मंगलवार, 9 अक्तूबर 2007

वे दु:ख बेचते हैं

कालेज में किसी कवी की एक अंग्रेजी़ कविता पढी थी
उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं,

We look before and after
and pine for what is not
Our sincerest laughter
With some pain is fraught
Our sweetest songs are those
Which tell us the saddest thought

उसकी सच्चाई अब जाकर मालूम पड रही है । खास कर टी वी के धारावाहिक देख कर । कोई भी धारावाहिक देखिये,
बिलकुल व्यंग वाले ऑफिस-ऑफिस को ही ले लीजिये, दुख को ही भुनाया जाता है, बेचारे मुसद्दीलाल हमेशा हारते ही रहे हैं । उनकी परेशानियों का कोई अंत नही । पारिवारिक धारावाहिकों की नायिकाओं का दुःख है कि दूर ही नही होता । षड़यंत्री महिला रिश्तेदारों से उन्हे भगवान भी नही बचाते । जिग्यासाओं, कावेरियों, कुकी काकियों तथा सिंदूराओं से मेरा तो कभी पाला पडा़ नही, पता नही किन परिवारों में बसतीं हैं ये ? शायद अति पैसैवाले परिवारों में । और तो और कहानी का कोई सामान्य अंत भी नही होता ।


दुखों को भुनाने के चक्कर में वाहिनियाँ इन्हे खींचती ही चली जाती हैं तब तक, जब तक की जनता उनका टी आर पी कम नही कर देती । कई बार तो फिर हडबडाहट में इन्हें समेट लिया जाता है । सामान्य पारिवारिक कथाओं की कब मर्डर मिस्ट्री बन जाती है पता ही नही चलता । और कहाँ कहाँ से इनके नये रिश्तेदार पैदा होते हैं ये भी । पर हमारी जनता में भी अद्भुत सब्र है । यह सब परोसा हुआ कचरा वह बकरी की तरह खाती ही रहती है, एक दो नही पांच पांच सालों तक ।

पचास तथा साठ के दशकों में दुखान्त फिल्मों का बोलबाला था । मीना कुमारी, नूतन, निम्मी इन फिल्मों की रानियाँ थीं ।
इन्हे हिंदी फिल्मों की ट्रेजेडी क्वीन कहा जाता था । और लोग बाग खास कर महिलाएं इन फिल्मों को खूब देखतीं और भरभर के आंसू बहातीं । पैसे देकर दुख मोल लेतीं ।
तब से अब फिल्मों मे ये बदलाव आया है कि वे आंसू नही अब जिस्म की नुमाइश करने लगीं हैं । रुलाने का ठेका अब टी वी वाहिनियोंने ले लिया है । एक के बाद एक दुख इन नायिकाओं पर लादे जाते हैं, अगर कोई अभिनेत्री तंग आकर धारावाहिक छोड देती है तो नायिका की प्लास्टिक सर्जरी करवा के वे नायिका ही बदल देते हैं । लेकिन दुख बेचते ही जाते हैं, आखिर मुनाफे का सौदा जो है ।

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

सही कह रही हैं.

वैसे जो बिकता है वो ही तो बेचते हैं.

Gyandutt Pandey ने कहा…

आप जैसा लिख रही हैं - मुझे भी वैसा लगता है। टीवी मीडिया समग्रता से कुछ प्रस्तुत नहीं करता. एक पक्ष - दुख, सेक्स, हास्य --- इनकी नुमाइश करता है। मैने तो उसपर जाना छोड़ दिया है।

anitakumar ने कहा…

Asha ji mere blog per aane ke liye dhanyawaad ...mujhe prasannta hai ki aap mere vichaaron se sehmat hai..aapka email id nahi maaloom aur aapke blog per dikha bhi nahi is liye majbooran yahaan hi dhanywaad diye jaa rahi hun..waise aapne bhi jo likha hai ek dum such hai ...bahut aansoon bhaahne ke baad hum bhi thak gaye aur TV dekhna hi chod diya...usse toh yeh blogging hi bhali..meri dooseri rachnaayein aapko kaisi langin jaannane ki utsukta rahegi

संजीव कुमार ने कहा…

बिल्कुल सही कहा है आपने.

anitakumar ने कहा…

Asha ji ek baar fir yahaan aaker aapko dhanywaad de rahi hun ...aapko meri 'Mein" kavita achchi lagi, mujhe jaan ker harsh hua ...aaap plz apna email id dein taaki mein aapko personally likh sakun ...mera email id mere blog per hai right hand side top corner mein...ek baar fir se dhanywaad

हरे प्रकाश उपाध्याय ने कहा…

sahi, bilkul thik likha hai aapne