शनिवार, 29 मार्च 2008

सपनों को तो मेरे...

मैने भी तो चाहा था बॅग ले के स्कूल जाना
अम्मा ने कह दिया था मुन्ने को है सुलाना

मेरी भी तो ललक थी हो मेरी भी सहेली
खेलूं मैं उसके संग संग बूझूँ कोई पहेली
पर रोटी सेंकने की बारी थी अब तो मेरी
उसके भी पहले था मुझे, इस चूल्हे को जलाना


मेरी भी तो चाहत थी पढूँ मै भी, उनके जैसी
पहनूं वो स्कूल की ड्रेस, कविता सुनाऊँ वैसी
इन कापी किताबों में फेकें क्यूं बापू पैसा
लडकी को तो वैसे भी ससुराल को है जाना


मैं भी तो चाहती हूँ मैं भी बनू कलक्टर
या फिर बनू मै टीचर या कोई लेडी डॉक्टर
झाडू है घर में देना, पानी है भर के लाना
सपनों को तो मेरे फिर मन में ही है रह जाना

आज का विचार
मातृभाषा का अनादर माँ के अनादर समान है
जो मातृभाषा का अनादर करे वह देश-भक्त नही हो सकता ।

स्वास्थ्य सुझाव

पालक, खरबूजा, पपीता, गाजर, कद्दू और शकर कंद को
अपने भोजन में अवश्य शामिल कीजीये । ये आपको
केंसर जैसे बीमारियों से बचाके रखेंगी ।
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