेगो जल
पीहू पीहू पीहू पीहू
बोलते पपीहा
छमक छमक छमक छमक
नाच उठे मोरा । बरस बरस.....

हरित हरित हरित हरित
हरित भई धरती
कण कण में जीवन को
पाल रही धरती
परस परस परस परस
परस गयो पियरा
हरस हरस हरस हरस
हरस गयो हियरा

चित्र गूगल से साभार।

गुरुवार, 17 जुलाई 2008

पत्र

माँ हम पहुँच गये हैं सकुशल
अच्छे भी हैं यहाँ पर आकर ।

छूट गई है कमीज़ मेरी
और तेरे बहू की कुरती
मुन्ने के दो एक खिलौने
इतनी थी जाने की फुरती



सब्जी तेरी ला न सका मै
बनिये का कर्ज़ न दे पाया
बाबूजी का टूटा चश्मा पर
कांच नही लगवा पाया

इसका है अफसोस मुझे, पर
तेरे चरण भी ना छू पाया
यह बात उमर भर है चुभनी
कैसा कपूत माँ तूने जाया ।


आज का विचार
काम कितना भी कठिन हो यदि उसे छोटे छोटे टुकडों में बांट कर
एक एक हिस्से को अंजाम दिया जाय तो वह कठिन नही रहता।

स्वास्थ्य सुझाव
गठिया जैसे बीमारी में हल्दी का प्रयोग ज्यादा करें
जैसे कच्ची हल्दी का अचार बनाकर खायें।

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

तुम्हें छोडकर

तुम्हें छोडकर मै चला तो गया था
पर यादें तुम्हारी मेरे साथ ही थीं ।

हवा जो तुम्हारे अलकों को छू कर
चली आती थी मुझको भी सहलाने
तराने जो तुम थीं कभी गुनगुनाती
सुनाती थीं अक्सर मुझे बहलाने
बादल जो छा जाते थे यूं अचानक
आँचल की, उनमें, तेरे रोशनी थी । तुम्हे......



नदिया की कल कल तेरी मीठी बातें
पहाडों की बर्फीली सर्दी की रातें
यादों का तेरे मुझसे लिपटना
जैसे हों बहते गर्म पानी के सोते
हरियाली धरती का गहरासा आंचल
महक थी जहां तेरे ही अपनेपन की । तुम्हे......

महीना रहा कैसे तुमसे बिछडकर
महसूस करता रहा तुमको हर पल
तुम्हारा झगडना, मनाना वो लड़कर
इन बातों का फिर याद आना वो अक्सर
तस्वीर रख्खी थी तेरी छिपाकर
पर उससे कहाँ बात वो बन सकी थी । तुम्हे......

आज का विचार
जिंदगी एक प्रतिध्वनि है, जो हम औरों के लिये सोचते हैं
वही लौट कर हमारे पास आता है .
स्वास्थ्य सुझाव
खाने के बाद एक छोटी हरड मुंह में डालकर चूसें।
गैस से राहत पाने की यह एक असरदार दवा है ।
साथ ही धूम्रपान की आदत भी इससे छूट सकती है ।

गुरुवार, 29 मई 2008

तुम आओ तो

फूल भी खिलेंगे
तारे निकलेंगे
चांद चमकेंगे
खयाल बहकेंगे
तुम आओ तो

सावन बरसेगा
बादल गरजेगा
चमकेगी बिजुरिया
जिया लहकेगा
तुम आओ तो

शरद की सुहानी
चांदनी खिलेगी
कच्ची गुनगुनी
धूप निकलेगी
अकारण ही मेरी
पायलिया बजेगी
तुम आओ तो

सरदियों की शाम
अंगीठी जलेगी
शाल ओढ कर
अम्मा मटर भूनेगी
चाय की गरम गरम
प्यालियाँ चलेंगी
तुम आओ तो

हम तुम मिलेंगे
मन महकेंगे
नदी के किनारे फिर
संग संग चलेंगे
सारे के सारे गिले
प्यार में डूबेंगे
तुम आओ तो

