शनिवार, 14 मई 2011

जिंदगी



लहर में बहती
बिना पतवार
एक नांव

हिचकोले खाती
उछलती
ठांव ठांव

एक माझी
एक चप्पू
जोरों की हवा

हवा से लडती
और उखडती
एक नाव

जिंदगी क्या इसीका नाम है ?
कभी उलटती
फिर सम्हलती
एक नाव ।

जिंदगी-२

पानी में बहते
पत्ते सी
मेरी जिंदगी
कभी तेज
तो कभी धीमें चलती
जिंदगी ।

हवा के झोंके , पत्थर
पेडों के तने
इनके असर पर
डगमगाती जिंदगी ।

एक लहर साथी को
कर देती अलग
अफसोस में फिर
आह भरती जिंदगी

अपना नही चलता
जब कोई जोर है
तो घुटन में
कसमसाती जिंदगी

कोई दिशा
मिलेगी क्या
इसको कभी
या फिर यूं ही
कटेगी जिंदगी ?
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