मंगलवार, 23 अगस्त 2011

एक लहर उठी

एक लहर उठी
धीरे धीरे
वह फैल गई
धीरे धीरे
उसमें फिर और
कई धारें
जुडती ही गईं
धीरे धीरे ।

पूरब से लेकर
पश्चिम तक
उत्तर से लेकर
दक्षिण तक
एक हवा बही
कुछ तेज चली
बनती ही गई
वो बवंडर सी
जो बात चली
धीरे धीरे ।

फिर जोर बढा
फिर शोर बढा
जन जन का
आक्रोश बढा
एक राई थी
बनती ही गई
वह पर्वत सी
धीरे धीरे ।

उस की हलचल से
सिंहासन और
सारे प्रभुता के आसन
बस डोल उठे
भयभीत हुए
सारे कायर
धीरे धीरे ।

इस लहर को
प्रलय बनाना है
ऐसा मंथन
करवाना है
विष का तो
पान किया अबतक
अब अमृत भी
चखवाना है
फिर इस भ्रष्ट
व्यवस्था को
करना है खतम
धीरे धीरे ।





एक टिप्पणी भेजें