मंगलवार, 14 जुलाई 2009

ब्लॉगिंग क्यूं ?


मेरी तरह जो कितनों की कलम चल पडी है,
इस कलम से निकल कर स्याही फिसल पडी है ।
स्याही से ही बन बन कर अक्षर बिखर रहे हैं
उन मोतियों को चुन कर शायर पिरो रहे हैं ।
कितनों ने यहाँ देखो कितने कलाम लिख्खे
संपादकों के दफ्तर कितने पयाम रख्खें ।
जूते ही घिस गये रे चक्कर लगा लगा कर
फिर देखा प्रकाशक की भी हाजिरी लगा कर ।
कविता की ये किताबें बिकती नही है यारों
शायर की मुफलिसी है दुनिया में आम यारों ।
इसी से तो ब्लॉग पर ही लिखने की हमने ठानी
और शुक्रिया है उनका जो पढें हमारी बानी ।
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