आज का विचार
हमारा ईमान ही हमारा सबसे अच्छा दोस्त है । उसे बार बार सुनना जरूरी है ।

स्वास्थ्य सुझाव
आधीशीशी का सरदर्द यानि माइग्रेन से राहत के लिये रोज रात को सोने से पहले बादाम तेल की २ -२ बूंदे नाक में डालें ।

मंगलवार, 20 मई 2008

महाराष्ट्र का प्रांतवाद

महाराष्ट्र का प्रांतवाद आजकल बडी चर्चा में हैं । वहाँ के लोगों को आपत्ती है कि क्यूं उत्तर प्रदेश और बिहार के भैया लोग मराठी भाऊ लोगों का जीना मुश्किल कर रहे हैं, उनकी रोटी रोजी छीन रहे हैं । तो इसीलिये गुस्से मे आकर उन्होने कुछ कदम उठाये हैं । लेकिन शायद उन्हे किसीने बताया नही कि कमजोर ताकत गुस्सा भारी । हमारे काका (पिताजी) अक्सर ये मुंहावरा प्रयोग करते थे । और गुस्सा तो हर काम को सिर्फ खराब ही करता है । किसी भी लकीर को यदि छोटा करना है तो इसके आगे एक बडी लकीर खींच दो बस । पर ये बडी लकीर खींचना भी है तो कानून के दायरे में रह कर । हमारे ताई और भाऊ को समझना पडेगा कि अगर भैयाओं से जीतना है तो उनसे कम पैसे लेकर उनसे बढिया काम करें ओर थोडा ज्यादा करें फिर तो देखें कोई कैसे उनकी नोकरी या काम छीन सकेगा । ये समस्या कोई आज की या महाराष्ट्र की ही नही है । आसामी, नागा, बंगाली, पंजाबी सबने इस समस्या को झेला है और झेल रहे हैं ।



हमारा संविधान हर किसी को हक देता है कि वह देश के किसी भी भाग मे जाकर काम ढूंढ सकता है और मिले तो कर सकता है । मांगने से तो भीक भी नही मिलती भाऊ, साबित करो अपने आप को । यह नही हो सकता कि आप काम भी कम करें और फिर भी आप ही को नोकरी मिले । यदि आपको लगता है कि भैया लोग आपके शहर को गंदा कर रहे हैं तो पहले खुद तो उसे साफ रखो और कानून व्यवस्या मजबूत करो ताकि हर कोई शहर की हिफाजत करे । प्रांतों की रचना भाषावार हुई ये सही है । बडी बडी कंपनियों को जो महाराष्ट्र में काम कर रही हैं भूमि पुत्रों को काम देना चाहिये यह भी सही है, पर आप की काबीलीयत भी होनी चाहिये और अपने छबि को सुधारना भी जरूरी है । महाराष्ट्र के लोगों की छबी तो यूनीयन बाजों की है । इसे बदलना होगा । खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है ।

इसी चीज का एक और पहलू है कि यूपी और बिहार के राजनीतिबाज खुद तो अपने क्षेत्रों में ६० सालों में कुछ कर नही सकें ओर अपने लोगों को बद सो बदतर जीवन जीने को मजबूर कर रहे है पर दूसरे प्रदेशों मे जाकर दादा गिरी करने से बाज नही आते ।
बिहार जैसे प्राकृतिक साधनों से भरपूर प्रदेश में किसी भी पार्टी ने प्रदेश के विकास के लिये काम नही किया । और दूसरे प्रदेशों में जाकर छटपूजा मनाने का क्या तुक है, अगर व्यक्तिगत तौर पर मनायें तो किसी को आपत्ती भी न हो पर उसे राजनीतिक और धार्मिक रैली के तौर पर मनाना कितना उचित है । और असल बात तो यह है ये सब चुनावीं चोंचले हैं पर जनता को चाहिये कि वह इस नौटंकी से प्रभावित न हो ।

