रविवार, 27 नवंबर 2011

इस देस में वापस आकर

इस देस में वापस आकर, कितना अच्छा लगता है
इसका सच्चा झूठा किस्सा सारा सच्चा लगता है ।

इसकी धूल भरी सडकें और इसका धूमिल आसमान
गाता या रोता हर कोई अपना बच्चा लगता है ।

इसकी धुंद और इसके कोहरे, इसकी ठंडक और गर्मी
इसका हर मौसम इस दिल को सचमुच अच्छा लगता है ।

ताजे अमरूदों के ठेले, सिंघाडों की हरियाली
देख के ये प्यारे से नजारे मन कच्चा कच्चा लगता है ।

इसके वृक्ष बबूल के हों या हों रसीले आमों वाले
हम को तो हर पेड से लटका प्यार का गुच्छा दिखता है ।

पार्कों में मिलते वो पडोसी जो न कभी मुस्कायेंगे
उनकी चढी त्यौरियों पीछे कुछ अपनापा लगता है ।

सुंदर स्वच्छ परदेस में चाहे कितने ही सुख क्यूं न मिले
देसी घुडकी खा कर भी रबडी का लच्छा लगता है ।

35 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपना देश अपना ही लगता है ..सुन्दर प्रस्तुति

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर भी होगी। सूचनार्थ

Arvind Mishra ने कहा…

सब कुछ बयान करती हुयी मनः स्थति की कविता -कब लौटीं हैं विदेशाटन से ?

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काश देश भी आपके भावों को यथारूप समझ पाये।

kshama ने कहा…

इसकी धुंद और इसके कोहरे, इसकी ठंडक और गर्मी
इसका हर मौसम इस दिल को सचमुच अच्छा लगता है ।
Bilkul sahee kah raheen hain aap!

mridula pradhan ने कहा…

सुंदर स्वच्छ परदेस में चाहे कितने ही सुख क्यूं न मिले
देसी घुडकी खा कर भी रबडी का लच्छा लगता है ।
ekdam dil se likhi.....bahot pyari kavita.

GYANDUTT PANDEY ने कहा…

ओह, वापस आये हैं, या वापस आने की याद आई है!

स्वागत!

sushma 'आहुति' ने कहा…

बेहतरीन शब्द सयोजन भावपूर्ण रचना.......

रविकर ने कहा…

बधाई ||

पढ़ कर अच्छा लगा ||

Vaanbhatt ने कहा…

बकौल शैलेन्द्र जी...लाख लुभायें महल पराये...अपना घर फिर अपना ही घर है...

Rakesh Kumar ने कहा…

सच में अपना वतन अपना ही लगता है.
आपकी प्रस्तुति लाजबाब है आशा जी.
सुन्दर और भावपूर्ण.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
मेरी नई पोस्ट पर आपका हार्दिक स्वागत है जी.

Udan Tashtari ने कहा…

सुंदर स्वच्छ परदेस में चाहे कितने ही सुख क्यूं न मिले
देसी घुडकी खा कर भी रबडी का लच्छा लगता है ।

--एकदम सच!!

Swarajya karun ने कहा…

@इसकी धूल भरी सडकें और इसका धूमिल आसमान
गाता या रोता हर कोई अपना बच्चा लगता है ।
वाकई ,दिल को छू गयी यह रचना .

चैतन्य शर्मा ने कहा…

हाँ ...अपने देश से अच्छी कोई जगह नहीं......

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मन से निकले भाव .... सच अपना आँगन, अपना देश अपना ही होता है.....

आशा जोगळेकर ने कहा…

आप सब का अनेक धन्यवाद ब्लॉग पर आने के लिये कविता सराहने के लिये । आकर दस दिन हो गये आज । छह महीने का बंद घर रुटीन में लाने के लिये इतना समय लग गया अभी भी चल ही रहा है । पर आप लोगों से मन की बात कहने का लोभ संवरण नही कर पाई ।

dheerendra ने कहा…

आशा जी,..
अपना तो अपना होता है चाहे वह देश हो या
अपने लोग,..
बहुत सुंदर भावों लिखी बेहतरीन रचना,
पढकर बहुत अच्छा लगा ...
मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार है...

संतोष कुमार ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति
आभार !!

Unlucky ने कहा…

I wanted to let you know you wrote a great article.

From Indian transport

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

आदरणीया आशाजी रचना के भावों को महसूस कर मन खुश होगया । सचमुच अपने देश अपनी भूमि से बढकर कुछ नही ।

Abhishek Ojha ने कहा…

ये बात तो पूरी तरह सच है !

mahendra verma ने कहा…

इसके वृक्ष बबूल के हों या हों रसीले आमों वाले
हम को तो हर पेड से लटका प्यार का गुच्छा दिखता है ।

अपने देश की बात ही निराली है ।

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

देशभक्ति पूर्ण

dheerendra ने कहा…

अपना देश अपना होता है सुंदर पोस्ट...
मेरे नये पोस्ट "प्रतिस्पर्धा"में......

बेनामी ने कहा…

A very sweet patriotic poem. Loved each and every line. It freshened me up. Thanks :-)

ZEAL ने कहा…

पार्कों में मिलते वो पडोसी जो न कभी मुस्कायेंगे
उनकी चढी त्यौरियों पीछे कुछ अपनापा लगता है ...

bahut sahi likha hai aapne.

.

Suman ने कहा…

सुंदर भावभरी रचना जिसमे अपनी माटी की
ख़ुशबू आ रही है !

k.joglekar ने कहा…

हम कितना ही बदले हुए परिवेश के साथ समझोते कर लें, हमें भाता वही है जिसके साथ हम जिए बड़े हुए......वही सब कुछ अपना लगता है ....सच्चा लगता है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच है अपना देश अपना ही होता है ... मैं भी जब जाता हूँ ऐसे ही ख्याल आते हैं ..

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति, आभार

Kunwar Kusumesh ने कहा…

वाह,
बहुत खूब.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ऐसा देश है अपना हाँ ऐसा देश है अपना ...

dheerendra ने कहा…

मेरे नए पोस्ट में,..आज चली कुछ ऐसी बातें, बातों पर हो जाएँ बातें

ममता मयी हैं माँ की बातें, शिक्षा देती गुरु की बातें
अच्छी और बुरी कुछ बातें, है गंभीर बहुत सी बातें
कभी कभी भरमाती बातें, है इतिहास बनाती बातें
युगों युगों तक चलती बातें, कुछ होतीं हैं ऎसी बातें

वर्षा ने कहा…

सच में, अपनी मिट्टी में जीना या मरना दोनों ही अच्छा लगता है।

mehek ने कहा…

bilkul ji apna desh chahe jaisa ho apna hota hai.yaha chahe lakh dhulikaye ho sunderta bhi utani hi hai.bahut khub.