मंगलवार, 21 जून 2011

चलते रहिये चलते रहिये -2…. विक्टोरिया फॉल्स सफारी लॉज


सुबह साढे चार बजे उठे । नहा धो कर तैयार होकर नीचे आये । एडम और एमी ने चाय नाश्ता तैयार किया था सो नाश्ता कर के हमें साढे सात निकलना था दस बजे की हमारी उडान थी ब्रिटिश एयरवेज की । विक्टोरिया फॉल्स उसी नाम के शहर (गांव कहना ज्यादा उपयुक्त होगा ) में स्थित है । यह झिंबाब्वे मे है । इसके लिये हमें अलग से विसा की जरूरत थी । पर वह हमें उतरने के बाद भी मिल सकता था तो वही तय किया था । उडान दो घंटे की थी । विमान में वेज खाना ही नही था ।हमें एक टॉफी खा कर ही संतोष करना पडा । हम पहुंचे बारा बज कर 10 मिनिट पर । उतर कर हमें विसा के लाइन में खडा रहना पडा । एयरपोर्ट छोटासा था और टूरिस्ट काफी थे तो हमें बाहर फुट पाथ पर लाइन में खडा रहना पडा । हम खडे थे, इतने में कुछ लोग एका-एक हमसे आगे चल कर अंदर चले गये । बस फिर क्या था हमें गुस्सा आ गया कि भेद भाव क्यों हो रहा है । पता चला वे सब एक ही ग्रूप के थे । थोडी देर बाद हमें भी अंदर बुला लिया गया तो विजय हंस कर बोले, “अब क्या करें ? मना कर दें अंदर जाने को, कि हम तो अपनी बारी आने पर ही जायेंगे ।“ क्या बोलती मै, चुप-चाप अंदर चली गई । तीस तीस डॉलर फीस जमा कराई तब वीसा मिल गया ।
फिर एयरपोर्ट से बाहर आये और हमारे लिये जो होटल से टैक्सी आने वाली थी उसको देखने लगे । हमारे होटल का नाम था विक्टोरिया सफारी लॉज और हमें लाने के लिये जो टैक्सी नियत थी वह थी वाइल्ड होरायझन नामक कंपनी की ।
यह तो हमने देखा नही बस टैक्सी पर विक्टोरिया सफारी लॉज देख कर एकदम से उसमें जा कर बैठ गये । यह भी ना देखा कि आदमी के हाथ में जो बोर्ड है उस पर किसका नाम लिखा है । उसने भी, ग्रूप ऑफ फोर, पूछ कर बिठा लिया । थोडी देर बाद और चार लोग आये तो ड्राइवर थोडा परेशान हो गया । फिर नाम पूछा तो गुप्ते और जोगळेकर नाम देख कर कहा ये आपकी टैक्सी नही है । तब तक हमने उसने जो पानी की बोतल वगैरा दी थी उन्हे खोलकर पानी वानी पी लिया था । खैर वह हमारे टैक्सी ड्राइवर को खोज कर लाया और हम हमारी टैक्सी में बैठ कर होटल की तरफ रवाना हो गये । रास्ते पर दोनो तरफ के जंगल देख कर मै सोचती जा रही थी कि ये तो कोई घना जंगल नही दिखता फिर यहां जानवर कैसे दिखेंगे । रास्ते पर लोग भी ज्यादा नही दिखे । धीरे धीरे होटल दिखने लगे । फिर एक शानदार मोड लेकर हमारी टैक्सी विक्टोरया सफारी लॉज के आगे आकर रुक गई । एकदम अफ्रीकन संस्कृति के दर्शन हो गये । हमारी टैक्सी रुकते ही अफ्रीकन लिबास में एक आदमी जिसका नाम नफात था हमारे स्वागत के लिये आगे आया और उसने हमारे पाँव जमीन पर ना पडें इसके वास्ते एक लंबी टाट-पट्टी सी बिछा दी और हम बडी शान से .. और मन में कुछ सकुचाते हुए उस पर चल कर स्वागत कक्ष में पहुँचे । वहां दो लोग थे, उनमे से एक का नाम था मेंबर जो याद रहा। यहां काफी लोग क्रिस्चियन हैं ।
होटल का गेट-अप एकदम पारंपरिक अफ्रीकन घरों की तरह था घास का बना मोटा छप्पर खंबों पर टिका हुआ पर अंदर से हमारे कमरे वगैरा एकदम आधुनिक सुख सुविधाओं (4 सितारा ) से सुसज्जित थे । कमरे और परिसर देख कर हम तो बहुत खुश हो गये । परिसर में सामने एक बगीचा था उसके बीचों बीच एक पेड था जिसका तना ऐसे लग रहा था मानो पत्थर का हो । हमारे इस पैकेज में जो कि ७०० डॉलर प्रति व्यक्ति था जोहेन्सबर्ग से विक्टोरिया फॉल्स और वापसी का हवाई भाडा, होटल में तीन दिन तक रुकने का डबल बेड कमरा, नाश्ता तथा रात का भोजन शामिल था और इस के साथ एयरपोर्ट से लाने ले जाने की सुविधा और एक बोट क्रूज भी थी जिस मे पानी में रहने वाले जानवरों के दर्शन हो जाते थे । सबसे पसंद आई बेड के ऊपर लगी मसहरी जो पलंग के नीचे तक श्री देवी की साडी की तरह लटकती तो मच्छर घुसने का कोई चान्स ही नही रह जाता । स्वागत काउंटर पर जो लोग थे बहुत ही आतिथ्य शील और विनम्र थे । यह हमारा पहला खास अफ्रीकी अनुभव था और बहुत सुखद था । स्वागत कक्ष की सजावट भी एकदम पारंपारिक थी । स्वागत कक्ष के साथ ही थी एक अफ्रीकन शो पीसेज की दुकान भी पर जाहिर है कि ये दुकान बहुत महंगी थी । स्वागतकों ने हमे कमरों की चाभियां तो दी हीं साथ ही साथ वहां के खाने पीने के रेस्तराँ तथा खाने के समय के बारे में भी बताया । यह भी बताया कि पास ही उनका एक बोमा रेस्तराँ भी है, यह एक विशेष रेस्तराँ होता है, जहां अगली रात को नृत्य तथा ड्रम्स का प्रोग्राम है । सुबह साढे चार से उठे हम लोगों को तो काफी थकान हो गई थी । तो कमरे की चाभियां लीं और कमरे में आकर नेशनल प्रोग्राम चालू । (विडियो)