मंगलवार, 13 मई 2008

हादसे

चीन में भूकंप से १२ से १५ हजार आदमी मर गये ये खबर अभी जेहन में खलबली मचा ही रही थी कि जयपुर के सात धमाकों की खबर सुनी । क्यूं हो रहा है ये सब, कभी प्रकृति तो कभी आदमी हमारी जान के पीछे पडे हैं । प्रकृति के प्रकोप को तो हम रोक नही सकते पर क्या आतन्कवादी हमलों के खिलाफ हम कुछ भी नही कर सकते ? हर बार हादसा होने पर ही थोडी बहुत लीपा पोती करते हुए हम नजर आते हैं । क्यूं नही हमारी पुलिस, जनता, और सरकारी यंत्रणा कम से कम हर राज्य के राजधानियों में और महत्वपूर्ण संवेदनशील जगहों में सचेत रह सकती । और तारीख विशेषों पर होने वाले हादसों को देखते हुए तो ऐसा लगता हैं कि इन विशेष अवसरों पर तो हम चौकन्ने रह ही सकते हैं ।





बाबू लोगों को ६ टे वेतन आयोग के तहत ३ गुना तनखाह बढाने की बजाय या संसद सदस्यों का अलॉटमेन्ट बढाने की बजाय यह ज्यादा जरूरी है ऐसा हमारी सरकार को क्यूं नही लगता । विशेष सुरक्षा दस्तें इस के लिये क्यूं नही बनाये जा सकते ? जनता की सुरक्षा की जो सरकार चिंता नही करती उसकी हाथों में देश कितना सुरक्षित है । अब जब भी वोट मांगने नेता लोग आयें तो यह सवाल आम आदमी को और खास कर मीडिया को उठाना चाहिये क्यूंकि अगर ये एसा ही चलता रहा तो क्या कल हादसे का शिकार हम नही हो सकते ।
हमारे टी वी चेनल और अखबारों के पास तो सिनेमा और क्रिकेट सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं ।
खेलों को खेल जितना ही महत्व दो और मनोरंजन को मनोरंजन जितना । हमारे जीवन से जुडे मुद्दों को उठाना क्या समाचार माध्यमों का काम नही है । महंगाई से मार खाती जनता के हित में सरकार को कटघरे में क्यूं नही खडा करते ये टी वी वाले, करते भी हैं तो सब को बुला कर हो हल्ला मचाने देते हैं और बिना किसी निष्कर्ष के विवाद खत्म हो जाता है । मुझे लगता है हम सबको थोडा ज्यादा जिम्मेवार होना पडेगा नहीं तो इस हादसे के बाद भी थोडा बहुत रो धो कर हम अगले हादसे तक अपने में मशगुल हो जायेंगे ।

गुरुवार, 8 मई 2008

हम क्या कर रहे हैं


हम क्या कर रहे हैं
कहाँ जा रहे हैं
एक पल को रुक कर सोचें जरा
क्या पाने की ललक में हम क्या खो रहे हैं।
वर्तमान के क्षणिक सुख की खातिर
अपना भविष्य खोते जा रहे हैं






इन नन्हे से फूलों को प्रकाश दो
छाया दो
वर्षा का पानी दो ममता की माया दो
इस जानलेवा तेज धूप में वे कुम्हला रहे हैं ।

इतना न डालें दबाव उनके मन पर
कि दाब से कोई विस्फोट हो जाये
हम संभाल सकें इससे पहले
दिल पर भीषण चोट हो जाये
अपने से खिलने दो, दो सारी सुविधाएँ
न दो अपने सपनों का भार
जो वे ढोते जा रहे हैं



ये किशोर ये युवा भविष्य हैं, हमारा ही नही
देश का भी
ये जागीर नही है हमारी, धरोहर है
मालिक नहीं हैं हम, पालक हैं
ध्यान रखें, कोमलता जतन करें
आकांक्षा का क्षितिज दे
पर चुनाव का हक भी दें
इन्हें न लगे कि वे जीने का हक ही
खोते जा रहे है ।

आज का विचार
सफलता का सबसे बडा मंत्र यह है कि
हम जो भी कार्य करना चाहते हैं अभी करें।

