मंगलवार, 26 जुलाई 2011

चलते रहिये चलते रहिये -7 कैप टाउन –रॉबिन आयलैन्ड


सुबह उठे चाय पी, बालकनी मे बैठ कर समंदर देखा । मन ललचा गया तो कमरे से बाहर निकल कर बीच पर गये । बीच तक पहुँचने के लिये कोई 30-35 सीढियाँ थीं । विजय (76 साल) ने कहा कि एक बार आ गया मै, अब और नही आउँगा । हमें भी थोडी मुश्किल तो हुई पर मज़ा बहुत आया । (विडियो) । 1


(विडियो) ।2

वापिस आकर नाश्ता किया तैयार हुए और 11 बजे निकल पडे ।
गाडी की कमान सुरेश ने संभाली । हमें जाना था वॉटर फ्रंट । यानि समंदर पर । जहां से बोट रॉबिन आयलैंड जाती है । रॉबिन को यहां रॉबेन लिखा जाता है । स्पेलिंग है ROBBEN हम Robin ढूँढ रहे थे तो मिल ही नही रहा था । खैर बाद में मिल ही गया । मैप में रास्ता कितना आसान लगता है पर गाडी चलाते हुए ढूँढना कितना मुश्किल । पहले तो एक जगह हमारी गाडी का कोई पार्ट निकल कर गिर गया सुरेश गाडी से उतर कर बहुत दूर तक पीछे देख भी आये पर कुछ भी दिखा नही । वह तो तीन दिन बाद जब गाडी वापिस करने गये तब पता चला कि व्हील कैप गिर गया था । फिर आगे हमें वॉटर फ्रंट तक का रास्ता ही ना मिले । एम -6 जिस पर हम चल रहे थे वह टेबल माउन्टेन के बाद अचानक खो गया फिर एक जगह गाडी ( एन वन street पर) रोकी, सुहास ने कहा, सुरेश रुको गाडी मै चलाती हूँ फिर पूछते पूछते पहुँचे वॉटर फ्रंट, वहां नेल्सन मंडेला गेट-वे गये । रिसेप्शन पर ही पता चला सारे बोट-टिकिट बिक चुके हैं । अब कोई सीट नही । “हाय राम अब दोबारा इसी रास्ते से आयेंगे “? हमारे बहुत बहुत अनुनय करने पर रिसेप्शनिस्ट बोली, “ठीक है आप टिकिट विन्डो पर जाकर खडे हो जाइये, यदि कोई कैन्सलेशन रहा तो आपको मिल सकता है टिकिट”। (विडियो) । 3

हालांकि हमारे पास दो दिन और थे पर एडम और एमी हमारे पास आने वाले थे और उनके साथ और और जगहें देखने का कार्यक्रम तय था । मै और विजय बैठ गये बैंच पर और सुहास और सुरेश टिकिट विंडो पर अपना भाग्य आजमाने खडे हो गये । बोट एक बजे निकलने वाली थी । बैठे बैठे मैं तो ऊब गई थी तो वहां एक स्लाइड शो ही देख लिया रॉबेन आयलैन्ड के बारे में । एक चित्र प्रदर्शनी भी लगी थी मैने कहा कि मै देख आती हूँ तो विजय बोले अभी वो दोनो आ जायेंगे, कहीं जाने की जरूरत नही है । एक बजने में दस मिनिट कम थे कि दोनों लोग आ गये, चलो चलो टिकिट मिल गये, फिर भागते भागते (!!!) बोट तक पहुँचे और सवार हो गये । क्या आश्चर्य कि करीब आधी बोट खाली थी, बहुत ही अजीब लगा । खैर हम तो बोट पर सवार हुए थे, तो इस बात को नजृर अंदाज किया । खूबसूरत पहाड और नीले समंदर की तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गये । (विडियो) । 4


