शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

खिडकी


मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी, कभी तुम भी खुली रखते ।

बस आँखें बंद करने से, मुश्किलें कम नही होती
तुम भी यह जान ही जाते जो आँखों को खुला रखते ।

हमेशा खुद को वंचित करके, दूसरा खुश नही होता,
सच मानो मै भी खुश होती, जो तुम खुद के लिये जीते ।

मन के अंदर जो दुख पनपे, हँसी होंठों पे कैसे हो,
दिल से तब मुस्कुराते तुम, जो खुद अपनी खुशी चुनते ।

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते

मै तो इस प्यार से अपने, जगमगा कर रखूँ आंगन
कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ इस रस्ते ।


चित्र गूगल से साभार

36 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

संवाद बना रहे, शब्दों का प्रवाह बना रहे, खिड़कियाँ खुली रहें।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते ....बहुत बड़ी बात कह डाली बातों बातों में

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या खिड़की!...वाह!...सुन्दर

kshama ने कहा…

मै तो इस प्यार से अपने, जगमगा कर रखूँ आंगन
कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ फिर इस रस्ते ।
Kya baat kahee hai!

Arvind Mishra ने कहा…

वाह बहुत खूबसूरत और महीन संवेदना की कविता

Vaanbhatt ने कहा…

नेकी कर दरिया में डाल...लोग बहुत ज़ालिम हैं...त्याग का मोल समझ नहीं सकते...वैसे भी हम त्याग उनके लिए करते हैं...जिनसे रिटर्न की उम्मीद नहीं होती...

mridula pradhan ने कहा…

कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ इस रस्ते
very good.....padhkar shayad kuch log sudhar jaayen.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हर अशआर भावपूर्ण ...


मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी, कभी तुम भी खुली रखते ।
सच है खिडकी खुली न हो तो उजला कैसे पहुंचेगा ..बहुत सुन्दर भाव ..

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते

गहन व्यथा को कह गया यह शेर

संजय भास्कर ने कहा…

सुन्दर गहन ....बहुत ही शानदार रचना है....लाजवाब

वन्दना ने कहा…

वाह ………………बहुत सुन्दर भावो का संप्रेक्षण्।

Dr Varsha Singh ने कहा…

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते

मै तो इस प्यार से अपने, जगमगा कर रखूँ आंगन
कभी तुम भी सुधर जाओ और आ जाओ इस रस्ते ।

खूबसूरत और भावमयी प्रस्तुति....

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी,कभी तुम भी खुली रखते

बस आँखें बंद करने से, मुश्किलें कम नही होती
तुम भी यह जान ही जाते जो आँखों को खुला रखते


भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...हार्दिक बधाई..

ZEAL ने कहा…

.

मेरे मन का उजाला ये, तुम तक भी पहुँच जाता
जो अपने दिल की इक खिडकी, कभी तुम भी खुली रखते .....

आपके मन का उजाला , मेरे दिल की खुली खिड़की से मुझ तक पहुंचा है ....आभार।

.

बेनामी ने कहा…

सीधे मन से संवाद करती हुई, जीवन के कुछ गूढ़ रहस्यों से पर्दा हटाती हुई बेहतरीन कविता। खासकर ये चार पंक्तियाँ बेहद पसंद आयीं।

हमेशा खुद को वंचित करके, दूसरा खुश नही होता,
सच मानो मै भी खुश होती, जो तुम खुद के लिये जीते ।

मन के अंदर जो दुख पनपे, हँसी होंठों पे कैसे हो,
दिल से तब मुस्कुराते तुम, जो खुद अपनी खुशी चुनते ।

P.N. Subramanian ने कहा…

संवेदनाएं तो हैं परन्तु मुझे तो प्रेरक लगी. आभार.

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.
आपको नवरात्रि की ढेरों शुभकामनायें.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…




बहुत ख़ूबसूरत रचना के लिए मुबारकबाद !
बधाई !


सा्थ ही …
आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और
शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति

विशाल ने कहा…

बहुत सुन्दर शब्द रचना.

खिड़की खुल जायेगी एक दिन.

Babli ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार को नवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

Rachana ने कहा…

हमेशा खुद को वंचित करके, दूसरा खुश नही होता,
सच मानो मै भी खुश होती, जो तुम खुद के लिये जीते ।
kya baat hai bahut bahut hi prabhavi kavita
saader
rachana

amrendra "amar" ने कहा…

सुंदर भाव..खूबसूरत अभिव्यक्ति*********
बेहतरीन कविता.
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

Suman ने कहा…

har pankti sunder .......

Arvind Mishra ने कहा…

एक वैदिक मन्त्र है -आनो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतः -मतलब विश्व के चारो और से उत्तम विचार मेरे पास आयें !
आपकी पोस्ट इस ऋचा की भी याद दिला गयी !

वर्षा ने कहा…

कई बार तो बंद खिड़कियां बड़ी कहर ढा देती हैं, अच्छे संदेश के साथ सुंदर रचना है।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'तपस्या,त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिस के लिए ये सब,वे खुद कुछ कद्रदां होते '
..................बहुत सुन्दर
...................बढ़िया प्रस्तुति

बेनामी ने कहा…

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते
....
हर ही चीज़ का महत्व तब ही होता है जब उसकी पहचान हो जिसे मिले - नहीं तो सभी कुछ meaningless हो जाता है | मुस्कुराहटें बिखेरने का ही नाम जीवन है |

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते।
बेकद्री के इस दौर पर सार्थक टिप्पणी

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग ने कहा…

Bahut hi achhi kavita jo jivan ke wastwikta ko vyakt karti hai.

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बंद-खिड़की का संकट है...खुल जाए तो फिर क्या कहने !

राम चन्द्र मिश्र ने कहा…

नमस्ते आशा जी, आपकी टिप्पणी मेरी दो साल पुरानी पोस्ट पर देखा तो आपके ब्लॉग पर आया|
अभी आप अमेरिका मे हैं या भारत मे ? Anderson, SC is not very far from Athens, GA. Me & My Wife are here in University of Georgia. Would be happy to meet you some day...

mahendra verma ने कहा…

बस आँखें बंद करने से, मुश्किलें कम नही होती
तुम भी यह जान ही जाते जो आँखों को खुला रखते ।

सुंदर और प्रभावी पंक्तियां।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

क्या बात है....

mehek ने कहा…

तपस्या, त्याग ये सब कुछ तब तक ही सही लगता
करो जिसके लिये ये सब, वे खुद कुछ कद्रदाँ होते

ye ekdam sachhi baat kahi,jab tak samnewala khidki na khole mann mein ujala kaise ho..ek alag si sunder rachana.
hum thik hai ahsa ji, aur aap bhi swasth rahe yahi tammanna hai.
ho jara busy kaam aani diwali chi shopping pan suru aahe.ajun tar sagala faral banayacha aahe,khup tension aale aahe,kase honar dev jane.
anyways wish u and family happy diwali in advance.mehek.