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बुधवार, 28 मार्च 2018

मज़ा

सुनो, सुन रहे हो ना
सुनो मेरा गीत जो आ जाता है होठों पर
सिर्फ दुम्हारे लिये ।

सुनो पुकार रही हूँ मै तुम्हें
दिखाना चाहती हूँ अपने हाथों में सद्य खिला गुलाब
जिसकी ताजगी आजाती है मेरे चेहरे पर
तुम्हें देखते ही।


सुनो तुम्हारे एक झलक के लिये
कितना तरसी हूँ मैं
पर इसमें भी एक तडप,
एक मज़ा है।

लगता है कि क्या ही अच्छा हो कि
हम देख सकें एक दूसरे को
सदा ही।

पर मज़ा तो कभी कभी पकवान खाने में है।

शनिवार, 6 अगस्त 2016

क्या सचमुच ..

क्या सचमुच कोई नेता नही चाहता
कि देश तरक्की करे,
लोगों को काम मिले,
उनके सर पे भी छत हो,
बदन पर कपडा।
उनके भी बच्चे जायें स्कूल,
बगिया मे खिले फूल।
खेतों में अनाज हो,
समंदर में देश के जहाज़ हों
बीमारों को दवा मिले,
साफ सुथरी हवा चले।
सैनिक रहें सज्ज सदा,
मिले उन्हे सम्मान और मुआवजा।
पडोसी देशों से मेल हो,
शांति से खेल हों।
वे भी और हम भी रहें खुशहाल,
किसी के दिल में ना हो मलाल।
प्रकृती की मार तो पडती ही है,
पर सरकार क्यूं हम से अकडती है।
क्या सचमुच कोई नेता, कोई अफसर,कोई नही चाहता
कि लोगों का काम हो
और उसका भी नाम हो।

हाँ एक नेता है ऐसा, जो चाहता भी है और कर भी रहा है । बस थोडा धीरज रखना होगा।



शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

वो दिन हवा हुए

वो दिन हवा हुए, जब पसीना था गुलाब,
आँखों में रंग थे और थे सुनहरे ख्वाब।

मेरे सवाल से पहले आता था उनका जवाब,
जिस काम को छूते हम बन जाता था सवाब।

रौनकें लगी रहती थीं हर तरफ,
रोशनी के चाशनी का माहौल हर तरफ,
रातें थीं चांदनी की और हम थे माहताब।

अब आज का जिक्र क्यूं कर करेंगे हम,
यादों की जब रखी हुई है खुली किताब। 

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

छटने लगे हैं अंधेरे

छटने लगे हैं अंधेरे
घुल गये बादल घनेरे,
रोशनी सी फैलती है
किरणों ने डाले बसेरे।

अभी कुछ है धुंद बाकी,
अभी हैं साये हाँलाकि,
राहें नजर आने लगीं हैं,
उजलते मंजिल के डेरे।

नाव डगमग डोलती थी,
कुछ भंवर को तोलती थी,
ले ही आया है ये नाविक
धीरे धीरे तीरे तीरे।

अब है आगे तेज़ धारा,
पर है मजबूती सहारा,
मंजिल बहुत है दूर अब भी
पर है पथ दीपक उजेरे।

हम हैं तेरे साथ नाविक,
और ऊपर वाला मालिक,
तेरे हाथों हाथ देकर
चल पडें सारे के सारे।

चित्र गूगल से साभार।

रविवार, 12 जून 2016

जीवन की यह अजब पहेली

कभी कहानी बहती रहती, कभी मोड पर रुक जाती है।
कभी कविता सी मचलती रहती, कभी अडियल सी ठहर जाती है।

कभी सुरों की सजीली महफिल, जमते जमते उठ जाती है,
बजते बजते ही सितार की तार टूट के सिहर जाती है।

हीरा तराशते तराशते, जैसे कोई दरार पड जाती,
जानें कितनी सुंदर कलियाँ बिना खिले मुरझा जाती हैं।

