रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्यार की कुछ क्षणिकाएँ

मन में मचती है खलबली सी
आ जाती हैं जब वो, अच्छे नसीब सी
जाते जाते हो जाती हैं कुछ और करीब सी

मेरे मन की तरह ही समंदर में उठती लहरें
मेरे मन जैसे ही इसके भाव कुछ छिछले, गहरे
पर ये उन्मुक्त, और मुझ पर कितने पहरे

कुछ दिन कैसे बन जाते हैं खास
मन में जगाते हैं कोमल कोमल अहसास
वो आयें या ना आयें लगे कि बस हैं आस ही पास

प्यार किसे कहेंगे, कैसे समझायेंगे
कोशिश करते हैं, शायद कामयाब हो जायेंगे
जैसे आ जाता है न बुखार, वैसे ही हो ही जाता है प्यार ।

कितनी उदासी छा जाती है ,
जैसे सूरज पे बदली मंडराती है
जब कई कई दिन फोन नही आता, न कोई मेल आती है ।

पॉवर कट के बाद बिजली की तरह, जब तुम आते हो
यूं लगता है कि गरमी में ए सी की ठंडक लहराती है
तबियत बाग बाग मन में हरियाली छा जाती है ।
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