बुधवार, 30 दिसंबर 2009

नव वर्ष की शुभ कामनाएँ !



रात्रि के घने तिमिर से जब प्रभात का नया सूरज फैलायेगा अपनी किरणें इस दुनिया पर तो क्या सचमुच सब कुछ नया नया होगा ? क्या पुराने दुख सुख में बदल जायेंगे, क्या भ्रष्टाचार के मकड जाल से मिलेगी हमें मुक्ती ? क्या नारी का योग्य सम्मान उसे मिलेगा ? क्या बालश्रम खत्म होगा, क्या कुछ और ज्यादा बच्चे जा पायेंगे स्कूल ? क्या सुधरेंगे राजनीतिज्ञ (!), सत्ताधारी ? क्या दरिंदों को सजा मिलेगी ? क्या न्याय मिलेगा जनता को आसानी से या कि हमेशा की तरह इतनी देर से कि वह अंधेर ही साबित हो । क्या जागेगा राष्ट्रप्रेम ? क्या राष्ट्रकुल खेलों के आयोजन में भारत साबित कर पायेगा अपनी क्षमता ? क्या हम सब यानि आम आदमी कर पायेगा निश्चय कि वह अपने स्तर पे नही देगा भ्रष्टाचार को बढावा । हर एक अपने स्तर पर रहेगा अडिग नही होने देगा अन्याय बच्चे पर, कमजोर पर, नारी पर ।
कुछ कुछ आशा बंध तो रही है । समाचार माध्यम कुछ जिम्मेदार नजर आ तो रहे हैं । हम सब नये साल के अवसर पर ये प्रतिज्ञा तो कर ही सकते हैं कि हम अपने अंदर का एक दुर्गुण हटायेंगे और दो अच्छे गुणों को अपनायेंगे । फिर शायद गुजरे साल से ये नया साल बेहतर हो ।
नव वर्ष शुभ हो, मंगल हो ।
आओ,
हम खोलें एक नया पन्ना
उसमें लिखें नई इबारत
अपने यश की उत्कर्ष की
सीख लें अपनी भूलों से
गलती न करे उन्हें दोहराने की
तभी होगी आवभगत सफल
नये वर्ष की ।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

गम ना कर

कैसा ये धोखा हमारे साथ हुआ
कांधे पे सिर रखा जिसके
वही कातिल हुआ ।

जिसको बना के राज़दार
हम थे बेफिक्र
वही भेदी हमारे घर का हुआ ।

हर बार सोचते रहे
अब कुछ अच्छा होगा
हाल हमारा बद से बदतर हुआ ।

सुकून से तो जीते थे
चाहे रोटी कम थी
अब जान का दुष्मन हर निवाला हुआ ।

भोर जायेंगे तो क्या
शाम को घर लौटेंगे
इस सवाल का पक्का, न जवाब हुआ ।

अब तक कटी है तो
आगे भी कट जायेगी
सपना अपना चाहे पूरा न हुआ ।

ऐसे ही जिया करते है
हजारों में लोग
गम ना कर, तू अकेला न हुआ ।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

अपना घर तो अपना घर है



छह महीनों के बाद दिल्ली आ गये अपने घर, तभी तो फिलहाल लिखना पढना बन्द सा है । घर की सफाई, सामान लाना- क्यूंकि जाते हुए तो सब खाली कर के जाते हैं । इस बार ये ज्यादा महसूस हो रहा है क्यूंकि आरथ्राइटिस जोरों पर है । और कीमतें 6 महीनों में डेढ गुनी हो चुकी हैं । पर फिर भी यहां आकर बडा सुकून महसूस होता है । अपना घर और अपना देश – बात ही कुछ और होती है । राजू तो कहता भी है “वहाँ क्या आपका सिंहासन रख्खा है “ , तो मै कह भी देती हूं,” हां बेटा सिंहासन ही है समझो “।
घर तो मीनाजी ने थोडा बहुत साफ करवा रखा था । आते ही पता चला कि नल में एक बूंद भी पानी नही है, सब नल सूखे । हम एयरपोर्ट से आते हुए दो बोतल पानी ले आये थे और दो बोतल मीनाजी ने रख दिया था, तो काम चल गया । पर नाना तरह के सवाल मन में, कहीं मोटर तो खराब नही हुई या फिर टंकी तो नही क्रेक हुई पर दूसरे दिन पानी भी आया और पता चल गया कि सब ठीक है वह तो गाडी धोने वालों की कृपा से सारा पानी सायफन हो गया था । तो सारा कुछ सामान्य होते होते हफ्ता दस दिन लग ही जाते हैं । और रात दिन का फर्क- सारी (आधी ) दुनिया सोती है तब हम जगे होते हैं -अल्लाह सोये तो खुदा जागे वाली बात । पर वह भी ठीक हो ही गया ।
कुछ दिन से सुबह सुबह रामदेव बाबा जी के साथ प्राणायाम कर रहे हैं । आज सोचे कि कुछ तो लिखा जाय और कुछ नही तो आप बीती ही सही । यहाँ की सब्जी में चाहे वह कैसी (जहरीली !) ही हो गज़ब का स्वाद है जो वहां की ओवर साइज्ड सब्जियों में कभी आ ही नही सकता । मलाई वाला दूध, खुशबूदार घी आ.SSSSSSSSSSSSSहा । तो अभी तो आनंद उठा रहे हैं जब मुश्किलें सामने आयेंगी तो वह भी झेल लेंगे ।
सोचते हैं हमारे वापिस जाते जाते मेट्रो भी शुरू हो जायेगी गुडगांव वाली भी, तो आसान हो जायेगी जिंदगी थोडी । धूल तो हवा में हमेशा ही रहेगी और नाक, आंख, मुह, कान में जाती रहेगी पर अपने देश की मिट्टी है, अपनी है तो प्यारी है । पार्क में घूमने जाते हैं तो अमीरों के बिगडैल बच्चों द्वारा फेंकी गई पानी की जूस की बोतलें प्लास्टिक के रैपर्स, कागज, थैलियां फिकीं मिलती हैं, बावजूद इसके कि जगह जगह कूडे दान लगे हैं कुछ मेहेरबानी महरियों की और उनके बच्चों की भी होती है कूडा बढाने में । कुछ पशु-पक्षी प्रेमी अपने घर का बासी खाना पार्क के प्रंवेश द्वार पर फेंक रखेंगे कि कोई गाय कौवा चिडिया खा ले अपने कोर्ट यार्ड उन्हे इसके लिये उपयुक्त नही लगते । पर अपने लोग हैं नादान हैं तो क्या ।
और इस बार तो हमने पैसे बचाने के लिये अपना फोन भी होल्ड पर करवाया था और ब्रॉडबैन्ड इंटरनेट भी । आते साथ ही इन्होने चाणक्यपुरी का चक्कर लगाया और फोन का होल्ड खुलवा दिया फोन तो तुरंत चालू हो गया, पर ब्रॉड बैन्ड क्या और नैरो बैन्ड क्या इंटरनेट नही आ रहा । रोज फोन कर रहे हैं एम टी एन एल के ऑफिस में पर इंटर नेट नही आ रहा । मजे की बात ये है कि उनकी तरफ से भी रोज फोन जाता है, “आ गया जी” । “अजी कहां आया” कहा कि उधर से फोन बंद । कभी कभी वे फोन के लिये भी पूछ लेते हैं, “फोन सही चल रहा है जी आपका “, “हां वह तो चल रहा है पर इंटरनेट..” इतना सुनते ही बंदा फोन काट देता । करीब 15 दिन से ये ही कहानी है हार कर इन्होने एयरटेल का कनेक्शन ले लिया । एक बार एक बंदा आ कर आधा घंटा खटपट कर के फोन पर फोन करके इंस्ट्रक्शन्स लेके कंप्यूटर से जूझता रहा पर नतीजा वही- नो लक । मैने कहा कि,” एम.टी.एन.एल. बंद कर देते हैं” । सुनते ही ये बोले, “पागल हो गई हो, पता चला फोन भी कट गया, सालों से लोगों के पास हमारा जो नंबर है वह लगेगा ही नही । इन का कुछ ठीक नही है ये कुछ भी कर सकते हैं” । तो अभी तक हम इंतजार में हैं कि शायद कभी हमारी किस्मत खुले और ये ब्रॉडबैन्ड काम करने लगे । पर एयरटेल की मेहरबानी से आप से मेल मुलाकात का रास्ता तो खुल ही गया है ।

सोमवार, 16 नवंबर 2009

मिलते रहिये

मिलते रहिये मिलाते रहिये
लोगों से बतियाते रहिये
शायद बात कोई बन जाये !

देखते रहिये दिखाते रहिये
सपनों को चमकाते रहिये
शायद कोई सच हो जाये !

राह को एक पकड के रहिये
चलते रहिये चलते रहिये
शायद मंजिल ही मिल जाये !

बूंदो पर भरोसा रखिये
बूंद बूंद जमाते रहिये
शायद गागर भी भर जाये !

मेरे करने से क्या होगा
ना सोचें, बस करते रहिये
काम कोई पूरा हो जाये !

हंसते रहिये हंसाते रहिये
काम किसी के आते रहिये
शायद जीवन फल पा जायें ।

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कैसा ये मौसम


कैसा ये मौसम, प्यारा सा मौसम
बरफ की सफेद चादर चांदनी सी
ठंडी हवाएँ और आग गुनगुनी सी
ये साथ अपना और मन में रागिनी सी
सर्दियां है कितनी कितनी प्यारी सी । कैसा ये मौसम.......

दिन की नरम नरम धूप बावली सी
पल भर में हो जाती शाम सांवली सी
कंपकंपा जाती है देह सलोनी सी
ऐसे में कांगडी गर्म सुहानी सी । कैसा ये मौसम....

मिट्टी के प्याली में चाय सौंधी सी
आंच से तपते चेहरों पे ऱौशनी सी
चूल्हे में मक्के की रोटी फूलती सी
मन प्राणों में एक आग सुलगती सी । कैसा ये मौसम....

थोडा सुकून और थोडी शांती सी
सीमा पार से घुसपैठ थमती सी
बम और गोलियों में होती कमती सी
जिंदगी भी लगती थोडी थमती सी । कैसा ये मोसम.......

सोमवार, 2 नवंबर 2009

अब तुमसे दूर



अब तुमसे दूर बहुत दूर चला जाता हूँ
रोकना अब न, यहां से मै कहां जाता हूँ ।
जो अपने बीच घटा था कभी कुछ नाजुक सा
वो तेरे पास अमानत सा रखे जाता हूँ ।
न पूछो मुझसे सवाल, जवाबों को न सह पाओगी
उलझे उलझे से इन सवालों को लिये जाता हूँ ।
जो कुछ था दिल में हमारे, कब किसने जाना
न उसको चौपाल पे लाओ, मै चला जाता हूँ ।
जानता हूँ, जला करके तुलसी पे दिया,
तकोगी राह मेरी, फिर भी चला जाता हूँ ।
होगी मुलाकात कभी किस्मत में जो लिख्खी होगी
एक दुआ तुम करो, एक मैं भी किये जाता हूँ ।

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

ये मुझे क्या हुआ ?