स्दास्थ्य सुझाव

आंखों की रोशनी सुधारने के लिये तुलसी के पत्ते चबाना लाभकारी है ।
छह पत्तो से शुरू करें और रोज एक एक बढाते हुए इक्कीस तक जायें
और वापिस एक एक कम करते हुए छह तक आयें ।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

जाने कैसे आये ये दिन

जाने कैसे आये ये दिन
सूने सूने मेरी गली से
वर्षा की सफेद बदली से
मेरी आंखों के पुतली से
नि:स्तब्ध और भाव विहीन। जाने कैसे....

गरमी के तपते मरुथल से
झरना जैसे बिन कल कल के
नैना जैसे बिन काजल के
लेखनी मेरी, से रस हीन । जाने कैसे....

लंबी तपती दोपहरी से
किसी बिरहन की विभावरी से
खाली खाली गाँव गली से
तरु शाखाएँ पर्ण विहीन । जाने कैसे....

ना इच्छा ना कोई आशा
ना ही मन में कोई निराशा
शब्द न सूझें, कैसी भाषा ?
जल ही नही तब कैसे मीन । जाने कैसे....

आज का विचार
बोलने से पहले हम सोचें कि क्या, कब, और कहाँ
बोल रहे हैं ।

स्वास्थ्य सुझाव
केल्शियम और विटामिन सी के रोज सेवन से
रक्त में शकर्रा की मात्रा कम रखने में मदद मिलती है ।

शनिवार, 29 मार्च 2008

सपनों को तो मेरे...

मैने भी तो चाहा था बॅग ले के स्कूल जाना
अम्मा ने कह दिया था मुन्ने को है सुलाना

मेरी भी तो ललक थी हो मेरी भी सहेली
खेलूं मैं उसके संग संग बूझूँ कोई पहेली
पर रोटी सेंकने की बारी थी अब तो मेरी
उसके भी पहले था मुझे, इस चूल्हे को जलाना


मेरी भी तो चाहत थी पढूँ मै भी, उनके जैसी
पहनूं वो स्कूल की ड्रेस, कविता सुनाऊँ वैसी
इन कापी किताबों में फेकें क्यूं बापू पैसा
लडकी को तो वैसे भी ससुराल को है जाना


मैं भी तो चाहती हूँ मैं भी बनू कलक्टर
या फिर बनू मै टीचर या कोई लेडी डॉक्टर
झाडू है घर में देना, पानी है भर के लाना
सपनों को तो मेरे फिर मन में ही है रह जाना

आज का विचार
मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर समान है
जो मातृभाषा का अनादर करे वह देश-भक्त नही हो सकता ।

स्वास्थ्य सुझाव

पालक, खरबूजा, पपीता, गाजर, कद्दू और शकर कंद को
अपने भोजन में अवश्य शामिल कीजीये । ये आपको
केंसर जैसे बीमारियों से बचाके रखेंगी ।

शुक्रवार, 21 मार्च 2008

...गिरगिटिया रंग में रंगा मेरा ब्लॉग..

आप लोग सोच रहे होंगे क्या हो गया है आशा (जी) को होली के रंगो ने इन्हे जैसे
बौरा दिया है । एक तो होली के इतने दिन पहले से ही रंगों से खेल रहीं हैं, अब तो हमें बख्शतीं पर नहीं इनके रंग हमारा पीछा नही छोड रहे । और अब ये गिरगिटिया
रंग ¡ हे भगवान ¡ माझ्या देवा ¡ Oh my God ¡



