रविवार, 11 दिसंबर 2011

बीज और वृक्ष


मेरी जडें फैली हैं दूर दूर तक,
और मेरी टहनियां व्याप रहीं हैं सारा आकाश
कब सोचा था मैने मेरा छोटा सा अस्तित्व इतना बनेगा विशाल
बीज से उठ कर लहरायेगी डाल डाल ।
छू लेंगी आसमान मेरी टहनियाँ
इन पर बैठ कर पंछी सुनायेंगे कहानियाँ
बनायेंगे छोटे छोटे घरौंदे
तिनका तिनका डोरा डोरा गूंथ के ।
नीचे बैठेंगे थके हारे पथिक
और मेरी टहनियां झुक जायेंगी अधिक
लडकियां डालेंगी झूले, युवतियाँ कजरी गायेंगी
और मेरी पत्तियाँ मुस्कुरायेंगी ।
बच्चे खेलेंगे मेरी छांव में
चढेंगे मेरे कंधों पर एक एक पाँव रख कर
और मैं खांचे बना कर उन्हें सम्हालूंगा ।
टहनियों में झुलाउंगा ।
कितना सुख है इस सब में
कितना तृप्त हूँ मै जीवन में
सूख जाऊँगा तब भी लकडियाँ दे दूंगा
किसी के चूल्हे, किसी के अलाव, किसी की चिता के लिये ।
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