पंछी नये गीत गाने लगे
फूल बगिया को महकाने लगे
कैसे मेरे दिन लहराने लगे ?
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
चाल मे नई बिजली सी भर गई
बालों में अनोखी महक भर गई
आखों में अजीब सी चमक भर गई
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
चेहरे पे नये भाव छाने लगे
कैसे बदलाव मुझ मे आने लगे
अच्छे भी लगे और डराने लगे
ये मुझे क्या हुआ,
किस पवन ने छुआ ।
बिना कारण ही हंसी आने लगी
दर्पण देख देख मैं शरमाने लगी
सहेलियां भी मुझको सताने लगीं
ये मुझे क्या हुआ
किस पवन ने छुआ ।

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

जलते सवालात



दिल में ऐसे बसा रहा कोई
दिल को मंदिर बना गया कोई ।

किसने की आपसे कोई फरियाद,
कैसे शिकवा, गिला हुआ कोई ।

मैने माना कि कह के आना था,
(पर) आपसे क्यूँ मिला किया कोई ।

दाल महंगी है सब्जी जहरीली,
फिर तो फाँका किये रहा कोई ।

जो ये सरकार करे फिक्रे-अवाम
फिर तो जादू चला गया कोई ।

बदले हालात के न लेना तुम सपने,
उनको जालिम चुरा गया कोई ।

यही जीवन है तो, ऐसा ही क्यूँ है
जलते सवालात दे गया कोई ।

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दूर हों अंधेरे


दूर हों अंधेरे, मन के
जन-जन के,
रोशनी बसे मन में
कण कण के ।
जले दीप हर आंगन
स्वागत का,
प्रेम भाव पनप उठे ।
आगत का
बैर भाव, जल जाये
पटाखों मे,
हों एकजुट देश-हित
लाखों में ।
वाणी में रस घुले
मिठाई सा,
मन में सौहार्द जगे
भाई सा ।
माँ सा हो क्षमा भाव
अब मन में,
पिता सा धैर्य रहे
जीवन में ।
दीवाली पर मिले यही
उपहार हमे,
और लक्ष्मी दें यही
वरदान हमें ।

आप सबको दिवाली की अनेक शुभ-कामनाएँ ।

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

त्रिदल


घास पर ओस
धरती के आँसू
छलके छलके ।

सुबह की उजास
तुम्हारी मुस्कान
महकती हुई ।

काले गहरे
रात के अंधेरे
तुम्हारे गेसू ।

मेरा मुडना
तुम्हारा ठिठकना
कुछ कहता हुआ ।

चांदनी रात
तुम्हारी बात
अब किसके साथ ?

कब मुड गए
साथ चलते हुए
अपने रास्ते

मन बेचैन
मन चंचल
कैसा ये छल ।

अब तो उसे भी
भूलना ही होगा
बीता कल ।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

फॉल



जीवन बदलाव का नाम है यहां नित्यप्रति सब कुछ बदलता रहता है । चाहे हम इसे रोज़ के रोज़ महसूस ना करें । सब कुछ एक चक्र की भांति चलता रहता है । ऋतु बदलते हैं ऋतु के अनुसार ही हम और हमारे आसपास का वातावरण भी बदलता रहता है । गरमी पडती है, फिर थोडी ज्यादा, फिर बहुत ज्यादा जब मोगरा और रात की रानी शाम से महकते हैं । जब लगने लगता है कि ये गर्मी कभी खत्म भी होगी या नही तभी काले काले बादल आते हैं और होती है झमाझम बारिश, जो तन और मन को प्रसन्न कर देती है । गरमी में लकीर सी लगने वाली नदियां बरसात में पूरे उफान पर आ जाती हैं । चारों और हरियाली छा जाती है । जब गीले कपडे और सीलन से तंग आ जाते हैं तो आती है मन भावन शरद ऋतु, जब गुलाब और गुलदावरी और डेलिया अपनी सुषमा बिखेरने लगतीं हैं । कहते हैं चाँद सबसे सुहाना शरद पूर्णिमा पर ही लगता है ।
इसी शरद ऋतू को यहां अमेरीका और शायद और भी ठंडे (टेम्परेट) प्रदशों में कहते हैं फॉल यानि कि पतझड, पर पतझड हमारे यहाँ विरह का प्रतीक है ।
यहां फॉल में पेडों के पत्ते अपने रंग बदलने लगते हैं हरे हरे पत्तों के रंग में यकायक बदलाव आने लगता है । ये लाल ,पीले, नारंगी या गहरे जामुनी या मरून हो जाते हैं । और विभिन्न पेडों के ये अलग अलग रंग एक अभूतपूर्व दृष्य की सृष्टी करते हैं । यह सब देख कर ही अनुभव किया जा सकता है । वैसे तो घर के आस पास भी ये सब देखने को मिल जाता है पर कहते हैं वरमॉन्ट का फॉल अदभुत होता है । इस बार हमें भी मौका मिल ही गया ये नजारे देखने का । मेरी प्रिय सहेली ,सुशिला जिसकी मेरी दोस्ती तब की है जब हम दोनों महज़ 21 साल की थीं । तो सुशीला इस बार अमेरिका आई हुई थी । उसका बेटा तो 13-14 साल से अमेरिका मे है पर वो अभी पहली बार आई है । बेटे का हाल ये कि माँ बाप के लिये क्या करूं और क्या न करूं, तो वह उन्हें सब दूर घुमा रहा है । वह क्यूं कि बोस्टन में ही है जो डरहम ( अमित का गांव ) से एक डेढ घंटे के रास्ते पर है तो मैने चाहा कि वे सब यहां आयें तो बच्चों की भी जान पहचान पक्की हो जाये पर अमित और समीत (सुशीला का बेटा) ने तय किया कि हम सब वरमाँट में मिलते हैं साथ साथ घूमना और मिलना दोनो ही हो जायेगा
तो वही किया हम पहले गये बर्लिंगटन (वरमाँट) जहां लेक है शेंपलेन । सारे रास्ते बारिश होती रही पर फिर भी रंगों के नजारे तो दिख ही रहे थे । लेक के किनारे हम मिलें वे हम से पहले पहुँच कर एक क्रूज में चले गये थे पर हमारे पहुँचने के 10-15 मिनिट बाद ही हमें मिल गये ।
लेक के किनारे बैठे घूमें गपशप लगायी और रात को वहीं एक इंडियन रेस्तरां में खाना खाया । अमित की छोटी श्रेया को भी सबसे मिल कर खूब मजा आया।
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रात को हम पहुँचे माँन्ट-पेलियर वहां रात को हॉल्ट किया और सुबह नाश्ते के बाद चल पडे अपने सैर पर ।
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क्या खूबसूरत रंग थे ईश्वर नें खुद ही चित्रकारी की थी तो सुंदर कैसे ना होते । होली के रंग गुलाल की तरह जैसे हल्दी कुंकुम किसी ने मुठ्ठियां भरभर कर उडाये हों । आप भी देखें और आनंद लें । vdo 2 (विडिओ देखें)

बीच में एक जगह एक कवर्ड ब्रिज भी देखा और देखे खूब सारे झरने जो इन रंगीन पहाडों की सुंदरता को चार चांद लगा रहे थे । vdo 3 (विडिओ देखें)

प्रकृती भी हमें नित नये पाठ पढा जाती है, इन सुंदर पत्तों को देख कर पता लगा कि मृत्यू के सानिध्य में भी जीवन की सुंदरता को कैसे अक्षुण्ण रखा जा सकता है । चाहे इसके बाद पत्तों को झडना ही क्यूं न पडे ।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

घुमक्कडी 10– क्वीन्सटाउन और वापिस लॉस एन्जेलिस


सुबह सुबह टैक्सी लेकर पहुँचे सिडनी एयरपोर्ट । हमारी फ्लाइट 9:30 बजे की थी और ये भी इंटरनेशनल फ्लाइट थी तो 3 घंटे पहले भी पहुंचना था । सामान चेक-इन करा कर थोडी देर विंडो शॉपिंग की । यहां के ओपल बहुत विख्यात है पर बहुत महंगे भी पर हमे तो देखना ही था तो थोडा टाइम पास कर लिया । सिक्यूरिटि करवा कर अभी आगे बढ ही रहे थे कि मुझे सिक्युरिटी वालों ने एक अलग चेम्बर में बुलवा लिया । मुझे कुछ विशेष उस वक्त नही लगा सोचा सब को ही एक एक करके ऐसे ही जाना पडा होगा । पर उन्होने कहा हमें आपकी तलाशी लेनी पडेगी अगर आप मना करती हैं तो आप आगे नही जा सकतीं । मैने कहा, मै क्यूं मना करूंगी देख लीजिये जो देखना है । तो पूरी तरह मशीन से छानबीन हुई मेरी भी और मेरे पर्स की भी । फिर कहा गया आप जा सकती हैं, ये रैंडम चैकिंग थी । इधर मेरे साथ वाले परेशान, कि क्या हुआ ? जब मुझे देखा तो जान में जान आई । खैर फ्लाइट बढिया थी । और 3 घंटे की फ्लाइट और 2 घंटे टाइम डिफरन्स तो हम ढाई बजे पहुंच गये क्वीन्सटाउन । हवाई जहाज में से ही बर्फ से ढके हुए पहाड देखे तो तबियत खुश हो गई । छोटासा एयर पोर्ट है । पर उतरे तो इमिग्रेशन करवाने के लिये क्यू में लग गये हम सब तो आ गये पर प्रकाश-जयश्री को बहुत देर लग गई, मैने वापिस जाकर देखा तो प्रकाश की सारी सूटकेस को उन्होने उलट पुलट कर दिया था । जब काफी देर बाद वो बाहर आये तो हमारे पूछने पर बोले , “मेरे सुपारी के पैकेट पर, जो खुल गया था, उन्हे बहुत परेशानी थी आखिर मैने कहा कि हम लोग इसे खाने के बाद खाते हैं आप कहें तो मै आपके सामने खाता हूं । इस पर उन्होने नो नीड कह कर हमे बाहर आने दिया“। vdo1 (विडिओ देखें)

यहां हमारी बुकिंग थी मेलबोर्न रोड पर कम्फर्ट-इन में जिसे मेलबोर्न लॉज भी कहते हैं । तो हमने अपनी सुपर शटल ली और पहुँच गये । इसमें चढने से पहले ही हमने बर्फीले पहाड की बहुत सी तस्वीरें लीं । कमरे हमे तुरंत ही मिल गये । चाय कॉफी का जुगाड था ही तो पहले तो चाय पी कर फ्रेश हो गये । लंच तो विमान में हो ही गया था । इसके बाद हमने रिसेप्शन पर पता किया कि आज क्या कर सकते हैं । क्वीन्सटाउन बर्फीले पहाडों से घिरा, लेक वाकाटीपू पर बसा हुआ, एक छोटासा खूबसूरत शहर (गांव ) है । इसके पहाड और लेक के कारण इसे एक अनोखा सौंदर्य प्राप्त हुआ है । यहां हर किसी के लिये करने को कुछ ना कुछ है । स्कीईंग, बोटिंग, फिशिंग, ट्रेकिंग,गंडोला राइड और भी बहुत कुछ और शॉपिंग तो है ही । हमारे पास तो आज का आधा दिन और कल की सुबह इतना ही वक्त था तो पता चला कि आज अभी गंडोला राइड ले सकते हैं जो हमें पहाड के ऊपर ले जायेगी तो हमने रिसेप्शनिस्ट से टैक्सी बुलाने के लिये कहा और हमने बाहर निकल कर लेक का सुंदर दृश्य देखा और फोटो खींचीं । vdo 2 (विडिओ देखें)

हमारे पास जो टैक्सी वालेने कार्ड दिया था वह भी हमने रिसेप्सनिस्ट को दे दिया था तो उसने जो टैक्सी बुलाई तो यह वही टैक्सी वाला था जो हमें एयरपोर्ट से लेकर आया था । वह हमें स्काय लाइन गंडोला के ऑफिस ले गया । वहां हमने 12-12 डॉलर के टिकिट खरीदे और चढ गये गंडोला में । ये गंडोला यानि केबल कार रुकते नही हैं बस धीमे हो जाते हैं पर चलते में ही आपको चढना होता है । एक में केवल चार बैठ सकते हैं तो हम दो गंडोला में बैठ गये एक में हम तीनो और दूसरे में वे तीनो । यह राइड, बॉब-पीक नामक शिखर तक थी । क्वीन्स टाउन के कोई 400 मीटर ऊपर । पहाड एक दम सीधा । जाते हुए खूबसूरत वाकाटीपू लेक को देखते रहे । पहाड, जंगल, कुछ भेडें भी दिखीं और पूरे क्वीन्स लैन्ड का नजारा हर ऊँचाई पर बदलता हुआ । एकदम पैसा वसूल राइड । एक भाग में लेक को क्वीन्स लैन्ड का भू भाग जैसे एक बाँह से लपेटे हो और एक छोटा सा ब्लू-लगून बना रहा हो । दस–बारा मिनट का ये सफर मज़ा दे गया । ऊपर उतरे और पहले एक दुकान में गये जहां कार्ड्स और तरह तरह के क्यूरियोज़, स्कार्फ, नकली ज्वेलरी और भी ढेर सारी चीजें थीं खरीदने को । असल में गैलरी, जहां से नीचे का दृश्य देखना था, उसका रास्ता ही उन्होने दूकान के बाजू से रखा था , पर दूकान को अनदेखा करके हम सीधे गैलरी में आ गये । गज़ब की ठंडी हवा थी । तापमान शून्य से नीचे । सारे में घूम घूम कर खूप विडियो किया फोटो खींचे । वहीं एक जगह बंजी जंपिंग हो रही थी उसे भी देखा और विडियो किया । vdo 3 (विडिओ देखें)