मन के इस चंचल से पट पर जब कोई आकृति उभरती,
जाने क्या हो जाता है कि बनते बनते मिट जाती है।

मंदिर की घंटी का मधुरव, कानों में रस घोल रहा हो,
कैसे कोई कर्कश सी ध्वनी, लय, ताल बिखरा जाती है।

लहरों पर खेलती नाव जब लहर लहर मचलती होती,
कभी अचानक भँवर में फँस कर वजूद अपना खो जाती है।

राह एक पकड के राही मंजिल अपनी पा जाता है
तब जीवन की अजब पहेली उलझ उलझ के सुलझ जाती है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

खोया पाया

कितना कुछ खोना पडता है,
कुछ पाने के लिये।
और देना पडता है श्रमदान,
पाया बनाये रखने के लिये।

हम अक्सर गफलत कर जाते हैं,
पाये पर अपना मालिकाना हक समझने की।
नही जानते कि हमने किराये पर लिया है इसे,
हमारे इस देह की तरह।

इसको जतन करना है तो करना पडेगा श्रम,
ये तो हमारा ही है कहाँ जायेगा, नही पालना है ये भ्रम।

जहाँ किराया भरने से चूके, कि पाया खो जाता है,
देह को उपेक्षित किया कि घुन लग जाता है।
मन दुर्लक्षित हुआ कि मैला हो जाता है। 

देह को श्रम साध्य करना,
मन को रखना स्वच्छ, सरल निर्मल शिशुसा

फिर शायद पाया रहेगा पाया, लंबे समय तक।
पर चिरंतन तो कुछ भी नही।

   

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

इक लडकी






गेंहूँ के दाने सी इक लडकी
सुनहरी, चमकती, खनकती।
अपने नसीब से अनजान,
इठलाती, बलखाती, खिलखिलाती।

जानती कहाँ है पिसेगी वो,
पानी में भीगेगी, पिटेगी, मसली जायेगी
सिंकेगी जिंदगी के चूल्हे पर,
दुखों की आग में जलेगी,
परोसी जायेगी किसी के आगे,
फिर भी मुस्कुरायेगी, चाहे म्लान ही क्यूं न हो मुस्कान।

या फिर गाड दी जायेगी जमीन में,
लेकिन उसकी जिजिविषा देखो,
फिर उगेगी, लहरायेगी, खिलखिलायेगी, लौटायेगी तुम्हें सौ गुना।

ये लडकी गेंहूँ के दाने सी।

चित्र गूगल से साभार।

गणतंत्र दिवस की मंगल कामनाएँ।

शनिवार, 16 जनवरी 2016

याद करना मुझे

याद करना मुझे मेरे जाने के बाद।
याद करना मेरी बातें, मेरी आदतें
अपनी चाहतें।
याद करना मेरा सजना, संवरना
घर को सजाना।
याद करना मेरा प्यार, मेरा राग-अनुराग,
मेरा त्याग।
याद करना अपनी लडाई, मेरी बुराई,
थोडी अच्छाई।
मिलन के क्षण, थोडी जुदाई
प्यार की गहराई।
याद कर के खुश होना, रोना नही।
या फिर नही याद करना।
क्यूं कि याद करके दुखी होने से अच्छा है
भूल जाना।

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

तुमसे अलग

,


कितना खालीपनहोता है,
 कितना सन्नाटा,
रहती हूं जब, तुमसे अलग

कितना सुरक्षित, लगता है उडना
मन पंखों पर,
रहती हूँ जब तुम्हारे साथ।

मेरा क्या है, हूँ भी या नही
क्या फर्क पडता है,
होकर तुमसे अलग। 

तुम्हारे साथ मै, 
मै कहाँ होती हूँ,
रहते हो बस तुम ही।

न कोई साज, 
न सजने की कोई इच्छा
जगती है, हो कर तुमसे अलग।

चहरे पर रौनक ,मन रुनझुन,
खनकते हैं कंगना,
तुम्हारे साथ।

रहना है यूँ ही साथ साथ,
बस नही रहना
तुमसे अलग। 


चित्र गूगल से साभार।



शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

राखी
















एक अनोखा बंधन राखी,
स्नेह सुगंधित चंदन राखी,
भगिनि ह्रदय का स्पंदन राखी,
भाई का अभिनन्दन राखी।



