बुधवार, 2 मार्च 2011

चलते ही जाना



सुहास और विजय ने कुछ दिन दिल्ली में बिताये, बाजारों में घूमे फिरे । फिर हम सब निकल पडे राजधानी एक्सप्रेस से ठाणे के लिये, पता है पता है राजधानी ठाणे नही जाती, तो हम मुंबई सेंट्रल से वहां गये भाई । कोई ५-६ साल पहले हम लोग कोकण घूमने गये थे वहां की हमारी कुछ तस्वीरें सुहास ने देखी थीं और खास तौर पर हैमॉक पर बैठे हुए हमारी तस्वीरें तो सुहास ने तो कोकण घूमने का पूरा मन तब से बना लिया था । उसी के मुताबिक हमारा ये प्लान बना और धीरे धीरे इस प्लान में ११ लोग शामिल हो गये जो कि अंततः सिर्फ ८ रह गये । सुहास, विजय, सुरेश, मै, प्रकाश, जयश्री विजूताई ( सुरेश प्रकाश की चचेरी बहन) और लतिका (हमारी चचेरी देवरानी) ।
हम २१ तारीख को सुबह ठीक ७ बजे निकले । उसके भी पहले हम ५-६ दिन पुणे हो आये । सुहास को तुळशी बाग जो जाना था ।
(विडियो देखें) Clip242to265


पुणे का तुळशी बाग यानि दिल्ली का अजमल खाँ मार्केट । सुरेश और सुहास के मौसियों से भी हम मिले जो उमर में हम से काफी बडी हैं । पुणेमें वासंती और अर्चना वहिनी से मिले । अर्चना वहिनी ने अण्णा-रचित अंबा भजन सुनाया । पुणे से बहुत सा खाने पीने का सामान खरीदा । चिवडा चकली शंकरपाळे । लतिका ने डोंबिवली से भेळ का सामान, गुड की रोटियां और मेथी के लड्डू लाये थे (सर्दियों में मेथी के लड्डू यानि टॉनिक ) । मतलब की पेट पूजा की पूरी तैयारी थी । आज के लंच के लिये पराठे और बटाटा भाजी भी साथ थी । तो सुबह साढेचार बजे से हम तैयारी में जुटे और तय समय यानि ठीक सात बजे चल पडे । हमारी मिनि बस थी १७ सीटर टेम्पो-ट्रैवलर । ड्राइवर थे श्री विजय । हम सब के सब खूब उत्साहित थे । सुबह के सूरज की कोमल कोमल धूप एक सुखद गर्माहट दे रही थी । ठाणे शहर छूटा और कोकण देश का हमारा प्रवास सुरू हुआ । कोकण के चार मुख्य जिले हैं ठाणे, रायगड, रत्नागिरि और सिंधुदुर्ग । कोकण जमीन की एक संकरी पट्टी है जिसके पूर्व में है सह्याद्री पर्वत की शृंखला और पश्चिम में अरबी समुद्र । इसके सागर किनारे, हरियाली, पहाड, मंदिर और किले इसको एक अनोखा सौंदर्य प्रदान करते हैं ।
ठाणे शहर छूटा तो शुरु शुरू में तो पहाड भूरे ज्यादा हरे कम दिखाई दिये । पर दोनों तरफ पेड जरूर थे । पर थोडी ही देर में कोकण अपने पूरे सौंदर्य के साथ अवतरित हुआ । इसके पहले हम कोकण गये थे अक्टूबर में, तब क्या नजारा था हरे भरे, बादलों से ढके, पहाड, कल कल बहते झरने और नदियां और खेतों की हरियाली, मानो स्वर्ग में पहुँच गये हों । इस बार दृष्य कुछ अलग था दोनो तरफ आम के पेड आमों मे बौर लगा हुआ था और उसका एक मादक सुगंध सारे आसमंत में फैल रहा था । आम के साथ साथ ही काजू के पेड भी बौरा रहे थे । गांवों में घुसते ही नारियल सुपारी, केले के बगीचे जिन्हें यहां वाडी कहते हैं दिखते । (विडियो देखें)