फिर अंदर आये कुछ कार्ड खरीदे और रेस्तराँ में कॉफी पी । फिर गंडोला से नीचे । नीचे जाने में ज्यादा डर लग रहा था, नीचे देखो तो अपने लटके होने का अहसास ज्यादा डरावना था । सो मैने तो नीचे नही देखा बस ऊपर ही देखती रही । पुली और स्टील-रोप के घर्षण की आवाज़ भी अब सुनाई देने लगी थी । पर बीच बीच में लेक को देखने का मोह हो ही जाता था ।
नीचे पहुंचे तो पहले से ही पता कर रखा था कि यहां लिटिल इन्डिया करके रेस्तराँ है वहाँ जाना है । उसके पहले ग्रॉसरी स्टोर जाकर ब्रेड और चीज़ लेना था कि कल के सैन्ड-विचेज़ बन जायें तो टैक्सी को वही बताया । तकदीर से दोनो पास पास ही थे, तो हम पहले लिटिल इन्डिया गये । वहां हमारी बडी आव भगत हुई, हमारी उम्र को देखते हुए उन्होने राजेश खन्ना और धर्मेन्द्र के पिक्चर के गानों की डीवीडी लगा दी । खाना भी कमाल का था मटर पनीर, मां की दाल राइस और बटर नान बडे दिनों बाद रेडीमेड चटपटा स्वादिष्ट खाना खाया और वह भी पुराने फिल्मी गीत देखते हुए भई वाSSSSSह ।
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फिर ग्रॉसरी लेकर वापिस टैक्सी से घर । वापिस जा कर फिर एक कमरे में सब बैठे और कल का कार्यक्रम तय किया (विडिओ देखें)vdo 5

कल हमारी फ्लाइट थी साढे तीन बजे की हालांकि हमें लॉस एन्जेलिस (एल ए U.S.A. ) की फ्लाइट तो ऑकलैन्ड से लेनी थी फिर भी हमारा सामान तो यहीं से चैक-इन होना था तो वही 12-30 तक पङुंचना था एयर पोर्ट । तो जो कुछ भी करना था उसे 12 बजे तक अवश्य खतम करना था । हमने तय किया कि हम लेक वाकाटीपू जायेंगे और हो सका तो 1 घंटे की बोट टूर ले लेंगे । और लेक वाका टीपू तो आप देख ही रहे हैं कितना खूबसूरत लेक है ।
तो 30 जुलै को हम सुबह सुबह नाश्ता कर के निकल पडे और लेक पर पहूंच कर घूमने की कोशिश की । क्या ठंड थी हमारी तो कुल्फी ही जमी जा रही थी । और खुला होने के कारण हवा भी खूब तेज़ चल रही थी हमने बोट का पता किया तो 10 बजे के बाद ही कोई बोट निकलेगी यह पता चला और यह भी कि छोटी से छोटी राइड भी दो घंटे की होगी । तो कुल मिला कर बोटिंग जाना समय के हिसाब से रिस्क लेना ही था तो थोडी देर लेक पर ही टहले, बत्तखों की तसवीरें खींची (विडिओ देखें)vdo 6

और जब ठंड ज्यादा लगने लगी तो, ठिठुरने से तो अच्छा है कमरे में जाकर आराम करें (विडिओ देखें) vdo 7

ये सोच कर लौट के –- घर को आ गये । वैसे समय,पैसा और हिम्मत हो तो करने जैसा यहां बहुत कुछ है ग्लेशियर स्किइंग, रिवर राफ्टिंग,बोट ट्रिप्स, बंजी जंपिंग वगैरा वगैरा ।
हम तो वापिस अपने कम्फर्ट इन में आये थोडा आराम किया और समय से सुपर शटल बुलवा के एयरपोर्ट । हमारी उडान 3¬:15 पर थी जो ऑकलैन्ड 5 बजे पहुंची ऑकलैन्ड से लॉस एन्जेलिस (एल ए U.S.A. ) की उडान जो 30 ता के शाम के 7:15 की थी जो 30 तारीख को ही सुबह 12 बजे एल ए पहुँची । तो हमने 5 घंटे समय गेन किया ।Theory of relativity को प्रत्यक्ष अनुभव किया । उडानें, खाना सब चकाचक कोई वांधा नही । एयर-पोर्ट पहुंच कर भी सब सही सलामत बाहर आगये । हमारी बुकिंग लॉस एन्जेलिस (एल ए U.S.A. ) में Hotel Crown Plaza थी । (विडिओ देखें) vdo 8

हम बाहर आकर चलने लगे सामान समेत कि होटल की शटल्स का स्टॉप दिख जाये । तो सुरेश को स्टॉप मिल गया और सुहास ने भी फोन करके जानकारी हासिल कर ली । होटल की नीले रंग की शटल दिखी तो सबकी सांसे वापिस चलने लगीं । होटल पहुंचे नहाये और होटल से ही पिज्झा खाया । आराम भी किया ।
शाम को विजय के भाई सतीश उनकी पत्नी फे और बेटी हेलन उसके छोटे से बेटे काय के साथ हम से मिलने आये । पिछली बार जब हम हवाई गये थे तो इनके घर लॉस एन्जेलिस (एल ए U.S.A. ) में ही रुके थे । उन्होने सबके लिये कुछ कुछ उपहार लाये थे और हमें एक चायनीज़ रेस्तराँ में डिनर के लिये ले गये । (विडिओ देखें) vdo 9

खूब बातें हुई पतिपत्नी दोनों बहुत मिलन सार और आतिथ्यशील हैं । वापिस आकर फिर होटल के लाउंज में गपशप हुई । vdo 10 (विडिओ देखें)

उन लोगों को विदा करके हम कमरे में आये और अपनी पैकिंग कर के सो गये । vdo 11 (विडिओ देखें)

सुबह 6 बजे उठे और मर्दों के जल्द बाजी की वजह से पौने सात बजे की शटल लेकर 7 बजे से पहले ही लाइन में लग गये ( अंत में यह काफी मददगार साबित हुआ )। अब हमारी उडान थी फिरसे UNITED की । तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे साथ क्या हुआ होगा । लाइन काफी लंबी थी फिर भी हम धीरज से खडे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे हाथ में समय़ भी था । खैर हमारी बारी आई और सुरेश ने हमारे टिकिट नंबर फीड किये कोई नतीजा नही 3-4 बार नंबर फीड करने के बाद मेसेज आया कि कस्टमर सर्विस को कॉन्टेक्ट करें । तो हमने जो काउंटर पर खडी थी उस लडकी को बोला वह सुन कर थोडी देर के लिये गायब हो गई । इतने में एक सुपरवाइज़र टाइप लडकी दूसरी लाइन के लोगों को हमारी लाइन में भेजने लगी । हमें गुस्सा तो बहुत आ रहा था फिर थोडी देर बाद वह लडकी आई और हमारे पीछे के लोगों को टिकिट देख कर चैक-इन कराने लगी । जब हमने कहा कि हमारा क्या हुआ तो बोली आप लोग 37 नंबर काउंटर पे जाइये । वहां गये तो वहां भी वही हाल कोई हमें सुने ही ना । इस बीच उडान के लिये कुल सवा घंटा बचा था और अभी सिक्यूरिटी तो दूर चैक-इन का पता नही । काउंटर क्लर्क को हमने अपना किस्सा बताया तो वह जो अंदर गया आया ही नही । फिर वही सुपरवाइज़र लडकी फिर हमारी लाइन में और लोगों को भेजने लगी । “अब फ्लाइट तो ना मिलने की”, हम सोच रहे थे । इतने में प्रकाश की आवाज़ जोर से गूंजी वह उस सुपरवाइज़र छाप लडकी से उलझ गया था ,” What is going on here, nobody is attending us ,we have confirmed tickets here and we are booked on the flight which leaves in an hour. We are being shunted from here to there and nobody is attending us “. “But why is he yelling “ वह लडकी भुनभुनाई । इतने में एक हिन्दुस्तानी दिखने वाला बंदा आया और हमारी समस्या सुन ली और मैं कुछ करता हूं कह कर अंदर गायब । कोई 5 मिनिट बाद वह आया और कहा कि एयर न्यूझीलैन्ड की वजह से यह गडबडी हुई है पर हम उनसे बात कर रहे हैं उम्मीद है कि आप का काम हो जायेगा । हमें पक्का विश्वास था कि सारी गडबडी की जड़ ये यूनाइटेड एयरलाइन्स ही है क्यूं कि ऑस्ट्रेलिया –न्यूजिलैन्ड कि हमारी फ्लाइट्स सब बढिया रहीं थीं। खैर और 10 मिनिट के बाद जो आदमी पहले गायब हुआ था वह प्रगट हुआ और हमारा सामान अंततः चैक-इन हो गया हमे बोर्डिंग कार्ड भी मिल गये । अब सिक्यूरिटी तो हमें एक लेडी द्वारा बताया गया कि आप लोग मेरे साथ आओ और हमें ऊपर ले जाकर एक लाइन मे लगाया गया । वहां एक लेडी खाली 9 बजे की फ्लाइट वालों को ही आगे आने दे रही थी । हमारी फ्लाइट सवा नौ की थी तो हमें दूसरी लाइन के एकदम पीछे कर दिया । भुनभुनाते खडे रहे- मरता क्या न करता पर वहां नंबर आने से पहले ही एक और लेडी आई और हमें आगे ले गई और सिक्यूरिटी बिना झंझट के हो गई ।
अब बोर्डिंग के लिये जो गेट था काफी दूर था । हम भाग भाग कर जा ही रहे थे पर बीच में एक जगह सुहास गायब । कोई 5 मिनिट बाद वह दिखी । और अंततः हम विमान के अंदर पहुंचे और फ्लाइट उड चली । सुहास ने बताया ये डोमेस्टिक फ्लाइट है खाना वाना कुछ नही मिलेगा इसीसे मै खाना लेने चली गई थी लेकर आई हूं । 5 घंटे की फ्लाइट पर ठीक ठाक रही हमारे हिस्से की तकलीफें पहले ही जो उठा ली थीं । वॉशिंगटन डीसी पहुंचे तो जिम और हेलन लेने आ गये थे । फिर गाडी में बैठ कर घर । 31 तारीख के शाम के पौने सात बजे सुहास के घर बैठ कर चाय पी । और सोचा चलने से पहले ही कितने वांधे थे। पहले भारतीय विद्यार्थियों की पिटाई फिर सुनामी फिर स्वाइन फ्लू पर इन सबसे तो बचे ही और ट्रिप भी बढिया रही । थोडी दिक्कतें भी आईं पर कष्ट के बिना कृष्ण किसे मिले हैं, क्या कहते हैं आप ?

