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रविवार, 27 नवंबर 2011

इस देस में वापस आकर

इस देस में वापस आकर, कितना अच्छा लगता है
इसका सच्चा झूठा किस्सा सारा सच्चा लगता है ।

इसकी धूल भरी सडकें और इसका धूमिल आसमान
गाता या रोता हर कोई अपना बच्चा लगता है ।

इसकी धुंद और इसके कोहरे, इसकी ठंडक और गर्मी
इसका हर मौसम इस दिल को सचमुच अच्छा लगता है ।

ताजे अमरूदों के ठेले, सिंघाडों की हरियाली
देख के ये प्यारे से नजारे मन कच्चा कच्चा लगता है ।

इसके वृक्ष बबूल के हों या हों रसीले आमों वाले
हम को तो हर पेड से लटका प्यार का गुच्छा दिखता है ।

पार्कों में मिलते वो पडोसी जो न कभी मुस्कायेंगे
उनकी चढी त्यौरियों पीछे कुछ अपनापा लगता है ।

सुंदर स्वच्छ परदेस में चाहे कितने ही सुख क्यूं न मिले
देसी घुडकी खा कर भी रबडी का लच्छा लगता है ।