मंगलवार, 1 नवंबर 2011

कुछ अच्छा नही लगता


चांद भी आज जाने क्यूं कुछ मुरझाया सा है,
इसे भी मै तुम्हारे बिन, कुछ अच्छा नही लगता ।

सांस आती भारी सी है, तनहाई में उदासी है,
रूह भी प्यासी प्यासी है और कुछ अच्छा नही लगता ।

तुम वहां खंबे से टिक कर शून्य में तक रही होगी,
सोचती तुम भी तो होगी कि कुछ अच्छा नही लगता ।

तुम्हारी यादों का चेहेरा तुम्हारी खिलखिलाती हंसी
मुझे कितना सताती है और कुछ अच्छा नही लगता ।

बहुत कुछ सोच कर हमने किया था फैसला ये फिर,
क्यूं तुमसे बिछड कर अब, कुछ अच्छा नही लगता ।

अब दूरी और ये मुझसे सही बिलकुल नही जाती
चली आओ तुम्हारे बिन अब अच्छा नही लगता ।


चित्र गूगल से साभार ।

31 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चाँद सदियों से इन भावों का वाहक रहा है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जब खुद का मन उदास हो तो सभी कुछ मुरझाया सा लगता है ...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तुम्हारी यादों का चेहेरा तुम्हारी खिलखिलाती हंसी
मुझे कितना सताती है और कुछ अच्छा नही लगता ।
aisa hi lagta hai

सदा ने कहा…

बेहतरीन लिखा है भावों को ।

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।

mridula pradhan ने कहा…

doori ka dard......ekdam samne aa gaya.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

गज़ल में दूरी का दर्द है... दर्द है फिर भी उम्दा कहने की गुस्ताखी करुँगी..

संजय भास्कर ने कहा…

चांद भी आज जाने क्यूं कुछ मुरझाया सा है,
इसे भी मै तुम्हारे बिन, कुछ अच्छा नही लगता ।
......वाह! आशा जी वाह!
अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

संजय भास्कर ने कहा…

वाह बहुत खूब ...शब्द शब्द बोलता है आपकी ग़ज़ल का

Suman ने कहा…

आशा ताई मुझे तो हर पंक्ति सुंदर लगी !
बधाई अच्छी रचना के लिये !

Arvind Mishra ने कहा…

चली आओ तुम्हारे बिन अब अच्छा नही लगता ।
बहुत भावभीना सा ,,चली आओ के बजाय चले आओ हो तो कैसा रहेगा ?

दिगम्बर नासवा ने कहा…

चाँद अकसर भावनाओं को प्रगट कर देता है ... लाजवाब रचना है ...

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri ने कहा…

बहुत कुछ सोच कर हमने किया था फैसला ये फिर,
क्यूं तुमसे बिछड कर अब, कुछ अच्छा नही लगता ।
..बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति ..मन के भावों को चाँद के प्रतीक से सुन्दर भाव से प्रस्तुत करती कब्यांजलि....सादर !!!

Vaanbhatt ने कहा…

चाँद को भी अपने दुख में लपेट लिया...बहुत दुखी-दुखी लगा...चाँद...

वाणी गीत ने कहा…

कई बार कुछ अच्छा नहीं लगता , जबकि स्वयं अपना चुना होता है ...
चाँद की साक्षी में सुन्दर भाव सजाये !

mehek ने कहा…

bichoh ki udasi sara sama udas karti hai aur chand gavahi deta hai.

सागर ने कहा…

bhaut hi pyari rachna....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

सुन्दर रचना...
सादर बधाई...

daanish ने कहा…

दर्द की मासूम भावनाएँ
शब्द शब्द बन कर
जैसे खुद ही गुनगुना रही हों ....
वाह ,,, बहुत प्रभावशाली रचना !

ZEAL ने कहा…

very touching...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

तुम्हारी यादों का चेहेरा तुम्हारी खिलखिलाती हंसी
मुझे कितना सताती है और कुछ अच्छा नही लगता

मन के सुंदर कोमल भाव......

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपका ब्लॉग भी बहुत ख़ूबसूरत और आकर्षक लगा । अभिव्यक्ति भी मन को छू गई । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद . ।

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

Gyandutt Pandey ने कहा…

यादें ऐसी ही होती हैं। जब जकड़ लें तो कुछ अच्छा नहीं लगता।
मौसम और परिवेश धरे रह जाते हैं।

विजय कुमार झा ने कहा…

बहुत खूब। आज यूं ही पढ ल‍िया। सच कहूं तो मजा आ गया।

mahendra verma ने कहा…

बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है आपने।
शुभकामनाएं।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

bahut sundar bhaav, badhai.

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने! बधाई!
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/

Kunwar Kusumesh ने कहा…

very nicely written.

बेनामी ने कहा…

nice imagination :-)

loved reading it out.

M VERMA ने कहा…

यादें तो विचलित करते ही रहते हैं