रविवार, 27 सितंबर 2009

शुभ दशहरा


माँ, नौ दिन तक आपने सेवा का अवसर हमें दिया, आज आपके गमन का दिन है । ह्रदय आपके जाने से द्रवित है । आपके आने और रहने की खुशी को भी हम मन में समेटे हुए हैं । आशा करते हैं कि आशिर्वाद रूप में हमें आप से असीम शक्ति प्राप्त हो और शत्रू का निर्दालन करने में हम सक्षम बनें ।

आज विसर्जन दिवस
जन-ह्रदय व्यथित द्रवित
माँ इतनी खुशी देकर
जाना ही क्यूं है उचित ?
नौ दिन कैसे बीते
देह मन आनंदित
ढोल नगाडे बाजे
आरती और शुभं-गीत ।

(विडिओ देखें)


जाने के दिन पर माँ,
देकर जाना आशीष
जन-शक्ति, सैन्यशक्ति
देशभक्ति हो जागृत ।
ऐसा हो गर्जन कि
शत्रू हो आतंकित
हम रहें तैयार सदा
देश रक्षण हितार्थ ।
आप सबको दशहरे के पावन पर्व की शुभ कामनाएँ ।।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

घुमक्कडी -9 ऑस्ट्रेलियन म्यूज़ियम



ऑस्ट्रेलियन म्यूज़ियम इस देश का सबसे पुराना म्यूज़ियम है । यह दुनिया भर में अपने नेचुरल हिस्ट्री तथा मानव विज्ञान विभाग के लिये मशहूर है । इसकी नीव 1845 में पडी थी। clp8 (विडिओ देखें)


म्यूजियम का टिकिट था 12 डॉलर प्रति व्यक्ती । टिकिट लेकर पहुंचे देखने । शुरु में ही क्वाला जी दिख गये एक पेड के तने पर चढे हुए । उल्लूजी भी थे जिन्हें देख कर बचपन में पढी एक कविता याद आ गई और हंसी भी ।
उसे उल्लू, ऊ से ऊन कहती है ये नानी
हिंदी में उल्लू उल्लू है, अंग्रेजी में ज्ञानी
मास्टर जी जब उल्लू कह कर के मुझे खिजाते
मै अंग्रेजी मतलब लेता उलटे मुंह की खाते । clp9 (विडिओ देखें)

आगे बढे तो कुछ समुद्री शेल्स थे बहुत बडे बडे । फिर यहां के एब-ओरिजिनल्स के बनाये स्लिट ड्रम थे कुछ टोटम पोल्स भी थे जो आयलैन्ड (द्वीप) कल्चर की खासीयत है । फिर हम गये स्केलिटन के विभाग में जहां एमू, पिंजरे में तोता, कुर्सी पर बैठा आदमी, घोडे पर आदमी, ऐसे ऐसे अस्थिपंजर दिखाये गये थे । वहीं हाथी, व्हेल वगैरा के भी विशालकाय अस्थिपंजर वहां थे ।
एक सीढी चढ कर ऊपर गये तो पहुँच गये मिनरल्स और मेटल्स विभाग में जहां एक सचित्र जानकारी दी गई है कि पृथ्वी के अंदर किस तरह से किन सतहों पर ये कैसे बनते हैं । मेलेचाइट, यही एक नाम अब याद है वगैरा के सुंदर सुंदर क्रिस्टल्स, रत्न, उपरत्न आंखें ही नही ठहर रहीं थीं । सोना तथा चांदी दूसरे धातू, ऑस्ट्रेलिया का गोल्ड रश, वहां की माइनिंग का इतिहास तथा एक माइन का अवशेष सब कुछ था वहां ।
वहां से निकले तो सरीसृप विभाग में आ गये, सांपों और छिपकलियों का विभाग । इनके अलावा वहां बडे बडे मगर मच्छ और कछुए भी रखे थे ।
फिर देखा डायनोसॉर कलेक्शन । यहां थे तो सारे के सारे कंकाल । पर किस तरह एक एक हड्डी जोड कर इन कंकालों को तैयार किया गया, वाकई वैज्ञानिकों की दाद देनी पडती है ।
(video) clp10 (विडिओ देखें)

एक जगह तो स्पॉट-लाइट कार्यक्रम भी था अंधैरा करके केवल एक बडे डायनेसॉर कंकाल पर रोशनी डाल कर उनके धम धम चलने की और चीखने की आवाज सुनाई जाती है । तरह तरह के डायनेसॉर, मछली की तरह तैरने वाले, उडने वाले, विशाल काय, कडे आर्मर वाले, सजाये गये हैं, देखते ही रह जाना पडाता है बस । आप भी देखें (विडियो)
vdo clip 11 (विडिओ देखें)

स्तनधारी प्राणियों में थे व्हेल, तरह तरह के बंदर और उनके रिश्तेदार- प्रायमेट्स ,कांगारू और क्वाला भी ।
फिर आया पक्षी विभाग यह दक्षिण गोलार्ध में पक्षियों का सबसे बडा संग्रह है । ऑस्ट्रेलिया में प्रजनन करने वाली सभी पक्षी-प्रजातियां यहां प्रदर्शित हैं । एमू, कॉसावरी ( इसके पंजे इतने मजबूत और तीक्ष्ण नखों वाले होते हैं कि दुश्मन की क्या मज़ाल जो इसके सामने टिक जाये इसके पर भी काफी कडे होते है ), और किवी जैसे न उडने वाले पक्षी तो हैं ही और भी विविध तरह की चिडियां जैसे स्वेलो, रेन, क्रेन,समुद्री पक्षी आयबिस , सीगल्स, अलबेट्रॉस और गरुड, चील, तथा दूसरे मांसाहारी पक्षी भी । सफेद गरुड (ईगल) भी है जो अब नही पाया जाता । बहुत से दुर्लभ तथा लुप्त पक्षी भी । यहीं आकर पता चला कि असल शुतुरमुर्ग (ऑस्ट्रिच) अब यहां नही पाये जाते सिर्फ अफ्रीका में ही पाये जाते हैं एमू की भी कई प्रजातियां अब लुप्त हैं । सबसे तेज दोडने वाले और विशाल काय पक्षी के लुप्त होने के पीछे अर्थात मानव का ही हाथ है । (विडिओ देखें) clp12

आखरी में थी यहां के मूल निवासियों(एबओरिजिनल्स) की जानकारी जो एक नही बल्कि कई जनजातियों में बटे हुए थे हरेक की अलग पहचान और संस्कृति, .पर सारे परिवार और नाते रिश्तों को महत्व देने वाले, मेहमानों की आवभगत करने वाले । इसी का फायदा उठाया अंग्रेंजोनें । अपने शस्त्रों अस्त्रों के बल पर उनका प्रदेश तो छीना ही उनकी संस्कृति को नेस्त-नाबूद करने में कोई कसर नही छोडी । उनके बच्चों को अगुआ करके सालों साल उन्हे मिशनरियों के साथ रखा जाता था अपनी भाषा अपने लोग अपने रहन सहन से दूर बिलकुल काट कर । पर फिर भी इन लोगोंने अपनी संस्कृति को जीवित रखा हमारी स्मृति और श्रृति की तरह पीढी दर पीढी ।clip13 (विडिओ देखें)

इनके द्वारा बनायी गयी बहुतसी कलाकृतियां वहां दर्शाई गई हैं । एक तो जानवर की खाल से बना बडा सा लंबा कोटनुमा परिधान जो कितनी भी ठंड में आपकी रक्षा कर सके । बहुतसी मालायें चित्र लकडी की चीजें, वाद्य आदि भी हैं । आज की इनकी एक मिली जुली संस्कृति है जो इनकी पारंपरिकता तथा अंग्रेजीयत का मिश्रण है ।
म्यूजियम का ये हमारा आखरी पड़ाव था, अब पेटपूजा । तो म्यूजियम का ही रेस्तराँ खोजा और सैन्डविचेज और कॉफी का लंच करके निकले बाहर फिर हाइड पार्क से होते हे दो ट्रेने लेकर वापिस वायतारा स्टेशन और एक दो एक दो करते घर (विडियो) ।
सिडनी का ये हमारा आखरी दिन था तो सेलिब्रेशन तो जरूरी था और हमारे ग्रूप का सेलिब्रेशन याने खाने के बाद हाथ में रेड वाइन के गिलास थाम कर दिन भर की शूटिंग देखना वो भी सोफे पर पसर के-- अल्टिमेट लक्झरी । कल जल्दी उठकर क्वीन्सटाउन (न्यूजीलैन्ड) के लिये प्रस्थान करना था ।
(क्रमश:)

सोमवार, 21 सितंबर 2009

घुमक्कडी -8 –बॉन्डी बीच, हाइड पार्क



आज हमें सिडनी का फेमस बॉन्डी बीच देखना था और ट्रेन से जाना था टाउनहॉल स्टेशन तक और वहां से एक और ट्रेन लेकर बॉन्डी जंक्शन तक । यह एक नया अनुभव लेना था हमें, तो एक्साइटेड थे सब के सब । तो पहुंचे वायतारा स्टेशन और पता लगाया कि वायनार्ड के बजाय टाउन हॉल उतरना ठीक रहेगा और वहीं से दूसरी ट्रैन मिल जायेगी बॉन्डी जंक्शन के लिये । वहां से शायद पास ही होगा सोच कर निकल पडे घर से । vdo1 ( देखें विडियो )

वायतारा स्टेशन जो कि पास ही था वहां से ट्रेन ली टाउन हॉल तक । क्या ट्रेन थी, तीन लेवल थे इसमें और एक डब्बे में कम से कम 80 व्यक्तियों के लिये बैठने की व्यवस्था थी । vdo2 ( देखें विडियो )



जहां बस से हमे एक घंटा लगता ट्रेन ने हमें आधे घंटे में पहुंचा दिया । टाउन हॉल पे उतरे तो पता चला बॉन्डी जंक्शन की ट्रेन हमें 5 लेवल नीचे से मिलेगी । पाताल में जा रहे हों एसा लग रहा था । और यहाँ हमारा हिन्दुस्तानी दिमाग बिल्कुल नही चलाना चाहिये कि नीचे जाना हे तो कैसे भी चले जायें थोडा और नीचे उतर कर पहुंच जायेंगे । ऐसा नही होता विशेष प्लेटफॉर्म के लिये सूचना के अनुसार ही जाना चाहिये नही तो 2-3 बार आप ऊपर नीचे ही करते रहेंगे । तो उस पाताली प्लेट फॉर्म पर से हमने बॉन्डी जंक्शन की ट्रेन पकडी (विडियो) । कोई 15- 20 मिनिट में बॉन्डी जंक्शन आ गये वहां से पता चला कि बस मिलेगी बीच के लिये ।बस के टिकिट हमें स्टेशन पर ही मिल गये । बस के नंबर थे 381 और 383 । स्चेशन से बाहर आकर ही बस स्टैन्ड मिल गया । बस भी आ गई तो बस से पहुंच गये बॉन्डी बीच । vdo3 ( देखें विडियो )

हम थोडे आगे निकल आये तो उसका फायदा उठाते हुए हमने एक दूकान से कुछ सेब खरीद लिये कि बीच पर भूख लगेगी तो खा लेंगे । और फिर पैदल चल कर बीच पर आ गये क्या बीच था. महीन सफेद रेत, पांव के नीचे से फिसलती हुई । और लहरें ऐसी तेज तेज कि पानी नही दूध हो ऐसे लगता था । ये है ही सिडनी का सबसे फेमस बीच रेशमी रेत साफ सुथरा किनारा और नीला हरा पानी जैसे नीलम और पन्ने को घोल कर बनाया गया हो । इसे सिडनी का कोस्टल रिसॉर्ट कहा जाता है । दिन भी बहुत सुंदर था धूप खिली थी । vdo4 ( देखें विडियो )

लोग सर्फिंग कर रहे थे कुछ तैर भी रहे थे और कुछ हमारी तरह बीच पर टहल रहे थे। हां टहलना, सींपियाँ जो ज्यादा थी (पर पर 7-8 जितनी भी मिलीं थीं बहुत नाजुक सी) नही इकठ्ठी करना और तस्वीरें लेना भी अपने आप मे एक मुकम्मल क्रियाकलाप है । तो काफी टहले बीच पर, बडी सुंदर मनभावन हवा चल रही थी । प्रकाश और जयश्री दूर तक आगे निकल गये और फिर वापसी पर प्रकाश तो चल कर आये पर जयश्री ने ये दूरी दौड कर तय की । उसे शुरू से ही बोन्डी वीच जाने का बडा उत्साह था । लहरें काफी तेज थीं और फूटने पर फेनिल हो जाती थीं । vdo5 ( देखें विडियो )

बहुत देर तक लहरों का आनंद उठाने के बाद हमने एक बेन्च ढूंढा और उस पर बैठ कर अपनी सैंडविचेज़ खाईं सेब भी खाये । सी-गल्स यहां भी काफी थे । फिर बीच से पैदल चल कर बस स्टैंड तक गये और वहां से स्टेशन और दो ट्रेन बदल कर घर । vdo6 ( देखें विडियो )