न न न ब्लॉग छोडने से पहले मेरी पूरी बात तो सुन लीजीये । मै यह कहना चाहती हूँ कि अभी जो यह मेरा ब्लॉग आप सिर्फ हिंदी के लाल रंग में देख सकते हैं सिर्फ एक चटख से आप इसे इंद्र-धनुषी रंगों में पढ सकते हैं । यानि कि अब मेरा लिखा
मेरे बंगला भाषी, गुजराती भाषी, तामिल भाषी, ओरिया भाषी और जाने कितने कितने
भाषी दोस्त अपनी अपनी लिपी में इसे आराम से पढ सकते हैं । है कि नही अच्छी
और मजेदार बात ।
करना आपको बस इतना सा है कि आपको भी तो एग्रीगेटर की मेल आई होगी तो आप भी उनके सरल आदेशों का पालन कर अपना ब्लॉग खूबसूरत और रंगीन बना सकते हैं ।
काश ये गिरगिट भाषांतर भी कर सकता ¡ बहर हाल होली मुबारक ¡

मंगलवार, 18 मार्च 2008

....होली है...२

सोनिया राधा लाल है
मनमोहन जी पीले
बायें सूखे हैं खडे
राजद खडे हैं गीले

एन.डी.ए. हो गये हरे
ईर्षा के रंग में
अधिकारी सब मस्त हैं
पॉवर के भंग में

सेना मनसे चाहती
दुष्मन को रुलाना
बसपा का सपना है
विरोधी को सुलाना

सपा तो हो गयी भैया
अब खिसियानी बिल्ली
बुरा न मानो होली है
ऐसे ही मनाती है दिल्ली

आज का विचार

हमारा आज का व्यक्तित्व एक वृक्ष के समान है
जो कल एक बीज था । हमारे आचरण से ही हम
आज के बीजों यानि बच्चों बच्चों को प्रभावित करते हैं।

स्वास्थ्य सुझाव

खाने के बाद एक छोटी इलायची चबा चबा कर खायें
इससे आपके गुर्दे की पथरी को तोडने में मदद मिलेगी

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

होली है........

थोडी सी मस्ती थोडी शरारत
थोडीसी सर्दी थोडी हरारत
झूटी लडाई, सच्ची सी चाहत
लेकर के आई है होली..

थोडा सा रंग ज्यादा सा पानी
थोडासा लाल और थोडासा धानी
थोडे से शाम थोडी राधा रानी
लेकर के आई है होली..

थोडे गुलाबी थोडेसे लाल
बादल अबीरी और गुलाल
दिल में न रखना कोई मलाल
कहती है आकर के होली..

थोडा मृदंग और थोडीसी ढोलक
थोडीसी थिरकन थोडीसी पुलक
थोडी सी मचलन थोडीसी झिझ़क
दिल में जगाती है होली..

प्यारे से बोल और मीठा सा राग
थोडीसी प्रीत थोडा अनुराग
जी भर के खेलो री गोरी आज फाग
फिर फिर ना आये ये होली ..


आज का विचार
निराशावाद आसुरी शक्ती है और आशावाद दैवी
आशावादी बने रहिये ।

स्वास्थ्य सुझाव
कोकम शरबत सुबह पीने से आप दिनभर चुस्त
दुरुस्त बने रहेंगे ।

बुधवार, 5 मार्च 2008

आप की शख्सियत पे

रात जब बात आपकी थी चली
दिल की जैसे चटख गई थी कली
सबने जब तारीफों के पुल बांधे
मै ही तकता रहा था सूनी गली

किसीने कहा जूही सी नाजुक
किसीने कहा, नही, गुलाब कली
आपके गेसूओं के क्या कहने
स्याह से बादलों की हो टोली
दूधिया रंग चांदनी सा है
बातें जैसे कि मिश्री की हो डली
और नाजुक मिजाज है इतना
झट से भर आये आँख की प्याली
आप की शख्सियत पे मै कुरबान
कैसे कह दूँ कि आप मेरी वली

आज का विचार
हमारे जीवन में जो भी अनुभव आते हैं अच्छे
या बुरे उन्हे हम केवल अनुभव के तौर पर लें
किसी को भी दोष न दें, ईश्वर को भी नही ।

स्वास्थ्य सुझाव
अंजीर को अपने खान पान में शामिल कीजीये
ये रक्त प्रवाह को सुधारते हैं तथा रक्त की गुणवत्ता को भी ।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2008

