मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

गम ना कर

कैसा ये धोखा हमारे साथ हुआ
कांधे पे सिर रखा जिसके
वही कातिल हुआ ।

जिसको बना के राज़दार
हम थे बेफिक्र
वही भेदी हमारे घर का हुआ ।

हर बार सोचते रहे
अब कुछ अच्छा होगा
हाल हमारा बद से बदतर हुआ ।

सुकून से तो जीते थे
चाहे रोटी कम थी
अब जान का दुष्मन हर निवाला हुआ ।

भोर जायेंगे तो क्या
शाम को घर लौटेंगे
इस सवाल का पक्का, न जवाब हुआ ।

अब तक कटी है तो
आगे भी कट जायेगी
सपना अपना चाहे पूरा न हुआ ।

ऐसे ही जिया करते है
हजारों में लोग
गम ना कर, तू अकेला न हुआ ।
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