घर आकर रोज की तरह चाय पी और फिर खाना वाना खाकर आराम से सोफे पर पसर कर रेड-वाइन के साथ दिन भर की शूटिंग देखी आप भी आनंद उठाइये (विडियो) । दूसरे दिन हमें ऑस्ट्रेलियन-म्यूजियम देखना था ।
आज 28 जुलै है । सुबह उठे और रोजाना की तरह सब जल्दी जल्दी तैयार हो गये । आज भी हमें ट्रेन से टाउनहॉल और वहां से दूसरी ट्रेन लेकर सेंट जेम्स स्टेशन जाना था । जहां उतर कर हमें हाइड पार्क से होकर म्यूजियम जाना था । हाइड पार्क बहुत ही खूबसूरत जगह है । विडियो देख कर आपको मेरी बात का अवश्य विश्वास हो जायेगा । जाते ही दिखा एक बहुत ही खूबसूरत फव्वारा जैसे कोई मोर अपने पूरे पंख फैला कर नाच रहा हो । ( देखें विडियो ) vdo7

उस से आगे चलते हे गये तो एक सुंदर सा केथीड्रल । बगीचा तो बहुत ही सुंदर, हरी भरी घास और तरह तरह के फूल खिले हुए। आगे चल कर देखा तो एक गोल सी छोटे स्टेडियम जैसी दिखने वाली जगह थी जिसके बीचों बीच एक गोल बना हुआ था जो असल में एक फव्वारा ही था जहां जमीन में से ऊपर को पानी फेका जा रहा था । इतना सुंदर सब कुछ हो और तस्वीरें ना खींचे ये कैसे होता तो खींची और खूब खींची । आगे चलते गये तो दो खूबसूरत पक्षी दिखे (शायद आयबिस) जिनका नाम हमें मालूम नही था वे तो खाने की तलाश में थे और हम उनके पीछे पीछे । Vdo8 (विडिओ देखें)

उनकी आवाज भी टेप हो गई
तो चल कर हम पार्क के म्यूज़ियम वाले सिरे पर आ गये । सामने ही म्यूज़ियम की बडी सी इमारत दिखाई दी थी तो रोड क्रॉस किया और पहुंच गये गेट पर ।
(क्रमश:)

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

घुमक्कडी 7—मोनो रेल और वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड



Welcome to my tour of Sydney..वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड, मोनो रेल (विडिओ देखें)Vdo Wel

मेरा बहुत मन था तोरंगा चिडिया घर देखने का जहां ऑस्ट्रेलिया के खास पक्षी शुतुरमुर्ग (इसमे से ऑस्ट्रिच तो अब यहां से लुप्त हो गये हैं पर एमू और कॉसावरी हैं) और मोनोट्रीम्स यानी अंडे देने वाले मेमल्स देखने को मिलते, पर टिकिट की कीमत देखी तो 49.50 डॉलर प्रतिव्यक्ति, इससे तो हमारा सारा बजट ही गडबडा जाता । हमें हमारी बस में दो लोकल लेडीज़ भी मिल गईं जिनसे इस बारे में हमने काफी पूछताछ की । उन्होने बडे जोर देकर कहा कि अगर ऑस्ट्रेलिया आकर झू नही देखा तो फिर क्या किया । उन्होने ये भी बताया कि और पक्षियों के लिये आप बर्ड वॉचिंग ट्रेल पर जा सकते हो । घर आकर इस पर बडा सोच विचार हुआ सिडनी के पेम्फ्लेट दुबारा छाने गये तो पता चला कि वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड देख सकते हैं वहां हमें कांगारू, एमू (शुतुरमुर्ग ) तथा ऑस्ट्रेलिया के और भी खास प्राणी देखने को मिल जायेंगे ।
तो सर्कूलर-क्वे तो जाना ही था वहीं पास ले ही मोनो रेल मिलती और वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड का भी पता चल जाता । तो यही तय कर के सोये कि वहां जाकर तय करेंगे । मोनो रेल तो जाना ही जाना है
यहां भी हमारी नींद जल्दी खुल जाती थी और हम रात को 8-9 बजे तक मुश्किल से जागते । सुबह 3 3-1/2 प्रकाश और सुहास उठ जाते और पहली चाय बना कर रखते । तो सब लोग चार बजे तक जग गये और चाय भी पी ली । फिर थोडी गप शप के बाद सब लोग अपने अपने कामों में लग गये जयश्री के पास सैन्डविचेज़ बनाने का चार्ज होता था मैं सब्जी दाल बनाकर रख देती । रोटियां थीं ही बनी बनाई तो रात के खाने तक का जुगाड हो जाता । तो सब वैसे ही किया और फिर 9 बजे तक हम लोग निकल लिये । आज भी ट्रेन नही चलने वाली थी तो मुफ्त बस की सेवा का लाभ उठाया । पहुंच गये विनयार्ड । फिर पैंया पैंया चल कर गये सरक्युलर क्वे । वहां जा कर पता चला मोनो रेल यहां से नही चलती वह तो टाउन हॉल के पास से मिलेगी । फिर चल पडी हमारी पलटन, पर सिडनी देखने का मज़ा आ गया । एक से एक बिल्डिंग्ज, तसवीरें लेते हुए जी नही भर रहा था । तो चलते गये और रुक रुक कर तस्वीरें भी लेते गये और आखिर कार मोनो रेल के स्टेशन भी पहुंचे । vdo1(विडिओ देखें)

स्टेशन के साथ ही खूब सारी दुकानें थीं खिलौनों की कपडों की तो सबने अपने अपने नाती पोतों-पोतियों के लिये कंगारू खरीदे और कपडे भी। सुहास नें और भी कुछ खरीदारी की ।vdo2 (विडिओ देखें)

स्टेशन पर पता चला कि एक बार टिकिट ले कर आप इस रेल में जितनी मर्जी चक्कर लगा कर सिडनी (डाउन-टाउन) देख सकते हो पर एक बार उतर गये तो फिर दुबारा टिकिट लेना होगा ।vdo3 (विडिओ देखें)

तो तय किया कि दो चक्कर तो लगाना ही है फिर बोर हो गये तो उतर जायेंगे । डार्लिंग हार्बर पर आखरी में उतरेंगे वहीं से लिविंग वर्ल्ड जाना है । तो टिकिट लेकर स्टेशन के अंदर पहुँचे और ट्रेन भी तुरंत आ गई पर भीड थी और हमें तो जरूरत थी 6 खाली सीटों की तो दो ट्रेन छोडने के बाद तीसरी ट्रेन के आखरी डिब्बे में हमारे मन मुताबिक जगह मिल गई । ये स्टेशन था सिटि सेन्टर ।vdo4 (विडिओ देखें)

ट्रेन चली और हम सिडनी शहर को ऊँचाई से देख रहे थे । बडी बडी ऊँची बिल्डिंग्ज़ के ऊंचे मालों को हम सामने से देख रहे थे और सिडनी टॉवर भी बहुत साफ नजर आया । एक चक्कर लगा कर पता चल गया कि रेल कोई 6-7 स्टेशन घुमाती है । विक्टोरिया, पैडीज़ मार्केट, चायना टाउन, हार्बर साइड, वर्ल्ड स्वेअर और डार्लिंग पार्क जहां हमें उतरना था । बीच में एक स्टेशन पर एक परिवार चढा साथ में दो प्यारे से बच्चे भी थे उनमें से एक तो काफी बातूनी था और सुहास के साथ उसकी अच्छी दोस्ती हो गई थी । (विडियो) vdo5 (विडिओ देखें)

हमे तो एक और चक्कर लगाना था तो बैठे रहे और एक बार फिर से घूम कर फिर डार्लिंग पार्क उतरे । यह काफी सुंदर जगह है समुद्र के किनारे, समुद्र या नदी किसी शहर या गांव की शोभा वैसे ही दुगनी कर देते हैं और वह साफ सुथरी हो तो क्या कहने । इस प्राकृतिक सौंदर्य के अलावा मानव निर्मित भी बहुत कुछ है यहाँ । वॉटर वर्ल्ड, वाइल्ड लाइफ, रेस्तराँ, म्यूजियम्स, बच्चों की ट्रेन, पार्क और चलने के लिये समुंदर के किनारे किनारे वॉक ट्रैक ।
तो यह सब देखते हुए पहुँचे वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड । यह और वॉटर वर्ल्ड पास पास ही हैं । टिकिट का पता किया तो यहां झू से थोडा कम यानि 34 डॉलर का था टिकिट । सुहास ने कहा कि जयश्री और तुम देख आओ हम यहां बाहर घूमते हे वैसे भी मैं इतना चल नही पाउंगी और फिर पास के रेस्टॉरेन्ट में मिलेंगे तुम दोनो से ।
मेरा तो बिना कुछ देखे जाने का बिल्कुल मन नही था तो मै तो फट् से राजी हो गई । और इस तरह मै और जयश्री टिकिट के लाइन में लग गये । बहुत बुरा लग रहा था खुदगर्जी पर । किन्तु कोई भी ना देखे इससे तो अच्छा था हम देखें थोडा शूट करें और सबको दिखायें ।
टिकिट लिया और अंदर । पहले तो तरह तरह की तित्तलियां थीं (मोनार्क तितलियां भी ) उन्हें देखा और आगे बढ गये वैसे भी यहां भीड बढाने के लिये काफी मर्द थे । फिर देखा दुनिया का सबसे बडा कॉकरोच और एक काली भयंकर मकडी बडी जहरीली । बहुत सारी मधुमख्खियां , vdo6 (विडिओ देखें)

दीमक वगैरा वगैरा पर एक जगह रुकना पडा, वहाँ थे स्टिक इनसेक्ट्स, हरे रंग के ये टिड्डे की तरह के कीडे पेड की डालियों से ऐसे लटके हुए थे मानो पत्तियां हों आप भी देखें (विडियो) । vdo7 (विडिओ देखें)

फिर नॉक्टर्नल यानि रात में घूमने फिरने वाले जानवर । यहां चमगादड, खास तरह के चूहे , उल्लू ग्लाइडर और भी कुछ कुछ जीव थे । मैने डार्क सेटिंग पर कुछ शूटिंग करने की कोशिश तो की है आप बतायें कि कुछ दिखा भी ।
फिर देखे तरह तरह के सांप अजगर भी और एक लाल कॉलर लगाये छिपकली ये इसका इस्तेमाल अपने शिकार को डराने के लिये करती है वरना उसको कुत्ते के कानों की तरह लटका कर रखती है नही रखता है । और थी एक दो मुँही छिपकली, इसे छिपकली कहना इसका इन्सल्ट ही होगा । मुँह तो असल में एक ही होता हे पर पूंछ भी सर की तरह ही दिखती है । यह भी शिकार पकडने की सहूलियत के लिये ही है, आप भी देखें अजूबा । जब यह चलती है तभी सिर पैर का पता चलता है । बडे बडे मगरमच्छ भी देखे ।
अगले सेक्शन के लिये एक टनल में से गये और फिर एकदम रोशनी में और वहां देखे कांगारू इनके पेट पर एक थैली होती है मार्सूपियम जिसमें मादा छोटे छोटे बच्चों को रखती हैं। आतंम-निर्भर होने तक यहीं इनका लालन पालन होता है । इनके पिछले पैर और पूंछ काफी मजबूत होती है और ये छलांगे लगा कर चलते हैं । इसी तरह के होते है वालाबी भी पर ये पहाडी इलाके में रहते हैं और ऊबड खाबड जगहों में भी बखूबी छलांगे लगाते हैं । vdo8 (विडिओ देखें)

फिर पहुंचे रंग-बिरंगे तोते देखने जिनको किंग पैरट कहते हैं किसी का सिर नीला तो किसी का लाल पर हरा रंग सबका । कुछ तो इतने ढीठ ते कि हाथों पर चढ कर खाना ले लेते थे । यहाँ और बी तरह तरह के पक्षी ते जो आप विडियो में देख सकते हैं । यहां से बाहर एक बार फिर दिखे कंगारू । फिर आये कॉसावरी यानि शुतुरमुर्ग, सबसे बडा पक्षी । बहुत तेज भाग सकता है, देखने में बडा सुंदर पर अकडू लगता है ।vdo9 (विडिओ देखें)

