शनिवार, 1 अगस्त 2009

माँ की खबर

चलना है चलते ही जाना है दस कोस
मां की खबर मिली है,
किसी किसी गांव से होकर
उस तक पहुँची है आज ।
भीमा कहता है, छोटे को
लेकर चली जा तू, मैं देख लूंगा बच्चों को
माँ की हालत कहीं ज्यादा न बिगड़ गई हो ।
चल रही है वह टूटी फूटी आधी अधूरी खबर के सहारे
गाँव, खेत, जंगल पार करती । सोचती है कब मिली थी आखरी ।
अचानक एक गांव में झुग्गियाँ नजर आती हैं उसके अपने लोगों की
यहीं होगा शायद भाई का झोंपडा ।
पूछती पूछती अचानक पहुँचती है एक उखडे पाल के पास
कुछ पहचान की निशानियाँ देख कलेजा धक से रह जाता है
फूट फूट के रो पडती है, कैसे चली गई री , मेरी बाट नही जोही ।
आँखों से आंसू की नदी बह निकलती है ।
पता चलता है पिछले बुध को ही चली गई माँ,
भाई भी पाल उखाड कर चला गया ।
हताश, बच्चे को छाती से चिपकाये
चलने लगती है सावरी, उलटी दिशा में पांव खींचते हुए ।

और मै सोचती हूँ कि जब मेरे माँ के जाने की खबर आई थी
तो दूरी से विवश मैं, न जा सकी न आँसू ही बहा सकी,
पैसे की गरमी से सूख जो गये थे ।
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