शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

रूठी कविता

मेरी कविता मुझसे रूठ गई,
शब्दों की श्रुंखला टूट गई ।।

शब्द नाचते से आते थे
इक माला में गुँथ जाते थे
रंगों गंधों से सज धज कर
चारों और महक जाते थे
क्या हुआ कि सरगम टूट गई ।। मेरी

शब्द शब्द में भाव बरसता
 निर्मल जल सा कल कल बहता
रसिक मनों को छू सा जाता
मन मयूर किलकारी भरता
बरखा क्यूं अचानक सूख गई।। मेरी

अब तक में कर रही प्रतीक्षा
कब खत्म हो मेरी परीक्षा
किस गुरुवर से लूं अब दीक्षा
जो दे मुझको उत्तम शिक्षा
ऐसा क्या मिलेगा मुझे कोई।। मेरी




बुधवार, 1 अगस्त 2018

जिंदगी


हर पल तो नही पर हर घंटे लेती है इम्तहान,
ये हमारी जिंदगी जो बनाना चाहती है हमें महान।
पर हम साधारण से मानव कोई राम या धर्मराज तो नही
जो सफल हों हर इम्तहान में और तैयार हों अगले के लिये।

हम होते हैं कभी सफल तो कभी असफल और भुगतते हैं परिणाम
अपने ठीक से तैयार न होने का या होने का
कभी भाग्य के साथ देने का कभी न देने का
कभी जिंदगी के हमें रुलाने का कभी हँसाने का।

एक इम्तहान खत्म हुआ नही कि दूसरे की तैयारी
कैसी मुश्किल हमारी कैसी ये लाचारी
दुनिया हँस के कहती है बेचारा या बेचारी
कैसी जिंदगी इसकी काँटों भरी सारी की सारी।

देती है समय हमको काँटा निकाल,पाँव सहलाने का
थोडा बैठ के दिल बहलाने कि हम हो जायें तैयार
अगले काँटे की चुभन के लिये और चुभाने दें काँटे
जिंदगी को, जब तक कि पाँव लहू-लुहान ना हो जायें।


मंगलवार, 19 जून 2018

कितने दिन

कितने दिन हो गये हैं
देस छोडे हुए हैं।
पडे परदेस में हैं,
अजब से वेश में हैं।
न चुन्नी और न आँचल
पेंट शर्ट में खडे हैं।
याद आती है घर की
अपने दिल्ली शहर की।
वहाँ के भीड भडक्के
और लोगों के वे धक्के।
वो त्यौरियाँ चढाना
वो दस बातें सुनाना।
और किसी का वो कहना
बस भी करो अब बहना।
साथ तो रोज का है
सफर थोडी देर का है।
उतरना है सभी को
न रहना है किसी को।
समझदारी की बातें
सॉरी सॉरी की घातें।
उस सबको याद करती
मन को बहलाती रहती।


बुधवार, 28 मार्च 2018

मज़ा

सुनो, सुन रहे हो ना
सुनो मेरा गीत जो आ जाता है होठों पर
सिर्फ दुम्हारे लिये ।

सुनो पुकार रही हूँ मै तुम्हें
दिखाना चाहती हूँ अपने हाथों में सद्य खिला गुलाब
जिसकी ताजगी आजाती है मेरे चेहरे पर
तुम्हें देखते ही।


सुनो तुम्हारे एक झलक के लिये
कितना तरसी हूँ मैं
पर इसमें भी एक तडप,
एक मज़ा है।

लगता है कि क्या ही अच्छा हो कि
हम देख सकें एक दूसरे को
सदा ही।

पर मज़ा तो कभी कभी पकवान खाने में है।

रविवार, 19 नवंबर 2017

ठहराव

भँवर में फँसी थी नाव
नाव में फँसा था पाँव
अनुकूल ना थी हवा
माकूल ना थी दवा
गर्त में था गहरा खिंचाव।

घबराहट चेहरेपर
धडधडाहट थी दिल में
कैसे निकले मुश्किल से
छटपटाहट थी मन में
दूर था किनारे का गाँव।


समय चल रहा था खराब
मुश्किलों का न कोई हिसाब
कोई न तरकीब ऐसी
कूद के पार हों ऐसी
वक्त का हो रहा रिसाव।

मुश्किल से सही
ये भी निकला समय
धीरे धीरे सही कट ही गया
वह समय
चलने लगी आखिर नाँव।

ठंडी हवा कुछ सुकूँ दे गई
साँस संयत हुई
कुछ तो राहत हुई
कुछ तो आया ठहराव।



शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

छह महीनों के लम्बे अंतराल के बाद मैं वापस पढ़ना लिखना शुरु कर रही हूँ। पहले आप सब को पढ़ूँगी फिर कुछ लिखूँगी भी। आशा है आप सबका सहयोग मिलता रहेगा।


शनिवार, 5 अगस्त 2017

दर्द ओ ग़म तो




दर्दों ग़म तो लाखों हैं इस ज़माने में,
ख़ुशी को लेकिन अक्सर ढूँढना ही पड़ता है ।

रंजिशों की तो  यहाँ सदा बिछी है बिसात
मात देने को सिकंदर ही बनना पड़ता है।

टी वी अख़बार तो छापते हैं बस बुरी ख़बरें
अच्छी ख़बरों को तो कोने में घुसना पड़ता है।

भूखे चेहेरों पे लाने के लिये छोटी हँसी
अपनी रोटी में से थोड़ा खिलाना पड़ता है।

अपनी कमाई में से कुछ तो थोड़ा सा
दूसरों की ख़ातिर भी रखना पड़ता है।

ग़मों में टूटने से बचने के लिये
दुख में भी मुस्कुराना पड़ता है।

हम हँसे तो लोग भी मुस्कुरा देंगे
रोशनी  हो तो अंधेरों को हटना पड़ता है।

ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम सनम
ऐसे तो फिर जीना सभी को पड़ता है ।