वोम्बाट भी देखे जो छोटे से सुअर की तरह दिखते हैं देखने में मोटे ताजे पर काफी तेज भाग सकते हैं ।
अंत में आये क्वाला जी ये भी कंगारू के जात भाई हैं पर दिखते हें छोटे से भालू की तरह हम पहुंचे तो महाशय पेड पर चढे हुए थे और वहीं से करतब दिखा रहे थे । देख दाख कर बाहर निकले तो सबका लंच हो चुका था तो लंच किया गरम चॉकलेट दूध पिया और सबको कहानियां सुनाईं वाइल्ड लाइफ वर्ल्ड की । इसके पहले कंगारू के स्टेचू के साथ फोटो भी खिंचवाई । (विडियो) फिर वापिस वायनार्ड और बस से वायतारा और घर ।

(क्रमश:)

शनिवार, 12 सितंबर 2009

घुमक्कडी-6 - सिडनी



यहाँ पर इमिग्रेशन वगैरा बिना किसी झंझट के हो गया सामान लिया और बाहर आये । टैक्सी का कोई पहले से बुकिंग नही था तो टैक्सी ली और चल पडे । यहां और ऑकलैन्ड में भी टैक्सी में तो हम छै आ नही सकते थे तो हम सुपर शटल लेते थे जिसमें 8 लोग बैठ सकते हैं और सामान एक अलग ट्रैलर में रखा जाता है । हमें जाना था Waldorff apartments, Wahroonga. ऑकलैन्ड में तो हम बिलकुल डाउन-टाउन में थे तो बसें वगैरा आसानी से मिल जाती थीं । पर ये तो सिडनी से वाहरुंगा तक डेढ घंटे की ड्राइव थी तो शहर के सारे लैन्डमार्क्स देखते हुए हम चले जा रहे थे अब अगले चार दिनों तक हमें इन्ही राहों पर चलना था । थकान तो हो रही थी पर अपार्टमेन्ट पहुंचे तो परिसर देख कर ही थकान दूर हो गई । हमारी लैन्ड-लेडी बहुत ही अच्छी थी । वह हमें लिफ्ट से हमारे अपार्टमेन्ट तक ले गईं सारा अपार्टमेन्ट दिखाया । अपार्ट मेन्ट सुंदर था सजावट इंग्लिश थी । मसलन शो केस छोटे छोटे टेबल्स राइटिंग टेबल और चेयर अलग से । सोफा सेट और बेड तो थे ही । बाहर का कॉमन एरिआ तो और भी ज्यादा खूबसूरत था । (विडिओ देखें)


किचन तो दिखा ही नही । तो लैन्ड-लेडी ने दिखा दिया । एक क्लॉजेट में था किचनेट । वहाँ क्रॉकरी ,कटलरी के अलावा एक सॉस पैन और एक बिजली की आयताकार खूब गहरी निर्लेप (नॉन स्टिक) कढाई थी, कढाई इसलिये कह रही हूँ कि दोनो तरफ पकडने के लिये कान थे । एक बिजली की केतली भी थी जो खूब काम की सिध्द हुई, सब के सब पक्के चायबाज़ जो ठहरे ।
हमारी मकान मालकिन (चार दिन के लिये ही सही पर थी तो मकान मालकिन ) ने फ्रिज़ में 10-15 छोटे पैकेट दूध के रख दिये थे और साइड बोर्ड पर चाय कॉफी चीनी भी । मन ही मन उसका शुक्रिया अदा करते हुए चाय बऩाई और पी कर राहत महसूस की । वही (मकान मालकिन) फिर हमें अपनी गाडी से इंडियन ग्रॉसरी स्टोर भी ले गईं । मै और विजय हमारे घुटनों के दर्द की वज़ह से और गाडी मे सिर्फ चार ही जा सकते थे इसलिये मै और विजय घर पर रहे और चार लोग उनके साथ हो लिये । हमने टी.वी. खोला तो देखा भारतीय विद्यार्थियों के ऊपर हो रहे हमलों के बारे में एक ग्रूप डिस्कशन हो रहा था (सामुहिक चर्चा सत्र ) । उसमे भारतीय विद्यार्थी, ऑस्ट्रेलियन पोलिस, वहां के सामाजिक कार्यकर्ता आदि थे । वहीं पता चला कि कुछ घटिया कॉलेजेस् कैसे एडवर्टाइजमेन्टस को खूबसूरत बना कर भारतीय विद्यार्थियों को आकर्षित करते हैं और कैसे उन्हे यहाँ आने पर सचाई का पता चलता है तो भी वे किसी और कॉलेज में दाखिला नही ले सकते क्यूंकि ये कॉलेज उन्हें दूसरी जगह जाने नही देते बंधुआ मजदूरों की तरह । वैसे ही यह भी कि अधिकतर भारतीय विद्यार्थी यहाँ परमनेन्ट रेसिडेन्सी पाने के लिये ही आते हैं और इस तरह वे ऑस्ट्रेलियाई स्टूडेन्स् के साथ नौकरियों के लिये दावेदार बन जाते हैं जिसको लोकल स्टूडेन्ट्स पसंद नही करते ( यह अंडरस्टेटमेन्ट है ) । कुकरी और सोशल वर्क फील्ड में आसानी से जॉब मिल जाते हैं ये भी पता चला ।
हम तो उस कार्यक्रम में ऐसे खो गये कि ये लोग ग्रोसरी सब्जी वगैरा ले कर आये तभी समय का पता चला । इन लोगों ने ग्रोसरी क्या खरीदी, पूरी दूकान लूट लाये थे जैसे 15 दिन यहीं रहना हो । अचार, नमकीन, बने बनाये खाने, जैसे उपमा, रोटियां, ब्रेड, पीनट बटर, चीज़, सब्जियां, दाल, चांवल, तेल, घी, चाय, चीनी, मसाले सब, चाय के लिये अद्रक भी । इन लोगों को वापस आते आते 6 बज गये थे और नींद खूब जोरों की आ रही थी । फिर भी मैने रेडी टु मेक उपमा बना कर रख दिया कि किसी को भूक लगे तो खा लेगा । और थके हुए सारे के सारे जो सोये तो साढे तीन चार बजे तक ही उठे । सुहास और प्रकाश सबसे जल्दी उठते तो चाय भी वही बनाते ।
चाय पी कर हमने तय किया कि ट्रेन लेकर डाउन टाउन जायेंगे और आज सिडनी ब्रिज और ऑपेरा हाउस देखेंगे । रात को कोई उठा नही था तो उपमा वैसा का वैसा ही था । ब्रेकफास्ट मे उपमा ही गरम कर के खाया उपमा कमाल का टेस्टी था । जयश्री ने रास्ते के लिये सैन्डविचेज़ बनाये और मैने रात के लिये सब्जी और दाल ।
फिर निकल पडी हमारी टोली। पहले नीचे ऑफिस में जाकर जानकारी ली । पता चला कि वायतारा स्टेशन हम पैदल चल कर जा सकते हैं वहीं से हमें डाउन टाउन के लिये ट्रेन मिल सकती है । तो चल पडे 1-2 1-2 करते हुए । स्टेशन वैसे तो पास ही था पर वहां जाकर पता चला कि ट्रेक रिपेयर के लिये गाडियां बंद है इस लाइन की और हमें बस से ही जाना पडेगा । तो वापिस चल कर बस स्टैन्ड तक आये । हमने पता किया कि हमें वायनार्ड जाने वाली बस लेनी चाहिये वहां से ऑपेरा हाउस सिडनी हार्बर ब्रिज पास ही है । (विडिओ देखें)


तो बस के लिये खडे रहे । जल्दी ही बस आ गई और हम सब चढ गये । टिकिट लेने लगे तो पता चला रेल यात्रियों के लिये यह मुफ्त बस सेवा थी । बोनस मिल गया जी हमें तो । करीब 1 घंटे बाद वायनार्ड पर उतरे और पैदल पैदल चलते हुए सर्क्युलर क्वे पर पहुँचे जहाँ से फेरी भी जाती थीं झू के लिये, बॉटेनिकल गार्डन के लिये और बीचेज़ के लिये भी ।
वह पता करके आगे चलते चले गये बीच में एक जगह भारत के सपेरे की तरह और साधू जैसी वेशभूषा वाल एक आदमी मजमा लगाये बैठा दिखा तो हम भी पहुँच गये देखने तो वह एक मोटे बांस की तरह का कोई बाजा सा बजा रहा था उसकी भी तस्वीरें लीं आप भी देखिये । (विडिओ देखें)


फिर एक जगह थोडा बैठ कर सुस्ता लिये और कॉफी और सैन्डविचेज़ खाये । (विडिओ देखें)

वहीं एक जगह कुछ जापानी या इन्डोनेशियन नन्स अपने केरोल्स गा रहीं थीं बहुत खुश दिख रहीं थीं सब की सब, उनकी भी तस्वीरें लीं । (विडिओ देखें)

आगे चलते चले गये तो किसी सपने सा खूबसूरत ऑपेरा हाउस नज़र आया । हम नें इसे सब तरफ से घूम घूम कर देखा पास से दूर से खूब तस्वीरें लीं । सीढियां, जो ढेर सी थीं, चढ कर ऊपर गये, रेस्टॉरेन्ट भी देखा । पर अंदर से थियेटर न देख पाये वहाँ कोई कार्यक्रम चल रहा था । (विडिओ देखें)

बहाई टेम्पल के मुकाबले यह काफी बडा लगा और है भी, कोई 1000 कमरे हैं यहाँ।
यह सिडनी की ही नही पूरे ऑस्ट्रेलिया की पहचान है । सबसे अनोखी इमारत, इंजीनियरिंग का नायाब नमूना । पर हमें तो बहाई टेम्पल ही याद आता रहा । जहां बहाई टेम्पल एक शांत प्रार्थना स्थल है, ऑपेरा हाउस अपने डांस, ड्रामा, और म्यूजिकल कार्यक्रमों के लिया जाना जाता है जो कि सारे साल चलते रहते हैं । अपनी पूरी भव्यता के साथ सिडनी हार्बर के बेनेलॉन्ग पॉइंट पर खडे इस ऑपेरा हाउस का प्लान 1950 में John ultzon द्वारा डिज़ाइन किया गया । पर इसको बन कर तैयार होने के लिये 1973 तक इंतज़ार करना पडा ।
वहीं से सिडनी हार्बर ब्रिज का खूबसूरत नज़ारा भी देखा । पर सोचा कि ब्रिज को पास से देखने के लिये एक क्रूज़ लेकर पानी में से नज़दीक से देखते हैं तो फेरी के लिये वापस सर्कूलर क्वे आये औऱ मैनली बीच के लिये एक क्रूज़ ली । (विडिओ देखें)

क्रूज़ सिर्फ एक तरफ की ली कि मैनली से आगे बस से वायतारा चले जायेंगे और फिर घर पर बाद में पता चला कि डिसीजन सही नही था । बोट राइड में बहुत मज़ा आया खूब एन्जॉय किया खूब सारी सेल बोट्स के फोटो लिये और किनारे के भी । (विडिओ देखें)

सिडनी ब्रिज भी नजदीक से देखा खूब से चित्र भी लिये और विडियो भी । यह स्टील का खूबसूरत पुल जिसकी कमान इंद्रधनुष की याद दिलाती है रात में रोशनी से जगमगाता वैसे ही लगता होगा, पर यहां के अरसिक लोग उसे कोट-हैंगर कहते हैं । दुनिया के सबसे चौडे स्पैन वाले और सबसे ऊँचे कमान वाले इस पुल पर रेल, बस, कार पैदल सब तरह का ट्राफिक दिन रात चलता रहता है । कई साहसी लोग इसके ऊपर भी चढ जाते हैं । बोट में वैसे भी हमने खूब मज़े लिये आप भी देखें विडियो ।मैनली का बीच भी बहुत अच्छा हैऔर बाज़ार भी पर हम तो थक के चूर हो रहे थे । फिर भी हमने काफी शूटिंग की एक कौवा बिलकुल ऊँचे बैठ कर इतरा रहा था से भी फोटो में कैद कर लिया । (विडिओ देखें)


