रविवार, 11 अक्तूबर 2009

त्रिदल


घास पर ओस
धरती के आँसू
छलके छलके ।

सुबह की उजास
तुम्हारी मुस्कान
महकती हुई ।

काले गहरे
रात के अंधेरे
तुम्हारे गेसू ।

मेरा मुडना
तुम्हारा ठिठकना
कुछ कहता हुआ ।

चांदनी रात
तुम्हारी बात
अब किसके साथ ?

कब मुड गए
साथ चलते हुए
अपने रास्ते

मन बेचैन
मन चंचल
कैसा ये छल ।

अब तो उसे भी
भूलना ही होगा
बीता कल ।
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