शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

चलते चलते मोड पर

चलते चलते मोड पर
कैसे बदल गये रस्ते
तुम चले गये उधर
ठगे से हम रहे इधर ।

कहां तो पिरोये थे
बकुल पुष्प हार
कहा था खुशबू इनकी
रहेगी साल हजार

वे भी कहीं पडे होंगे
बकुल वृक्ष के नीचे
या कूडे के ढेर में
सोये हों अखियां मीचें ।

मेरी किताबों में दबे
वे खत तुम्हारे लिख्खे
वे प्रेम रस में पगे
अक्षर सारे पक्के ।

कैसे मै भूलूं उनको
कैसे मिटाऊँ दिल से
पलक की कलम से
उतारे जो गये दिल पे ।

ये क्या हुआ सोचूं
सोचूं ये क्यूं हुआ
वो प्यारा सा सपना
क्यूं हुआ धुआं धुआं ।

कभी राह में अब
जो मिल गये हम से
नज़र बचा कर जाना
न तकना, कसम से ।

सह न पाऊँगी तुम्हारी
वह बनावट की हंसी
गले की अटकी फांस
हाय ह्रदय में फंसी ।
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