मैनली से हमें वापिस वायतारा जाने में बस में डेढ घंटा लग गया खूब थक गये इतने कि वायतारा स्टॉप से घर तक पैदल जाना भारी पड रहा था । (क्रमश:)

सोमवार, 7 सितंबर 2009

घुमक्कडी-5 – टाकापूना बीच



आज पक्का कोई न कोई बीच देखना था । हमेशा की तरह तैयार होकर नाश्ता कर के 9 बजे ही हम सब निकल पडे । विजय, सुहास के हज़बन्ड, एक गाना गुनगुना रहे थे । सुना तो पता चला कि गा रहे है,“ ALL LINE CLEAR.. छोटी सी ये अलटन पलटन फौज़ है मेरे घर की, साथ हमारे तोप का गोला बात नही है डर की .....“ मेरी तो हंसी छूट गई । सुहास ने पूछा भी क्या हुआ पर मेरी क्या मति मारी गई थी जो बताती, तो चुप ही रही, नही तो विजय की खैर न होती ।
मुल्ला की दौड मस्जिद तक तो यूनिवर्सिटी स्टॉप पहुंचे, और फ्री बस लेकर स्काय टॉवर । वहीं टूरिस्ट ऑफिस से पता चला कि यहां नजदीक के बस स्टॉप से ही टाकापूना नामक जगह के लिये बस जाती है और वहां जैसा हम चाहते हैं वैसा बीच है और वह हार्बर ब्रिज से होकर जाती है तो हम वह भी देख लेंगे।
तो वहां से निकले और दो ब्लॉक चल कर पहुंचे विक्टोरिया स्ट्रीट। बस का नंबर भी बताया गया था 86 और 83 तो जैसे ही बस आई हम सवार होकर चल पडे । दोनो तरफ दिखने वाली खूबसूरत बिल्डिंग्ज और पार्क वगैरा देखते रहे । यह करीब 30-40 मिनिट का सफर रहा ।
फिर आया हार्बर ब्रिज जिसे हम मुंबई-वरळी लिंक ब्रिज़ का छोटा वर्शन मान सकते हैं। सुंदर है ब्रिज़ आप भी देख लीजिये ।
फिर हम पहुँच गये टाकापूना । छोटी सी पर सुंदर जगह है । बस से उतर कर पहले ही बर्गर किंग देख लिया ताकि बर्गर लेकर बीच पर जायें और भूक लगने पर इधर उधर न भागना पडे । फिर बीच जाने का रास्ता पता किया जो कि एक छोटे से मार्केट होकर जाता था । तो वहां इधर उधर नजरें दौडा कर मुआयना कर लिया कि क्या कुछ लिया जा सकता है पर खास कुछ इंटरेस्टिंग चीजें दिखीं नही । सो चलते चलते बीच पर पहुंच गये सुंदर बीच था सुनहरे और काले रेत वाला । कुछ बच्चे खेल रहे थे पूछा तो बताया कि बांध बना रहे हैं । (विडियो)

तीनो चारों अपने छोटी छोटी मुठ्ठीयां भर कर रेत लाते और डालते ।
फिर हमने एक बार घूम कर बीच का मुआयना किया और रेत छान कर कुछ सीपीयाँ इकट्ठी कीं। पानी तो ठंडा था फिर भी एक बार जूते उतार कर पांव भिगो लिये । प्रकाश और जयश्री का स्टेमिना हम सब में अच्छा था वे दूर तक बीच पर घूमें फिर थोडी देर बाद सब एक जगह बैठ कर लहरें देखते रहे । (विडियो)

अब तक भूक लग आई थी तो बीच पर ही थोडे आगे एक बैन्च पर सब बैठ कर बर्गर खाने लगे । हमें देख कर वहां कुछ कबूतर और सी-गल इकट्ठा हो गये जब तक हमने उन्हें चारा नही डाला तब तक तो सब शांत थे पर फिर जयश्री ने अपने बर्गर में से कुछ टुकडे उन्हें डाले तब तो जैसे वे टूट पडे और जिसे न मिलता वो खूब जोरों से चिल्लाकर दूसरों को हटाने की कोशिश करता ।(विडियो )

फिर तो जैसे हम सबको ही जोश आगया और सबने छोटो छोटे टुकडे उन्हें डालने शुरू किये और ये पक्षियों की चिल्लपों हम खूब देर तक एन्जॉय करते रहे जब ब्रेड ही खतम होगई तो थोडे नमकीन के दाने डालें जो सिर्फ चिडिया ही उठा पाईं । प्रकाश के पास हमेशा सबके लिये मीठी सुपारी रहती थी जो वे सबको खाने के बाद हमेशा पूछते, उससे खाने का मज़ा दुगना हो जाता ।
थोडी देर और बीच पर बिता कर हमने वापसी की राह पकडी । जिस पार्क में से आये थे वहाँ एक जगह बहुत से खूबसूरत हल्के जामुनि और सफेद फूल थे, डेज़ी जैसे, उनकी फोटो खींची (विडियो) फिर आगे मेन रोड पर आये और मार्केट में जाकर विंडो शॉपिंग की ।
एक जगह एक खूबसूरत गोभी का फूल दिखा तो ले लिया कि सब्जी बना लेंगे । फिर उलटी तरफ के बस स्टॉप पर आकर वापसी की बस पकडी । आते आते एक जगह एक दूकान की सजावट में गुडिया और उसका छोटा सा घर था । पूरा का पूरा अपने घर की तरह लिविंग रूम, बेडरूम, किचन, बाथरूम समेत । उसका एक छोटासा क्लिप लिया आप भी देखें । बस से उतरे विक्टोरिया स्ट्रीट फिर पैदल स्काय टॉवर और फिर टैक्सी से सिन्ट्रालेन, अपने अपार्टमेन्ट।
अब परसों हमें जाना था सिडनी । हमारी उडान सुबह 9 बजे की थी, पर हमें तीन घंटे पहले एयरपोर्ट पहुंचना ही था (इंटरनेशनल उडानों के नियमानुसार )। इसीसे हमने सोचा कि हम कल ही विक्टोरिया मार्केट जो थोडा सस्ता मार्केट था वहाँ घूम आयेंगे और कुछ टोकन गिफ्ट वगैरा ले लेंगे ।
विक्टोरिया मार्केट से हमने कुछ कांच के किवि (पक्षी) खरीदे ताकि अपनों को कुछ तो दें ऑकलैन्ड की यादगार ।वहां पर एक जगह कॉफी पी । बाकी सामान तो वहाँ कुछ खास नही था । (विडियो )

प्रकाश हमारे ग्रूप के खजांची थे और अकाउंटंट भी, तो हिसाब किताब वही रखते थे । अलास्का में उन्होने ये काम खुशी खुशी निपटाया था कितु इस बार बिचारे कनवर्शन और हिसाब के मारे परेशान हो जाते । पर एक्यूरेसी में उनका जवाब नही ।
यह हमारी आखरी रात थी सिंट्रा लेन की तो रेड वाइन से सेलिब्रेट किया । इस बीच हमने उस टैक्सी वाले से भी बात कर ली थी तो वह 24 की सुबह ठीक 5 बजे हमें एयरपोर्ट छोडने के लिये भी आ गया । पैसे हमारे उसके पास जमा थे ही । एयर पोर्ट आकर हमने बढिया सी कॉफी पी और हमारे पास के सैन्डविचेज खाये । और सिक्यूरिटी वगैरा करवा के उडान के लिये पहुँचे । सौभाग्य से उडान एकदम टाइम पर थी और हमारे टिकिट नंबर भी पास पास के ही थे । (विडियो )

ऑकलैन्ड से सिडनी का हवाई रास्ता 3-31/2 घंटे का है । और टाइम डिफरन्स 2 घंटे का तो हम ऑकलैन्ड से 9 बजे निकल कर 10:30 बजे पहुंचने वाले थे । Flight पर अच्छा सा ब्रेकफास्ट मिला, रेड-वाइन मिली, मुझे सुहास को तथा जयश्री को बताया गया था कि जूस वूस ले लेना पर रेड वाइन जरूर मांगना और हमे पकडा देना । हम ठीक साढे दस बजे सिडनी पहुंच गये ।
(क्रमश:)

बुधवार, 2 सितंबर 2009

घुमक्क्डी-4



आज हमारा प्रोग्राम कैली टार्टलन का था । केली टार्टलन न्यूझीलैन्ड का एक एक्सप्लोरर, डायव्हर एवं और एडवेंचरर था, ( क्षमा चाहती हूँ इनमें से किसी शब्द की मुझे हिंदी नही आती ) जिसकी असीम इच्छा थी कि उसके ये अद्भुत अनुभव दुनिया भी देखे । इसीसे उसने 1985 में ये पानी के अंदर की दुनिया बसाने का अपना सपना पूरा किया । इसे केली टार्टलन के नाम से ही जाना जाता है । आज तो इसमें कितने नये नये आयाम जुड चुके हैं । यहां आकर हमें न्यूजीलैन्ड के दोनों और के समुद्रों ( दक्षिणी तथा प्रशांत महासागर ) के जीवन का अच्छी जानकारी मिलती है । कैली टार्टलन के लिये हमें स्काय टॉवर से उनकी बस लेनी थी जिसका किराया टिकिट में ही था ।तो हम यूनिवर्सिटी गये पैदल वहां से फ्री बस से स्काय टॉवर पहुंचे । दस मिनिट में हमारी बस आगई ।
यहां पर पेंगुइन्स का विशेष विभाग है जिसे देखने की हमें बडी इच्छा थी बडे बडे पोस्टर जो कह रहे थे ,” Experience Antarctica” तो टिकिट लेकर पहले उसी लाइन में लग गये ।यहाँ एन्टार्टिका के किंग तथा जेन्टू पेंगुइन की बस्ती बसाई गई है । यह टूर एक विशेष गाडी में लेनी होती है जिसका नाम है स्नो कैट । सफेद रंग की यह गाडी एक टनल के अंदर से गुजरती है, इसी में सवार होकर हम सब के सब चल पडे ।(विडिओ देखें)


पहले तो बरफ ही बरफ दिखा मानो एन्टार्कटिका साकार हो गया हो, और फिर उस पर चलते हुए पेंगुइन। एकदम सीधे खडे होते हैं ये पक्षी आदमियों की तरह । कुछ तो एकदम स्टेचू की तरह खडे थे जैसे हिलेंगे तो अंडे टूट जायेंगे । आगे एक दिखा जो अपने डैने हिला हिला कर कुछ कह रहा था शायद खाना मांग रहा था । और एक दूसरा हैड मास्टर की तरह घूम रहा था, जैसे हाथ पीछे बंधे हों । फिर कुछ पानी में तैरते हुए उछलते हुए भी दिखे इन्हे देख कर बडा मज़ा आया । ये सब आप सिर्फ कांच के बाहर से ही देख सकते हैं । एक सील भी देखी । और देखी एन्टार्कटिका की अंतर्राष्ट्रीय एक्सपीडीशन-हट जहां और देशों के झंडों के साथ भारत का झंडा देख कर खूब खुशी हुई । पैंगुइन्स को खाना खाते हुए भी हमने देखा इसके लिये मै जयश्री और सुहास दुबारा स्नो कैट में गये , किस मजे से वे मछली ले रहे थे और खा रहे थे । एक का पेट भर गया था तो वह इनकार करने लगा और मछली नीचे डाल दी ।(विडिओ देखें)

इन्हें देख कर वापस आये तो आगे हमें समुद्री खजाना (सी वर्ल्ड) देखना था । आजकल यहाँ का आकर्षण था स्टिंग रे । इसके अलावा, शार्क्स, सामन, ग्रोपर्स, स्कॉर्पियन मछली, तरह तरह की अन्य मछलियां भी थीं जैसै पाइप फिश और सी-हॉर्स जिन्हें देख कर बहुत मज़ा आया । मर्रे ईल्स भी थीं यहाँ उन्हें देख कर सुहास को और मुझे विश्वास हो गया कि हमने हवाई में जो देखा था वह समुद्री सांप ही था कोई मर्रे ईल नही थी। (विडिओ देखें)