शाम साढे चार बजे उठे और सुहास विजय के कमरे में गये । चाय पी। कमरे में चाय कॉफी की व्यवस्था थी । फिर बाहर बालकनी में बैठ कर पंछी देखते रहे । एक पक्षी तो, जो बचपन में घुमा कर टर्र टर्र आवाज करने वाला खिलौना होता था वैसी आवाज निकाल रहा था और थी बया चिडिया की तरह चिडिया थीं जिनके घोंसले होते तो वैसे ही हैं जैसे बया के पर थोडे बेतरतीब से होते हैं । सुहास विजय के कमरे के बालकनी से एक पानी का तालाब भी दिखाई देता था पर वहां जाना मना था । बहुत से जानवर वहां पानी पीने आते थे । हम काफी देर तक वहां देखते रहे पर बडे सारस जैसे पंछियों के अलावा कुछ न दिखा । अब शाम होने वाली थी । काफी देर बैठने के बाद अंदर आने ही वाले थे कि 4-5 हाथियों का एक झुंड आ गया उसमें एक बडा हाथी, जो पिता होगा, पहरा देने खडा हो गया और बाकी के बारी बारी पानी पीते रहे । उनमें से एक माँ थी और बाकी बच्चे । खूब मज़ा आया । (विडियो)

ऐसे स्वतंत्र हाथी वो भी इतने सारे हमने कब देखे थे । रात का डिनर वहीं था और कॉम्लीमेंट्री था । डिनर में बहुत प्यार से वहां के हेड वेटर नें पूछ ताछ की हमारे टेबल पर आकर हमारा ऑर्डर लिया । जब चीज तैयार होकर आती थी तो से खोलने का एक उत्सव सा होता ढक्कन जोर से उठाकर वे एक तरह की आवाज निकालते और सब खुश होकर ताली बजाते । खाना खाते हुए नाच गाने का प्रोग्राम भी हुआ । डाइनिंग हॉल के हर सेक्शन के लिये यह कार्यक्रम दोहरा दिया जाता , हम ने भी बहुत आनंद उठाया । होटल का स्टाफ सचमुच ही बहुत विनम्र और हर तरह की मदद के लिये तत्पर था । (विडियो)

वापिस कमरे में आकर हम चारों ने कल का प्रोग्राम तय किया हमारे पास कल का ही दिन था परसों तो हमारी वापसी थी । कल सुबह हम जायेगे विक्टोरिया फॉल्स देखने । शाम को हमारी बोट क्रूज़ थी । तो तय किया कि उठेंगे आराम से और नाश्ता कर के चल पडेंगे फॉल्स के लिये ।
सुबह आराम से उठे, चाय के लिये गये सुहास के कमरे में, वहां के बालकनी से तालाब जो दिखाई देता था । होटल में ही एक जगह एक खूबसूरत तालाब और झरना था वहां से भी वॉटर होल दिखाई देता था । वहां एक हिरन आया फिर दो तीन चार बहुतसे हिरन आ गये । वे सारस जैसे बडी चोंच वाले बडे पक्षी जिन्हे जकाना कहते है बहुत से थे एक तो बिलकुल बुत की तरह एक पेड़ पर बैठा था जैसे कोई पुतला हो । फिर एक सफेद हंस की तरह का पक्षी भी दिखाई दिया । हमने सोचा नाश्ता करने चलते हैं वहां के खिडकी से सब साफ दिखाई देगा । तो गये । कैमरा ,दूरबीन सब साथ ले गये क्यूंकि वहां से तालाब जिसे ये लोग वॉटर होल कहते है काफी नजदीक है और साफ दिखाई देता था । वहां और भी हिरण देखे और देखे मगर मच्छ । मन तो था कुछ देर और बैठें पर जाना जो था (विडियो) ।


(क्रमशः)
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