गांव याने आदमी, आदमी यानि कचरा, प्लास्टिक की उडती थैलियां, गीला, सूखा, कचरा,नालियां और सडकों पर इकट्ठा पानी। किंन्तु जैसे ही गांव छूटते प्रकृति अपना सौंदर्य बिखेरने लगती । जैसे जैसे दक्षिण की तरफ हम बढ रहे थे आमों के जंगल के जंगल दिख रहे थे । नदियां स्वच्छ सुंदर । पहाड भी अब ज्यादा हरे भरे हो चले थे । आंखें जैसे सारी परिवेश अपने अंदर भर लेना चाह रही थीं । बच्चे स्कूल जा रहे थे । औरतें अपने कामों में लगी थीं । कोई सर पे गठ्ठर उठा के जा रहा था तो कोई सब्जियां ले जा रहा था । हम कोकण के छोटे छोटे गांवों से होकर जा रहे थे । मजेदार से नाम- नागोठणे, वाटुळ, वाकड, परशुराम वगैरा । हमारा पहला पडाव रत्नागिरि था यह चिपळुण के पास है । रास्ते में हमने थोडा नाश्ता किया जो हम साथ ले आये थे । प्रकाश के पास एक २५ कप वाला थर्मास था अलखोबार से लाया हुआ उसमें चाय भी थी । कमाल की बात ये कि ये चाय २४ गंटे गरमा गरम रहती । हमारा लंच भी हमारे पास ही था बस हमें जगह खोजनी थी । हमने हमारे ड्राइवर विजय को ये बता दिया था और विजय ने एक बहुत ही बढिया जगह खोज निकाली, ये एक वडा पाव केंद्र था जो दोपहर को खाली पडा था यहां शायद सुबह शाम ही दुकान लगती होगी खैर हमें तो लंच के लिये इससे बेहतर जगह मिल नही सकती थी । बेंन्चे, टेबल सब तैयार, हमने सारा सामान पानी आदि निकाला- पेपर व प्लास्टिक की प्लेटस्, पराठे, आलू की सब्जी, गुड की रोटी सब निकाला और टूट पडे, हरहर महादेव ।

ठाणे से रत्नागिरि का प्रवास कोई ६ घंटे का है । चिपळूण आते ही सब खुश हो गये कि अब रत्नागिरि आने ही वाला है ।
रत्नागिरि पहुँच कर हम अपने होटल पहुँचे । होटल विवेक, वहां फ्रेश हो लिये फिर सुहास ओर मै जरा आस पास का जायजा लेने एक चक्कर लगा आये हम चलते चलते थीबा पैलेस पहुँच गये । यहां अंग्रेजों ने ब्रम्हदेश के राजा को कैद करके रखा था । यह पैलेस हम अपनी पिछली ट्रिप में देख चुके थे । यहां पर उस जमाने का फर्निचर और राजा की वस्तुएँ रखी हुईं हैं । उस वक्त तो पांच बजने वाले थे यानि सब कुछ बंद होने का समय ।
रत्नागिरि यानि लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक का जन्मस्थान । वही लोकमान्य टिळक, जिन्होनें घोषणा दी थी कि, ”स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और वह मै लेकर ही रहूँगा” । रत्नागिरि में सेन्ट्रल पार्क के पास सौ साल पुराना एक वाचनालय है और उससे थोडी ही दूर है लोकमान्यजी का घर जो अब इनका स्मारक है। यहां तिलक जी के चलाये हुए अखबार केसरी के कुछ पुराने अंक हैं और उनके भाषणों के कटिंग्ज भी फ्रेम किये हुए हैं । तिलक जी की वस्तुएँ भी यहां सजायी हुई हैं । हम यहां पहले हो आये थे और हमारे साथ के अधिकांश लोगों का यह देखा हुआ था ।
हम सब ने तय किया कि हम समंदर की सैर करेंगे और फिर खाना खाने जायेंगे । तो वही किया समंदर के किनारे गये वहां सूर्यास्त देखा और बहुत देर तक समंदर पर धीरे धीरे फैलता हुआ अंधियारा देखते रहे । कैसे पूरब का सिंदूरी लाल पीला रंग सलेटी-गुलाबी और फिर काले में बदलता है । समंदर के पानी पर रंगों की अठखेलियां, समंदर का यह अनोखा रूप एकदम अलग था । बहुत देर तक हम यह रूप हम अपनी आंखों में भरते रहे फिर उठ कर खाना खाने के लिये रेस्टॉरेन्ट ढूंढा । रेस्तरां सुंदर था वहां एक एक्वेरियम में रंगबिरंगी खूबसूरत मछलियां तैर रही थीं जो सुंदरता को चार चांद लगा रहीं थीं । आप भी आनंद लें । (विडियो देखें)

जम कर खाना खाया । मोदक भी मिले । होटल लौट कर गपशप की और सो गये सुबह जल्दी ही मालवण की तरफ बढना था ।
सबसे ऊपर के फोटो में प्रकाश, जयश्री, मै और सुरेश हैं । विडियो में सफेद बॉब्ड बालों वाली सुहास है और सफेद बालों वाले विजय हैं । लतिका सबसे छोटी और विजूताई नीले साडी में हैं ।

(क्रमशः)
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