नही महज़ एक धागा राखी,
नही रुपैया गहना राखी,
अंतर तक कुछ गहरा गीला,
भाव-सिक्त सा गुंजन राखी।

सोमवार, 3 अगस्त 2015

हवा







हवा ये किस तरह बहने लगी है ,
कितना काला धुआँ सहने लगी है।

घुली इस में भी सच्चाई कभी थी,
ज़ुल्म अब झूट के सहने लगी है।

 गूँजते थे इसमें कह-कहे भी,
चीख सन्नाटे की कहने लगी है।

महकती थी कभी जो मोगरे सी,
बदबू इसमें से अब आने लगी है।

शोख कलियों का दामन थामती थी,
गर्म अंगार सी दहने लगी है।

रूमानी हुआ करता था मौसम,
बंदूके धांय धुम, चलने लगी हैं।

हवा का रुख ही है बदला हुआ सा,
 लुभाती थी, डराने क्यूं लगी है। 


चित्र गूगल से साभार।

शनिवार, 27 जून 2015

सफर

होगा कैसा वह सफर जो करना बाकी है अभी
ज्ञात से अज्ञात तक का अस्ति से नास्ति का भी

कैसी होगी राह वो  ले जायेगी जो मंजिल तलक,
पथ पूर्ण से शून्य का क्या जगायेगा  कोई ललक।

कौन सा होगा वो वाहन, जो पहुँचायेगा गंतव्य तक,
राह सरल सुगम होगी या फिर हो भरी कंटक ।

राह में होगा अंधेरा या होगा क्या प्रकाश भी,
व्याप्त केवल शून्य होगा या कोई विचार भी।


क्या मिलेंगे वहाँ सारे जो गये मुँह मोड कर,
या मेरे होने से न होने का ही होगा सफर।

क्या मै मिल पाउँगी वहाँ ज्ञान-देव के विठ्ठल से,
व्यास जी के क़ष्ण से उस रुक्मिणि देवी के वर से।

गीता में जो कह गये सभी मुझ तक आयेंगे,
मानो चाहे या न मानो मुझमें ही समायेंगे।

चित्र गूगल से साभार

मंगलवार, 26 मई 2015

अपराध बोध

देखें हैं मैने अपनों के कष्ट,
देखा है उन्हें पल पल घुलते
तिल तिल मरते,
पूर्ण अनिच्छा से छोडते हुए ये संसार।
जब कि बाकी था कितना कुछ पाना, उन्हें, अपने हिस्से का।
कितना सुख, कितनी पूरी होती आशाएं, आकांक्षाएँ
जो अधूरी छोड,जाना पडा उन्हें।
नही पूछी किसीने उनकी मर्जी
बस सज़ा सुनादी, उन्हें भी और उनके अपनों को भी।
और फिर वह दवाओं का अंबार, जिसमें से एक भी कारगर नही हो सकी,
वह बिस्तर, वह अपनों के मायूस चेहरे। भरे मन से इर्द गिर्द घूमना।
और उनका दिन गिनना, बस दिन गिनना।
हर दिन कम होती शरीर की ताकत,
हर दिन गहरे धंसती आंखें, गालों के गहराते खड्डे
हाथों पावों की हड्डियां, पतली होती जाती सिकुडती त्वचा,
और मेरा मुझमें से रोज कुछ टूटते जाना।
स्वयं के जीवित होने का अपराध बोध गहराते जाना।

