बुधवार, 19 अप्रैल 2017

बादलों के उस पार

बादलों के उस पार कोई तो जहाँ होगा,
जहाँ हमारा भी इंतजार हो रहा होगा।

खूबसूरत अलग से झरने होंगे,
रंगों का कोई अनोखा सा समाँ होगा।

हमारे संगी साथी जो यहाँ बिछुड गये, होंगे
धुंआधार बारिशों से धुला आसमाँ होगा।

रुपये पैसे की जरूरत ही नही होगी,
खाना पीना भी वहाँ मुफ्त ही होगा

या फिर भूख प्यास ही नही होगा,
तृप्ति का अहसास ही सदा होगा।

हमारी सोच भी तो इस जहाँ की है,
ना जाने कौनसा नया मंजर वहाँ होगा।

जो भी होगा बहुत खूबसूरत होगा
ये यकीन हमारा भी सही होगा।


बुधवार, 12 अप्रैल 2017

कितना कुछ

तारोंभरा आसमान निहारते हुए
कितना कुछ याद आता है।
परिक्षा के बाद गर्मी की छुट्टियों में
रात छत पर सफेद चादरों वाले बिस्तर पर
बैठ कर बतियाना,
परिक्षा खत्म होने की खुशी और साथ साथ
नतीजे की प्रतीक्षा और तनाव
वह  एकदूसरे को ढाढस बंधाना,
हाथों को हाथ में लेकर।
अचानक एक सिहरन, एक बिजली सी महसूस होना
मेरा हाथ छुडाकर नीचे भाग जाना
क्या यही प्यार था,
आज इतने सालों बाद यह याद कर के
हंसी भी आती है और एक बेचैनी भी होती है दिल में
क्या वह प्यार  था  अगर था तो थोडी सी हिम्मत दिखाने से परवान चढता?


बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

कब हमने सोचा था

कब हमने सोचा था कि ये पैर डगमगायेंगे,
बेटे हमारे लिये फिर लाठी ले के आयेंगे।

खाना बनाने से भी हम इतने थक जायेंगे
सीढी बिना रेलिंग की कैसे हम उतर पायेंगे।

लेकिन ये हुआ है तो अब मान भी हम जायेंगे
जो जो सहारा लेना है लेकर उसे निभायेंगे।

मन माफिक खाना पीना भी भूल जायेंगे,
सरे शाम ही अब खाने से निपट जायेंगे।

हलका फुलका और दाल से निभायेंगे,
एक ही काफी है अब दो कहाँ खा पायेंगे।

घूमने जाना तो फिर कोई साथ ले के जायेंगे
अकेले से तो जानें की हिम्मत क्या बटोर पायेंगे।

बुधवार, 9 नवंबर 2016

फिर कविता



मेरी कविताएं नाचती हैं मेरे खयालों में।
घूमती हैं गोल गोल मेरे चारों और,
एक नई अनछुई कविता लेने लगती हा आकार
उनके बीचोंबीच।
जिसका हरियाली का लेहंगा, फूलों की चोली,
चांद सितारे टंकी झीनी झीनी चूनर,
उसके बादल से काजल काले गेसू।
सके अलंकार, उपमा, उत्प्रेक्षा, श्लेष,
अपन्हुति, अन्योक्ति और जाने क्या क्या।
धीरे धीरे साफ होती जाती है उसकी आकृति मन दर्पण में
और मै उठा लेती हूँ कलम।



कविता, कविता का जन्म

सोमवार, 7 नवंबर 2016

घुटने की शल्यक्रिया के बाद




घुटना बोलता है,
जब उसे दुख  होता है
साथ छूटने का, साथी जो
उसके अपने थे।
होता है उनको भी दुख
अपने पुराने साथी से बिछडने का
उसकी जगह लेने वाले नये साथी से उनकी बनती नही है अभी।
नयी बहू की तरह सब की परीक्षा के घेरे में है वह।
इसीसे दुखी है और उसके दुख से मै दुखी।
पर धीरज रखना है। नई बहू को भी सब अंततः स्वीकार कर ही लेते हैं।
इसे भी कर लेंगे बल्कि कर ही रहे हैं।
उसका और मेरा दुख भी थोडा थोडा
हल्का हो रहा है।
जल्द ही वह भी हो जायेगा हिस्सा इस पैर का

फिर वह भी घुल मिल के रहेगा सबके साथ।

शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

जब चले आते हो,



जब चले आते हो, अंधेरे में रौशनी की तरह,
हर पोर मेरा, खिलता है एक कली की तरह।

ज्यूं छिटक जाये अमावस को चांदनी गोरी,
जगमगाते हो, हमेशा ही तुम, दिवाली की तरह।


किसी लमहे-उदास को लगे, खुशी की नजर,
मेरी उजडी सी जिंदगी, तुम गुलाली की तरह।

हमें तुम्हारी रुसवाइयाँ भी हैं मंजूर,
जो वादा कर लो, मिलोगे फिर, सबा की तरह।

कर लेंगे इंतज़ार, हम भी कय़ामत का सनम,
जो तुम बन के खुदा बख्श दो नबीं की तरह।

गजल जैसी, प्रेम, भावना


रविवार, 4 सितंबर 2016

गणेश चतुर्थी



द्वारे बंदनवार, सजाई रंगोली,
आईये गणपति
स्वागत है।

ढोल, ताशे, झांज, खूब बज रहे
आनंद अपार
आगमन से।

पांव धोके पीऊँ, आरती उतारूं
कुंकुम तिलक
सुंदर सोहे।

सजाया आसन, विराजे गणेश,
भक्तों का उत्साह
 कहूँ कैसे।

आचमन,स्नान को, जल ये पवित्र,
चंदन रोली अक्षत
भाल सोहे।

जवाफूल दूब करूं मै अर्पण,
मोदक इक्कीस
नैवेद्य के।

अथर्वशीर्ष का होता पारायण,
सुखकर्ता, दुखहर्ता,
करूँ आरती।

चरणों में, साष्टांग दंडवत,
सेवा में आपके,
सदा रहें।


दस दिन हमारे साथ रहें देव
भारत सदैव
उन्नति करे।

आशीष केवल, यही देते जाना
सर्व जन रहें
सदा सुखी।




चित्र गूगल से साभार।