ये कोई 45 मिनिट का नौका प्रवास था ।येS S बडी बडी लहरें उठ रही थीं कि हमारी इतनी बडी मोटराइज्ड बोट भी हिचकोले खा रही थी । सुहास की तबियत खराब हो गई बोट की वजह से । 5-6 लौंग खाने के बाद थोडा चैन मिला । दो महिलाओं नें बडी आस्था से उसे पूछा फिर मोशन सिकनेस के लिये गोलियां भी दीं और कहा वापसी पर बोट में चढने से पहले खा लेना । सुहास भूल गई ये बात अलग है ।
जब हम रॉबिन आयलैन्ड पहुँचे तो बोट से उतरते ही देखा कि बसें हमारे लिये तैयार थीं ताकि हम रॉबिन द्वीप का एक चक्कर लगा सकें । यह द्वीप दूसरे महायुध्द के इतिहास का साक्षी रहा है यहां हमने उस समय की दो तोपें देखीं । हमारा गाइड काफी जानकार आदमी था उसने हमें डच और ब्रिटिश लोगों के जमाने का इतिहास बताया और किस तरह इन लोगों ने यहां के लोगों को गुलाम बना कर रखा सारी दौलत हथिया ली और खुले आम वर्णभेद किया । हमारा सबसे पहला पडाव था सुबुक्वे जी का घर । हम बाहर के लोग सिर्फ नेल्सन मंडेला को ही जानते हैं । सुबुक्वे भी दक्षिण अफ्रीका के प्रसिध्द स्वतंत्रता सेनानी थे । ये पैन अफ्रीकन कॉंग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे हाँलाकि इससे पहले वे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस में ही थे जिसके अध्यक्ष नेल्सन मंडेला थे । पर कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होने अपनी अलग पार्टी बनाली । कह सकते हैं कि ये गरम दल के थे और मंडेला नरम दल के । इनके उग्र विचारों के चलते इन्हे कई सालों तक ऱॉबिन आयलैन्ड पर ही एक घर में कैद रखा । (विडियो) । 5

मंडेला जी को कुल 27 साल जेल में रखा जिसमे से 18 साल वे रॉबिन आयलैन्ड पर सुरक्षित विभाग में बंद रहे इन सब कैदियों से मजदूरी करवाई जाती थी । पत्थर तोडना गिट्टी बनाना, सडकें बनाना ये काम करवाये जाते थे । ये जेल भी इन्ही कैदियों से बनवाया गया और उन्ही को इसमें बंद करके रखा । शुरुआती दिनों में राजनीतिक बंदियों को दूसरे बंदियों के साथ ही रखा जाता था । बाद में ब्रिटिश सरकार को डर लगा कि ये राजनीतिक बंदी दूसरे बंदियों को ना बरगला लें । इसी कारण इन राजनीतिक बंदियों को अति सुरक्षित ए, सुरक्षित बी और ग्रूप जेल सी, ऐसे तीन विभागों में बाँटा गया हमें कैदियों के सेल देखने को मिले नेल्सन मंडेला जहां कैद थे वह सेल (कोठऱी) भी देखा । हाल ही में पढा कि मिशेल औबामा खराब मौसम के चलते रॉबिन आयलैंड तो नही जा सकीं पर मंडेला जी से उनके प्रीटोरिया के घर में मिल कर आईं, जब वे जून में दक्षिण अफ्रीका के टूर पर गईं थीं ।
हमें कैदियों को जो प्रतिदिन का खाना दिया जाता था उसकी भी जानकारी मिली । अति-सुरक्षित जेल में खतरनाक बंदियों को रखा जाता था जो कि अपनी कोठरी में एकदम अकेले रहते थे, इसमें उनकी फोटो समेत सारी जानकारी भी रहती थी ।
बी सेल में थोडे कम खतरनाक बंदी रखे जाते थे, ये भी अकेले ही रहते थे । मंडेला जी का सेल बी विभाग में था । सी विभाग मे कोठरी हॉलनुमा थी और इसमें 30-40 कैदी एक साथ रहते थे । कैदी पहले तो दरियों पर सोते थे पर बादमें इन्हे बंकर बेड दिये गये थे ।
औरतों को अलग जेल में रखा जाता था । पहले कोढियों को भी इसी द्वीप पर रखा गया था । यह सब देख कर दिल भर आया और वह सब जो हमने ब्रिटिश राज के बारे में पढा था याद आ गया ।
बहुत ही बुरा लग रहा था कि भारत की तरह ही यहां भी गरीब और दलित अभी भी स्वतंत्रता के फल चखने को तरस रहे हैं । सबसे ऊपरी पोस्ट्स पर अब भी गोरों का कब्जा है । वैसे ही सोने, हीरे, व प्लेटिनम की खदानें भी अंग्रेज या डच लोगों के कब्जे में हे ।
जब हम बोट पर वापिस आ रहे थे तब हमने 5-6 छोटे पेंगुइन पक्षी देखे । उनकी तस्वीरें भी लीं । इसके पहले एक जगह स्प्रिंग बक हिरण भी देखे । आप भी देखें (विडियो) । 6