रविवार, 3 मई 2015

पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

जो दे अब भी खुशी, पुरानी जेब का वो सौ का नोट
तो जान लो कि पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

बचपन के दोस्तों से मिलो अब भी जो गले लग कर,
तो जान लो कि पांव अब भी इसी जमीन पे हैं।

साबुन को इस्तेमाल करो घिस के पतला होने तक,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

गली में खेलते बच्चों की लपक लो तुम जो गेंद कभी,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

माँ के हाथ की रोटी जो लगे पिझ्झा से प्यारी,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

बच्चों को कहानी सुनालो जो किसी रात को तुम,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

किसी बुजुर्ग को देखते ही रोक लो जो कार,
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

मेहमाँ के आते ही खिल जाये अब भी जो बाँछें
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।

नयी जिंदगी में जो याद आयें पुराने हमदम
तो जान लो कि पाँव अब भी इसी जमीन पे हैं।



चित्र गूगल से साभार
इस कविता का आधार वॉटसएप पर पोस्टेड एक मराठी गद्य कविता है।




शनिवार, 18 अप्रैल 2015

तुम सुंदर हो ।




तुम सुंदर, तुमसे ये जग सुंदर
इस जग की सब बातें सुंदर
नदिया, पर्वत, बादल सुंदर
पशु, पक्षी और जंगल सुंदर
सागर, बालू, सीपी सुंदर
लहरातीं फसलें सुंदर
इस धरती की गोदी सुंदर
और आसमान की छत सुंदर
चंदा, तारे, बादल सुंदर
सूरज की किरणें सुंदर
बारिश की बूंदे सुंदर
पवन के झकोरे सुंदर
बिजली की चमकारें सुंदर
बादल की गड गड सुंदर
तेरा वह शांत रूप सुंदर
रौद्र रूप भी तो सुंदर
मै भी सुंदर, वह भी सुंदरं
तेरा प्रकाश सबके अंदर
हरलो मानव मन की कालिख
कर दो उसको निर्मल सुंदर
क्यूं कि तुम सुंदर हो।


चित्र गूगल से साभार।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कविता



टप टप टप बूँदों से आते शब्द नाचते,
झर झर झर धारा सी बहती है कविता।

सर सर सर लहराता जाता किसी का आँचल,
पायल की रुनझुन सी खनकती है कविता।

गुलशन में चटखती नन्ही नन्ही कलियाँ,
खुशबू वाली हवा सी बहती है कविता।




माँ की घुडकी, झिडकी और मीठी सी थपकी,
फिर उसकी लोरी सी बहती है कविता।

जच्चाघर से आती अजवायन की खुशबू,
और नन्हे रुदन सी बिलखती है कविता।

बादल की शिव के डमरू सी गड गड गड गड
और बिजली की लहर सी कडकती है कविता।

मन की कभी उदासी, कभी वो बेहद खुशियाँ,
मन के इन भावों सी बदलती है कविता।

तेरे, मेरे, और हम सब के जीवन जैसी,
कभी सरल तो कभी हठीली है कविता।


चित्र गूगल से साभार।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

प्यार

प्यार होता है कब, कहाँ, कैसे,
खिल सा जाता है दिल कली जैसे।

मन में एक रागिनि लहराती है
हवा भी खुशबूएँ सी लाती हैं,
धूप में चांदनी नहाती है।
मौसम भी हो रहा भला जैसे।

कब कैसे कोई मन को भाता है,
बिन उसके कुछ नही सुहाता है,
कैसे यकायक से सब बदलता है,
सपना साकार उठा हो जैसे।
उसके ना दिखने से वो बेचैनी,
बात ना करने पे परेशानी,
और अपनी कैसी कैसी नादानी,
होके मन बावला फिरे कैसे।

रात अपनी ना ही दिन अपने,
मन में खिलते हजारों में सपने,
उसका ही नाम बस लगे जपने,
अजनबी खुद से हो लिये जैसे।


