रविवार, 5 जून 2011

ग्रीष्म

जलता सूरज
गरम गरम धरती
रोटी की तरह दिन भर सिकती ।

घिसी चप्पल जलाती पांव
सूखे ठूँठ पर कौवों की काँव काँव।
पीपल के पत्ते भी स्तब्ध
हवा के डैने कैद बंद ।

सूखे होंठों को गीला करती जीभ
दूर तक पानी की नही कोई सींच ।
सूना पनघट, खाली गगरी
छांव से खाली आंगन, देहरी ।

पसीने की चिपचिपाहट
खीझ, झुंझलाहट, पॉवरकट ।
घूंघट के नीचे माथे पर पसीने
बच्चे नंगे अन-तराशे नगीने ।

पानी के लिये सब तरसे
कब आयें बादल और कब बरसे ।
गरमी है ये जेठ की गरमी
नही बरतेगी कोई नरमी ।
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