रविवार, 11 दिसंबर 2011

बीज और वृक्ष


मेरी जडें फैली हैं दूर दूर तक,
और मेरी टहनियां व्याप रहीं हैं सारा आकाश
कब सोचा था मैने मेरा छोटा सा अस्तित्व इतना बनेगा विशाल
बीज से उठ कर लहरायेगी डाल डाल ।
छू लेंगी आसमान मेरी टहनियाँ
इन पर बैठ कर पंछी सुनायेंगे कहानियाँ
बनायेंगे छोटे छोटे घरौंदे
तिनका तिनका डोरा डोरा गूंथ के ।
नीचे बैठेंगे थके हारे पथिक
और मेरी टहनियां झुक जायेंगी अधिक
लडकियां डालेंगी झूले, युवतियाँ कजरी गायेंगी
और मेरी पत्तियाँ मुस्कुरायेंगी ।
बच्चे खेलेंगे मेरी छांव में
चढेंगे मेरे कंधों पर एक एक पाँव रख कर
और मैं खांचे बना कर उन्हें सम्हालूंगा ।
टहनियों में झुलाउंगा ।
कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये ।

24 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

एक और शानदार
और
प्रभावी प्रस्तुति ||
बधाई ||

सदा ने कहा…

वाह...बहुत बढि़या।

sushmaa kumarri ने कहा…

बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति....

kshama ने कहा…

कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये ।
Wah! Kya baat hai!Bahut khoob!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर वृक्ष का यही दुःस्वप्न होता है, हमारी संवेदनशीलता ही क्षीण हो जाये तो

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut sundar bhaav samete hue hain in panktiyon me insaan ko bhi vraksh se sabak lena chahiye.humara jeevan prakarti ke bina sambhav nahi.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

जीवन को सार्थक बनाने को प्रेरित करती एक सुन्दर,सरल मगर अद्वितीय कविता !
आभार !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये ... dene se badhker koi sukh nahi...

Arvind Mishra ने कहा…

एक छोटी सी उर्जाभरी सृजनशीलता क्या कुछ नहीं कर सकती

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

महादानी हैं ये और हम सब?

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत प्रभाव शाली सुंदर पोस्ट ....बेहतरीन

मेरी नई रचना .......
नेताओं की पूजा क्यों, क्या ये पूजा लायक है
देश बेच रहे सरे आम, ये ऐसे खल नायक है,
इनके करनी की भरनी, जनता को सहना होगा
इनके खोदे हर गड्ढे को,जनता को भरना होगा,

आपका इंतजार है ...

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

ये देते रहते हैं और हम लेते ..... फिर भी जी नहीं भरता हमारा :(

Suman ने कहा…

मरते दम तक देने की चाह ..
ताई सुंदर रचना आहे !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहूत सुन्दर

संजय भास्‍कर ने कहा…

कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा

....गहरे भाव समेटे हुये पंक्तियाँ...शानदार पोस्ट

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर सारगर्भित रचना, अच्छी लगी .....

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

वाह। परोपकार की भावना अनंत को अपने में समेट लेती है!

mehek ने कहा…

yahi tho vruksha ki mahanta hai,bahut sunder,kash har insaan ka mann aisa hota.

Satish Saxena ने कहा…

वे जीवन के अभिन्न भाग हैं ...वे जीवित भी हैं बस हम उन्हें सुअने का प्रयत्न नहीं करते !
शुभकामनायें आपको !

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

अमेरिका में रहते हुए भी आपकी कविताओं में गांव की मिट्टी की महक कायम है।...अभिनंदन आपका।
प्रशंसनीय रचना।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

शानदार प्रस्तुति.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

मेरी नई रचना के लिए "काव्यान्जलि" मे click करे

vikram7 ने कहा…

कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये
प्रभावशाली रचना

Rakesh Kumar ने कहा…

आशा जी, आपकी यह प्रस्तुति अनुपम और प्रेरक है.बीज से वृक्ष बनना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिये,जो सदा परोपकार के लिए अपना जीवन
समर्पित करने में ही आनंद और शान्ति का अनुभव करे.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.'हनुमान लीला भाग-२' पर आपका स्वागत है.