वही अपना खुदा, वही भगवान,
उसके मुस्कान पे जहाँ कुर्बान,
उसकी बातें ही गीता और कुरान
धरम और करम सब पिया जैसे।

क्या कहें प्यार कैसे होता है,
बस इक बुखार जैसे होता है
ये कभी ना कभी उतरता है,
तब सब बचपना सा लगता है
मोड से आगे बढ जाना जैसे।

चित्र गूगल से साभार।


सोमवार, 26 जनवरी 2015

आस हरियाली रहे



आसमाँ पे जो हुकूमत बाज़ और गिध्दों की हो,
शान्ति के नन्हे परिंदे बोलो फिर जायें कहाँ।

आस पे ही अब तलक जिंदा रहे थे हम सनम,
तुम जो ना आने की ठानों, बोलो तब जाये कहाँ।

स्कूलों में महफूज़ हैं बच्चे यही सोचा किये,
वहीं गोली चलने लगे तो बच्चे फिर जायें कहाँ।

जिंदगी का आजकल कोई भरोसा ना रहा,
सुबह का निकला न लौटे शाम, तब जाये कहाँ।

अच्छे दिन अब आ रहे हैं कितना तो सुनते रहे,
जाने कहाँ वो छुप रहे हैं उनको हम पाये कहाँ।

गणतंत्र बनने का जशन हर साल मनता है यहाँ
जन के लिये जो तंत्र है, उसको हम जानें कहाँ।

आस पर कायम है दुनिया इसको दें ना टूटने,
आस हरयाली रहे, आबाद सपनों का जहाँ।



रविवार, 18 जनवरी 2015

नया दिवस


















मंद सौम्य उज्वलता उसकी
झरती, नभ से धरती पर

उसमें फिर दिखने लगते हैं
रजकण औ उत्तुंग शिखर।

सुखद अनुभूति लगे व्यापने
शरीर और मन के अंदर,

हलका हलका सा धुंधलका
सरकने लगता ज्यूँ चादर।

फिर छाने लगती ऊषा की
लज्जा नभ की छाती पर

लाल सुनहरी भोर छमाछम
आती आंगन के अंदर

इक नये दिवस का  उदय
हो जाता इस धरती पर।



बुधवार, 31 दिसंबर 2014

शुभ नववर्ष



खुल रही है एक नई किताब जिसका हर सफा है कोरा,
लिखना है हमें ही इसमें हर दिन का हिसाब हमारा।

कितनी की मक्कारियाँ कितने बोले झूठ
कितनों को लगाया चूना, किस पेड को बनाया ठूँठ।

कितनी फैलायी गंदगी नजरें सबकी बचाके,
कितने तोडे वादे, झूटे बहाने बनाके

कितना किया अपमान सज्जनों का
कितना निभाया साथ दुर्जनों का

क्या यही सब लिखना है इसमें,
और अंत में रोना पडेगा
या कि फिर हम चुनेंगे इक नई राह
जिस पर चल कर सुख मिलेगा।

इस राह पर मुश्किलें तो होंगी पर
पर दिवस का अंत सुखमय होगा
मनमें जगेगा विश्वास,
कर्तव्य पूर्ती का निश्वास होगा।

हम लायेंगे हँसी कई चेहरों पर,
पोछेंगे आंसू कई आँखों से
हम करेंगे मेहनत ताकि आगे बढें
और हमारे साथ सब आयें।

ले जायेंगे देश को खुशहाली के रास्ते पर
कदम दर कदम
साथ साथ चलेंगे आगे बढेंगे सभी हम।

पर इसका चुनाव करना है खुद हमें,
 ताकि किताब का अंत हो सुखद
और हम फिर सबसे सच्चे दिल से कहें
शुभ नव वर्ष।


सारे ब्लॉगर भाई बहनों को नववर्ष की हार्दिक बधाई।