जीने के लिये

बस एक टुकडा धरती
और एक मुठ्टी आसमान
इतना काफी है जीने के लिये
चाहिये नही तुम्हारा ये जहान

जिसमें नफरतों के ऊँचे किले
दफ्न करते हैं प्यार के मेहमान

फुरसतें है किसे मुहब्बत के लिये
वक्त महँगा है सस्ता है इन्सान

गरगराती इन मशीनों में पिसे
जा रहे हैं दिल के अरमान

और किसी अजब दौड में शामिल
हाँफते हाँफते दौडते इन्सान

जानते जो नही कहाँ मंजिल
कब पायेंगे वो अपना मकाम

बस एक टुकडा धरती
और एक मुठ्टी आसमान


आज का विचार

जीवन का उद्देश है बहते रहना सहज और स्वच्छंद ।

स्वास्थ्य सुझाव

मूली या पत्ता गोभी के पत्तों को धीरे धीरे चबा चबा कर
खाने से अवसाद ( डिप्रेशन ) से छुटकारा मिलता है ।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2008

मुनिया

छुन छुन बजती पैंजनिया
चलने को तत्पर मुनिया
एक एक कर पाँव उठाती
पाँव तले उसके दुनिया

डग मग डग मग भरती है डग,
डोल रही जैसे नैया
आँखें इधर उधर दौडाती
फैलाती जाती बहियाँ

ऱेशम से अलक उडते हैं
मुझे बुलाती है मैया
और जब मै बाहें फैलाऊँ
झट से डाले गल बहियाँ

छुन छुन बजती पैंजनिया

आज का विचार
केवल पशु ही अपने लिये जीता है
मनुष्य वही है जो औरों के लिये जीता ही नही
मरता भी है ।

स्वास्थ्य सुझाव
घुटने के दर्द के लिये सरसों के तेल से
रोज पाँच बार क्लॉक वाइज और पाँच
बार एन्टि-क्लॉक वाइज मालिश करें काफी आराम
मिलेगा ।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2008

कैसा आया है वसंत

कैसा ये आया है वसंत
सर्दी में ठिठुरा ठिठुरा सा
धुंद की गीली चादर ओढे
कोई बूढा झुका हुआ सा

कहाँ खो गई धूप गुनगुनी
कहाँ छुप गई हवा बसंती
सिकुड गई नन्ही सी कलियाँ
बिन सूरज़ के कैसे खिलती

पंछी हुए बावले फिरते
तितली की हिम्मत ना होती
कैसे ढूंढे बाग बगीचे
ना कोई संगी ना कोई साथी

कोयल भी है चुप्पी साधे
भौरों नें छोडा गुंजारव
सर्दी ने सबको जकडा है
आसमंत सब नीरव नीरव

कैसा ये आया वसंत
जब गुम हो गये रंग सजीले
शाल दुशाले चादर ओढे
दुबक गये वासंती चोले

बुधवार, 30 जनवरी 2008

कहानी भ्रूण-परीक्षण की



मै तो चाहती हूँ जन्म लेना, लेकिन मै उस माँ की कोख में हूँ जिसकी पहले से ही दो बेटियोँ है ।
मेरा अस्तित्व अब खतरे में है । यह किसी भी पल समाप्त हो सकता है । मेरी मजबूर माँ पर दादी और
पिताजी जोर डाल रहे हैं कि वह भ्रूण का लिंग परीक्षण करवा ले । माँ नही चाहतीं पर उनकी आवाज़ ही
कहाँ है, वह तो दब गई है इस समाज की खोखली मान्यताओं के नीचे । पुत्रों को अनुचित महत्व देना हमारे
पितृ-सत्ताक पध्दती की देन है । श्राध्दों में जब तक पुत्र तिलांजली और जल नही देगा पितरों का उध्दार जो
नही होगा ।

