मंगलवार, 26 मई 2015

अपराध बोध

देखें हैं मैने अपनों के कष्ट,
देखा है उन्हें पल पल घुलते
तिल तिल मरते,
पूर्ण अनिच्छा से छोडते हुए ये संसार।
जब कि बाकी था कितना कुछ पाना, उन्हें, अपने हिस्से का।
कितना सुख, कितनी पूरी होती आशाएं, आकांक्षाएँ
जो अधूरी छोड,जाना पडा उन्हें।
नही पूछी किसीने उनकी मर्जी
बस सज़ा सुनादी, उन्हें भी और उनके अपनों को भी।
और फिर वह दवाओं का अंबार, जिसमें से एक भी कारगर नही हो सकी,
वह बिस्तर, वह अपनों के मायूस चेहरे। भरे मन से इर्द गिर्द घूमना।
और उनका दिन गिनना, बस दिन गिनना।
हर दिन कम होती शरीर की ताकत,
हर दिन गहरे धंसती आंखें, गालों के गहराते खड्डे
हाथों पावों की हड्डियां, पतली होती जाती सिकुडती त्वचा,
और मेरा मुझमें से रोज कुछ टूटते जाना।
स्वयं के जीवित होने का अपराध बोध गहराते जाना।
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