स्टिंग रे के फिन्स का स्पेन काफी बडा था और उसके लहराते मूवमेन्ट्स देख कर बहुत ही आनंद आ रहा था । एक जायंट पतंग की तरह लगती है ये स्टिंग रे । इसके पूंछ के पास काटेनुमा poison gland होती है जो यह अपने शिकार को अचेत करने के लिये इस्तेमाल करतीं हैं । कुछ लॉबस्टर्स भी देखें । (विडिओ देखें)

एक जगह एक कछुआ देखा जो बहुत ही धीरे धीरे आगे बढ रहा था और याद दिला रहा था कछुए तथा खरगोश की कहानी । इसका रंगों का ड्जाइन बडा आकर्षक था ।
फिर देखे सी-एनिमॉन्स और स्पॉन्जेस सुहास बार बार उन्हें सी-एनिमोनी कह रही थी, पता चला अमरीका में यही कहते हैं । उनके नाजुक नाजुक टेन्टेकल्स इतनी खूबसुरती के साथ लहरा रहे थे कि मज़ा आगया । हालाँकि ये खाना जुटाने का एक साधन है । प्रकृती में सौदर्य कहाँ कहाँ बिखरा पडा है आप भी देखें विडिओ में कि कितने सुंदर हैं ये जीव। वहाँ पर बहुतसा समय बिताया शार्क मछलियां भी देखीं पर तुलनात्मक रीति से ये सिनेमा मे दिखाते हैं उससे काफी छोटी थीं और तेज थीं पर खूंखार नही लग रही थीं ।(विडिओ देखें)

सोचा था इसके बाद मिशन बीच जायेंगे पर वहाँ जाने का रास्ता कुछ ठीक नही था, और शायद वो रेतीला बीच भी नही था, थक भी गये थे तो सोचा क्यूं न यहीं थोडा चाय नाश्ता हो जाये तो हम लोगों ने वहीं के रेस्टॉरेन्ट में हॉट चॉकलेट और थोडे चिप्स लिये और थोडा सा सुस्ता लिये । फिर एक बार सोचा विक्टोरिया मार्केट चला जाये पर थकान कह रही थी “विनोSS द घर चलते हैं” सो वही किया ( आपकी सुविधा के लिये बता दूं कि ये जाने भी दो यारों का डायलॉग है ।) टैक्सी ली और वापस ।(विडिओ देखें)


अपार्टमेन्ट आकर सब सो गये फिर उठ कर चाय पी खाने का जुगाड किया दिन भर की शूटिंग देखी ।
कल कोई न कोई बीच देखना था और दिन वहीं बिताना था । वैसे ते यहाँ कई और भी आकर्षण थे जैसे क्रूज़ जिसमें व्हेल और डॉलफिन वॉचिंग के लिये जा सकते हैं पर हम ये सब कैपकॉड में कर चुके थे इसीसे आयडिया ड्रॉप कर दी । हां एक वाइटोमो केव्हज् देखने के लिये क्रूज़ थी, पर बहुत महंगी थी सो नही गये । यह क्रूज-बोट केव्स के अंदर ले जाती है जहाँ गुफा के अंदर हजारों जुगनुओं के प्रकाश में आप प्रकृति का करिश्मा देख सकते हैं । एक और क्रूज़ रंगीटोटो आयलैन्ड पर भी जाती है । जहां पर ज्वालामुखी का मुख देख सकते हैं पर रंगीटोटो ज्वालामुखी, जो आजकल सुप्त है, हमारे अपार्टमेन्ट से ही दिख जाता था तो.........( पर ये आप की जानकारी के लिये है )। चिडिया घर और दूसरे दूसरे खूबसूरत द्वीपों के लिये भी क्रूज़ थी पर वे सब दो या तोन दिन की थीं । (क्रमश: )

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

घुमक्कडी-३



सुबह जल्दी ही नींद खुल गई । चाय पीने के बाद बालकनी में से ऑकलैन्ड की खूबसूरत सुबह का नजारा देखा बादलों को चीर कर धीरे धीरे बाहर आता सूरज जैसे लिहाफ में से निकल रहा हो । हमारे इस बालकनी में से सामने ही हार्बर का दृश्य नजर आता था । खूब सारी सेल-बोटस् । काफी गप्पें लगाईं शाम के खाने के लिये भी कुछ बना लिया फिर भी हम सुबह ८ -८:30 तक घर से निकल गये ।(विडिओ )

और युनिवर्सिटि से फ्री बस लेकर पहुंचे स्काय टॉवर के टूरिस्ट ऑफिस । आज हमारा प्रोग्राम था ऑकलैन्ड सही माने में देखने का, तो ३५-३५ डॉलर के टिकिट लिये और कंडक्टेड साइट सीइंग के लिये निकल पडे । पहला ही पडाव था स्काय टॉवर पर वहीं बस को वापिस आना था तो हमने सोचा क्यूं न पहले म्यूज़ियम देखा जाये । तो वहीं उतरे । म्यूज़ियम की इमारत ही बडी भव्य
थी । अंदर जाकर देखा ५ -५ डॉलर के टिकिट थे पर हम सब सीनियर सिटिझन थे तो हमें वही टिकिट ३-३ डॉलर में मिल गये । म्यूज़ियम में बहुत अचरज वाली चीजें देखी (जाहिर है, म्यूजियम में और क्या देखेंगे ?) । पहला सेक्शन तो दुनिया भर से इकठ्ठी की गई खूबसूरत चीजों का था । माइकेल एन्जेलो के शिल्प, चीन की पॉटरी, कई चीजें भारत से भी थीं और जापान से भी जिन्हे ये लोग साउथ पेसिफिक आर्टिफेक्टस कहते हैं । माओरी लोगों( यहाँ के मूल निवासी) की बनायी चीज़ें भी । (विडिओ देखें)
दूसरा सेक्शन यहाँ के लोकल लोगों (माओरी ) के इतिहास का था तथा उनकी संस्कृति ओर शिल्प भी प्रदर्शित किये गये थे । जब अंग्रेज यहाँ पर आये तो यहाँ माओरी लोग रहते थे । वे पॉलिनेशियन मूल के थे ओर हवाई के लोगों की तरह ही फिजी से यहाँ आकर बस गये थे । माओरी लोग काफी शूर-वीर और लडाके थे । अंग्रेज़ों को उन्होने काफी टक्कर दी परंतु अंग्रेज़ अपनी टेक्नॉलॉजी की वजह से उन पर भारी पडे और अंत में न्यूज़ीलैन्ड उनका हो गया पर फिर भी पॉलिनेशियन मूल के लोग आज न्यूज़ीलैन्ड में काफी संख्या में से दिखते हैं । भारतीय भी काफी हैं ।
इस विभाग में हमने देखीं लकडी की तरह तरह की मानवीय आकृतियां घर, दरवाजे, नावें, औजार और सब उकेरे हुए शिल्प।
फिर पशु-पक्षी और पौधों का सेक्शन था । यहाँ हमने तरह तरह के पक्षी देखे । एमू और किवी यहाँ के प्रसिध्द पक्षी है । यह न उडने वाले पक्षी है । एमू आकार में बहुत बडा है और अब संख्या में कम हो गये हैं । यहां उस समय में इन्हीं की बहुतायात थी जब अन्न बहुत उपलब्ध था और न ही कोई बडे दुष्मन ही, इसीसे उडने की जरूरत ही नही थी । इससे इनके पंखों की क्षमता जाती रही और आकार बडा हो गया । किवि इसके मुकावले आकार प्रकार मेंछोटा है, और भी बहुतसे पक्षी थे । अलबेट्रॉस तथा सी-गल्स और छोटी बडी अलग लग तरह की बहुत सी चिडियाँ । (विडिओ )

आखरी में था ज्वालामुखी सेक्शन । ऑकलैन्ड में रंगीटोटो नामक ज्वालामुखी है जो अस्सी साल पहले जागृत हुआ था कई लोग उसकी चपेट में आ गये थे और जानवर भी । इसकी एक पूरी फिल्म देखी जहां ज्वाला मुखी के विस्फोट के समय हमारी कुर्सियों के नीचे की भी जमीन हिलती है तो उससे काफी कुछ वास्तविक सा लगता है । रंगीटोटो पर्वत हमारे अपार्मेन्ट के बालकनी से भी दिखता था । इसी सेक्शन में लावा से पेट्रिफाइड एक आदमी भी रखा था । एक हाथी भी । न्यूजीलैन्ड पहले भारत और ऑस्ट्रेलिया से जुडा हुआ था । इसीसे यहाँ के कुछ पोधे और पशु भारत जैसे हैं हाथी,चीता,शेर,हिप्पो और बहुत से प्रायमेट्स, बाद में अलगाव की वज़ह से इनमें काफी परिवर्तन आगया । म्यूजिंयम के अंदर ही स्वागत कक्ष के पास एक सुंदर सा रेस्तराँ भी है । फिर बाहर आकर हम ने अपनी एक्प्लोरर बस पकडी, हमारा अगला पडाव था स्काय टॉवर ।
स्काय-टॉवर दुनिया के सबसे ऊँचे टावरों में से एक है । इसे ऑकलैन्ड टॉवर भी कहते हैं । इसकी ऊँचाई आयफेल टॉवर से भी ज्यादा है ३०९ मीटर (यहाँ किसने देखा है आइफेल टॉवर !)। यहाँ मीटर ओर किलो ही चलते हैं अमेरिका की तरह मील ओर पाउंड नही । यहाँ नीचे एक खूबसूरत होटल भी है स्काय सिटी । इसका परिसर बहुत ही खूबसूरत है, और ऊपर से नीचे के नजारे का तो कहना ही क्या ? (विडिओ देखें)

तो हमने यहाँ २८ -२८ डॉलर के टिकिट खरीदे और लिफ्ट से ऊपर गये । इतनी उँचाई से सारा ऑकलैन्ड शहर बेहद खूबसूरत दिखा । खूब तसवीरें खींची और एक चक्कर लगाया । गैलरी के फ्लोर के कुछ हिस्से कांच के बने थे तो वहाँ से नीचे देखने में थोडा थोडा डर भी लगा । वहाँ से स्काय डायविंग भी कुछ लोग कर रहे थो तो उसकी तसवीरें खींची । उन्हें देख कर ही थ्रिल महसूस हो रही थी । खुद तो करने की हिम्मत थी नही तो देख कर ही खुश हो गये । फिर नीचे आये वहां नीचे के स्टोर से कुछ पिक्चर पोस्टकार्ड खरीदे । और तुरंत ही पते लिख कर पोस्ट भी कर दिये सबने अपने अपने नाती-नातिनों, पोते पोतियों को । फिर थकान हो रही थी तो एक टैक्सी पकडी और मकाम पर वापिस । इस ट्रिप पर हम खूब एहतियात बरत रहे थे दुनिया भर में एच१ एन १ कै हौवा फैला हुआ था तो बाहर सिर्फ गरम चाय या कॉफी ही पीना खाना घर पर ही कुछ बना लेना आदि । तो सुबह ही कुछ बना कर रख लेते और शाम को माइक्रोवेव में गरम करके खाते । इससे सेहत के साथ साथ बचत भी तो हो रही थी । इसीसे चुपचाप टैक्सी ली और मकाम पर । फ्री बस लेते तो युनिवर्सिटी से तो आगे पैदल ही जाना पडता ।
रास्ते इस तरह ऊँचे नीचे हैं कि सैनफ्रानसिस्को का क्रुकेड स्ट्रीट याद आ गया । और हम सब तो ठहरे आर्थ्राइटिस वाले या सीनीयर सिटीझन, तो टैक्सी में जाने में ही खैर थी । शाम को खाना खाने के बाद दिन भर की शूटिंग कैमरे से टीवी पर देखी और गपशप हँसी मज़ाक कर के सो गये । यहाँ नींद बहुत जल्दी आती थी, “खा के गिलौरी शाम से ऊँघे वाला हाल था” । और खुलती भी बहुत जल्दी थी ।
(क्रमश:)