बोट से हम वापिस आये तब तक पांच बज चुके थे । कार तक आते आते और आधा घंटा लग गया । मज़ा तो इसके बाद आया । हम जैसे ही बाहर निकले हमें एम 6 पर जाने के लिये दाहिने मुडना था पर हम बाये मुड गये । और आगे तक हम चलते चले गये पर कोई एक्झिट ही ना मिले मजबूरन सीधे सीधे कोई 4-5 मील निकल गये । जगह नई, रास्ते अनजाने और ऊपर से सबने बताया हुआ कि किसीसे कुछ पूछना नही । रात को तो बिलकुल नही । अंधेरा होने लगा था, फिर तय हुआ कि हम तो गलत जा रहे हैं और सीधे चलते गये तो शायद जोहान्सबर्ग पहुँच जायेंगे । हमें यह भी बता रखा था कि हमारे अपार्टमेन्ट में सिक्यूरिटी अलार्म हे जो आठ बजे के बाद एक्टिवेट हो जाता है । फिर एक जगह एक्झिट लेकर हम एक मॉल में गये और वहां पता किया । पता चला कि हम तो एकदम उलटा आ गये हैं और हमें वापिस वॉटर फ्रंट तक जाना पडेगा फिर वहां से एम 6 लेकर हम लुडाडनो जा सकते हैं । डर खूब लग रहा था पर जान मुठ्ठी में लेकर सब बैठे रहे और सुहास गाडी चलाती रही । वॉटर फ्रंट पहुंच कर थोडी राहत हुई फिर एम 6 मिल ही गया और थोडे पहचाने नाम आने लगे । करते करते रात 8 बजने में 2 मिनिट कम पर हम अपार्टमेन्ट पहुँच गये और कोई अलार्म भी नही बजा ।
(क्रमशः)

16 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जेलों की कहानी मार्मिक है, हर देश में यही कार्य किया है अंग्रेजों ने।

kshama ने कहा…

Uttam jaankaaree aur vedio ke saath,subah,subah ghuma diya aapne!

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

रोचक एवं जानकारी से भरा यात्रा वृतांत अच्छा लगा !
विडियो ने तो सजीव कर दिया !
आभार !

Arti ने कहा…

Hello Ashaji,
My first visit to your blog, its beautiful...
The post is very nicely presented with the videos completing the post... Loved them!
Have a nice week ahead:)

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बताया भी दिखाया भी।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जानकारी भी और चित्र भी .... बढ़िया पोस्ट...

Dorothy ने कहा…

ढेर सारी जानकारी समेटे इस रोचक और जींवत संस्मरण के लिए आभार.
सादर,
डोरोथी.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

बढिया यात्रा, आपके माध्यम से मंडेला जी के विषय में ज्ञान वृद्धि हुई।

आभार

रविकर ने कहा…

महा-स्वयंवर रचनाओं का, सजा है चर्चा-मंच |
नेह-निमंत्रण प्रियवर आओ, कर लेखों को टंच ||

http://charchamanch.blogspot.com/

Vaanbhatt ने कहा…

आपके लाइव ब्लॉग पर आके दुनिया के दर्शन घर बैठे हो जाते हैं...

Vivek Rastogi ने कहा…

मजा आ गया यात्रा वृत्तांत पढ़कर ।

vidhya ने कहा…

जानकारी भी और चित्र भी .... बढ़िया पोस्ट..
आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

Rachana ने कहा…

jel ki bare me padh kr ma dukhi huaa .ap aapdono ko dekh kar bahut hi achchha laga.
video dekh kr to aanad hi aagaya
saader
rachana

Rakesh Kumar ने कहा…

खूबसूरत,रोचक, धाराप्रवाह और जानकारी पूर्ण वर्णन पढकर आनंद आ गया.साथ में सुन्दर विडियो भी.

वाह! अनुपम प्रस्तुति.

आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

चलते रहिये चलते रहिये पूरी शृंखला रोचक है …
( पिछले दो-तीन महीने बहुत समस्या भरे रहे हैं … , इसलिए नेट पर कम ही सक्रिय रह पाया )
अभी दो दिन में आपके इस रोचक यात्रा वृतांत को पढ़ता रहा हूं … जैसे यात्रा मैंने स्वयं की हो ऐसा लगा ।

हां , वीडियो लोड होने में वक़्त ज़्यादा लेते हैं … कई तो देखे भी नहीं जा सके …

आपने हम ब्लॉग पाठकों के लिए इतना श्रम किया , आभार !

इस यात्रा वृतांत की डॉक्यूमेंट्री बना कर आप किसी चैनल पर प्रसारित करें तो और सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं शायद …

हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

रुचिकर यात्रा कथा .....