सोमवार, 28 मार्च 2011

हासिल



आसमान के चांद तारे तोड लाने की बात करते थे तुम
फूल तक तो ला नही पाये कभी आज तक

ऐसा क्यूं होता है कि पत्नि बनते ही
प्रेमिका की अर्थी उठ जाती है
रोमांस और रोमांच खुदकुशी कर लेते हैं
या फिर जर्जर हुए, दम टूटने का इन्तजार

क्यूं मै हमेशा रही हासिल की तरह, तुम्हारे लिये
कभी उत्तर नही बन पाई हमारे गणित का

मेरे साथ चलते हुए भी इधर उधर भटकती तुम्हारी आँखें
फूल फूल पर मंडराने वाले भौरें की ही याद दिलाती रहीं
मै तो नन्दादीप बनी जलती रही तुम्हारे मंदिर में
पर तुमने कब आंख खोली मेरे लिये

छोडो अब, इस बहस की कोई जगह नही
मैनें सीख लिया है अपने लिये जीना ।
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