रविवार, 12 जून 2016

जीवन की यह अजब पहेली

कभी कहानी बहती रहती, कभी मोड पर रुक जाती है।
कभी कविता सी मचलती रहती, कभी अडियल सी ठहर जाती है।

कभी सुरों की सजीली महफिल, जमते जमते उठ जाती है,
बजते बजते ही सितार की तार टूट के सिहर जाती है।

हीरा तराशते तराशते, जैसे कोई दरार पड जाती,
जानें कितनी सुंदर कलियाँ बिना खिले मुरझा जाती हैं।

मन के इस चंचल से पट पर जब कोई आकृति उभरती,
जाने क्या हो जाता है कि बनते बनते मिट जाती है।

मंदिर की घंटी का मधुरव, कानों में रस घोल रहा हो,
कैसे कोई कर्कश सी ध्वनी, लय, ताल बिखरा जाती है।

लहरों पर खेलती नाव जब लहर लहर मचलती होती,
कभी अचानक भँवर में फँस कर वजूद अपना खो जाती है।

राह एक पकड के राही मंजिल अपनी पा जाता है
तब जीवन की अजब पहेली उलझ उलझ के सुलझ जाती है।
एक टिप्पणी भेजें