पुत्र चाहे माँ बाप को झूटे को भी न पूछे तो भी वही घर का चिराग है । और बेटी चाहे जिंदगी भर सेवा करे तो भी वह पराया धन है । और इस पर यह परिवार नियोजन ! पहले जब 5-7 बच्चे हुआ करते थे या कभी कभी तो इससे भी ज्यादा तो कन्या भ्रूण को गर्भ में ही खत्म करने की नौबत नही आती थी । पर अब दो या तीन बस के जमाने से कन्या भ्रूणों की शामत आ गई है । ऐसा नही है कि दंपत्ती बेटियों के खिलाफ हैं, उनके जन्म पर भी खुशियाँ मनाई जाती हैं । पर अगर बेटा नही है तो कुछ कमी तो महसूस की ही जाती है । पहली संतान के लिये तो कोई लिंग परीक्षण नही करवाता, पर यदि पहली संतान बेटी है तो 90 प्रतिशत दंपत्ती लिंग परीक्षण करवाते हैं और कई मामलों में लडकी का भ्रूण नष्ट कर दिया जाता है । पुराने जमाने में राजस्थान के ही किसी वर्ग विशेष में नवजात लडकियों को दूध में डुबो कर मार दिया जाता था । अभी हाल ही की बात है जब एक स्टिंग ऑपरेशन के दौरान एक महिला डॉक्टर को, मोटी रकम लेकर, कन्या भ्रूणों को नष्ट करने का काम करते हुए केमरे पर पकडा गया था । यह लिंग परीक्षण तकनीक तो इन बेटों के दीवानों के लिये वरदान साबित हुई है ।
गाँवों में भी लोगों को इसकी जानकारी है और वे भी इसका लाभ उठाना चाहते हैं, बेटा जो चाहते
हैं सब ।कोई सोचना नही चाहता कि यह बेटों की इतनी अधिक चाहत हमें कहाँ ले जायेगी । हम दो हमारा एक नीती के कारण चीन में यह पाया गया कि परिवार नियोजन की जितनी सख्ती सरकार करती गई कन्या भ्रूण के हत्या के मामले उतने ही बढते गये और अब वहाँ स्त्री : पुरुष अनुपात इतना अधिक गडबडा गया है कि बहुतसे चीनी पुरुषों को पत्नी मिलना मुश्किल हो गया है ।
भारत में भी कुछ राज्यों मे कन्याभ्रूण को नष्ट करने कि वजह से लडके लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है है । धीरे धीरे यह स्थिति विस्फोटक हो सकती है । महिलाओं की संख्या में कमी उनके खिलाफ अपराधों को बढा सकती है । और क्या पता द्रौपदी की कहानी आज भी सच ही हो जाय ।

यह स्थिति बेहद खतरनाक और अवांछनीय भी । वक्त रहते इस बारे में कुछ ठोस कदम उठाना
जरूरी है । क्या आप इस कन्या भ्रूण की मदद करेंगे ? प्रस्तुत है इस विषय पर एक कविता

मुझे आने दो माँ,
मै भी यहाँ पर साँस लेना चाहती हूँ

मेरी भी आँखें चाहती हैं देखना संसार को
मै भी तो अब जन्म लेना चाहती हूँ

मेरे कान भी सुनेंगे प्यार भरे बोल तेरे
मै तेरी गोदी में सोना चाहती हूँ

मै भी चलूंगी अपने नन्हे कदम रखकर
नापना संसार को मै चाहती हूँ

मै भी उडूँगी अपनी बाँहों को पसारे
आसमाँ मुट्ठी में करना चाहती हूँ

रोक लो औजारों को तुम दूर मुझ से
मै तुम्हारे पास आना चाहती हूँ

नष्ट ना कर दे कोई यह देह मेरी
मै तुम्हारी शक्ती बनना चाहती हूँ
मुझे आने दो माँ !


आशा जोगळेकर

आप इस बारे में क्या कर सकते हैं ? इस विषय पर अपनी आवाज़ उठाईये । आईये 3 फरवरी 2008 को होने वाले ऑल इन्डिया कॉंग्रेस ऑफ ऑबस्ट्रेटिक्स एन्ड गायनेकॉलॉजी के कन्याभ्रूण बचाओ पब्लिक फोरम में ।